पुण्यतिथि विशेष: क्या नेहरू ने स्वयं को कभी अजैविक और ईश्वर दूत कहा था?

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“सभ्यता का क्षय बाहरी आक्रमण के बनिस्पत उसकी आंतरिक विफलताओं से अधिक होता है।” (डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया, पृ. 284)

“मैंने स्वतंत्रता का विश्लेषण किया और हमारे करोड़ों लोगों के लिए इसका क्या अर्थ होना चाहिए, समझा है। हम नहीं चाहते हैं कि गोरों के स्थान पर भूरे हमारे मालिक बन जाएं। लेकिन, वास्तविक लोगों का राज हो, लोगों के द्वारा लोगों के लिए हो, जिससे कि हमारी गरीबी और कष्टों का अंत हो सके।” (नेहरू, डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया, पृ. 60)

आज़ साठ दशक हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू को दिवंगत हुए। उत्तर-नेहरू भारत 27 मई, 1964 से 27 मई 2024 तक के कालखंड में 13 प्रधानमंत्रियों (लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, नरसिम्हा राव, अटलबिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र दामोदरदास मोदी) की शासन शैलियों के ऐतिहासिक अनुभवों की पूंजी जमा कर चुका है; स्वतंत्रता पूर्व मूल्यआधारित उदारवादी लोकतंत्र; नेतृत्व केंद्रित उदार पूंजीवादी लोकतंत्र; व्यक्ति केंद्रित अधिनायकवादी लोकतंत्र; कल्याणकारी व समाजवादी राज्य से कॉरपोरेट पूंजीवादी राज्य में रूपांतरित लोकतंत्र; और बहुलतावादी से अर्द्ध बहुसंख्यकवादी में परिवर्तित लोकतंत्र।

इस छह दशकीय अवधि में स्वतंत्र भारत ने पाकिस्तान के साथ दो पूर्ण युद्ध (1965 व 1971), स्थानीय लड़ाई (कारगिल जंग), प्रॉक्सी युद्ध (ज़िआउल हक़ के शासन काल आतंकी लड़ाई), पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित क्रमिक आतंकी हमले और चीन के साथ अनेक झड़पों का भी सामना किया है। इससे पहले नेहरू शासन में ही 1962 में चीन के साथ भारत पूर्ण युद्ध का सामना कर चुका था। इसके साथ ही भारत के हस्तक्षेप के कारण पाकिस्तान का विभाजन व बांग्लादेश का जन्म हुआ और भारत में सिक्किम का विलय (अप्रैल 1975) भी हुआ। देश के भूभाग का विस्तार हुआ। ज़ाहिर है, यह साठ साला सफ़र सीधा व समतल या एक रेखीय नहीं रहा है।

जहां प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू नेतृत्व की पूर्व व उत्तर स्वतंत्रकालीन विरासत इस सफर में जुड़ती रही, वहीं उत्तरवर्ती प्रधानमंत्रियों ने भी इसमें अपनी उपलब्धियों व विफलताओं के आयाम जोड़े हैं। विभिन्न शासन शैलियों की पृष्ठभूमि में नेहरू जी की भूमिका को किस प्रकार रेखांकित किया जा सकता है, इस पर विचार की ज़रूरत है। तभी सवाल उठेगा ‘क्यों याद रखें नेहरू को?’। 

विश्व की किसी भी ऐतिहासिक शख्सियत को तत्कालीन सन्दर्भों के साथ वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता को परखें, या फिर उसे विशुद्ध वर्तमान सन्दर्भों की आकांक्षा व आवश्यकता की कसौटी पर रख कर उसकी प्रासंगिकता का परीक्षण करें? यह एक पेचीदा सवाल है। मूलतः परीक्षण की तीन कसौटियां रहती हैं: तत्कालीन, समकालीन और भावीकालीन। बेशक़, परीक्षण- प्रक्रिया पूर्वाग्रह निरपेक्ष नहीं होती है। वास्तव में, नेहरू जैसे इतिहास निर्माताओं को तत्कालीन सन्दर्भों से काट कर उनकी भूमिका के साथ न्याय नहीं किया जा सकता। किरदार द्वारा तत्कालीन व समकालीन समय-सन्दर्भ मंच पर मंचित भूमिका ही उसे इतिहास निर्माता बनाती है। लेकिन, यह भी सच्चाई है कि भूमिका की परीक्षण-प्रक्रिया में समकालीन सत्ता की विचारधारा का प्रत्यक्ष या परोक्ष हस्तक्षेप होता ही रहता है। इस दृष्टि से, वर्तमान काल में नेहरू नेतृत्व की परीक्षण प्रक्रिया भी पूर्वाग्रह सापेक्ष रहती है, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

