Monday, January 24, 2022

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सीपी कमेंट्री-1: महामारी में चुनावी बहार और राष्ट्रपति चुनाव-2022 के अनखुले पन्ने

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अब तो चुनाव ही चुनाव हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर राज्यों के ही नहीं बल्कि भारत गणराज्य के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति से लेकर लोकसभा के डिप्टी स्पीकर और राज्यसभा के 75 नए सदस्य के भी। राष्ट्रपति पद पर राम नाथ कोविन्द का पाँच बरस का मौजूदा कार्यकाल जुलाई 2022 में खत्म हो रहा है। अगस्त माह में उपराष्ट्रपति पद पर एम वेंकैया नायडू का भी कार्यकाल समाप्त होगा। लोकसभा उपाध्यक्ष का भी चुनाव होना है जो करीब ढाई बरस से रिक्त है। राज्यसभा की सीटों पर जुलाई तक द्विवार्षिक चुनाव होने हैं। यह बरस बीतने से पहले प्रधानमंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सर्वोच्च नेता नरेंद्र मोदी एवं केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के गृह राज्य , गुजरात के चुनाव होने हैं। गुजरात के साथ ही हिमाचल प्रदेश के भी चुनाव निर्धारित हैं।

उपरोक्त पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों का असर राष्ट्रपति चुनाव पर भी पड़ेगा। इन राज्‍यों में कुल 690 विधायक चुने जाने हैं। राष्ट्रपति चुनाव के वोटर भारत के आम नागरिक नहीं हैं। देश भर के निर्वाचित सभी सांसद और विधायकगण, रामनाथ कोविंद की जगह भारत का नया पहला नागरिक चुनेंगे। भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद थे जो इस पद पर दो बार चुने गए थे। उनके सिवा फिर कोई दो बार राष्ट्रपति नहीं चुना गया। रामनाथ कोविंद इस पद के लिए दूसरी बार चुनाव लड़ेंगे इसकी संभावना कम ही नजर आती है।

राष्ट्रपति चुनाव 2022 के अनखुले मायने की और विस्तृत चर्चा हम अगले सप्ताह के अंक में करेंगे। लेकिन अभी यह इंगित करना जरूरी है कि भारत के राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक और भारतीय सशस्त्र सेना के सर्वोच्च कमांडर हैं। राष्ट्रपति लोक सभा, राज्यसभा और विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा 5 बरस के लिए चुने जाते हैं। यह संवैधानिक पद है जिसका प्रावधान भारतीय संविधान में किया गया है। राष्ट्रपति का चुनाव संविधान के अनुच्छेद 55 के तहत आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा होता है। मत आवण्टित करने के लिए एक फार्मूला इस्तेमाल किया गया है ताकि हर राज्य की जनसंख्या और उस राज्य से विधानसभा के सदस्यों द्वारा मत डालने की संख्या के बीच एक अनुपात रहे और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों और राष्ट्रीय सांसदों के बीच एक समानुपात बना रहे। अब तक 13 राष्ट्रपति हो चुके हैं। इनके अलावा 3 कार्यवाहक राष्ट्रपति भी हुए हैं जो पदस्थ राष्ट्रपति की मृत्यु के बाद बनाये गए है। 7 राष्ट्रपति निर्वाचित होने से पूर्व राजनीतिक पार्टी के सदस्य रहे। इनमें से 6 कांग्रेस के और 1 जनता पार्टी के शामिल हैं। दो राष्ट्रपति, ज़ाकिर हुसैन और फ़ख़रुद्दीन अली अहमद, का निधन पदस्थ रहते हुए हुआ। प्रतिभा पाटिल, भारत की पहली महिला राष्ट्रपति चुनी गईं। रामनाथ कोविंद 25 जुलाई 2017 को राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे।

