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Categories: बीच बहस

क्यों सोशल साइट्स पर श्रद्धांजलि देने को उतावले रहते हैं हिन्दी के लेखक और कवि?

क्या हिन्दी के लेखक व कवि सोशल साइट्स पर श्रद्धांजलि देने के लिए उतावले रहते हैं? बेशक हाँ! मेरे एक कवि मित्र ने मुझे बताया कि हिन्दी के कई लेखक व कवि बहुत सारे वृद्ध प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरण तक लिखकर व उनके साथ वाली तस्वीर भी मोबाईल में लेकर घूमते रहते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि सोशल साइट्स पर श्रद्धांजलि देने में कोई अन्य लेखक-कवि हमसे बाजी ना मार जाए। इसलिए मोबाइल में पहले से सुरक्षित संस्मरण व तस्वीर ही उनको श्रद्धांजलि देने की कतार में सबसे आगे ला सकती है, जिससे वे चटखारे लेकर ताउम्र अपनी शेखी बघारते रहें कि फलाने को तो सबसे पहले श्रद्धांजलि मैंने ही दी है और मेरी वाली पोस्ट को देखकर ही फलाने-फलाने ने श्रद्धांजलि दी, लेकिन मुझे क्रेडिट तक नहीं दिया।

मैं यह बात इसलिए लिख रहा हूँ कि कल शाम में यह खबर आयी कि प्रसिद्ध क्रांतिकारी कवि वरवर राव गंभीर रूप से बीमार हैं। कल वरवर राव की बात जीवन साथी हेमलता व बेटी पवना से हुई थी। वरवर राव सही से बोलने की स्थिति में भी नहीं थे। तब उनके केस पार्टनर ने उनकी पत्नी व बेटी को बताया कि वरवर राव की तबियत काफी खराब है और वे चलने और खुद से ब्रश करने की स्थिति में भी नहीं हैं, इसलिए उन्हें अविलंब अच्छे अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत है। मालूम हो कि कवि वरवर राव भीमा कोरेगांव मामले में पिछले 2 साल से जेल में बंद हैं।

अब हमारे हिन्दी के लेखकों व कवियों ने भविष्य का अंदाजा लगा लिया कि जो व्यक्ति अपने से ब्रश भी नहीं कर पाता है, देर रात तक तो वह मर ही गया होगा। फिर क्या था, भविष्य के अंदाजे पर इन लोगों ने फेसबुक पर धड़ाधड़ पोस्ट कर श्रद्धांजलि देना शुरू कर दिया और इनकी देखा-देखी श्रद्धांजलि देने वालों की कतार ही लग गई। स्वाभाविक सी बात है कि जब हिन्दी के तथाकथित बड़े क्रांतिकारी कवि व लेखक ने भी श्रद्धांजलि दे दी थी, तो छोटों को तो उनका अनुसरण करना ही था।

बात यहीं खत्म नहीं हुई, सोशल साइट्स पर श्रद्धांजलि देकर श्रद्धांजलि देने वालों की कतार में ‘अग्रणी’ में नाम लिखाकर लहालोट हुए ये कवि-लेखक चैन की नींद से सो गये। उनके पोस्ट पर कमेंट की झड़ी सुबह 9 बजे तक लगती रही, कुछ ने कमेंट में वरवर राव की मृत्यु की खबर को झूठा बतलाते हुए पोस्ट को डिलीट करने की सलाह भी दी, तो सैकड़ों ने अपनी श्रद्धांजलि दे ही दी। लेकिन पोस्ट करने वाले नींद से जगे तब ना, खैर उनकी नींद तो टूट गई और उन्होंने पोस्ट डिलीट कर दिया, लेकिन एक नयी पोस्ट कर माफी मांगनी भी उचित नहीं समझी। इधर एक लेखक की नींद अब तक (दोपहर 1 बजे) नहीं खुली है और उनके पोस्ट पर धड़ाधड़ श्रद्धांजलि आती जा रही है, उस पोस्ट पर खबर को झूठा बताने वाले कमेंट पर किसी की नजर ही नहीं पड़ती है।

