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Categories: बीच बहस

प्रवासी मज़दूरों के लिए मौत का कुआं बन गया है पूरा देश

‘वंदे भारत मिशन’ के तहत कल मलेशिया, क़तर, शारजाह, मस्कट, दुबई से लेकर मध्य पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया के तमाम देशों से विमान लखनऊ, कोच्चि और चेन्नई समेत ढेर सारे हवाई अड्डों के लिए उड़ान भरे। इनके ज़रिये बाहर फंसे हज़ारों भारतीयों को अपने देश लाया गया। न सरकार ने इनसे किराया वसूला और न ही किसी तरह की उनको रास्ते में परेशानी हुई। विदेशी हवाई अड्डों पर पहुंचने पर संंबंधित देश के भारतीय राजदूतों ने उनका स्वागत किया और उसके बाद पूरे सम्मान के साथ स्वदेश के लिए उनकी विदाई कर दी। घर वापसी के बाद सभी यात्री भारत सरकार को धन्यवाद दे रहे हैं। जगह-जगह की तस्वीरें ऑल इंडिया रेडियो के ट्विटर हैंडल पर देखी जा सकती हैं। ये विमान जब देश की आसमानी सीमा में अपने नागरिकों को लेकर प्रवेश कर रहे थे तो उसी समय नीचे धरती पर हज़ारों प्रवासी मज़दूर सड़कों को पैदल ही नाप रहे थे। ये सब भी अपने घरों की ही ओर जा रहे थे। लेकिन न तो इनका कोई स्वागत करने वाला था न ही विदाई।

ऊपर से जगह-जगह इनको पुलिस की लाठियाँ ज़रूर मिल रही थीं। नतीजतन इन लाठियों के भय से बहुत सारे मजदूरों ने रेल की पटरियाँ पकड़ लीं। इन्हीं में से किसी एक शख़्स की चप्पल टूटी तो उसने बिसलेरी की बोतल को ही चप्पल बना लिया। तपती सड़क पर नंगे पाँव वह भी फटी बिवाइयों के साथ चलने की पीड़ा सिर्फ़ मज़दूर ही महसूस कर सकता है। वीरान सड़कों पर बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं के साथ बढ़ते जा रहे इन मज़दूरों को देखकर बँटवारे की तस्वीर ज़िंदा हो गयी है। कहीं माँ को पीठ पर लिए कोई श्रवण दिख जाएगा। तो कहीं नन्हें पैरों से डग भरते मासूम बच्चे। कई मज़दूर तो अपनी पीड़ा बताने के क्रम में फूट-फूट कर रोने लग रहे हैं। इन रोती-कलपती और बिलखती तस्वीरों को देखकर किसी का भी कलेजा मुँह को आ जाए।

सरकार ने पहले इनसे इनकी सड़कें छीनीं। मजबूरी में जब इन लोगों ने रेल की पटरियों का रुख किया तो वहाँ ट्रेनें मौत बनकर सामने खड़ी हो गयीं। कहीं पुलिस मार रही है तो कहीं हादसे जान ले ले रहे हैं। भूख से तो 24×7 का रिश्ता हो गया है। कई तो ऐसी ख़बरें आयीं जिसमें हज़ारों किमी की यात्रा के बाद घर के नज़दीक पहुँचने पर लोग दम तोड़ दिए। इसमें तेलंगाना से छत्तीसगढ़ आने वाली 11 साल की वह बच्ची भी शामिल है जिसने उल्टी-दस्त और फिर डायरिया की चपेट में आने से दम तोड़ दिया। बिहार के एक शख़्स का नाम भी इन अभागों में दर्ज हो चुका है जो घर के बिल्कुल नज़दीक पहुँच कर ज़िंदगी से हार गया। किसी का रास्ते में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया तो कोई सड़क हादसे का शिकार हो गया। सड़कों पर जैसे हर तरफ मौत नाच रही हो। वह कोरोना है। भूख है। गाड़ियाँ, या फिर कोई बीमारी। रूप इनका अलग-अलग है। लेकिन सड़क पर चलते इन गरीब-गुरबों को लीलने के लिए सभी तैयार बैठी हैं।

आख़िर ये लोग कौन हैं? क्या ये देश के नागरिक नहीं हैं? संविधान क्या इन्हें कोई हक़ नहीं देता? सात समंदर पार से आप लोगों को ढो-ढो कर ला रहे हैं और अपने ही देश के लोगों को सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया गया है। जबकि न तो बसों की कमी है न ही ट्रेनों की। और न ही देश में पेट्रोल और डीज़ल ख़त्म हो गया है। एक बेशर्म सुप्रीम कोर्ट है जिसको लोगों के शराब की तो फ़िक्र है। और वह उनके लिए ऑनलाइन होम डिलीवरी तक की व्यवस्था करता है। लेकिन इन ग़रीबों की समस्या सुनने के लिए उसके पास समय नहीं है। जगदीप छोकर की पीआईएल पर एक महीने बाद सुनवाई भी की तो राहत देने की जगह घाव पर यह कहकर नमक छिड़क दिया कि सरकार खाना तो दे ही रही है अब क्या पैसा भी दे?