आरएसएस का लक्ष्य

भाजपा और उसके स्वयंघोषित मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अंदरुनी हलकों में भारत को 1925 में स्थापित आरएसएस की शतवार्षिकी के उपलक्ष्य में अगले लोकसभा चुनाव से पहले विधिवत हिन्दू राष्ट्र उद्घोषित करने के लक्ष्य की चर्चा है। उनके रणनीतिकारों को शायद लगता होगा कि तब तक भाजपा की अगुवाई में 1996 में कायम किये चुनावी गठबंधन, नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) को राज्यसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल हो जाएगा। उन्हें उम्मीद है तब केंद्र सरकार एकसमान नागरिक संहिता, नागरिकता और जनसंख्या ‘नियंत्रण‘ से संबंधित वे सभी कानून संसद में आसानी से पारित करवा लेगी जो राज्य सभा में उसका बहुमत नहीं होने के कारण तत्काल संभव नहीं है।

कुल 245 सीटों की राज्यसभा में भाजपा के अभी 95 सदस्य ही हैं। सदन में बहुमत के लिए 123 सदस्यों के समर्थन की दरकार है। इसमें अभी 28 सदस्यों की कमी पड़ रही है। एनडीए के अन्य दलों में से अभी तमिलनाडु के ऑल इंडिया अन्ना द्रमुक (एआईएडीएम) के छह, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के पाँच, असम गण परिषद और महाराष्ट्र के सांसद रामदास अठावले के रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) के एक–एक सदस्य हैं। ऐसे में एनडीए की भी कुल सदस्य संख्या बहुमत से 15 सीट कम है।

राज्यसभा का इतिहास

भारत की संसद के उच्च सदन, राज्यसभा की सीटों पर हालिया चुनावों में धनबल, सत्ताबल, वंशानुगत राजनीति, क्रासवोटिंग और ब्लैकमेलिंग तक के मामले बेशक बढ़े हैं लेकिन इस सदन का गौरवमयी इतिहास रहा है। स्वतंत्र भारत में संसद के द्वितीय सदन की उपयोगिता अथवा अनुपयोगिता के संबंध में संविधान सभा में विस्तृत बहस हुई थी। हमारे संविधान रचियताओं ने विविधताओं के विशाल देश के लिए शासन के लिये राष्ट्रपति प्रणाली के बजाय संसदीय लोकतंत्र और परिसंघीय (फेडरल) व्यवस्था में द्विसदनी संसद को सब से उपयुक्त माना। संविधान के अनुच्छेद 80 में राज्यसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 निर्धारित की गई है। इनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित किए जाते हैं। 238 सदस्य राज्यों के और संघ-राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि होते हैं। राज्य सभा के सदस्यों की वर्तमान संख्या 245 है। इनमें से 233 सदस्य राज्यों और संघ-राज्य क्षेत्र दिल्ली तथा पुडुचेरी के प्रतिनिधि हैं और 12 राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित हैं। संविधान के प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है।

संविधान की चौथी अनुसूची में राज्यसभा में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को स्थानों के आवंटन का उपबंध है। स्थानों का आवंटन प्रत्येक राज्य की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। राज्यों के पुनर्गठन तथा नए राज्यों के गठन के परिणामस्वरूप, राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को आवंटित राज्य सभा में निर्वाचित स्थानों की संख्या वर्ष 1952 से लेकर समय-समय पर बदलती रही है। प्रत्येक राज्य के प्रतिनिधियों का निर्वाचन राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार किया जाता है।

राज्य सभा स्थायी सदन है और यह भंग नहीं होता। प्रत्येक दो वर्ष बाद राज्य सभा के एक-तिहाई सदस्य सेवा-निवृत्त हो जाते हैं। राज्यसभा के सद्स्य मंत्रिपरिषद के सदस्य बन सकते हैं। सभापति का कार्यकाल 5 वर्षों का ही होता है। राज्यसभा अपने सदस्यों में से एक उपसभापति का भी चयन करती है।

राज्यसभा में वर्ष 1969 तक वास्तविक अर्थ में विपक्ष का कोई नेता नहीं होता था। उस समय तक सर्वाधिक सदस्यों वाली विपक्षी पार्टी के नेता को बिना किसी औपचारिक मान्यता विपक्षी नेता मानने की प्रथा थी। विपक्ष के नेता के पद को संसद में विपक्षी नेता वेतन और भत्ता अधिनियम (1977 ) द्वारा मान्यता प्रदान की गई।

