विश्व प्रेस स्वतन्त्रता दिवस विशेषः जटिल है भारत में मीडिया की स्वतंत्रता का प्रश्न

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अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विथाउट बॉर्डर्स (मुख्यालय-पेरिस) द्वारा जारी प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 में हम 142 वें स्थान पर हैं। वर्ष 2016 से हमारी रैंकिंग में जो गिरावट प्रारंभ हुई थी वह अब तक जारी है। तब हम 133 वें स्थान पर थे। आरएसएफ के विशेषज्ञों ने भारत के प्रदर्शन के विषय में अपनी टिप्पणी को जो शीर्षक दिया है वह अत्यंत महत्वपूर्ण है, “मोदी टाइटन्स हिज ग्रिप ऑन द मीडिया”। यह टिप्पणी निम्नानुसार है, “वर्ष 2020 में अपने कार्य को लेकर चार पत्रकारों की हत्या के साथ भारत अपना काम सही रूप से करने का प्रयास कर रहे पत्रकारों के लिए विश्व में सबसे खतरनाक मुल्कों में से एक है। इन्हें हर प्रकार के आक्रमण का सामना करना पड़ा है, संवाददाताओं के साथ पुलिस की हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ मुठभेड़ एवं आपराधिक समूहों तथा स्थानीय भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारियों द्वारा प्रेरित प्रतिशोधात्मक कार्रवाई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी को 2019 के वसंत में हुए आम चुनावों में मिली भारी सफलता के बाद से ही मीडिया पर हिन्दू राष्ट्रवादी सरकार की विचारधारा एवं नीतियों का अनुसरण करने के लिए दबाव बढ़ा है।

उग्र दक्षिणपंथी हिन्दू राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाली हिंदुत्व की विचारधारा का समर्थन करने वाले भारतीय अब कथित राष्ट्र विरोधी चिंतन की हर अभिव्यक्ति को सार्वजनिक विमर्श से हटाने की चेष्टा कर रहे हैं। हिंदुत्व के समर्थकों में खीज पैदा करने वाले विषयों पर लिखने और बोलने का साहस करने वाले पत्रकारों के विरुद्ध सोशल मीडिया पर चलाई जा रही समन्वित हेट कैंपेन्स डरावनी हैं और इनमें सम्बंधित पत्रकारों की हत्या करने तक का आह्वान किया जाता है। विशेषकर तब जब इन अभियानों का निशाना महिलाएं होती हैं, इनका स्वरूप हिंसक हो जाता है। सत्ताधीशों की आलोचना करने वाले पत्रकारों का मुँह बन्द रखने के लिए उन पर आपराधिक मुकदमे कायम किए जाते हैं, कुछ अभियोजक दंड संहिता के सेक्शन 124ए का उपयोग करते हैं, जिसके अधीन राजद्रोह के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान है।

वर्ष 2020 में सरकार ने कोरोना वायरस के संकट का लाभ उठाकर समाचारों की कवरेज पर अपने नियंत्रण को मजबूत किया और सरकारी पक्ष से भिन्नता रखने वाली सूचनाएं प्रसारित करने वाले पत्रकारों पर मुकद्दमे कायम किए। कश्मीर में स्थिति अब भी चिंताजनक है, जहाँ पत्रकारों को प्रायः पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा प्रताड़ित किया जाता है, पत्रकारों को समाचारों की विषय वस्तु के संबंध में ओरवेलियन कंटेंट रेगुलेशन्स (सरकार द्वारा जनजीवन के प्रत्येक पक्ष पर अपना नियंत्रण सुनिश्चित करने हेतु निर्मित नियम) का पालन करने को मजबूर किया जाता है और जहाँ मीडिया आउटलेट्स का बन्द होना तय है जैसा कि घाटी के प्रमुख समाचार पत्र कश्मीर टाइम्स के साथ हुआ।”

भारत इस इंडेक्स में बैड केटेगरी में है। हम आरएसएफ द्वारा प्रयुक्त चारों पैमानों पर खरे नहीं उतरे हैं- बहुलवाद, मीडिया की स्वतंत्रता, कानूनी ढांचे की गुणवत्ता और पत्रकारों की सुरक्षा। हमारे दक्षिण एशियाई पड़ोसी नेपाल (106), श्रीलंका (127), म्यांमार(140), सैन्य विद्रोह के पहले की स्थिति) प्रेस की स्वतंत्रता के विषय में हमसे बेहतर कर रहे हैं, जबकि पाकिस्तान में हालात हमसे थोड़े खराब हैं, वह 145वें और बांग्लादेश कुछ और गिरावट के साथ 152 वें स्थान पर है।

