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फ्रांस की आतंकी घटना पर विश्वव्यापी प्रतिक्रिया! इस्लाम के खिलाफ जाएगा किसी भी तरह के कट्टरपंथ को प्रश्रय

बीते सप्ताह फ़्रांस में एक 47 वर्षीय शिक्षक सैमुअल पैटी छात्रों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में पढ़ा रहे थे और इसी सिलसिले में उन्होंने शार्ली एब्दो के कार्टूनों का ज़िक्र किया था। इसके बाद 18 साल के चेचन मूल के एक लड़के ने बर्बरतापूर्ण तरीके से उस शिक्षक की सिर काटकर हत्या कर दी। इस घटना के बाद फ़्रांस की पुलिस ने उस लड़के को मार गिराया था। हमले के बाद पुलिस ने कई जगहों पर छापा मारा और 16 लोगों को हिरासत में ले लिया था। बाद में छह को छोड़ दिया गया। सरकार ने एक मस्जिद भी बंद करने का आदेश दिया है। उस मस्जिद के ख़िलाफ़ आरोप है कि पैटी की हत्या से पहले वहां से फ़ेसबुक पर वीडियो साझा किया गया और उस स्कूल का नाम-पता बताया गया जहां पैटी पढ़ाते थे।

फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस घटना की निंदा करते हुए इसे ‘इस्लामिक आतंकवादी’ हमला कहा और उनकी सरकार ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ दी है और इसमें उन्हें विपक्ष का भी समर्थन मिल रहा है।

एक ट्वीट में मैक्रों ने कहा, “वो झुकेंगे नहीं, लेकिन शांतिप्रिय मतभेदों का आदर भी करते हैं। हम नफऱत भरे भाषण स्वीकार नहीं करेंगे और तार्किक बहस का बचाव करेंगे। हम हमेशा से मानवीय मर्यादा के पक्षधर रहे हैं।”

वहीं सैमुएल की हत्या के बाद फ़्रांस के लोग सड़क पर उतर आए हैं। पिछले हफ़्ते फ़्रांस के दो शहरों के टाउन हॉल में सैमुएल को श्रद्धांजलि देने के लिए उनकी तस्वीर के साथ पैग़ंबर मोहम्मद के कार्टून भी लगाए।

फ़्रांस नीतिगत तौर पर मानता है कि किसी भी धर्म की भावनाओं की रक्षा करने की कोशिश, स्वतंत्रता और देश की एकता में बाधक है। ताजा घटनाक्रम के बाद जहां फ़्रांस की सरकार ने इसे आतंकवादी घटना करार देते हुए कार्रवाई शुरू की है और साथ ही कहा है कि फ़्रांस में हर हाल में धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आज़ादी कायम रहेगी।

कुछ इस्लामिक देशों के विरोध के बीच फ्रांस को लगातार इस मुद्दे पर बाकी देशों का समर्थन मिल रहा है। यूरोपीय काउंसिल के सदस्यों ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी कर हत्या की घटना की निंदा करते हुए फ्रांस के राष्ट्रपति के पक्ष में समर्थन जाहिर किया है।

वहीं शिक्षक की हत्या के बाद फ्रांस द्वारा उठाए गए कदम के बाद एक चर्च में भी अनेक लोगों पर चाकू से हमले की खबर है। इसमें तीन लोगों की मौत हो गई है। कई लोगों के घायल होने की सूचना है।

वहीं तुर्की जैसे कुछ एक इस्लामिक देशों को छोड़ कर बाकी दुनिया ने इस घटना की निंदा की है और फ़्रांस सरकार का समर्थन किया है। इजराइल के प्रधानमंत्री ने भी इस हमले की निंदा की है।

ऐसा लग रहा है कि फ्रांस की ताजा घटना के बाद दुनिया के देश दो हिस्सों में बंट गए हैं। सऊदी अरब, कुवैत, जॉर्डन और कतर में फ्रांसीसी उत्पादों का बहिष्कार शुरू हो गया है। वहीं पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी फ्रांस के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। ढाका में प्रदर्शनकारियों ने फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का पुतला जलाया।

ढाका के प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया देते हुए बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने ट्वीट कर लिखा है, “ये रेप, हत्या, भ्रष्टाचार, ग़रीबी और अन्याय के ख़िलाफ़ सड़क पर नहीं उतरते हैं। ये चीनी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं करते हैं जहां मस्जिदें तोड़कर सार्वजनिक शौचालय बनाए जा रहे हैं। इस्लाम एक धर्म नहीं राजनीति है।”

धार्मिक कट्टरपंथ के कारण या अन्य किसी भी कारण किसी की हत्या को जायज ठहराया भी नहीं जाना चाहिए। यदि किसी को भी कहीं कुछ गलत लगता है तो उसके लिए कानून के रास्ते खुले हुए हैं। हत्या एक आतंकी क्रिया है। फ्रांस में शिक्षक की हत्या पूरी दुनिया के लिए तनाव बन रहा है और इस तनाव को कुछ देशों के नेता बढ़ावा दे रहे हैं।

बीते सोमवार को तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने भी फ़्रांसीसी सामानों के बहिष्कार की अपील की थी। मंत्रालय ने अपने बयान में फ़्रांस के सामानों के बहिष्कार की अपील की भी निंदा की है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि फ़्रांसीसी सामानों के बहिष्कार की अपील अर्थहीन है और इसे तत्काल रोका जाना चाहिए।

