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केरल ने निजी अस्पतालों की नकेल कसी, क्या अन्य राज्य ऐसा नहीं कर सकते हैं ?

30 जनवरी 2020 को केरल में कोरोना का पहला मरीज एक छात्र था जो वुहान विश्वविद्यालय में पढ़ता था, वह देश का सबसे पहला कोरोना मरीज है। भारत सरकार ने इस बात की पुष्टि भी की थी कि चीन के वुहान विश्वविद्यालय से आए एक छात्र में कोरोना वायरस के लक्षण पाए गए हैं। केरल की आबादी का एक बड़ा हिस्सा विदेशों में रहता है और विदेशों ने लगातार आवाजाही से, वहां यह खतरा अधिक था। लेकिन केरल का हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर देश मे सबसे उन्नत हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर माना जाता है अतः उन्हें इस सबल इंफ्रास्ट्रक्चर, जागरूक जनता और राज्य के प्रगतिशील सामाजिक ताने बाने के काऱण इस महामारी से निपटने में उन्हें, उतनी कठिनाई नहीं हुयी, जितनी कि उत्तर भारत या हिंदी पट्टी के राज्यों को हो रही है।

पूरे देश की तरह केरल में अप्रैल माह में, कोरोना की दूसरी लहर का भी प्रकोप हुआ। इसी बीच वहां राज्य विधानसभा के चुनाव भी थे। दूसरी लहर चलने के बाद केरल में भी संक्रमण के मामले तेजी से बढ़े हैं। लगभग रोज ही, कोरोना के नए मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी देखी जा रही है। 13 अप्रैल को प्रदेश में कोरोना के एक दिन में सामने आए मरीजों की संख्या 7 हजार 515 थी। 14 अप्रैल को 16 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ यह आंकड़ा 8 हजार 778 पर पहुंच गया। 15 अप्रैल को हालांकि, मामलों (8 हजार 126) में मामूली कमी आई लेकिन 16 अप्रैल को फिर से नए मरीजों में 23 फीसदी की वृद्धि देखी गई। इस दिन 10 हजार 31 नए मामले दर्ज किए गए।

इसके बाद केरल में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ने लगे। 17 अप्रैल को 37 फीसदी बढ़ोतरी के साथ 13 हजार 835 और 18 अप्रैल को 32 फीसदी की वृद्धि के साथ 18 हजार 257 नए मामले सामने आए। 19 अप्रैल को फिर मामलों में 25 फीसदी की कमी देखी गई और 13 हजार 644 मामले ही दर्ज किए गए लेकिन अगले ही दिन (20 अप्रैल को) 43 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ प्रदेश में 19 हजार 577 मरीज सामने आए। इसके बाद 21 अप्रैल को 22 हजार 414, 22 अप्रैल को 26 हजार 995 और 23 अप्रैल को 28 हजार 447 कोरोना के मरीज मिले।

केरल में मई के पहले हफ्ते में कोरोना वायरस संक्रमण के एक ही दिन में सर्वाधिक 28,447 नए मामले सामने आए, जिसके साथ ही राज्य में संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर 13,50,501 तक पहुंच गई। बीते 10 दिनों में रोजाना कोरोना के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। हाल ही में जारी केरल स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में 28 हजार से ज्यादा नए मरीज सामने आए हैं। बीते 24 घंटों के भीतर प्रदेश में 5 हजार 633 कोरोना मरीज ठीक हुए हैं। इसके साथ ही प्रदेश में संक्रमण मुक्त हुए मरीजों की संख्या 11 लाख 66 हजार 135 हो गई है।

राज्य सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में फिलहाल 1.78 लाख मरीज एक्टिव हैं। राज्य में मृतक संख्या बढ़कर 5 हजार 55 हो गई। केरल में संक्रमण के मामलों में तेजी दर्ज की जा रही है। गुरुवार को जहां संक्रमण के 26 हजार 995 नए मामले सामने आए थे, वहीं बुधवार को 22 हजार 144 और मंगलवार को 19 हजार 577 मामले दर्ज किए गए थे। केरल में पिछले 24 घंटे में 1 लाख 30 हजार 617 नमूनों की जांच की गई थी।