स्वतंत्र भारत में द्वितीय सदन की उपयोगिता अथवा अनुपयोगिता के संबंध में संविधान सभा में विस्तृत बहस हुई और द्विसदनी विधानमंडल बनाने का निर्णय मुख्य रूप से इसलिए किया गया कि परिसंघीय प्रणाली को विविधताओं वाले विशाल देश के लिए सर्वाधिक सहज माना गया। संविधान के अनुच्छेद 80 में राज्य सभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 निर्धारित की गई है।

संविधान की चौथी अनुसूची में राज्य सभा में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को स्थानों के आवंटन का उपबंध है। स्थानों का आवंटन प्रत्येक राज्य की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। राज्यों के पुनर्गठन तथा नए राज्यों के गठन के परिणामस्वरूप, राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को आवंटित राज्य सभा में निर्वाचित स्थानों की संख्या वर्ष 1952 से समय-समय पर बदलती रही है। प्रत्येक राज्य के प्रतिनिधियों का निर्वाचन राज्य विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार किया जाता है। राज्यसभा के सद्स्य मंत्रि परिषद के सदस्य बन सकते है। सभापति का कार्यकाल 5 वर्षों का ही होता है। राज्यसभा अपने सदस्यों में से एक उपसभापति का भी चयन करती है।

हमारा आकलन

हमारा आंकलन है राज्यसभा के इस बरस के द्विवार्षिक चुनाव के बाद सदन में भाजपा और एनडीए की शक्ति और कम हो जाएगी। भाजपा की सदस्य संख्या में पाँच की कमी आ सकती है। उसके सहयोगी दलों के भी चार सदस्य कम हो सकते हैं। भाजपा को राजस्थान, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ , झारखंड आदि राज्यों में सीटों का नुकसान हो सकता है।

विपक्षी कांग्रेस को राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के तीन बरस पहले विधान सभा चुनावों में सुधरी स्थिति की बदौलत तीन –चार सीटों का फ़ायदा हो सकता है। अभी कांग्रेस के सिर्फ 34 सदस्य हैं। यह उसकी अबतक की न्यूनतम सदस्य संख्या है।

मध्य प्रदेश : भाजपा के मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य बने पूर्व केंद्रीय मंत्री और अभूतपूर्व पत्रकार एमजे अकबर, सम्पतिया उइके और कांग्रेस के विवेक कृष्ण तन्खा का मौजूदा कार्यकाल 29 जून 2022 को खत्म हो रहा है। प्रदेश से राज्यसभा में सम्पतिया उइके का निर्वाचन केंद्रीय मंत्री अनिल माधव दवे के निधन से रिक्त हुई सीट पर 31 जुलाई 2017 को हुआ था। राज्यसभा में मध्य प्रदेश की ग्यारह सीटें हैं।

बिहार : इस बरस बिहार से राज्यसभा की पाँच सीटों पर चुनाव है। मोदी सरकार में मंत्री और जेडीयू नेता आरसीपी सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री एवं राष्‍ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव की बड़ी बेटी मीसा भारती, भाजपा के गोपाल नारायण सिंह और सतीश चंद्र दुबे की सीटें जुलाई में खाली हो रही हैं। जेडीयू के राज्‍यसभा सांसद किंग महेंद्र के हाल में निधन से वह सीट रिक्त है जिस पर दो बरस का कार्यकाल बचा हुआ है। जेडीयू का आरसीसी सिंह को तीसरी बार और आरजेडी का मीसा भारती को दूसरी बार राज्‍यसभा चुनाव में अपना प्रत्याशी भेजना लगभग तय है। द्विवार्षिक चुनाव में आरजेडी को तीन सीटें मिल सकती हैं। भाजपा को दो सीटें आसानी मिल जाएंगी। लेकिन जेडीयू को एक सीट का नुकसान होगा। उसे एक ही सीट मिल सकेगी।

राजस्थान : इस राज्य में आगामी जुलाई में राज्यसभा की चार सीटें खाली हो रही हैं जो अभी भाजपा के पास हैं। वहां कांग्रेस को तीन सीटें मिलना तय है। प्रदेश में पिछले बरस राज्यसभा की तीन सीटों पर चुनाव से ऐन पहले ही कांग्रेस के कुछ विधायकों ने सचिन पायलट के नेतृत्व में बगावती रूख दिखाए थे। लेकिन कांग्रेस दो सीट जीतने में सफल रही और भाजपा को एक ही सीट मिली।