विगत दस वर्षों ( 2014 -2024 ) के मोदी-शासन काल के दौरान नेहरू व्यक्तित्व व नेतृत्व पर जितने निर्मम हमले किये गए हैं, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। भाजपा सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा नेहरू जी को हर दृष्टि से निन्दनीय व अप्रासांगिक बनाने की हर संभव कोशिशें की गईं। प्रधानमंत्री मोदी ने नेहरू-नेतृत्व को संसद के भीतर और बाहर, कमतर दर्शाने में प्रमुख भूमिका भी निभाई। चुनाव के दौरान भी यही किया गया। राजनैतिक स्तर के समानांतर सामाजिक व आर्थिक स्तरों पर भी नेहरू को हिन्दू विरोधी, अल्पसंख्यक समर्थक, भारत विभाजन व कश्मीर संकट का सूत्रधार, राष्ट्र व विकास विरोधी और साम्यवादी (कम्युनिस्ट) जैसे अशोभनीय तमगों से सजाने की भरपूर कोशिशें की गईं।

नेहरू को वर्तमान पीढ़ी की नज़रों में  जितना गिराया जा सकता है, उसके प्रयास किये गए। उन्हें मुसलमान की औलाद बताया गया। उनके  चरित्र हनन की भी कुचेष्टाएं हुईं। लेकिन क्या मोदी ब्रांड भाजपा को इस अभियान में सफलता मिली? नहीं, बिलकुल नहीं। मोदी+ शाह शासन भूल गया कि पिछली सदी के पांचवें दशक में अमेरिका में भी सीनेटर मैकार्थी ने साम्यवादियों +समाजवादियों के विरुद्ध सफाया अभियान चलाया था। देश में बड़े-बड़े बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार, फिल्म अभिनेता आदि सफाया अभियान के शिकार हुए थे। कइयों को अमेरिका छोड़ कर अन्य देशों में जाना पड़ा था। लेकिन, अंततः अभियान को वापस लिया गया और मैकार्थी स्वयं भी आलोचनाओं का शिकार हुआ। यही काम मोदी और शाह की जोड़ी ने नेहरू-स्मृतियों के विरुद्ध सफाया अभियान चलाया है। पर, सफलता नहीं मिली।  

मैं इस लेख में नेहरू की महानता या नाकामियों पर चर्चा नहीं करूंगा, और ना ही संघ व मोदी-शाह सत्ता प्रतिष्ठान को नेहरू की आलोचना के लिए अपराधियों के कठघरे में खड़ा करूंगा। नेहरू की कर्म यात्रा स्वयं की सुरक्षा करने में समर्थ है। पर इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि नेहरू जी की लोकप्रियता घटी नहीं है, उसमें वृद्धि ही हुई है। नई पीढ़ी में नेहरू-खोज के लिए रूचि जगी है। नेहरू साहित्य फिर से पढ़ा जाने लगा है। इसका श्रेय मोदी+शाह सत्ता प्रतिष्ठान को जाता है। 

मेरा फोकस सिर्फ एक ही सवाल पर रहेगा कि भूमंडलीकरण, मुक्त अर्थव्यवस्था और कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के युग में’नेहरू दृष्टि और शासन शैली’ की कितनी  प्रासंगिकता है या पुनर्जीवित होगी? यदि नेहरू एक सामान्य सांचे के राजनेता व प्रधानमंत्री रहे होते, तब बहुत अधिक माथापच्ची की ज़रुरत नहीं होती। क्या बात है कि आज़ भी  नेहरू  इतिहासकारों, राजनीतिक व समाज विज्ञानियों और अर्थशास्त्रियों की दिलचस्पी के केंद्र में हैं। उदारपूंजीवादी लोकतंत्र, लोकतंत्र बनाम फासीवाद, मिश्रित समाजवादी अर्थव्यवस्था, संघीय व संविधान व्यवस्था बनाम सर्वसत्तावादी व्यवस्था आदि पर जब भी विमर्श होते हैं तब नेहरू का उल्लेख अपरिहार्य हो जाता है। अलबत्ता इंदिरा गांधी और मनमोहन सिंह की शासन शैलियों की भी उपस्थिति दर्ज़ होती है। दोनों के सन्दर्भ-महत्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती। संक्षेप में, राजनीति के विद्यार्थी नेहरू जी की शासन-प्रशासन शैली को समझना चाहते हैं।

