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Saturday, September 18, 2021

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संसद में 33 फीसदी सीटों के लिए महिलाओं ने नये शिरे से शुरू की गोलबंदी

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(संसद में महिला आरक्षण विधेयक पेश किए जाने की 25 वीं बरसी पर आज महिला संगठनों ने दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक बैठक की। बैठक में महिला आरक्षण विधेयक संसद से तत्काल पारित कराने की मांग की गयी। इस मौके पर तमाम महिला संगठनों के प्रतिनिधि और दूसरी महिलाएं मौजूद थीं। बैठक में इस सिलसिले में सभी संगठनों की तरफ से एक प्रस्ताव पारित किया गया। पेश है पूरा प्रस्ताव-संपादक)

भारत में महिला अधिकारों के लिए काम कर रहे तमाम महिला संगठनों की हम महिलाएं मांग करती हैं कि 33 फीसदी महिला आरक्षण विधेयक, जो 25 वर्ष पहले 12 सितंबर, 1996 को पेश किया गया था, संसद के अगले सत्र में ही पारित किया जाए। यह सत्ताधारी दलों की निर्लज्ज साजिश का ही परिणाम है कि 25 साल बाद भी वह अधर में लटका है। आज संसद में भाजपा का पूर्ण बहुमत है और कांग्रेस प्रमुख विपक्षी दल है। इन दोनों राजनीतिक दलों ने औपचारिक रूप से घोषणा की है कि वे विधेयक का समर्थन करते हैं। इसलिए इस विधेयक को पारित करने में कोई संभावित बाधा नहीं है। बिना किसी विलम्ब के उसे संसद के पटल पर रखा जाए और उस पर मतदान कराया जाए। 2010 में विधेयक को राज्यसभा में पारित करवाना एक महत्वपूर्ण कदम था। पर अब 11 वर्ष से ज्यादा बीत गए हैं और आज भी उसे पेश करने का काम बाकी है। वह भी तब तक कानून नहीं बन सकता जब तक उसे संसद में पारित नहीं किया जाता और उसे 15 राज्यों का समर्थन नहीं मिल जाता।

पंचायतों और स्थानीय निकायों में अनिवार्य महिला आरक्षण ने गांवों-कस्बों और शहरों में लाखों महिलाओं के राजनीति में प्रवेश को सुगम बनाया है। नतीजतन लाखों महिलाओं को पहली बार अवसर मिला है कि वे सार्वजनिक दायरे में आएं। जहां से वे पूरी तरह गायब थीं। आज महिलाएं सक्रिय रूप से राज्यों में सरपंचों, पंचायत सदस्यों, बीडीसी सदस्यों, जिला परिषद अध्यक्षों, टाउन एरिया अध्यक्ष, मेयर और पार्षदों की जिम्मेदारी बखूबी निभा रही हैं। चुनावी जंग में आने के लिए उन्होंने न जाने कितने अड़चनों का सामना किया है। उनमें से कई तो आज महिला समाज के लिए आदर्श बनकर खड़ी हैं। इसकी वजह से कई महिला मुद्दे पंचायतों और स्थानीय निकायों की विषय सूची में लाए जा सके हैं। इस सकारात्मक अनुभव को और मजबूत करने और विस्तृत करने की जरूरत है।

क्रमश: आने वाली सरकारों ने किसी न किसी बहाने से विधेयक को 25 सालों तक टालकर रखा है। मोदी सरकार ने वादा किया था कि 33 फीसदी ही नहीं वे 50 फीसदी आरक्षण देंगे। पर वह भी एक जुमला साबित हुआ।

महिला आरक्षण पर वार करने के लिए यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मनुस्मृति से उद्धरण देते हुए कहा कि महिलाओं को कभी भी आजाद नहीं छोड़ना चाहिए और उन्हें हमेशा मर्दों के अधीन रखना चाहिए।

महिला आरक्षण पर मतदान नहीं कराने के लिए सरकार सर्वसम्मति के अभाव का बहाना बनाती है। हम पूछते हैं कि क्यों निर्णयकारी संस्थाओं में महिला अधिकारी को ही चुना गया है सर्वसम्मति के लिए? लेबर कोड और तीन किसान विधेयकों को बिना सर्वसम्मति के क्यों पारित किया गया?

हम संसद में उपस्थित सभी राजनीतिक दलों से मांग करते हैं कि वे बिना विलम्ब किए 33 फीसदी महिला आरक्षण विधेयक को पारित करें। हम हाशिये पर जी रहे समुदायों- एससी-एसटी, ओबीसी और एलजीबीटीक्यू को 33 फीसदी में शामिल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

हम विधेयक का विरोध कर रहे तमाम लोगों से अपील करते हैं कि वे अपने भय त्याग दें और विधेयक का पुरजोर समर्थन करें। हम मांग करते हैं कि सरकार विधेयक को लोकसभा के पटल पर रखे और उस पर मतदान करवाये। हम तहे दिल से उन सभी युवा साथियों का शुक्रिया अदा करते हैं जो राज्यों में भारी संख्या में आकर विधेयक को समर्थन दिए। खासकर ग्राफिक डिजाइनर अरित्री दास, आशुतोष भारद्वाज, षणमुख, परवेज राजन, वंशिका बब्बर, उत्तम घोष आदि का।

एआईडीएमएम, मरियम धावले, कविता कृष्णन, एआईपीडब्ल्यूए, शबनम हाशमी, अनहद, सीमा जोशी/माधुरी वार्षेणेय, डीडब्ल्यूसी, डॉ. सईदा हमीद, एमडब्ल्यूएफ, अनि राजा, एएफआईडब्ल्यू, फरीदा खान, पहचान, पूजा मंडल, वाईडब्ल्यूसीए

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