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Categories: बीच बहस

आख़िर क्यों वित्तमंत्री के ऐलान झुनझुने जैसे ही हैं?

ग़रीब हो या अमीर, अब तो सभी 20 लाख करोड़ रुपये के सुहाने पैकेज़ वाले झुनझुने की झंकार सुनने को बेताब हैं। लेकिन वित्तमंत्री की पहले दिन की पेशकश में ग़रीबों के लिए कुछ नहीं था। हो सकता है, आने वाले दिनों में सरकार को इनके लिए भी कुछ सूझने लगे। अभी तक तो सरकार की तरफ से समाज के उस सबसे कमज़ोर तबके के लिए हमदर्दी के बोल भी नहीं थे, वो एक से बढ़कर एक विचित्र तकलीफ़ झेलकर चिलचिलाती धूप में सैकड़ों किलोमीटर लम्बी सड़कों को पैदल नापकर अपनी आत्म-निर्भरता का प्रदर्शन करने के लिए मज़बूर हुए हैं।

वैसे क़रीब दस करोड़ ग़रीबों के लिए 26 मार्च 2020 को घोषित पहले दौर के पैकेज़ में करीब एक लाख करोड़ रुपये का इन्तज़ाम किया गया था। इन्हीं रुपयों से किसी को 500, किसी को 1000, किसी को 2000, किसी को मुफ़्त गैस सिलेंडर और किसी को सस्ता राशन वग़ैरह मुहैया करवाया जाना था। ग़रीबों को ये मदद पहुँची भी है। हालाँकि, ये चर्चाएँ तो होती ही रहेंगी कि मदद कितनी पर्याप्त या अपर्याप्त रही? लेकिन यदि ‘प्रत्यक्षं किम् प्रमाणम्’ यानी ‘प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या’ जैसा कोई आधार है, तो पैदल सड़क नाप रहे ग़रीबों को देखकर तमाम सरकारी दावों और कोशिशों की हक़ीक़त समझना मुश्किल नहीं है।

MSME पैकेज़ की श्रेणियाँ

20 लाख करोड़ रुपये के कोरोना पैकेज़ में से वित्तमंत्री ने सबसे पहले उस लघु, छोटे और मझोले श्रेणी (MSME) के उद्यमियों की परवाह की जिसकी 6.5 करोड़ इकाईयों से 12 करोड़ लोग रोज़गार पाते थे। खेती के बाद अर्थव्यवस्था का यही सेक्टर देश के सबसे अधिक लोगों का पेट भरता है। इसी में सबसे अधिक बेरोज़गारी पैदा हुई है। वित्तमंत्री ने MSME को सबसे बड़ा तोहफ़ा ये दिया कि उसकी परिभाषा बदल दी। इसकी माँग भी बहुत पुरानी थी। इसमें मैन्यूफ़ैक्चरिंग और सर्विस वाली श्रेणियाँ ख़त्म करके लघु, छोटे और मझोले, तीनों श्रेणियों के लिए निवेश और टर्न ओवर की सीमा को ख़ासा बढ़ाया गया। ये पैकेज़ नहीं बल्कि सुधारवादी क़दम है। फिर भी सरकार को शाबाशी मिलनी चाहिए।

अगला ऐलान है – संकट झेल रहे 45 लाख MSMEs को निहाल करने के लिए 3 लाख करोड़ रुपये का पैकेज़ देना। उद्यमियों को ये रक़म चार साल के लिए बतौर कर्ज़ दी जाएगी। बदले में उन्हें कोई गारंटी नहीं देनी पड़ेगी और ना ही किसी सम्पत्ति को गिरवी रखना होगा। यानी, यदि ये रकम डूब गयी तो बैंकों को इसकी भरपाई केन्द्र सरकार करेगी। इस ‘नो गारंटी, नो कोलेटेरल’ श्रेणी वाले कर्ज़ पर साल भर तक कोई ब्याज़ नहीं भरना पड़ेगा। अब सवाल ये कि 3 लाख करोड़ रुपये के इस पैकेज़ का ज़मीन पर असर क्या होगा?