विश्व में नेहरू के समकालीन राजनेताओं (फ्रैंकलिन रूजवेल्ट, ट्रूमैन, आइजनहॉवर, स्टालिन, चर्चिल, ऐटली, चाऊ एन लाई, हो ची मिन्ह, फिदेल कास्त्रो, कैनेडी, टीटो, एन क्रूमा, अब्दुल नासिर, सुकार्णो  आदि) का इतिहास रहा है। एक प्रकार से वे अपने देश के युग नायक और इतिहास निर्माता थे। यह वह दौर था जब विश्व भर में साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन चल रहा था, दूसरा विश्व युद्ध समाप्ति के अंतिम चरण में था, जर्मनी और इटली में नाज़ीवाद व फासीवाद अपने चरम पर था और भारत में गांधी जी के नेतृत्व में अंग्रेज़ी राज के खिलाफ ‘भारत छोड़ो ‘आंदोलन का ज्वार था। फिर नव स्वतंत्र राष्ट्रों में नव निर्माण का प्रोजेक्ट शुरू हुआ; भारत में औपनिवेशिक दासता से पूर्ण स्वतंत्रता व नव निर्माण की संक्रमणकालीन यात्रा के नायक थे जवाहरलाल नेहरू।

गंभीरता से सोचें तो मध्ययुगीन मानसिकता, औपनिवेशिक दासता और भारत विभाजन की त्रासदी से ग्रस्त देश को वैज्ञानिक मानस व आधुनिक नागरिक+लोकतांत्रिक चेतना से लैस करना विराट चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट था। चूंकि, नेहरू आधुनिकता और आधुनिकीकरण की चेतना से समृद्ध थे, इसलिए उन्होंने लोकतांत्रिक शासन शैली में इस प्रोजेक्ट को लागू किया। तभी उन्होंने स्वयं ही छद्म ‘चाणक्य’ नाम से लेख लिख कर देशवासियों को उनकी शासन शैली के प्रति सावधान रहने के लिए भी कहा था। 1937 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहते हुए नेहरू जी ने गुप्त नाम ‘चाणक्य’ से लिख कर कांग्रेसजनों और देशवासियों को चेताया था कि वे नेहरू की कार्यशैली पर कड़ी नज़र रखें। देखते रहें कि कहीं इस व्यक्ति में तानाशाही की प्रवृत्तियां तो पैदा नहीं हो रही हैं!

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे अपनी लोकतान्त्रिक शैली के प्रति काफी संवेदनशील थे। उन्होंने प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट के. शंकर पिल्लई की पत्रिका का लोकार्पण करते हुए कहा था कि वे अपने कार्टून में प्रधानमंत्री को भी बख्शे नहीं। नेशनल हेराल्ड ग्रुप के प्रधान सम्पादक चेलापति राव द्वारा सम्पादित नेशनल हेराल्ड में भी नेहरू की आलोचना छपती रही है। यह सर्वविदित है कि आज़ादी के आंदोलन के दौरान 1938 में नेहरू जी नेशनल हेराल्ड की स्थापना की थी। इस पेपर के मुख्य पृष्ठ के शिखर पर लिखा रहता था: ”आज़ादी खतरे में है, अपनी समस्त शक्ति से इसकी रक्षा करें।”

नेहरू ने अपने सार्वजनिक जीवन और शासकीय जीवन की यात्रा को विकसित देशों के उदारवादी लोकतंत्र के वातावरण में शुरू किया था। हालांकि, सोवियत संघ और चीन में साम्यवादी क्रांतियां हो चुकी थीं और वैकल्पिक राजनीति की प्रयोगशाला के केंद्र के रूप में दोनों देश उभर रहे थे। लेकिन, नेहरू ने अमेरिका व पश्चिमी देशों की उदारवादी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को भारतीय संस्करण में तब्दील किया। इसके अच्छे परिणाम भी निकले। पूंजीवादी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के माध्यम से ही पश्चिमी देशों ने अंतरिक्ष सहित जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगति की है। उनकी आधुनिक सामाजिक व वैज्ञानिक उपलब्धियों से नेहरू परिचित थे। स्टालिन के नेतृत्व में सोवियत संघ की आर्थिक उपलब्धियों से भी परिचित थे।  