इससे पहले मार्च 2021 में अमेरिकी थिंक टैंक फ्रीडम हाउस ने भारत का दर्जा स्वतंत्र से घटाकर आंशिक स्वतंत्र कर दिया था। फ्रीडम हाउस के अनुसार जब से नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं तब से राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतन्त्रता में गिरावट आई है और यह गिरावट 2019 में मोदी जी के दुबारा चुने जाने के बाद और तेज हुई है। दिसंबर 2020 में अमेरिका के कैटो इंस्टीट्यूट और कनाडा के फ्रेजर इंस्टीट्यूट द्वारा जारी ह्यूमन फ्रीडम इंडेक्स 2020 में हम 162 देशों में 111 वें स्थान पर रहे। वर्ष 2019 में हम 94 वें स्थान पर थे। स्वीडन केवी डेम इंस्टीट्यूट ने 22 मार्च 2021 को जारी डेमोक्रेसी रिपोर्ट में भारत के दर्जे को डेमोक्रेसी से इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी में तब्दील कर दिया था।

इन सारे सूचकांकों का जिक्र महज इसलिए कि आरएसएफ के इन आंकड़ों को भारत के विरुद्ध षडयंत्र की भांति प्रस्तुत करने की सत्ता समर्थकों की कोशिशों से कोई भ्रमित न हो जाए। पिछले अनेक महीनों से विश्व के अलग-अलग देशों की एजेंसियां भारत के लोकतंत्र में आ रही गिरावट की ओर संकेत करती रही हैं और प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की रैंकिंग को इन सारी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा समय-समय पर किए गए आकलन की पुष्टि करने वाली अगली कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए।

इस आलेख में जैसा पहले ही लिखा गया है आरएसएफ की टिप्पणी का शीर्षक बहुत उपयुक्त और सारगर्भित है। शीर्षक में भारत सरकार या उसके प्रधानमंत्री का जिक्र नहीं है, यह नरेंद्र मोदी हैं जो मीडिया पर अपना शिकंजा और मजबूत कर रहे हैं। उनका व्यवहार विश्व के विशालतम लोकतंत्र के निर्वाचित प्रधानमंत्री की भांति नहीं है, अपितु वे उग्र दक्षिणपंथ की राह का सफर खतरनाक तेजी से तय करती भाजपा के कप्तान की भूमिका में हैं।

जैसा कि आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में होता है, हमारे देश में भी सत्ता अर्जित करने के बाद राजनीतिक दल अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं और पूर्वाग्रहों को एक सीमा तक नियंत्रित कर लेते थे और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप सरकार का संचालन करते थे। शायद ऐसा इसलिए भी था कि देश में लंबे समय तक शासन करने वाली कांग्रेस ने स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया था और उसे लोकतांत्रिक स्वतन्त्रता का मूल्य पता था। कांग्रेस को अपदस्थ करने वाले गठबंधनों की वैचारिक भिन्नता और गठबंधन धर्म का पालन करने की विवशता किसी एक विचारधारा के अतिरेक से रक्षा करने वाली और लोकतंत्र को परिपुष्ट करने वाली ही सिद्ध हुई थी।

भारतीय राजनीति का मोदी युग सरकार, पार्टी और मीडिया के फ्यूज़न के लिए जाना जाएगा। हम आज मीडिया के एक बड़े भाग को सरकार और पार्टी के प्रवक्ता के रूप में व्यवहार करता देखते हैं, वह सरकार का रक्षक है और सहायक भी। कभी मीडिया भाजपा के लिए एक रणनीतिकार का कार्य करता दिखता है तो कभी पार्टी की रणनीतियों के क्रियान्वयन का जिम्मा उठा लेता है। भाजपा पार्टी कभी सरकार की भांति अहंकारी बनकर लचीलापन खोती दिखती है तो कभी मीडिया की भांति आक्रामक होकर प्रोपेगंडा और वैचारिक छद्म रचती दिखती है।

सरकार गवर्नेंस छोड़कर सारे काम करती दिखती है। प्रायः वह पार्टी की भांति संकीर्ण और पक्षपाती बन जाती है और पार्टी के लिए चुनाव केंद्रित शासन करने लगती है। हम उसे मीडिया की भांति इवेंट बनाते और मैनेज करते देखते हैं जिसमें जमीनी कामकाज पर नगण्य और आंकड़ेबाजी तथा विजुअल्स पर अधिक जोर होता है। सत्ता में होने के बावजूद भाजपा पार्टी और उसकी सरकार दोनों ही मीडिया की भांति एक सशक्त विपक्ष की भूमिका में दिखते हैं। यद्यपि इनके द्वारा अपने प्रतिद्वंद्वियों को शत्रु समझकर की गई उनकी आलोचना अतार्किक और अनैतिक होने के कारण द्वेषजनित निंदा का रूप ले लेती है तथा इसका स्वरूप मारक एवं हिंसक बन जाता है।