3 लाख करोड़ रुपये को यदि सामान्य श्रेणी वाले 45 लाख MSMEs के बीच बराबर से बाँटा जाए तो हरेक के हिस्से में 6.66 लाख रुपये आएँगे। यही वो रक़म है, जिसे देखकर उद्यमी चाहें तो ख़ुशियाँ मना सकते हैं। बीमार (Stressed and NPA) श्रेणी वाले 2 लाख MSMEs के लिए भी 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया है। ये मदद 10 लाख रुपये प्रति इकाई बैठती है। पैकेज़ के बग़ैर 2 लाख उद्यमियों के लिए बैंकों से इसे पाना मुश्किल होता, क्योंकि वो पिछले देनदारी नहीं चुका पाये। फ़िलहाल, ये कहना मुश्किल है कि 10 लाख रुपये के टॉनिक से कितने बीमार MSMEs के दिन फिर जाएँगे और कितने इस रक़म को भी डुबो देंगे?

अब बात ‘ग्रोथ पोटेंशियल’ वाली उस श्रेणी के MSMEs की जिसे सही मायने में ‘भारत को आत्म-निर्भर’ और ‘विश्व गुरु’ बनाना है। ‘2024 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर वाली इकोनॉमी’ बनाने का दारोमदार भी इसी श्रेणी पर है। शायद कोरोना संकट और 2016 से जारी मन्दी को देखते हुए फ़िलहाल ये नारा स्थगित हो गया है। वर्ना, प्रधानमंत्रीजी ‘आत्म-निर्भर भारत’ की बातें करते वक़्त इसका ज़िक्र क्यों नहीं करते? बहरहाल, ग्रोथ पोटेंशियल वाले लघु, छोटे और मझोले श्रेणियों के उद्योगों में निवेश को बढ़ावा देने के लिए 50,000 करोड़ रुपये का ‘फंड ऑफ फंड फॉर इक्विटी इन्फ्यूज़न’ भी बनाया गया है। वैसे ये भी नये जुमले वाला एक कर्ज़ ही है। इसे ज़बरन MSME पैकेज़ का चोला पहनाया गया है।

पैकेज़ में घुसा झुनझुना

MSME के लिए दो अन्य राहत भी मिली है। पहला, 200 करोड़ रुपये तक की सरकारी ख़रीद के लिए अब ग्लोबल टेंडर नहीं होगा। ताकि स्वदेशी कम्पनियों को ही ये धन्धा मिल सके। दूसरा, सरकार और इसकी कम्पनियों में जिन MSMEs का पेमेंट फँसा हुआ है, उसका भुगतान अगले 45 दिनों में हो जाएगा। ग्लोबल टेंडर की बात तो समझ में आती है, लेकिन बकाया भुगतान को वित्तमंत्री किस मुँह से पैकेज़ बता सकती हैं? MSMEs का बकाया उन्हीं का पैसा है, उनका हक़ है। इसे कमीशनख़ोर नौकरशाही अपने भ्रष्टाचारी हथकंडों में फँसाकर रखती है। इसे भी देने के लिए सरकार को 45 दिन समेत शाबाशी भी चाहिए।

इसी तरह, 14 लाख आयकरदाताओं का 5 लाख रुपये तक का रिफंड कर देना भी कोई पैकेज़ नहीं है। वित्तमंत्री का ये कहना भी फ़िज़ूल है कि इससे आयकर रिफंड से अर्थव्यवस्था में 80,000 करोड़ रुपये की लिक्विडिटी बढ़ गयी। कैसे भला? क्या रिफंड पाते ही लोगों ने उस रक़म को खर्च कर दिया? क्या ये लोगों की कोई नयी आमदनी है? ये भी उन्हीं का पैसा है।

ऐसा ही झुनझुना वो ऐलान भी है कि चालू वित्त वर्ष में टीडीएस कटौती में 25 फ़ीसदी की छूट दी जाती है। अरे, क्या इससे टैक्स घट गया, जो ख़ुशी मनायें? रियायत सिर्फ़ इतनी है कि जिसे 100 रुपये टीडीएस जमा करना है, वो अभी 75 रुपये जमा करेगा। लेकिन रिटर्न भरते वक़्त उसे ये 25 रुपये भी भरने होंगे। फ़िलहाल, झुनझुना बजाती वित्तमंत्री को लगता है कि ऐसा करके वो अर्थव्यवस्था में 50,000 करोड़ की डिक्विडिटी बढ़ा देंगी।