केरल ने अपने अपेक्षाकृत बेहतर हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ लेने के साथ साथ, निजी अस्पतालों की मुनाफाखोरी पर भी लगाम लगाया और उनके लिये उनकी चिकित्सा की दर को भी संशोधित किया। हालांकि इस सम्बंध में केरल हाईकोर्ट में निजी अस्पतालों में आम जनता को सरकार द्वारा सुगम इलाज हेतु एक जनहित याचिका दायर की गयी। याचिका में निजी अस्पतालों में इलाज, बेड और अन्य सुविधाओं के लिये सरकार द्वारा उनकी उचित दर तय करने की मांग भी हाईकोर्ट से की गयी थी। जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस डॉ. कौसर एडापागथ की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की और सरकार से अपना जवाब दाखिल करने के लिये नोटिस दिया।

राज्य के एडवोकेट जनरल ने अदालत को बताया, कि ” अस्पतालों और स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं-मान्यता प्राप्त अस्पतालों (एनएबीएच अस्पतालों) और गैर-एनएबीएच अस्पताल के सामान्य वार्डों के प्रति दिन की कीमत क्रमशः 2910 और 2645 रुपये निर्धारित की जाएगी। इसमें ऑक्सीजन, चिकित्सा और ड्रग्स, नर्सिंग और बोर्डिंग चार्ज आदि शामिल होंगे और सीटी, एचआरसीटी आदि को बाहर रखा जाएगा। पीपीई किट, दवाओं और इस तरह के अन्य टेस्ट की कीमत को अधिकतम खुदरा मूल्य या किसी अन्य अधिसूचना या आदेश के रूप में नियंत्रित किया जाएगा।”

सरकार ने हाईकोर्ट में यह भी कहा कि,” सरकार के पिछले आदेश के अनुसार, आरटी पीसीआर (RT-PCR) की कीमत 500 रुपये होगी। नए आदेश के अनुसार केरल क्लीनिकल प्रतिष्ठान अधिनियम और नियम के अंतर्गत जिला चिकित्सा अधिकारी और अधिकारी शिकायत निवारण अधिकारियों के रूप में काम करेंगे और जैसा कि सरकार ने इलाज के लिए कीमतें निर्धारित की हैं, वे इन कीमतों के बारे में मिलने वाली शिकायतों की जांच करेंगे।”

हाईकोर्ट ने जनहित याचिका का निपटारा करते हुए अपने फैसले में कहा कि,

“हमने बहुत बारीकी से सरकारी आदेश की जांच की है। हम सरकार के आदेश से अधिक प्रसन्न हैं। हम इन कीमतों को बेहद उचित मानते हैं। सरकार द्वारा तय की गई कीमतें वास्तविक कीमतों के अनुसार है।”

कोर्ट ने केरल क्लिनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत कोविड उपचार करने के सरकार के निर्णय की सराहना की। यह भी पूछा कि, “क्या राज्य सरकार आंध्र प्रदेश में अपनाए जाने वाले मॉडल की तर्ज पर गैर-निजी अस्पतालों में 50% बेड ले सकता है।”

केरल सरकार ने पहले अधिसूचित किया कि

● गैर-निजी अस्पतालों में 50% बेड कोविड 19 के उपचार के लिए समर्पित होंगे।

● सरकार द्वारा कोविड अस्पतालों के रूप में नामित अस्पतालों (सूचीबद्ध अस्पतालों) में कोविड के लिए 50% बेड पहले से ही सरकार के नियंत्रण में हैं।

अदालत ने गैर-अपात्र अस्पतालों को कोविड के इलाज के लिए 50% बेड अलग रखने के लिए राज्य को निर्देश दिया। जस्टिस रामचंद्रन ने कहा कि “अस्पतालों में 50% रिक्त बेड वास्तव में अनियमित हैं और सरकार द्वारा 50% रिक्तियां अब भी निजी अस्पतालों में अनियंत्रित हैं। अस्पतालों में और 50% रिक्त बेड भी हैं, जिनके लिए कोई कीमत निर्धारित नहीं है। दूसरे शब्दों में निजी अस्पतालों में 50% रिक्तियां आज भी पूरी तरह से अनियंत्रित हैं।”

अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि ” वह उन 50% बेड के लिए रेट तय करे। इसके साथ ही गैर-सूचीबद्ध अस्पतालों में कोविड के बेड के लिए भी कीमत निर्धारित करें। इसकी कीमत राज्य स्वास्थ्य एजेंसी द्वारा तय किया जा सकता है।”

अदालत ने यह भी उपाय सुझाये,

● राज्य को कोविड 19 के लिए एक सामान्य टोल फ्री नंबर स्थापित करना होगा।

● निर्धारित उपचार प्रोटोकॉल और रोगियों की विभिन्न श्रेणियों के प्रबंधन – रोगी प्रबंधन प्रणाली से संबंधित प्रणाली विकसित करना होगा।