मीडिया, सत्ताधारी दल और सरकार के इस फ्यूज़न का परिणाम यह है कि प्रेस की स्वतंत्रता के संकट का समाधान अब प्रेस बिरादरी के आंतरिक उपचारों, उपायों और नियामकों द्वारा नहीं हो सकता। प्रेस की आजादी अब सम्पूर्ण परिवर्तन द्वारा ही संभव है। यह सत्ता परिवर्तन ही नहीं होगा बल्कि इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी को डेमोक्रेसी की ओर ले जाने वाला विचारधारात्मक परिवर्तन होगा।

प्रेस की आजादी का सवाल इस कारण भी जटिल बन गया है, क्योंकि अब यह दमनकारी सरकार और पीड़ित जनता के पक्ष में खड़ी पत्रकार बिरादरी जैसा आसान मुद्दा नहीं है। नव फासीवाद ने जनता के बड़े हिस्से में अलोकतांत्रिक संस्कार डालने में सफलता पाई है और पहली बार हम बहुमत को लोकतंत्र विरोधी आचरण करता देख रहे हैं। लोकतंत्र और बहुसंख्यक की तानाशाही के बीच की स्पष्ट और गहरी विभाजन रेखा को धुंधला करने में नव फ़ासिस्ट शक्तियों को मिली सफलता के बाद अब धार्मिक ध्रुवीकरण करने वाली, नफरत और बंटवारे को बढ़ावा देने वाली, साम्प्रदायिक एवं जातीय उन्माद पैदा करने वाली, हिंसा की ओर धकेलने वाली तथा बुनियादी मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने वाली खबरों को इस रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे ये प्राकृतिक न्याय की स्थापना की सहज प्रक्रिया का कोई हिस्सा हों। यह दर्शाया जा रहा है कि धर्मनिरपेक्षता, बंधुत्व, अहिंसा तथा समानता जैसे मूल्य आरोपित और अन्यायपूर्ण थे, जिनका स्थान अब नए मूल्य ले रहे हैं।

बंटवारे और नफरत का जहर सूचना और विचारों के आदान प्रदान से जुड़े लोगों (इन्हें सामान्य रूप से पत्रकार कह दिया जाता है जो सही नहीं है, यह राजनीतिक-सामाजिक-धार्मिक कार्यकर्ता हैं, किसी विभाजनकारी एवं हिंसक विचारधारा के घोषित-अघोषित समर्थक हैं, स्पष्ट व्यावसायिक और राजनीतिक एजेंडे वाले समाचार चैनलों पर खबरों को पढ़ने वाले एंकर हैं, वे सभी लोग हैं जो डिजिटल और कुछ हद तक प्रिंट मीडिया का उपयोग अपने एजेंडे के प्रचार प्रसार में कर रहे हैं, इन्हें पत्रकारिता के बुनियादी मूल्यों से कोई वास्ता नहीं है और न ही सच्ची, प्रामाणिक, वस्तुनिष्ठ सूचना को बिना मिर्च मसाले के प्रस्तुत करना इनका ध्येय है। ये जनपक्षधर तो कतई नहीं हैं।) में इस प्रकार फैल गया है कि वैचारिक, भाषिक और कई बार शारीरिक हिंसा भी देखने में आ रही है।

सोशल मीडिया का जन्म उन्मुक्त और स्वछंद रहने के लिए हुआ है और यह अपनी प्रकृति में अनुशासन और नियंत्रण का विरोधी है। इसके अराजक और आज़ादी पसंद स्वभाव को नव फ़ासिस्ट शक्तियों ने बहुत चतुराई से अपने पक्ष में दिशा दी है और हजारों असंबद्ध और अनर्गल लगने वाली वायरल पोस्टों के माध्यम से जनमानस को हिंसा और घृणा के विमर्श का अभ्यस्त बनाया है। इस हिंसा के आकर्षण से नव फ़ासिस्ट शक्तियों के विरोधी भी अछूते नहीं रहे हैं।

अनेक बार हम देखते हैं कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर किसी आवश्यक, जनोपयोगी और बुनियादी मुद्दे पर चल रही बहस केवल इस कारण से पटरी से उतर जाती है, क्योंकि भाषा का संयम टूट जाता है, हम भाषिक हिंसा पर उतर आते हैं, हम आरोप-प्रत्यारोप तथा गाली गलौच की उस भाषा का प्रयोग करने लगते हैं जिस पर नफरतजीवियों का विशेषाधिकार है।

किसान आंदोलन की शुचिता पर प्रश्नचिह्न लगाने के ध्येय से कवरेज कर रहे मुख्यधारा के षड़यंत्रकारी मीडिया के किसी नफरतजीवी पत्रकार के साथ धक्का मुक्की और दिल्ली दंगे की वास्तविक सच्चाई दिखाने की कोशिश कर रहे किसी साहसी पत्रकार के साथ मारपीट बिल्कुल अलग घटनाएं हो सकती हैं। संभव है कि पहली हिंसा झूठ दिखाने से रोकने के लिए की गई हो और दूसरी हिंसा सच दिखाने से रोकने के लिए की गई हो।