साथ ही फ़्रांस के विदेश मंत्रालय ने इंडोनेशिया, बांग्लादेश, इराक़ और मॉरिटानिया में अपने नागरिकों को सर्तक रहने के लिए चेतावनी जारी की है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है, ”अभिव्यक्ति की आज़ादी, धार्मिक स्वतंत्रता और नफ़रत रोकने के पक्ष में फ़्रांस के रुख़ को ग़लत तरीक़े से पेश किया जा रहा है। राष्ट्रपति मैक्रों के बयान को भी राजनीतिक फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भी एक ख़त लिखकर मुस्लिम देशों से पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ एकजुट होने की अपील की है।

फ़्रांस में इस्लामिक चरमपंथी का यह कोई पहला हमला नहीं है। इससे पहले साल 2015 में ‘शार्ली ऐब्दो’ पत्रिका ने पैग़ंबर मोहम्मद के कार्टून प्रकाशित किए थे। प्रकाशन के बाद पत्रिका कार्यालय पर हमला करके 12 लोगों को मार डाला गया था। शार्ली एब्दो फ़्रांस की एक साप्ताहिक व्यंग्य पत्रिका है।

‘शार्ली ऐब्दो’ पत्रिका ने एक और विवाद खड़ा कर दिया है। मैगजीन ने तुर्की के राष्ट्रपति का कार्टून बनाया है जिससे बवाल खड़ा हो गया है। तुर्की ने एब्दो के खिलाफ ‘सांस्कृतिक नस्लभेद’ करने का आरोप लगाया है। इस बीच विरोध और विवाद के दौरान फर्जी ख़बरें भी फैलाई गईं सोशल मीडिया पर। 2017 के एक पुराना वीडियो वायरल किया गया और कहा गया कि शिक्षक की हत्या के बाद फ़्रांस पुलिस ने मुसलमानों को सार्वजानिक नमाज़ पढ़ने से रोका।

भारत सरकार ने भी फ़्रांस के राष्ट्रपति द्वारा उठाए गए क़दमों का समर्थन किया है। बुधवार को भारतीय विदेश मंत्रालय ने फ़्रांसीसी राष्ट्रपति का समर्थन किया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी किया है, “अंतरराष्ट्रीय वाद-विवाद के सबसे बुनियादी मानकों के उल्लंघन के मामले में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के ख़िलाफ़ अस्वीकार्य भाषा में व्यक्तिगत हमलों की हम निंदा करते हैं। हम साथ ही भयानक तरीक़े से क्रूर आतंकवादी हमले में फ़्रांसीसी शिक्षक की जान लिए जाने की भी निंदा करते हैं। हम उनके परिवार और फ्रांस के लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं। किसी भी कारण से या किसी भी परिस्थिति में आतंकवाद के समर्थन का कोई औचित्य नहीं है।

इस मसले पर पूरी दुनिया कई हिस्सों में बंटती नजर आ रही है। इनमें एक हिस्सा फ्रांस की कार्रवाइयों का समर्थन कर रहा है। जिसमें उसका मानना है कि किसी भी धर्म के कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई बहुत जरूरी है। और आगे बढ़ने के साथ ही यह कट्टरपंथियों को प्रश्रय देने वाले हिस्से के खिलाफ तक बढ़ सकती है। फ्रांस के इस मसले पर मुस्लिम तबके की एक अलग किस्म की प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। जो अभी तक इस तरह के किसी मसले पर आतंकवाद के खिलाफ खड़ा होता था और उसे किसी भी रूप में प्रश्रय देने के खिलाफ रहता था, लेकिन इस मसले पर कई मुस्लिम देश और वहां के शासक तक फ्रांस के विरोध में खड़े हो गए हैं। उन्हें नहीं पता कि आखिर में उनके इस विरोध का फायदा इस्लाम के भीतर की कट्टरपंथी ताकतें उठाएंगी और उससे न केवल इस्लाम को नुकसान पहुंचेगा बल्कि पश्चिमी और दूसरी इस्लाम विरोधी जमातों को उनके इस्तेमाल का मौका मिल जाएगा।

इस बात में कोई शक नहीं कि किसी भी आधुनिक, सभ्य और लोकतांत्रिक समाज में किसी को भी किसी दूसरे धर्म को अपमानित करने या फिर उसे नीचा दिखाने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है और इसमें अगर कोई उस लक्ष्मण रेखा को पार भी करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई कानून के मुताबिक होगी। उसके लिए पुलिस, कोर्ट और दूसरी कानूनी एजेंसियां मौजूद हैं और उनके जरिये उससे निपटा जा सकता है। इसमें अगर कोई भी शख्स प्रतिक्रिया स्वरूप या फिर भावना में दूसरे पर हमला कर देता है और उसकी हत्या तक कर देता है यह बात किसी भी सभ्य समाज के लिए किसी कलंक से कम नहीं है। और इसीलिए इस तरह की किसी घटना के हो जाने पर वहां की सरकार को भविष्य में ऐसी कोई घटना न हो उसको रोकने का उसे पूरा अधिकार मिल जाता है। और वैसे भी हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि फ्रांस समेत पश्चिमी यूरोप ने धर्म और राज्य के बीच अंतरविरोध के मसलों को हल कर लिया है। और किसी ऐसे मौके पर जब कि वहां दोनों के बीच कोई विवाद या फिर झगड़ा होता है तो राज्य का पक्ष प्रभावी होता है। इसलिए कट्टरपंथियों के खिलाफ फ्रांस में कार्रवाई वक्त की जरूरत है।

(वरिष्ठ पत्रकार और कवि नित्यानंद गायेन की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on October 30, 2020 5:15 pm

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