यूएपीए के आरोपों को सिद्ध न कर पाने पर क्यों नहीं होती है जांच एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई

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देश में जाँच एजेंसियां हर दूसरे तीसरे मामले में यूएपीए या राष्ट्रद्रोह के आरोप तो लगाती हैं पर अदालत में सिद्ध नहीं कर पातीं। इसके लिए जिम्मेदार जाँच एजेंसियों और आधिकारियों पर कारवाई क्यों नहीं होती ? कोई चार साल बाद तो कोई नौ साल बाद जेल में रहने के बाद अदालत से बरी हो जा रहा है। पांच सालों में यूएपीए के तहत जितनी गिरफ्तारियां हुईं, उनमें से 2 फीसदी से भी कम पर दोष साबित किया जा सका। इससे इन आरोपों को बल मिलता है की इस कानून के दुरूपयोग से निर्दोष नागरिकों का सरकारी उत्पीड़न किया जा रहा है।

दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) को लेकर हाल ही में की गई टिप्पणी के बाद इस कानून के क्रियान्वयन में जाँच एजेंसियों द्वारा इसके दुरूपयोग पर बहस शुरू हो गई है। हाईकोर्ट ने दिल्ली दंगों के मामले में आरोपी बनाए गए तीन लोगों को जमानत देने के साथ ही सामान्य अपराधों में यूएपीए के इस्तेमाल के औचित्य पर सवाल उठाए थे। अभी इस खबर की सुर्खियाँ सुखी भी नहीं थीं कि बेंगलुरू की एक विशेष एनआईए अदालत ने भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) में दिसंबर 2005 की गोलीबारी के मामले में कथित भूमिका के लिए आईपीसी की धाराओं के साथ पुराने यूएपीए कानून के तहत गिरफ्तार एक आरोपी मोहम्मद हबीब को आरोपमुक्त कर दिया है, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और कुछ लोग घायल हो गए थे। अब तो वर्ष 2019 में संसद ने यूएपीए 1967 में संशोधन करके इसे और कठोर बना दिया है। बहस इस बात पर भी हो रही है कि अदालतें रिहाई या जमानत तो दे रही हैं लेकिन ऐसी नाइंसाफी करने वाले जाँच एजेंसियों के काबिल अफसरों को कोई सजा क्यों नहीं दे रही हैं ?

बेंगलुरू के स्पेशल जज डॉ. कसानप्पा नाइक ने आरोपी को यह कहते हुए बरी कर दिया कि “अभियोजन ने आरोपी नंबर 7 (हबीब) के खिलाफ आईपीसी की धारा 120-बी, 121, 121-ए, 122 ,123, 307, 302, और भारतीय शस्त्र अधिनियम की धारा 25, 27, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3, 4, 5 और 6 और गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 10, 13, 16, 17,18 और 20 के तहत दंडनीय अपराध के मामले में आरोप तय करने के लिए प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनाता है। स्पेशल जज ने कहा, “वह यह समझने में विफल रहे कि उन्हें मामले में आरोपी के रूप में क्यों पेश किया गया।

हबीब को वर्ष 2017 में त्रिपुरा के अगरतला में सह-आरोपी सबाहुद्दीन उर्फ स्बाहुद्दीन अहमद के वर्ष 2008 में दिए गए बयान के आधार पर गिरफ्तार किया गया था, जिसे लखनऊ पुलिस ने गिरफ्तार किया था। आरोपी की ओर से पेश अधिवक्ता मोहम्मद ताहिर ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता पुलिस ने आरोप पत्र में आरोपी के बारे में कुछ नहीं कहा है और न ही कोई सबूत ‌जुटाया है, जिससे पता चले कि आरोपी को इस मामले में घटना या अपराध के बारे में कोई जानकारी है।

गौरतलब है कि नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के रिकॉर्ड्स के मुताबिक, पिछले पांच सालों में यूएपीए के तहत कुल 7840 लोगों पर गिरफ्तारी के बाद केस चलाया गया। इनमें से महज 155 लोगों पर ही आतंकवाद से जुड़े आरोप साबित किए जा सके। एनसीआरबी का 2015 से 2019 तक का डेटा भी कोर्ट की शंकाओं को बल देता है। रिकॉर्ड्स के मुताबिक, इन पांच सालों में यूएपीए के तहत जितनी गिरफ्तारियाँ हुई, उनमें से 2 फीसदी से भी कम पर दोष साबित किया जा सका।