आखिर ऐसा होता क्यों है? आप जानते हैं कि कवि वरवर राव 1969 से ही क्रांतिकारी कर्म से जुड़कर लेखन कार्य कर रहे हैं। विप्लवी रचयितालु संघम (विरसम) के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं व रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट (आरडीएफ) के भी केन्द्रीय अध्यक्ष हैं। वे मूल तेलुगु में लिखते हैं, लेकिन अंग्रेजी और हिन्दी भाषा पर भी उनकी अद्भुत पकड़ है। वे पूरे देश में एक क्रांतिकारी कवि के रूप में जाने जाते हैं और शायद ही कोई ऐसा प्रगतिशील व्यक्ति पूरे देश में हो, जो उनके बारे में ना जानता हो।

तब फिर सवाल उठता है कि जिन बड़े लेखक व कवि ने उन्हें जिंदा रहते ही श्रद्धांजलि दे दी, क्या उन्होंने क्रांतिकारी कवि वरवर राव के परिजनों या उनके रिहाई के लिए अभियान चला रहे साथियों से भी कभी बात की है? क्या हिन्दी के इन लेखकों व कवियों ने एक क्रांतिकारी कवि की रिहाई के लिए चल रहे अभियान में शिरकत की है? इसका जवाब आप खुद तय कीजिए। अगर इन लेखकों व कवियों की सहानुभूति या एक्टिव समर्थन कवि वरवर राव के रिहाई के लिए अभियान चला रहे लोगों से रहता, तो फिर ये लोग पहले उन लोगों से वरवर राव की मृत्यु के बारे में कन्फर्म होते, ना कि धड़ाधड़ श्रद्धांजलि देने लगते। तेलंगाना के बहुत सारे लेखकों और कवियों ने रात से ही अपने फेसबुक वाल पर कवि वरवर राव की ‘मृत्यु’ की खबर को अफवाह बताना शुरु कर दिया था, तो फिर हिन्दी के लेखकों व कवियों की नजर उस पोस्ट को क्यों नहीं खोज पायी?

आज हमारी हिन्दी पट्टी में पकड़ रखने वाले कई लेखक संगठन हैं, क्या उनके लिए कवि वरवर राव की रिहाई की मांग सिर्फ एक औपचारिकता भर है? अगर औपचारिकता नहीं है, तो फिर इन लेखक संगठनों ने क्यों नहीं अब तक सिलसिलेवार अभियान चलाया। कवि वरवर राव जिन परिस्थितियों में जेल में बंद हैं, उनमें कल उनकी मृत्यु भी हो सकती है। तो क्या ये लेखक संगठन उनके मरने का इंतजार कर रहे हैं कि वे कब मरें और कब अपने-अपने लेटर पैड पर श्रद्धांजलि दे सकूं?

कल देर रात से अब तक श्रद्धांजलि देने वाले हिन्दी के लेखकों और कवियों, अगर आपमें जरा भी शर्म बची हो तो क्रांतिकारी कवि वरवर राव की अविलंब रिहाई और जल्द से जल्द जेल अस्पताल से बाहर मुम्बई के किसी अच्छे अस्पताल में बेहतर इलाज की मांग के लिए मुहिम चलाइये, ताकि सरकार मजबूर होकर हमारे प्रिय कवि को मौत के मुंह में जाने से बचाए। अगर सच में हमारे प्रिय कवि की जान मुंबई के तलोजा जेल में चली गई और आप श्रद्धांजलि देने तक चुप बैठे रह गये, तो इतिहास आपको माफ नहीं करेगा।

(रुपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल झारखंड के रामगढ़ में रहते हैं।)

This post was last modified on July 12, 2020 2:39 pm

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