उन्होंने भी योजना आयोग के निर्देशन में पंच-वर्षीय योजना के मॉडल को अपनाया और देश के आधुनिकीकरण की यात्रा शुरू की; उद्योगीकरण शुरू हुआ; टेक्नोलॉजी संस्थान खुले; वैज्ञानिक शोध संस्थाएं स्थापित की गईं; परमाणु ऊर्जा पर काम होने लगा; आधुनिक मंदिर के रूप में विशाल बांधों का निर्माण हुआ; ज़मींदारी उन्नमूलन व भूमिसुधार के अभियान चलाये गए; अस्पृश्यता क़ानून लाया गया; पंचायती व सहकारिता आंदोलन को प्रोत्साहित किया गया। 

नेहरू जी ने अपने शासन काल में राज्य के चरित्र को लोक कल्याणकारी, धर्मनिरपेक्ष, मिश्रित अर्थव्यवस्था + समाजवादी, उदार लोकतांत्रिक और गुटनिर्पेक्षवादी बनाये रखा। उन्होंने राज्य को मज़बूत करने के लिए धर्म- मज़हब और सामाजिक ध्रुवीकरण के शस्त्रों का इस्तेमाल नहीं किया। उनके शासन काल में साम्प्रदायिकतावादी शक्तियां संसद और विधानसभाओं में सिर नहीं उठा सकी थीं। इसके विपरीत, उन्होंने जनता को  मज़बूत करने के लिए आधुनिक विकास के शस्त्रों (शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग निर्माण, लोकतांत्रिक चेतना का विस्तार, संवैधानिक संस्थाओं के मज़बूतीकरण, अभिव्यक्ति व प्रेस स्वतंत्रता की रक्षा आदि) का प्रयोग किया। वे सफल भी हुए।

क्या दुनिया के विकसित देशों को कट्टर धार्मिकता, ध्रुवीकरण, अंधविश्वास, मंदिर-मस्ज़िद टंटों, इतिहास पुनर्लेखन, सामंतकालीन मानसिकता, प्राचीनतावाद, सैन्यवाद, युद्धोन्माद, रक्त शुद्धतावाद आदि के बल पर ऐतिहासिक उपलब्धियां हुई हैं ? उत्तर : बिल्कुल भी नहीं। नेहरू इस ऐतिहासिक यथार्थ के ज्ञाता थे। विकास के इस यथार्थ को ध्यान में रख कर ही उन्होंने नवस्वतंत्र भारत की दशा-दिशा निर्धारित की थी।

बीसवीं सदी की दृष्टि के प्रकाश में भारत ने इक्कीसवीं सदी में अपनी महत्वपूर्ण उपलब्धियों के साथ प्रवेश किया है; 1. देश में जीवंत लोकतंत्र और संविधान है; 2. क़ानून का शासन – प्रशासन और अनुशासित सेना है; 3. परमाणु शक्ति है और अंतरिक्ष में हस्तक्षेप की सामर्थ्य है; 4. राष्ट्रों की बिरादरी और संयुक्त राष्ट्र में गरिमापूर्ण स्थान है; 5. अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से भारतीय समाजविज्ञानी और विज्ञानी पुरस्कृत हो चुके हैं; 6. भारत की छवि भरोसेमंद टिकाऊ लोकतांत्रिक राष्ट्र की है;7. नियमित समय से चुनाव होते  हैं और शांतिपूर्वक सरकारें बदलती रहती हैं; 8. जागरूक नागरिक समाज है; 9. प्रेस या मीडिया की स्वतंत्रता रहती रही है (अब नहीं है।); और 10. एक साथ जन्मे दो देश -भारत एक सफल राज्य है, जबकि पाकिस्तान असफल राज्य  (फेल्ड स्टेट) है। यदि, भारतीय गणतंत्र की  ईमारत की बुनियाद कमज़ोर -गीली रही होती, तब क्या इस सदी में दुनिया में हम विकासशील राष्ट्र का परचम ऊंचा किये होते? आज भारत कृत्रिम मेधा के युग में प्रवेश की दहलीज़ पर खड़ा है। क्या इसकी तैयारी पिछले दस सालों में हुई है? 