एनसीआरबी के रिकॉर्ड्स के मुताबिक, पिछले पांच सालों में यूएपीए के तहत कुल 7840 लोगों पर गिरफ्तारी के बाद केस चलाया गया। इनमें से महज 155 लोगों पर ही आतंकवाद से जुड़े आरोप साबित किए जा सके। जबकि इस साल की शुरुआत में ही गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने जानकारी दी थी कि 2015 से लेकर 2019 तक यूएपीए के तहत गिरफ्तारियों में इजाफा हुआ है। जहां 2015 में 1128 लोगों की गिरफ्तारी हुई, वहीं 2016 में 999, 2017 में 1554 और 2018 में 1421 लोग गिरफ्तार हुए। 2019 में तो गिरफ्तारियों का आंकड़ा 1948 तक पहुंच गया।

आंकड़ों के मुताबिक, साल 2019 में सबसे अधिक मामले मणिपुर में दर्ज किए गए थे। इसके बाद तमिलनाडु में 270, जम्मू कश्मीर में 255, झारखंड में 105 और असम में 87 मामले दर्ज किए गए। हालांकि, साल 2019 में यूएपीए के तहत सबसे अधिक 498 लोगों की गिरफ्तारियां उत्तर प्रदेश में हुई। इसके बाद मणिपुर में 386, तमिलनाडु में 308, जम्मू कश्मीर में 227 और झारखंड में 202 लोगों को गिरफ्तार किया गया। एनसीआरबी के ही डेटा में बताया गया है कि 2015-19 के बीच दिल्ली में यूएपीए के तहत 17 केस दर्ज हुए। इनमें दिल्ली पुलिस ने 41 संदिग्धों के नाम दिए।

इसे क्या कहेंगे कि महाराष्ट्र के नांदेड़ के रहने वाले मोहम्मद इरफान और मोहम्मद इलियास का यूएपीए के तहत लगे आरोप में 9 साल जेल में बिताने के बाद एक विशेष अदालत ने दोनों को बाइज्जत बरी कर दिया है। दोनों को महाराष्ट्र पुलिस की एटीएस ने अगस्त 2012 में गिरफ्तार किया था। इलियास के पास इतने पैसे नहीं थे कि वो अदालत में केस लड़ पाते।  बिजनेस बंद हुआ, गरीबी आई, बदनामी, मेंटल ट्रॉमा। अब 9 साल बाद अदालत ने कहा कि दोनों के खिलाफ कोई सबूत नहीं है।

हाथरस में एक दलित युवती के साथ गैंगरेप का मामला सामने आया था। जिसमें पुलिस ने युवती की मौत के बाद रातोंरात अंतिम संस्कार कर दिया था। रिपोर्टिंग करने  केरल के रहने वाले पत्रकार सिद्दीकी कप्पन, अतीक-उर-रहमान, मसूद अहमद और आलम हाथरस जा रहे थे, लेकिन इन्हें रास्ते में ही पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। चारों के खिलाफ यूएपीए  के तहत आरोप लगाए गए। पुलिस ने कप्पन, उनके साथियों और ड्राइवर पर शांति भंग की आशंका में मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया था। लेकिन पुलिस अदालत में कोई सुबूत नहीं पेश कर पाई, इसलिए यह केस बंद हो गया। फिलहाल यूएपीए के मामले में अभी भी कप्पन जेल में हैं और इस बीच उनकी बीमार माँ चल बसीं।

दरअसल  यूएपीए के तहत जमानत पाना बहुत ही मुश्किल होता है। जांच एजेंसी के पास चार्जशीट दाखिल करने के लिए 180 दिन का समय होता है, जिससे जेल में बंद व्यक्ति के मामले की सुनवाई मुश्किल होती है। यूएपीए की धारा 43-डी (5) में यह कहा गया है कि एक अभियुक्त को जमानत पर रिहा नहीं किया जाएगा, यदि न्यायालय केस डायरी के अवलोकन या सीआरपीसी की धारा 173 के तहत बनाई गई रिपोर्ट पर विचार व्यक्त करता है कि यह मानने के लिए उचित आधार है कि इस तरह के व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाना प्रथम दृष्टया सही है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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