अरे जनाब, सरकार खाना और पैसा कुछ न दे लेकिन लोगों को उनके घरों तक पहुँचाने की व्यवस्था तो कर दे। यह एक काम तो वह कर सकती है? कोई कह सकता है कि ट्रेनें तो शुरू की गयी हैं। लेकिन उनकी हक़ीक़त ऊँट के जीरे से ज्यादा नहीं। कर्नाटक और गुजरात खुलेआम मजदूरों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश करते हैं तो दूसरे सूबे मज़दूरों को रोकने के लिए अंदर ही अंदर हर तरह के तीन-तिकड़म में शामिल हैं। लिहाज़ा इन ट्रेनों की भूमिका दिखावे से ज्यादा नहीं। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। पंजाब में तक़रीबन 10 लाख प्रवासी मज़दूर अपने घरों को लौटने के लिए रजिस्ट्रेशन करा रखे हैं। इस लिहाज से अब अगर सैकड़ों ट्रेनें एक महीने तक चलायी जाएं तब इन सबको उनके घरों तक पहुँचाया जा सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि कुछ ट्रेनें नाम के लिए चला दी जा रही हैं। ऐसे में बाकियों के पास क्या रास्ता बचता है? और ऊपर से अगर उनके पास किराया नहीं है तो फिर पैदल निकलने के अलावा और क्या विकल्प बचता है? कुछ सरकारें रीइम्बर्स का भरोसा दिला रही हैं। कोई इनसे पूछे कि जब पैसा होगा तभी तो उसका इंबर्समेंट होगा?

सरकारों और देश की संस्थाओं का इससे ज्यादा क्रूर, नंगा और घृणास्पद चेहरा कभी नहीं देखा गया होगा। इस दौर ने इनकी असलियत खोल कर सामने रख दी है। यह बात अब स्पष्ट हो गयी है कि ये संस्थाएँ किसी गरीब, मज़लूम और बेसहारा के लिए नहीं बनी हैं। यह उनको नागरिक मानने से भी इनकार करती हैं। खाया-पीया-अघाया मध्यवर्ग और तोंद फुलाए बैठी उच्च वर्गीय जमात ही इनकी ज़िम्मेदारी है। इनकी निगाह में वही नागरिक भी हैं। और वही सुख-सुविधा, सुरक्षा और हर तरह की देखभाल की हकदार है। बाक़ी जनता भेड़-बकरी है और वह सड़कों पर हांके जाने के लिए अभिशप्त है।

अनायास नहीं क्वारंटाइन किए गए प्रवासी मज़दूरों के खानों में कीड़े मिल रहे हैं और मज़दूर जब उसका विरोध कर रहे हैं तो पुलिस उनको लाठियों से पीट रही है। बिहार के नवादा से लेकर समस्तीपुर के कुछ इलाक़ों में परसों इसी तरह की घटनाएं घटी हैं। यह तब हो रहा है जब उनके द्वारा पैदा किए गए अनाजों से भंडार भरे पड़े हैं। लेकिन अब जबकि वह खुद भूखा है तो उसे मयस्सर नहीं। वितरण से पहले राशन कार्ड माँगा जा रहा है। नहीं होने पर मरने के लिए छोड़ दिया जा रहा है।

दरअसल यही दरिद्र नारायण हैं। गांधी के इस आख़िरी आदमी के बारे में सत्ता ने सोचना छोड़ दिया है। संविधान और व्यवस्था के हाशिये में भी अब इसके लिए जगह नहीं है। लोकतंत्र के नाम पर बनी सभी संस्थाओं ने इसे बे वजूद घोषित कर दिया है। शहरों की अट्टालिकाओं को खड़ी करने वाली यह जमात अपने ही बनाए ढाँचों के बीच एकाएक बेगानी हो गयी। भोजन तो दूर किसी ने पानी भी पूछना जरूरी नहीं समझा। नतीजतन यह पूरा हिस्सा सिर पर पैर रखकर अपने घरों की ओर भागने के लिए मजबूर हो गया। क्योंकि उसे यह बात पता चल गयी कि कोरोना मारे, न मारे। रुकने पर भूख उसे ज़रूर मार देगी। लेकिन कहते हैं कि जब संस्थाएँ नाकाम हो जाती हैं। सिस्टम काम करना बंद कर देता है। तब समाज आगे आता है। वह अपनी ज़िम्मेदारी निभाता है। लिहाज़ा मानवता का किसी ने अगर पहला भी सबक़ सीखा है तो इन गरीब-गुरबों की मदद करना उसका बुनियादी कर्तव्य बन जाता है।

कांवड़ियों की सेवा के लिए जगह-जगह तंबू-कनात और खाने की व्यवस्था की जाती है। उनके आराम और हर तरह की सुख-सुविधा का ख़्याल रखा जाता है। उसी तरह से हजारों-हजार किमी की पैदल दूरियाँ नाप रहे इन नारायणों के लिए भी लोगों को उठ खड़ा होना होना चाहिए। और इस बात का संकल्प लेना चाहिए कि घरों में बैठने वाला हो या फिर सड़क पर चलने वाला कोई भी भूखा नहीं रहेगा। और ज़रूरत तथा सुविधा के मुताबिक़ सड़क नाप रहे इन लोगों को अपने इलाक़ों के दायरे में हर संभव दूरी तक साधनों के ज़रिये ले जाने की कोशिश करनी चाहिए।

आज 10 मई है। देश की आज़ादी की पहली लड़ाई यानी 1857 की बरसी। हमारे पुरखों ने ऊपर के कुछ लोगों को हर सुख-सुविधा और साधन मुहैया कराने के लिए अपनी क़ुर्बानियाँ नहीं दी थीं। वे व्यापक आम जनता की आज़ादी और उसके हक-हुकूक के लिए लड़े थे। लिहाज़ा आज यह मौक़ा संकल्प लेने का है। आइये इस बात की प्रतिज्ञा करते हैं कि सरकार और संस्थाओं द्वारा किए जा रहे अन्याय का प्रतिकार और ज़रूरतमंदों की हर तरीक़े से मदद करेंगे।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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This post was last modified on May 11, 2020 6:16 pm

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