अगला ऐलान भी झुनझुना वाला ही है जो बिजली वितरण करने वाली कम्पनियों ‘Discoms’ से जुड़ा है। इसे भी ढोल बजाकर पैकेज़ बताया गया। कहा गया कि बिजली उत्पादन करने वाली कम्पनियाँ अपने ख़रीदारों यानी डिस्कॉम्स को 90,000 करोड़ रुपये का क्रेडिट देंगी। ये क्रेडिट उस रक़म के बदले ही होगी जिसे डिस्कॉम्स अपने उपभोक्ताओं से हासिल करने वाली होंगी या जो उपभोक्ताओं पर बक़ाया होगा। यहाँ असली बात ये है कि यदि डिस्कॉम्स को ऐसी सहूलियत नहीं मिलती तो बिजली पैदा करने वाली कम्पनियों की बिजली का बिकते रहना रुक जाता। इसीलिए ये ख़ुद को दान देने जैसा पुण्य है।

ग़ैर बैंकिंग पैकेज़ की हक़ीक़त

लॉकडाउन के बाद सरकार ने म्यूच्युल फंड की मदद के लिए 50,000 करोड़ रुपये के पैकेज़ का ऐलान किया। फ़िलहाल, ये रक़म अनुपयोगी बनकर रिज़र्व बैंक के पास है। इसी तर्ज़ पर अब वित्त मंत्री ने ग़ैर बैंकिंग वित्तीय कम्पनी (NBFC), हाउसिंग फाइनेंस कम्पनी (HFC) और माइक्रो फाइनेंस कम्पनियों के लिए 30,000 करोड़ रुपये वाले Special liquidity debt scheme का भी ऐलान किया है। ये पैकेज़ कितना बड़ा है? इसे यूँ समझिए कि जिस अर्थव्यवस्था की GDP का 10 फ़ीसदी, 20 लाख करोड़ रुपये है, उसमें 30 हज़ार करोड़ रुपये की औक़ात सिर्फ़ 0.015 प्रतिशत है। इससे ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ को कैसी गति मिलेगी, इसका अन्दाज़ा लगाना मुश्किल नहीं?

ठेकेदार और EPF पैकेज़

सभी तरह के ठेकेदारों को लॉकडाउन की वजह से अपने करार को निभाने के लिए छह महीने की अतिरिक्त मियाद दी गयी है। उन्हें वक़्त पर करार नहीं निभाने के लिए कोई ज़ुर्माना नहीं भरना पड़ेगा। ठेकेदारों का जितना काम हो चुका है, उसके अनुपात में उनकी बैंक गारंटी को वापस करने के वित्तमंत्री के ऐलान से ठेकेदार बिरादरी को थोड़ी राहत ज़रूर मिलेगी। इसी तरह, कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) से जुड़े कुल 6.5 करोड़ खाताधारकों में से 72 लाख कर्मचारियों को जो सौग़ात सरकार ने 26 मार्च 2020 को दी थी, उस सहूलियत को अब अगस्त तक बढ़ा दिया गया है।

EPF वाली सहूलियत भी 3.66 लाख उद्यमियों और उनके ऐसे कर्मचारियों के लिए ही है, जहाँ 100 से कम कर्मचारी हैं और उनमें से 90 फ़ीसदी की तनख़्वाह 15,000 रुपये से कम है। इसमें नियोक्ता और कर्मचारी ने 12-12 फ़ीसदी की जगह 10-10 फ़ीसदी का अशंदान ही दिया। बाकी रक़म सरकार देगी। ये राहत कुल 6750 करोड़ की है। वित्तमंत्री के तमाम ऐलान में सिर्फ़ यही ऐसा है जो सीधे नीचे तक गया। लेकिन ये राहत प्रति कर्मचारी प्रति माह औसतन 1550 रुपये बैठती है। यानी, हर महीने 775 रुपये की राहत मज़दूर को और इतनी ही राहत उसे नौकरी पर रखने वाले उद्यमी को। अब इस मदद को जितना चाहें उतना महत्वपूर्ण और उदार मान लें।

