Monday, December 5, 2022

आर्थिक आधार पर आरक्षण को जायज ठहराना क्यों संविधान-सम्मत नहीं है?

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भारत में सामाजिक न्याय से जुड़े मसलों पर जब भी कोई वृत्तांत या इतिहास लिखा जायेगा, 7 नवम्बर, 2022 के दिन और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ को जरूर याद किया जायेगा। उच्चवर्ण या सवर्ण जातियों के ‘आर्थिक रूप से कमजोर लोगों’ को आरक्षण देने वाले 103 वें संविधान संशोधन को इस पीठ ने जायज ठहरा दिया। केंद्र की मोदी सरकार ने 2019 के संसदीय चुनाव से ऐन पहले किसी ठोस सर्वे, गणना या आंकड़ों के आधार के बगैर संविधान में आरक्षण का उक्त संशोधन कर डाला था। उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। तकरीबन तीन साल बाद यह फैसला मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित के कार्यकाल के आखिरी दिन उन्हीं की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने दिया।

पांच सदस्यीय संविधान पीठ के फैसले ने भारतीय संविधान के सामाजिक न्याय सम्बन्धी दर्शन और वैचारिकी को बिल्कुल पलट कर रख दिया। इस फैसले को अगर बारीकी से पढ़ें तो यह  संविधान-पीठ का उतना ‘विभाजित फैसला’(Split Verdict) नहीं है, जितना भारतीय मीडिया में इसका शोर मचाया गया। आरक्षण के ‘आर्थिक आधार’ पर संविधान पीठ के सभी सदस्यों में सहमति नजर आती है जबकि संविधान के 103 वें संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं में असहमति या विरोध का सबसे अहम् बिंदु यही था।

मुख्य न्यायाधीश ललित और जस्टिस रवींद्र भट्ट ने बहुमत के जजमेंट से जो असहमति जताई, उसमें सबसे प्रमुख बात थी कि आर्थिक आधार पर आरक्षण के दायरे में एससी-एसटी और ओबीसी को भी क्यों नहीं रखा गया! जिन तीन जजों-जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जसिटस जेबी पारदीवाला ने EWS आरक्षण पर अपना बहुमत फैसला दिया, उन्होंने आरक्षण के आर्थिक आधार में कुछ भी गलत नहीं माना। जस्टिस ललित और जस्टिस भट्ट की भी इस विषय पर असहमति नहीं रही।

अल्पमत फैसले को पुरजोर ढंग से रखने वाले जस्टिस रवींद्र भट्ट ने तो साफ शब्दों में कहा कि आरक्षण को आर्थिक आधार पर दिया जा सकता है। पर आर्थिक आधार के आरक्षण-दायरे से एसएसी-एसटी-ओबीसी को अलग रखना संविधान के मूल ढांचे, खासतौर पर समानता के सिद्धांत के विरूद्ध है और भेदभावपूर्ण है। इसलिए वह इस संविधान संशोधन को गलत मानते हैं। अपने अल्पमत फैसले में उन्होंने आंकड़े भी दिये कि हमारे देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों का 80 फीसदी हिस्सा एससी-एसटी-ओबीसी समाज से आता है। ऐसे में उन्हें आर्थिक आधार पर आरक्षण के अधिकार से वंचित कैसे किया जा सकता है?

इस फैसले को समझने के लिए तीन तथ्य ध्यान रखने लायक हैं। 103 वें संविधान संशोधन को जब कोर्ट में चुनौती दी गई तो उसकी सुनवाई संवैधानिक पीठ के बजाय शुरू में सामान्य पीठ ने ही की। उक्त आरक्षण के क्रियान्वयन पर कोई रोक भी नहीं लगी। कोर्ट में मामला लंबित रहा और भाजपा-शासित अनेक राज्यों में ईडब्ल्यूएस कोटे में अंधाधुंध नियुक्तियां की गईं।

आगे की सुनवाई के लिए संविधान पीठ बनाने की बात तय हुई। फिर मुख्य न्यायाधीश यू यू ललित की अध्यक्षता वाली संविधान बेंच ने लंबे इंतजार के बाद सुनवाई शुरू की। जस्टिस ललित के सेवा-निवृत्ति के ऐन पहले फैसला आया। हाल के वर्षों में यह एक नया परिदृश्य है कि नाजुक और बड़े विवादास्पद मसलों के कई फैसले किसी न किसी न्यायाधीश के सेवानिवृत्ति के ऐन पहले आये हैं। 

अब तक हमारे संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं रहा है। भारत में आरक्षण का प्रावधान सिर्फ सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ापन पर आधारित रहा है। आरक्षण हमारे यहां गरीबी उन्मूलन परियोजना नहीं है और न ही यह आम रोजगार-भरो अभियान है। यह एक तरह का ‘एफमर्टिव एक्शन’ है। सदियों से वंचित और भेदभाव का शिकार रहे लोगों-समाजों को सामाजिक न्याय देने का। इसका मतलब ये हुआ कि सामाजिक-शैक्षिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान भारतीय संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा रहा है। तो क्या इसे आर्थिक आधार पर करने का मोदी सरकार का फैसला संविधान के मूल ढांचे के विरूद्ध नहीं था?