किंतु जब पहली घटना को हिंसक किसानों की गुंडागर्दी और दूसरी घटना को भावनात्मक रूप से उद्वेलित भीड़ की सहज प्रतिक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तब आघात सत्य एवं न्याय के लिए चल रहे संघर्ष को ही लगता है। अच्छे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए चल रहे संघर्ष में भी भूल से ही सही जब हम हिंसा का आश्रय लेते हैं तब भी हम आतताइयों को एक अवसर प्रदान कर देते हैं कि वह अपनी हिंसा को न्यायोचित ठहराएं, और हम पर हिंसक होने का आरोप लगाकर हमारी स्वतन्त्रता का अपहरण करें।

यही स्थिति पत्रकारिता में है। हम उग्र दक्षिणपंथी शक्तियों के विरोध में इतने लीन हो जाते हैं कि हमें पता ही नहीं चलता कि कब हम उनकी तरह घृणा की भाषा बोलने लगे हैं, कब हमारे प्रतिरोध में हिंसा और प्रतिशोध के तत्व घुस आए हैं। हम स्वयं को स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता का पैरोकार समझ रहे होते हैं और उग्र दक्षिणपंथी शक्तियां इस बात का जश्न मना रही होती हैं कि हम उनके द्वारा दिए गए मुद्दों पर उन्हीं की भाषा में उनकी भांति ही सोचने के लिए धीरे-धीरे प्रशिक्षित किए जा रहे हैं।

हमें पत्रकारिता के गैंगवार का हिंसा प्रिय अपराधी बनाने की कोशिश हो रही है और जैसे ही हम भाषिक एवं वैचारिक हिंसा का आश्रय लेंगे सरकारों का दमन चक्र प्रारंभ हो जाएगा और हम उनकी संगठित हिंसा का मुकाबला नहीं कर पाएंगे।

हाल ही में संकीर्ण और असमावेशी उग्र दक्षिणपंथी  विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने वाले एक नामचीन टीवी एंकर के असामयिक दुःखद निधन पर हममें से अनेक लोगों की प्रतिक्रिया अतिरंजित और अमर्यादित थी। यदि उन्होंने अपनी प्रतिभा और लोकप्रियता का दुरुपयोग समाज में घृणा और विभाजन का विष फैलाने के लिए किया है तो आने वाली पीढ़ियां उन्हें उसी रूप में याद रखेंगी।

हो सकता है कि किसी अप्रिय और कष्टप्रद अनुभव की भांति उन्हें विस्मृत कर दिया जाए। किंतु हमें तो चाहिए था कि एक युवा जीवन के आकस्मिक अवसान पर शोक व्यक्त करते और इस बात पर अफसोस व्यक्त करते कि हमें इतना समय नहीं मिल पाया कि हम उन्हें सहिष्णुता, समावेशन, अहिंसा और सर्व धर्म समभाव जैसे मूल्यों के वास्तविक महत्व से परिचित करा पाते। हमें तो इस बात की कामना करनी थी कि समाज को घृणा और विभाजन की ओर धकेलने वाली विचारधारा के समर्थन की जो भूल उनसे हुई थी वह कोई अन्य प्रतिभावान नवयुवक दुबारा न करें। किंतु हमने उनके निधन पर हर्ष व्यक्त कर उसी नफरत को मजबूती दी जिसके विरोध का हम दावा करते हैं।

हम स्वयं को मौलिक और स्वतंत्र पत्रकारिता का पोषक तभी कह सकते हैं जब हम घृणा की भाषा और विभाजनकारी मुद्दों का बहिष्कार करें। चाहे वह सरकारी दमन हो या उग्र दक्षिणपंथी शक्तियों की हिंसा हो या सूचना एवं विचारधारा के प्रचार-प्रसार से जुड़े व्यक्तियों के आक्रमण हों, इन सभी के दो उद्देश्य होते हैं- पहला प्रकट उद्देश्य होता है कि भय उत्पन्न कर सत्यान्वेषण और जनपक्षधर पत्रकारिता को बाधित किया जाए किंतु दूसरा अप्रकट उद्देश्य अहिंसा, सहिष्णुता और संयम की राह से भटकाकर हिंसा और असहिष्णुता की ओर ले जाने का होता है। जब यह दूसरा उद्देश्य कामयाब हो जाता है तब हमारा विरोध भी इन नव फ़ासिस्ट शक्तियों को मजबूती देता है।

(राजू पांडेय लेखक और गांधीवादी चिंतक हैं।)

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