माँग-पक्ष की कोई परवाह नहीं

साफ़ दिख रहा है कि कोरोना संकट भी मोदी सरकार के पिछले चिन्तन की दशा और इसकी प्रतिबद्धता को डिगा नहीं सका। 2016 की नोटबन्दी के बाद से देश की अर्थव्यवस्था में माँग-पक्ष के तेज़ी से सिकुड़ने का कष्ट जारी है। अब तक प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ने अपने पिटारे से जितने भी नुस्ख़े निकाले हैं, वो सप्लाई-पक्ष को सुधारने के लिए तो कुछ उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन इनसे माँग-पक्ष का कोई भला नहीं होने वाला। माँग-पक्ष की दशा बदलने के लिए नये रोज़गार पैदा होना ज़रूरी है, जो रोज़गार में हैं उनकी आमदनी बढ़ना ज़रूरी है। जब तक लोगों के पास खर्च करने का पैसा नहीं होगा, खरीदने की ताक़त नहीं होगी, तब तक सप्लाई चाहे जितना उम्दा हो, बात नहीं बनने वाली। कर्ज़ देकर भी माँग को तभी बढ़ाया जा सकता है जब आमदनी कर्ज़ की किस्तें भर सके।

नयी बोतल में पुरानी शराब

इसीलिए ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ और ‘लोकल के लिए वोकल’ जैसी बातें जुमला हैं। ये ‘नयी बोतल में पुरानी शराब’ जैसी हैं। क्योंकि 2019 की आख़िर में प्रधानमंत्री की ओर से वाराणसी के एक भाषण में ‘लोकल खरीदो’ और ‘लोकल को प्रमोट करो’ वाला नुस्ख़ा देश को मिल चुका था। सवाल ये भी है कि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ में क्या फ़र्क़ है? सिवाय इसके कि ‘मेक इन इंडिया’ का ऐलान 15 अगस्त 2015 को ऐतिहासिक लाल क़िले की प्राचीर से हुआ था, तो ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ का श्रीगणेश 12 मई 2020 को लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास से हुआ।

‘मेक इन इंडिया’ में सबसे बड़ी उम्मीद रक्षा उत्पादन क्षेत्र से थी। इसे शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति भी मिली। इसके बावजूद बीते चार वर्षों में इसमें सिर्फ़ 1.17 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश हुआ। साफ़ है कि ‘मेक इन इंडिया’ फ्लॉप साबित हुआ। इसी तरह, ‘स्टैंड अप इंडिया’, ‘स्टार्ट अप इंडिया’ और ‘स्किल इंडिया’ जैसे पहले मोदी राज के प्रथम कार्यकाल वाले क्रान्तिकारी नारे भी यदि फ़ुस्स नहीं साबित हुए होते तो अब ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ की नौबत ही क्यों आती?

वैसे ‘आत्म-निर्भर’ का मतलब क्या है? यही कि हमें आयात पर निर्भर नहीं रहना पड़े, देश की ज़रूरतें देश में ही उत्पादित सामानों से पूरी हों। मोटे तौर पर क्रूड ऑयल, सोना और रक्षा ख़रीदारी, यही तीन क्षेत्र हैं जहाँ भारत आत्म-निर्भर नहीं है। यही हमारा मुख्य और स्थायी आयात का क्षेत्र भी है। बाक़ी, देश में तकनीक, मशीनरी और चिकित्सीय उपकरणों और सामग्री के आयात की हिस्सेदारी, कुल आयात के सामने बहुत छोटी है। इसीलिए, ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ का असली मक़सद समझना मुश्किल नहीं है। वैसे प्रधानमंत्री जी, 130 करोड़ भारतीयों को मूर्ख भी क्यों बनाना चाहेंगे!

(मुकेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक प्रेक्षक हैं। तीन दशक लम्बे पेशेवर अनुभव के दौरान इन्होंने दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, उदयपुर और मुम्बई स्थित न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में काम किया। अभी दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on May 14, 2020 5:22 pm

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