अगर विरूद्ध था तो माननीय सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से क्या संविधान के मूल ढांचे के कुछ जरूरी सिद्धांत नजरंदाज नहीं हुए हैं? संविधान की उद्देशिका(प्रिएंबुल) के कुछ पहलुओं के अलावा अनुच्छेद 14, 15, 16, 17 को देखें तो साफ जाहिर होता है कि ये सिद्धांत नजरंदाज हुए हैं। फैसला सुनाने वाली पीठ के दो माननीय सदस्य मुख्य न्यायाधीश ललित और रवींद्र भट्ट का कथित अल्पमत फैसला भी इसकी तस्दीक करता है।

मुख्य न्यायाधीश और अपनी तरफ से अल्पमत का फैसला लिखने वाले जस्टिस भट्ट ने माना है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण के दायरे से एससी-एसटी-ओबीसी को बाहर रखने का 103 वें संशोधन का क्लाज सीधे-सीधे समानता और भ्रातृत्व के संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध जाता है। इसी संदर्भ में माननीय न्यायाधीशों ने बहुत विस्तार से सिन्हो कमीशन रिपोर्ट का आधिकारिक डेटा उद्धृत करते हुए कहा कि गरीबी रेखा से नीचे की आबादी में 80 फीसदी से ज्यादा लोग एससी-एसटी-ओबीसी हैं।  

चूंकि भारत में 1931 के बाद आज तक जाति-आधारित जनगणना नहीं हुई। ऐसे में अपर कास्ट की संख्या और उनकी अबादी के विस्तृत आर्थिक आधार का भी सरकार के पास कोई आधिकारिक डेटा नहीं है। अगर हम इन तथ्यों की रोशनी में देखें तो फिर यह संविधान संशोधन और इसे जायज ठहराने वाला कोर्ट का ताजा फैसला हमारे संविधान के मूल ढांचे के विरूद्ध नजर आता है। क्योंकि वह समानता के सिद्धांत पर आघात पहुंचाता है, जो प्रिएंबुल के अलावा संविधान का अनुच्छेद14 भी बहुत पुरजोर ढंग से उठाता है।

वह हर नागरिक को समानता का अधिकार मुहैया करने की बात करता है। इस तरह यह संविधान संशोधन विभेदकारी भी नजर आता है। लेकिन यह तथ्य कम महत्वपूर्ण नहीं कि अल्पमत फैसला देने वाले मुख्य जस्टिस ललित हों या जस्टिस रवींद्र भट्ट, किसी ने भी आरक्षण को आर्थिक आधार पर देने के नय़े प्रावधान को संविधान के ‘एफमर्टिव एक्शन’ सम्बन्धी मूल दर्शन के प्रतिकूल नहीं कहा! इन अर्थों में इसे सुप्रीम कोर्ट का सर्वसम्मत फैसला कहा जा सकता है। क्योंकि आरक्षण के आर्थिक आधार से किसी जज को असहमति नहीं थी।

दुनिया भर में जहां कहीं एफर्मेटिव एक्शन लागू किया गया या किसी संदर्भ में उस पर बहस हुई, सामाजिक(नस्ल, जाति या समुदाय के स्तर पर) और शैक्षिक रूप से वंचित किये गये लोगों के पिछड़ेपन को ही एफर्मेटिव एक्शन के लिए सर्वथा उपयुक्त माना गया। आर्थिक आधार को ठोस कारण नहीं माना गया। ऐसे में 103 वें संविधान संशोधन के बुनियादी आधार पर ही सवाल उठता है कि भारत में एफर्मेटिव एक्शन के लिए नया फार्मूला किस सोच या मंशा से आया! आर्थिक पिछड़ेपन के लिए पूरी दुनिया में गरीबी-उन्मूलन योजना या सहायता-अनुदान जैसे कदमों को आजमाने का रिवाज है। आर्थिक-असमानता से उत्पन्न पिछड़ेपन को जाति-वर्ण आधारित भेदभाव के समतुल्य नहीं माना जा सकता है। 103 वें संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट का बहुमत-फैसला इन तथ्यों और वैश्विक स्तर पर हुए तमाम विमर्शों को पूरी तरह नजरंदाज करता है।   

