सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता को आखिर गुस्सा क्यों आता है!

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विधि क्षेत्रों में सवाल उठ रहा है कि सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता को आखिर गुस्सा क्यों आता है? जनहित याचिकाओं (पीआईएल) पर जब भी मोदी सरकार की जवाबदेही का सवाल उच्चतम न्यायालय में उठता है तब तुषार मेहता भड़क जाते हैं और कभी पीआईएल करने वालों को आर्म चेयर बुद्धिजीवियों की संज्ञा देने लगते हैं तो कभी उच्च न्यायालयों की आलोचना करने लगते हैं कि वे एक समानांतर सरकार चला रहे हैं। तुषार मेहता ने भरी अदालत में यहाँ तक तल्खी प्रगट की है कि कुछ लोग एसी कमरों में बैठकर जनहित याचिकाएं लगा रहे हैं और पेशेवर जनहित याचिकाओं की दुकानें बंद हों।

जनहित याचिकाओं को लेकर उच्चतम न्यायालय में सालिसीटर जनरल तुषार मेहता की उक्तियाँ न्यायिक  मर्यादाओं की सीमारेखा का लगातार उल्लंघन कर रही हैं और पीठ के पीठासीन न्यायाधीश चाहे कोई भी रहे हों कभी भी उन्हें न्यायिक मर्यादाओं में रहने को नहीं कहा। अटॉर्नी जनरल एक संवैधानिक पद है जबकि सालिसीटर जनरल का पद संवैधानिक नहीं है बल्कि वह एक सांविधिक प्राधिकारी हैं जो अदालत में सरकार की ओर से पेश होते हैं।

दरअसल देश भर में फंसे प्रवासियों की पीड़ा को ध्यान में रखते हुए उच्चतम न्यायालय  के जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एम आर शाह की पीठ ने लॉकडाउन के दौरान प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए दायर जनहित याचिकाओं और प्रवासी श्रमिकों के दुख और समस्याओं से संबंधित स्वत: संज्ञान लेकर मामले की सुनवाई की और कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए।

गौरतलब है कि कोविड-19 से संबंधित जनहित याचिकाएँ 19 हाईकोर्टोंमें चल रही हैं जिनमें इलाहाबाद, आंध्र प्रदेश, बंबई, कलकत्ता, दिल्ली, गौहाटी, हिमाचल प्रदेश,  गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मद्रास, मणिपुर,  मेघालय, पटना, उड़ीसा, सिक्किम तेलंगाना और उत्तराखंड के हाईकोर्ट शामिल हैं। कुछ उच्च न्यायालयों जैसे बॉम्बे, दिल्ली, आंध्र प्रदेश और पटना ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लिया है। इसके अलावा कोर्ट बार के सदस्यों सहित सभी याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे हैं। उच्चतम न्यायालय में सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार के आलोचकों को फटकार लगाई और उनके उद्देश्यों और साख पर सवाल उठाया। उसी क्रम में  उन्होंने उच्च न्यायालयों पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि कुछ एक समानांतर सरकार चला रहे हैं।

सॉलिसीटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उठाए गए उपायों के बारे में कोर्ट को अवगत कराया। मेहता ने जोर देकर कहा कि वास्तव में देश के भीतर कुछ तत्व हैं जो प्रवासी संकट के बारे में “गलत सूचना” फैलाने पर अड़े हैं। सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि प्रवासी संकट के कुछ अलग, सीमित उदाहरण बार-बार दिखाए जा रहे हैं। ये मानव मन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। मेहता ने एक अभूतपूर्व मानवीय संकट के प्रति समाज के कुछ वर्गों द्वारा “हतोत्साहित” व्यवहार और असंगत उपद्रव करने का आरोप लगाया। 