● पैथोलॉजी की कीमतें निर्धारित करना।

● डॉक्टर / नर्स के परामर्श की कीमत निर्धारित करना।

● निजी अस्पतालों को सुनिश्चित करना कि सरकार द्वारा निर्धारित 500 रुपये की कीमत से आरटी-पीसीआर टेस्ट किए जाएं।

अदालत ने सरकार को यह भी निर्देश दिया कि “वह अस्पतालों के बाहर से लाए गए चिकित्सा उपकरणों की कीमत की सूचना दें।”

दरअसल, याचिकाकर्ता के  वकील एडवोकेट हरिराज ने कीमतों में असमानता की ओर इशारा किया था। याचिकाकर्ता के एडवोकेट सुरेश कुमार ने प्रस्तावित एक अन्य सुझाव में निजी अस्पतालों में कोविड के इलाज के कीमत की निगरानी के लिए सेक्टर मजिस्ट्रेट नियुक्त करने की राय दी थी।

अदालत को सरकारी वकील ने सूचित किया था कि

● राज्य सरकार ने निजी अस्पतालों के प्रबंधन के लिए बैठक बुलाई थी, जिसमें निजी अस्पतालों द्वारा कोविड -19 के इलाज के लिए कीमत तय करने का बिंदु उठा था।

● प्रत्येक अस्पताल द्वारा ली जा रही दरो को जल्द ही एक सरकारी आदेश द्वारा तय किया जाएगा।

● सरकार जिला स्तर पर एक प्राधिकरण स्थापित करेगी और निर्धारित कीमतों के उल्लंघन पर निर्णय लेने के लिए अपीलीय प्राधिकार होगी।

● अपीलीय प्राधिकारी के आदेश अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा के लिए उत्तरदायी होंगे।

न्यायमूर्ति देवन रामचंद्रन ने इन उपायों की सराहना की। यह सब आप विस्तार से लाइव लॉ और बार एंड बेंच की वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं।

केंद्र सरकार की ओर से सभी वयस्कों को वैक्सीन लगाए जाने की अनुमति मिलने के साथ ही केरल में लोगों की ओर से अनोखी मुहिम शुरू कर दी गई है। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों ऐलान किया था कि राज्य और निजी अस्पताल वैक्सीन निर्माता कंपनियों से सीधे वैक्सीन खरीद सकते हैं। इस बीच विशेष अभियान के तहत केरल में सभी को मुफ्त में वैक्सीन लगे इसके लिए राज्य की जनता ने मुख्यमंत्री राहत कोष में पैसे भेजकर योगदान देना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों वैक्सीन निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने बताया कि वर्तमान समय में कोरोना वैक्सीन की कीमत राज्य सरकारों के लिए 400 रुपये होंगी, जबकि निजी अस्पतालों के लिए 600 रुपये प्रति खुराक होंगी, लेकिन केरल की राज्य ने वैक्सीन को मुफ्त करने की अनुठी पहल शुरू कर दी है। केरल की जनता ने मुख्यमंत्री राहत कोष में पैसे भेजकर योगदान देना शुरू कर दिया है, जिससे केरल वासियों के लिए वैक्सीन मुफ्त में उपलब्ध कराई जा सके।

राज्य के मुख्यमंत्री ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा था कि ” हम लोगों को मुफ्त में टीके मुहैया कराएंगे, बदले में लोग भी सरकार की मदद के लिए आगे आ रहे हैं। लोग सरकार के खजाने को भरने के लिए सोशल मीडिया पर बढ़-चढ़कर कैंपेन भी चला रहे हैं। हजारों लोगों के समर्थन से मुख्यमंत्री राहत कोष में भारी-भरकम राशि का योगदान मिल रहा है। जल्द ही यह कैंपेन को हजारों लोगों ने शेयर करना शुरू कर दिया।मुख्यमंत्री राहत कोष में जनता के समर्थन से केवल एक ही दिन में, ₹ 50 लाख से अधिक का योगदान मिला। यह हमारे केरल की विशेषता है। अतीत में भी हमने एकता की ताकत से मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया है।”