हमारे संविधान में आरक्षण विषयक कुल चार अनुच्छेद हैं—15,16, 46 और 340. संविधान के अनुच्छेद-14 में समानता का सिद्धांत प्रतिपादित है। यह सब मौलिक अधिकार यानी फंडामेंटस राइट्स के तहत आता है—संविधान के PART-3 से फंडामेंटल राइट्स यानी मौलिक अधिकार के अनुच्छेद शुरू होते हैं। ये अनुच्छेद 12 से 35 तक हैं। पुणे पैक्ट से बनी राजनीतिक सहमति के मद्देनजर अनुच्छेदों का इस प्रकार संयोजन और मेल किया गया ताकि किसी अनुच्छेद से दलित-आदिवासी समुदायों को आरक्षण देने में किसी तरह की व्यवधान न पैदा हो। अनुच्छेद-340 में पिछड़ों के आरक्षण की व्यवस्था का पहलू शामिल किया गया, जिस पर विभिन्न सरकारें लंबे समय तक खामोश रहीं। ओबीसी को रिजर्वेशन पाने के लिए सन् 1992-93 तक इंतजार करना पड़ा।

अपने देश में आरक्षण का मौजूदा परिदृश्य देखें तो दलित समाज के लिए 15 फीसदी, आदिवासी समाज के लिए 7.5 फीसदी और ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण है। यानी कुल मिलाकर 49.5 फीसदी आरक्षण है। उच्च वर्णों के लिए 10 फीसदी लागू होने के बाद यह 59.5 फीसदी हो चुका है। इससे माननीय कोर्ट के इंदिरा साहनी फैसले की 50 फीसदी बंदिश भी धाराशायी हो चुकी है। मजे की बात है कि सन् 1992 में इंदिरा साहनी के नाम से ख्यात फैसला इसी सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने किया था और 2022 के 7 नवम्बर का फैसला कोर्ट की 5 जजों की बेंच की तरफ से आया है।

अब तो यह कोर्ट ही जाने कि नौ जजों की बेंच की बात सही है या पांच जजों की पीठ का बहुमत(3:2) से लिया गया फैसला उचित है? सन् 1992 के इस इंदिरा साहनी फैसले ने ओबीसी आरक्षण को ‘ओके’ किया। इसी के बाद मंडल कमीशन की आरक्षण सम्बन्धी सिफारिश पूरे देश में लागू हो सकी। पर उसने कुछ गड़बड़ी भी की। क्रीमीलेयर का प्रावधान होने से आरक्षण में आर्थिक श्रेणी खोजने का दरवाजा खुला। अगर पुणे पैक्ट और उसके बाद संविधान सभा के आरक्षण सम्बन्धी विमर्शों को देखें तो क्रीमीलेयर का प्रावधान संविधान-सम्मत नहीं था।

आरक्षण के साथ आर्थिक पहलू जोड़े जाने का ही नतीजा है कि आज आर्थिक आधार पर उच्चवर्णीय समुदायों को भी आरक्षण देने का फैसला आ गया। दुनिया में जहां-जहां एफर्मेटिव एक्शन आजमाया गया है, उनमें ज्यादातर जगहों पर आर्थिक की जगह सामाजिक पिछड़ापन और प्रतिनिधित्व में कमी को अहम आधार बनाया गया है। अपने यहां ‘सकारात्मक कार्रवाई’ के सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ेपन और प्रतिनिधित्व में कमी के आधार और परिप्रेक्ष्य को विकृत किये जाने से सिर्फ न्यायिक या एकेडेमिक स्तर पर ही नहीं, सामाजिक स्तर पर भी समस्याएं पैदा हुईं।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले में भी यह समस्याएं साफ दिखती हैं। निश्चय ही इस फैसले से सामाजिक न्याय सम्बन्धी संविधान सभा के विमर्श और हमारे संविधान के सम्बद्ध सिद्धांत नजरंदाज हुए हैं। पर यह समस्या सिर्फ न्यायपालिका की नहीं है, यह पूरे समाज की है। हमारी न्यायपालिका ने तो एक दौर में प्रिवीपर्स के खात्मे और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे महान् राजनीतिक फैसलों को भी खारिज कर दिया था। हमारे पास अच्छा अपेक्षाकृत संविधान जरूर है पर अच्छा, सुसंगत लोकतांत्रिक और समतामूलक समाज कहां है?

संकीर्ण-धार्मिकता और वर्णव्यवस्था कमजोर होने की बजाय अपनी व्यापकता और बढ़ा चुकी है। इसलिए आज जो कुछ हो रहा है, वह संविधान की नहीं, समाज और व्यवस्था के संचालकों की विफलता है। समाज के निर्माण और व्यवस्था के संचालन में हर स्तर पर हर समुदाय के लोगों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए न समाज को समझाया जा सका और न ही ‘सकारात्मक कार्रवाई’ की जरूरत के पक्ष में सामूहिक-बोध पैदा किया जा सका। एक राष्ट्र के रूप में हम न जाने कब तक इन विडम्बनाओं और विसंगतियों के साथ जीते रहेंगे!

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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