तुषार मेहता ने कहा कि मुझे अदालत के एक अधिकारी के रूप में कुछ और कहना है, मेरी शिकायत है। दो शिकायतें मैं दर्ज करना चाहता हूं। कुछ मीडिया रिपोर्ट और कुछ लोग हैं जो कयामत के दूत हैं जो गलत सूचना फैलाते रहते हैं। राष्ट्र के प्रति शिष्टाचार नहीं दिखा रहे हैं। सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि केंद्र इस “अभूतपूर्व संकट” का प्रबंधन करने के लिए अपने स्तर पर सबसे अच्छा कर रहा है लेकिन कुछ लोग नकारात्मकता फैला रहे हैं। उन्होंने कहा कि “आर्म चेयर” बुद्धिजीवियों में दिन-रात काम करने वाले मंत्रियों और अधिकारियों के प्रयासों की स्वीकार्यता का पूरा अभाव है। मेहता ने कहा कि कोविड-19 को रोकने के लिए बहुत कुछ कर रहे हैं लेकिन हमारे देश में कयामत के पैगंबर हैं जो केवल नकारात्मकता, नकारात्मकता, नकारात्मकता फैलाते हैं। ये आर्म चेयर बुद्धिजीवी देश के प्रयास को नहीं पहचानते हैं।

इसके अलावा, सॉलिसीटर जनरल ने भारत में प्रसिद्ध तस्वीर “द वल्चर एंड द लिटिल गर्ल” और कथित “प्रोफेट्स ऑफ़ डूम” की कहानी का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि एक फोटोग्राफर केविन कार्टर 1993 में अकाल-ग्रस्त सूडान गए थे। कार्टर ने एक गिद्ध की फोटो खींची, जो बच्चे के मरने की प्रतीक्षा कर रहा था। न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित होने के बाद उनकी तस्वीर को पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हालांकि, कार्टर ने चार महीने बाद आत्महत्या कर ली। उन्होंने टिप्पणी की … एक पत्रकार ने उनसे पूछा – बच्चे का क्या हुआ? उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता, मुझे घर लौटना था। तब रिपोर्टर ने उनसे पूछा – कितने गिद्ध थे? उन्होंने कहा – एक रिपोर्टर ने कहा – नहीं। वहां दो थे। एक कैमरा पकड़े हुए था …।

उपरोक्त उदाहरण पर प्रकाश डालते हुए और कार्टर और सरकार के कार्यों की आलोचना करने वाले लोगों के बीच एक सादृश्यता का चित्रण करते हुए सॉलिसीटर जनरल ने आग्रह किया कि “राजनीतिक एजेंडा” को लागू करने के लिए शीर्ष अदालत का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

एडीएम जबलपुर की घटना और सरकार और न्यायपालिका के बीच समानताएं खींचने वाले हस्तक्षेपकर्ताओं के खिलाफ तर्क-वितर्क करते हुए एसजी तुषार मेहता ने कहा कि आर्म चेयर बुद्धिजीवी केवल अदालत को तटस्थ मानते हैं और कार्यपालिकाओं को गाली देते हैं। इन आर्म चेयर बुद्धिजीवियों के लिए, अदालत केवल तभी तटस्थ होती है जब वे कार्यपालिका को गाली देते हैं। यदि कुछ मुट्ठी भर लोग संस्थान को नियंत्रित करना चाहते हैं, तो यह एक एडीएम जबलपुर की घटना बन जाएगी।

गौरतलब है कि जनहित याचिका भारतीय संविधान या किसी कानून में परिभाषित नहीं है, बल्कि यह उच्चतम न्यायालय के संवैधानिक व्याख्या से व्युत्पन्न है, जिसका कोई अंत‍‍‍र्राष्ट्रीय समतुल्य नहीं है और इसे एक विशिष्ट भारतीय संप्रल्य के रूप में देखा जाता है। यूं तो इस प्रकार की याचिकाओं का विचार सबसे पहले अमेरिका में जन्मा। जहां इसे ‘सामाजिक कार्यवाही याचिका’ कहते हैं। भारत में जनहित याचिका पीएन भगवती ने प्रारंभ की थी।