आंध्र प्रदेश : इस राज्य में भी भाजपा को तीन सीटों का नुकसान हो सकता है। भाजपा ने आंध्र प्रदेश में अपनी पुरानी सहयोगी तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के जिन चार राज्यसभा सदस्यों को अपने पाले में शामिल कर लिया था उनमें से तीन का कार्यकाल आगामी जुलाई में खत्म हो रहा है। नए चुनाव में ये तीनों सीटें वहां सत्तारूढ वाईएसआर कांग्रेस को मिलने की संभावना है।

छत्तीसगढ़ : इस राज्य  में जिन दो सीटों पर चुनाव होने हैं वे दोनों सत्तारूढ़ कांग्रेस को मिलने की संभावना है। वहां भाजपा को एक सीट का नुकसान होगा।

झारखंड : इस राज्य में दो सीटों पर चुनाव है जो अभी भाजपा के पास है। पर उसे एक सीट गंवानी पड़ सकती है।

पंजाब : इस बरस राज्य सभा की सात सीटों के चुनाव होंगे जिनमें पांच सीटें अप्रैल में और दो जुलाई में खाली होनी हैं। इन सात सीटों में से तीन–तीन कांग्रेस और अकाली दल और एक भाजपा के पास है जो उसने अकाली दल की मदद से जीती थी।

उत्तर प्रदेश : राज्यसभा की 12 सीटें खाली हो रही हैं। इनमें छह भाजपा , तीन सपा और दो बसपा के पास हैं। एक सीट पर कांग्रेस के पूर्व केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल सदस्य हैं। मौजूदा हालात में भाजपा के लिए ये सभी छह सीट बरकरार रख पाना कठिन लगता है।

तमिलनाडु : राज्यसभा की 6 सीटों के लिए चुनाव होगा जिनमें से 4 सीटें भाजपा की सहयोगी अन्ना द्रमुक और 2 सीटें कांग्रेस की सहयोगी द्रमुक की हैं। अन्ना द्रमुक के दो सांसदों ने पिछले बरस विधानसभा चुनाव जीत कर राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। ये दोनों रिक्त सीटें अब नए चुनाव में द्रमुक को मिलने की पूरी संभावना है।

केरल : इस राज्य से राज्यसभा में कम्युनिस्ट पार्टियों की सीट कम से कम एक बढ़ सकती है और कांग्रेस की एक सीट कम हो सकती है।

अन्य राज्य : विभिन्न प्रदेशों में सत्तारूढ़ दलों में तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस ),पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और ओडिशा में बीजू जनता दल ( बीजेडी ) की राज्यसभा चुनावों के बाद सदस्य संख्या यथावत रहने की संभावना है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में कोई बदलाव होना नहीं लगता है। भाजपा और कांग्रेस के जितने सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होगा उतनी सीटें दोनों को फिर मिल जाने की संभावना है। भाजपा को कर्नाटक में लाभ हो सकता है जहां कांग्रेस के 3 और भाजपा के 1 सदस्य का कार्यकाल समाप्त होगा। इनमें भाजपा तीन सीटें जीत सकती हैं। हिमाचल प्रदेश, असम और त्रिपुरा में भाजपा को एक-एक सीट का फायदा होने की संभावना है।

बहरहाल, राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव होने तक ये कयास ही लग सकते हैं कि करीब पौने आठ बरस से केन्द्रीय सत्ता पर काबिज मोदी जी आगे और क्या क्या कर सकते हैं। हम हालिया अनुभवों के आधार पर इतना जरूर कह सकते हैं उनके राजकाज में अकल्पनीय कुछ भी नहीं है। मोदी जी सैनिक हुए बगैर सैन्य कमांडर की वर्दी धारण कर सकते हैं तो भारतीय सशस्त्र सेना के सर्वोच्च कमांडर होने का स्वप्न भी देख सकते हैं।

(चंद्रप्रकाश झा स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं।)

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