कल्पना कीजिये, यदि भारत की पाकिस्तान जैसी शुरुआत रही होती, तब आज हमारे क्या हाल रहे होते? क्या हिन्दू धर्म को भारतीय राष्ट्र राज्य का धर्म घोषित कर दिये जाने से पिछड़ापन, गरीबी, अशिक्षा, घातक रोग, सामाजिक विषमता, अस्पृश्यता, साम्प्रदायिकता जैसे राष्ट्रीय कलंक मिट जाते? क्या देश में चारों तरफ मंदिर-ही- मंदिर नहीं होते, और मस्जिदें -गिरजाघर खण्डहर में तब्दील हो जाने से साम्प्रदायिक एकता स्थापित हो जाती? क्या हिन्दुओं की प्रति व्यक्ति आय बढ़ जाती? पाकिस्तान एक इस्लामिक राज्य है, लेकिन वहां भी ये तमाम समस्याएं राष्ट्र राज्य के अस्तित्व को ललकार रही हैं। ज़बरदस्त भाई -भतीजावाद और भ्र्ष्टाचार हैं। वास्तव में,  इन मानवीय त्रासदियों के समक्ष वहां मज़हब बेबस -लाचार खड़ा हुआ है। यही बेहाल ईरान का है। अफगानिस्तान की दुर्दशा देख लें। वहां तो कट्टर इस्लाम परस्त तालिबानों की सरकार है। कितनी दारुण स्थिति में महिलाएं जी रही हैं। तीनों देशों में विभिन्न समय में हुए निजी अनुभवों के आधार पर मेरा यह मत बना है। 

प्रौद्योगिक क्रांति व कृत्रिम मेधा के युग में धर्म -मज़हब मानव व राष्ट्र के विकास को अवरुद्ध ही करेगा। राज्य को प्रतिगामी बनाएगा! ऐसे संकटों के परिदृश्य में कैसे नेहरू -प्रासंगिकता विलुप्त हो सकती है? नेहरू एक दृष्टा थे। वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों के मद्देनजऱ, उन्होंने भारतीय राष्ट्र राज्य की चरित्र -यात्रा का रोड मैप तैयार किया था। समय परिवर्तनशील है। नेहरू ने स्वयं को कभी ‘अब्सोल्यूट या अपरिहार्य’ नहीं माना है। कोई भी दार्शनिक या युगनेता या राजनेता अंतिम नहीं होता है; नई परिस्थितियां ही नई चुनौतियां और नए समाधान पेश करती आई हैं… लेकिन, पुरखों की ‘दृष्टि+अनुभव +उपलब्धि विरासत’ को ध्यान में रख कर ही वर्तमान और भविष्य का सकारात्मक निर्माण संभव है। 

नेहरू-काल में ही सवाल उठने लगे थे कि ‘नेहरू के बाद कौन, नेहरू के बाद भारत कैसा होगा?’। बेशक़ सवाल दुरुस्त थे; भारत में उथल-पुथल के बावज़ूद लोकतंत्र जीवित तो है; भारत के लोग 40 करोड़ से आज़ 140 करोड़ हो गए हैं; राष्ट्र की असीम जीजिविषा नए-नए विकल्पों को चुनती रही है; नेहरू के उत्तराधिकारी बनते रहे हैं। नेहरू को कभी ‘ईश्वर का अवतार’ नहीं कहा गया, और न ही ईश्वर को ‘नेहरू भक्त’, तथा ‘निरंकुश, फासीवादी, तानाशाह’ कहा गया। इसके विपरीत, मोदी-काल में नरेंद्र मोदी को ‘सर्वशक्तिमान, ईश्वर का अवतार, देवीय शक्ति,फासीवादी’ बताया जा चुका है। ऐसे परिदृश्य में लोकतंत्र की जीवटता, ऊर्जा और कार्यशीलता क्षयग्रस्त होती जा रही हैं। लोकतंत्र की जीवंतता को पुनः सक्रिय करने के लिए नेहरू-दृष्टि भरोसेमंद ही रहेगी। सारांश में, नेहरू के बाद के भारत में नेहरू-प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक अपरिहार्य हो गई है।

(रामशरण जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं)     

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