केरल को वैक्सीन स्टोरेज, ट्रांसपोर्टेशन और इस्तेमाल के प्रोटोकॉल पर सख्ती से अमल करने की वजह से उसके वैक्सीनेशन प्रबन्धन की बहुत सराहना हुयी है। जहां एक तरफ देश के कई राज्यों में वैक्सीन की कमी बताई जा रही है, वहीं केरल ने वैक्सीन को बर्बादी से बचा कर दुनिया के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। केरल के वैक्सीनेशन मॉडल की प्रशंसा खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की हैं। उन्होंने वैक्सीन को बर्बाद होने से बचाने पर केरल के हेल्थ वर्कर्स की सराहना की है। केरल के मुख्यमंत्री ने ट्वीट कर बताया कि राज्य को भारत सरकार की तरफ से मिली 73,38,806 वैक्सीन की डोज का इस्तेमाल करते हुए 74,26,164 लोगों को वैक्सीन लगाई गई. यानी केरल ने 87,358 अधिक वैक्सीन डोज का इस्तेमाल कर वैक्सीन वेस्टेज को बेहद कम कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि वैक्सीन की हर 5 मिली की वायल में कुल 10 डोज होती हैं. एक होशियार नर्स एक वायल से 11 से 13 लोगों को वैक्सीन लगा सकती है। केरल में ऐसा ही हो रहा है। 1 मई को भारत सरकार के कोविड वैक्सीन के डेटा के अनुसार, केरल और आंध्र प्रदेश देश मे दो ऐसे राज्य हैं जहां कुल मिली वैक्सीन डोज से ज्यादा खुराक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

केरल देश का एक ऐसा राज्य है जहाँ की साक्षरता दर 90% है और वह हिंदी पट्टी के उन राज्यों की उस बीमारी से दूर है जहां की राजनीति ही साम्प्रदायिकता और विभाजनकारी एजेंडे पर केंद्रित है। केरल में सामंतवादी और पूंजीवादी सोच का अभाव है और सामाजिक समरसता की पूंजी से वह किसी भी महामारी के संकट से निपटने में सक्षम रहता है। इस बार भी यही हो रहा है। ज़मीनी स्तर पर मौजूद हेल्थकेयर वर्कर्स और लोगों के प्रतिनिधियों का गठजोड़ इस आपदा में, राज्य की सामाजिक पूंजी साबित हो रहा है, जिसके ज़रिए केरल कोविड-19 के ग्राफ़ को ऊपर बढ़ने से रोकने और कर्व को फ्लैट करने यानी नए मामलों में बढ़ोतरी पर बड़े स्तर पर लगाम लगाने में सफल रहा है। यह सामाजिक पूंजी केरल के पब्लिक हेल्थ सिस्टम की रीढ़ साबित हुई है. इसके चलते ही केरल कोरोना से प्रभावी तौर पर निबटने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। चीन के वुहान से भारत के पहले तीन मरीज आने के तीन महीने बाद भी तब केरल में कोरोना से मरने वाले लोगों की संख्या केवल दो थी।

हेल्थकेयर वर्कर्स और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की टीमें राज्य के हर गांव के घर-घर तक पहुंचीं और लोगों को इस वायरस के बारे में समझाया। इनके पास इस तरह के अभियान चलाने का पहले से ही अनुभव  है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, केरल की हेल्थ सर्विसेज के पूर्व डायरेक्टर डॉक्टर एन श्रीधर ने बताया, ”यह ट्रेनिंग प्रक्रिया दो-तीन दिन से ज़्यादा नहीं चलती है. एक्सपर्ट्स के तैयार किए गए स्टडी मैटेरियल के साथ ये लोग दूसरे लोगों को प्रशिक्षित करने के लिए चले जाते हैं। ग्रामीण इलाक़ों में हमारे लिंक वर्कर्स या आशा (एक्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) हैं। शहरी इलाक़ों में ऊषा (अर्बन सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) वर्कर्स हैं। इन्हें बता दिया जाता है कि लोगों को कैसे समझाना है। हर आशा क़रीब 1,000 लोगों की इंचार्ज होती है। इनके साथ जूनियर पब्लिक हेल्थ नर्स (जेपीएचएन) भी होती हैं जो कि 10,000 लोगों की आबादी की इंचार्ज होती हैं. इनके ऊपर एक जूनियर हेल्थ इंस्पेक्टर होता है जो 15,000 लोगों के लिए उत्तरदायी होता है।