जनहित याचिकाओं की स्वीकृति हेतु उच्चतम न्यायालय ने कुछ नियम बनाये हैं- पहला, लोकहित से प्रेरित कोई भी व्यक्ति या संगठन इन्हें ला सकता है। दूसरा, कोर्ट को दिया गया पोस्टकार्ड भी रिट याचिका माना जा सकता है। तीसरा, कोर्ट को अधिकार होगा कि वह इस याचिका हेतु सामान्य न्यायालय शुल्क भी माफ कर दे। चतुर्थ, ये राज्य के साथ ही निजी संस्थान के विरुद्ध भी लायी जा सकती है। हालाँकि जनहित याचिकाओं की आलोचनाएं भी की जाती हैं और कहा जाता है कि ये सामान्य न्यायिक संचालन में बाधा डालती हैं और इनके दुरूपयोग की प्रवृत्ति भी परवान पर है। इसके चलते ही सुप्रीम कोर्ट ने खुद कुछ बन्धन इनके प्रयोग पर लगाये हैं। साथ ही अनावश्यक याचिकाकर्ताओं को कड़ी चेतावनी और जुर्माना भी लगाया है, जिससे उसकी गम्भीरता का बोध होता है।

आरम्भ में भारतीय कानून व्यवस्था में जनहित याचिकाओं को यह स्थान प्राप्त नहीं था। इसकी शुरुआत अचानक नहीं हुई, वरन कई राजनैतिक और न्यायिक कारणों से धीरे-धीरे इसका विकास हुआ। 70 के दशक से शुरुआत होकर 80 के दशक में इसकी अवधारणा पक्की हो गयी थी। एके गोपालन और मद्रास राज्य (19-05-1950) केस में उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद-21 का शाब्दिक व्याख्या करते हुए यह फैसला दिया कि अनुच्छेद 21 में व्याख्यायित ‘विधि सम्मत प्रक्रिया’ का मतलब सिर्फ उस प्रक्रिया से है जो किसी विधान में लिखित हो और जिसे विधायिका द्वारा पारित किया गया हो।

अर्थात, अगर भारतीय संसद ऐसा कानून बनाती है जो किसी व्यक्ति को उसके जीने के अधिकार से अतर्कसंगत तरीके से वंचित करता हो, तो वह मान्य होगा। तब न्यायालय ने यह भी माना कि अनुच्छेद-21 की विधिसम्मत प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय या तर्कसंगतता शामिल नहीं है। न्यायालय ने यह भी माना कि अम‍रीकी संविधान के उलट भारतीय संविधान में न्यायालय विधायिका से हर दृष्टिकोण में सर्वोच्च नहीं है और विधायिका अपने क्षेत्र (कानून बनाने) में सर्वोच्च है।

इसके  बाद के फैसलों में न्यायालयों की सर्वोच्चता स्थापित हुई। गोलक नाथ और पंजाब राज्य (1967) केस में 11 जजों की खंडपीठ ने 6-5 के बहुमत से माना कि संसद ऐसा संविधान संशोधन पारित नहीं कर सकती जो मौलिक अधिकारों का हनन करता हो। वहीं, केशवानंद भारती और केरल राज्य (1973) केस में उच्चतम न्यायालय ने गोलक नाथ निर्णय को रद्द करते हुए यह दूरगामी सिद्धांत दिया कि संसद को यह अधिकार नहीं है कि वह संविधान की मौलिक संरचना को बदलने वाला संशोधन करे और यह भी माना कि न्यायिक समीक्षा मौलिक संरचना का भाग है।

आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रता का जो हनन हुआ था, उसमें उच्चतम न्यायालय के एडीएम जबलपुर और अन्य तथा शिवकांत शुक्ला (1976) केस, जिसके फैसले में न्यायालय ने कार्यपालिका को नागरिक स्वतंत्रता और जीने के अधिकार को प्रभावित करने की स्वच्छंदता दी थी, का भी योगदान माना जाता है। इस फैसले ने अदालत के नागरिक स्वतंत्रता के संरक्षक होने की भूमिका प‍र प्रश्नचिह्न लगा दिया। आपातकाल (1975-1977) के पश्चात न्यायालय के रुख में गुणात्मक बदलाव आया। मेनका गांधी और भारतीय संघ (1978) केस में न्यायालय ने एके गोपालन केस के निर्णय को पलट कर जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों को विस्तारित किया। जहां तक उच्चतम न्यायालय के दिशा निर्देश का सवाल है तो यह कहा जा सकता है कि उच्चतम न्यायालय ने जनहित याचिकाओं को प्रगतिशील लोकतान्त्रिक व्यवस्था का प्राणतत्व माना है। 

(वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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