इसके अलावा, स्वास्थ्य विभाग और सामाजिक न्याय विभाग के बीच एक लिंक आंगनवाड़ी वर्कर्स का भी होता है. एक आंगनवाड़ी वर्कर 1,000 लोगों की इंचार्ज होती है। संदेश मूलरूप में हेल्थकेयर वर्कर्स द्वारा दिए जाते हैं। उदाहरणस्वरूप, मास्क कैसे पहना जाना चाहिए. हम पंचायत प्रतिनिधियों को आने वाली चीज़ों के बारे में अवगत रखते हैं ताकि वे अलर्ट रहें. हेल्थकेयर इंस्पेक्टर और शहरी इलाक़ों में वार्ड मेंबर्स इन उप केंद्रों का हिस्सा होते हैं।हेल्थकेयर वर्कर्स और पंचायत मेंबरों की पूरी फ़ौज को अहम जानकारियों से लैस किया जाता है। राज्य में एक कम्युनिटी कॉल सेंटर भी है जिसका नाम दिशा है। इसमें एक टोल फ्री नंबर है। यह सेंटर ज़िला मेडिकल ऑफ़िसर के यहां होने वाली शिकायतों या इन्क्वायरीज़ के बारे में बताता है। अगर कोई क्वारंटीन सिस्टम को तोड़ता है तो पंचायत वर्कर और हेल्थकेयर वर्कर उन्हें ढूंढ लेते हैं और वापस लाते हैं।”

केरल के लिये महामारी पर नियंत्रण करना इसलिए भी आसान रहा कि, उनके पास, ज़मीनी स्तर पर हेल्थकेयर वर्कर हैं और सामाजिक पूंजी मौजूद है जो केरल को दूसरे राज्यों से अलग बनाती है। अलग-अलग स्पेशियलिटीज से लिए गए नौ डॉक्टरों की टीम के कॉनवल्सेंट प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल से कोरोना वायरस के मरीजों का इलाज करने पर लिखे गए पेपर को इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने अनुमोदित भी किया है। हेल्थकेयर के विकेंद्रीकरण की पॉलिसी के काऱण, स्वास्थ्य सेवाये प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स से ज़िला अस्पतालों और स्थानीय निकायों तक पहुंचायी गयीं हैं। कोविड-19 के कंट्रोल के लिए एक्सपर्ट्स मेडिकल कमेटी की पिछले डेढ़ महीने से हर रोज़ मीटिंग होती है ताकि मेडिकल और पब्लिक हेल्थ मसलों पर चर्चा हो सके।  रोज़ाना सुबह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए मुख्यमंत्री को सीधे रिपोर्ट स्वास्थ्य विभाग करता है और शाम 4 बजे दिन भर की एक रिपोर्ट जारी की जाती है। केरल में इस महामारी के बारे में यह बात भी अच्छी रही कि, कोरोना से संक्रमित पाए गए लोगों की औसत आयु राज्य में 37.2 साल है। 80 साल से ऊपर वाले ऐसे केवल दो शख्स रहे और 60 साल की उम्र वालों की संख्या केवल नौ है।

राज्यों को और केंद्र सरकार को भी स्वास्थ्य सेवाओं को जनसुलभ बनाना होगा और इसे निजी क्षेत्र मे दिए जाने के साथ साथ सरकारी क्षेत्र में ही और मज़बूत करना होगा। आज कोरोना आपदा में अस्पतालों, दवाइयों, ऑक्सीजन आदि की कमी तो है ही पर सबसे अधिक कमी डॉक्टरों और अन्य मेडिकल स्टाफ की है। अस्पताल, ऑक्सीजन और दवाओं की आपूर्ति तो बढ़ाई जा सकती है पर डॉक्टर और हेल्थकेयर स्टाफ ज़रूरत पड़ने पर नहीं बढ़ाये जा सकते हैं। इनके लिये मेडिकल कॉलेज, शोध संस्थान और नर्सिंग स्कूल का भी योजनाबद्ध रूप से विस्तार करना होगा। निजी अस्पतालों के बारे में सरकार को एक नीति बनानी होगी ताकि वे भी अनावश्यक रूप से लूट का अड्डा नहीं बन सकें। यह महामारी न तो पहली है और न ही अंतिम है। कभी भी कोई भी बीमारी, महामारी का रूप ले सकती है और देश के सामने ऐसे संकट खड़े कर सकती है। हम पहली लहर की आफत के बाद भी दूसरी लहर जो अधिक भयावह है से निपटने के लिये मिले समय का पर्याप्त सदुपयोग नहीं कर सके और यह सरकार की अक्षमता है, इसे स्वीकार करना ही होगा।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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This post was last modified on May 16, 2021 11:54 am

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