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पीएम का दोस्त होने का मिल रहा फायदा!, यस बैंक के डिफाल्टर अंबानी, सुभाष चंद्रा पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं

आर्थिक उदारीकरण के दौर में चाहे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक हों या निजी क्षेत्र के कार्पोरेट लूट का पर्यायवाची बनकर रह गये हैं। इसमें कार्पोरेट के साथ रिजर्व बैंक आफ इंडिया, संबंधित बैंक और सरकार की दुरभिसन्धि है, जिससे न केवल बैंकों का एनपीए साल दर साल बढ़ता जा रहा है बल्कि बैंक भी डूबने की कगार पर पहुंच जा रहे हैं।

जनता के पैसे की सार्वजनिक लूट के इस गोरखधंधे में न्यायपालिका भी चुप्पी साधे रहती है, क्योंकि सेबी की तरह बैंकों की नियामक संस्था रिजर्व बैंक आफ इंडिया कोई ऐसा दंडात्मक कदम नहीं उठाती, जिसके विरुद्ध कोई फरियादी बैंकर उच्चतम न्यायालय में जाने को विवश हो। न्यायपालिका जनता के पैसे की सार्वजनिक लूट का स्वत संज्ञान भी ले सकती है पर आज तक ऐसा हुआ नहीं है।

बकाया लोन्स की रिकवरी के लिए कुछ प्रावधानों को सम्मिलित करते हुए बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 में संशोधन करके अधिसूचित कर दिया गया है। पर इसके प्रवधानों के तहत यस बैंक के बड़े बकायेदारों के खिलाफ अब तक सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने कोई कार्रवाई शुरू नहीं की है। क्या इन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दोस्त होने का फायदा मिल रहा है?

गौरतलब है कि दस बड़े बिज़नेस घरानों की 44 कंपनियों ने यस बैंक के 34,000 करोड़ रुपये डकार लिए हैं। मोदी के चहेते अनिल अंबानी की नौ कंपनियों पर यस बैंक का 12,800 करोड़ रुपये का लोन बकाया है। भाजपा सांसद ज़ी वाले सुभाष चंद्रा के एस्सेल ग्रुप की 16 कंपनियों ने 8,400 करोड़ रुपये का लोन लिया।

डीएचएफएल यानी दीवान हाउसिंग फ़ाइनांस कारपोरेशन और बिलिंग रिएल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड की कंपनियों ने यस बैंक से 4,375 करोड़ रुपये का लोन लिया। आईएलएस एंड एफएस ने यस बैंक से 2500 करोड़ लिया। जेट एयरवेज़ ने यस बैंक से 1100 करोड़ लोन लिया। यस बैंक के बैड लोन में केर्कर ग्रुप भी है, जिसकी दो कंपनियों कॉक्स एंड किंग्स और गो ट्रेवल्स ने करीब 1,000 करोड़ रुपये का कर्ज लिया, जो बैड लोन में तब्दील होता नजर आता है।

बीएम खेतान ग्रुप की भारत इंफ्रा, मैकलियोड रसेल असम टी और एवरेडी (1,250 करोड़ रुपये), ओंकार रियल्टर्स और डेवलपर्स के दो प्रोजेक्ट (2,710 करोड़ रुपये), रेडियस डेवलपर्स (1,200 करोड़ रुपये) और थापर ग्रुप की सीजी पावर (500 करोड़ रुपये) पर बैड लोन है।

इनके विरुद्ध आज तक संशोधित बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के तहत कोई कारवाई सरकार ने नहीं शुरू कराई है, क्योंकि ये सभी या तो पीएम मोदी के मित्र हैं या किसी न किसी रूप से भाजपा और संघ के नजदीकी हैं।

केंद्र सरकार द्वारा बकाया लोन्स की रिकवरी के लिए कुछ प्रावधानों को सम्मिलित करते हुए बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 में संशोधन करके अधिसूचित कर दिया गया है। इन प्रावधानों के तहत केंद्र सरकार भारतीय रिजर्व बैंक को इस बात के लिए अधिकृत कर सकती है कि वह लोन डीफॉल्टरों के खिलाफ बैंकों को कार्रवाई शुरू करने के संबंध में निर्देश जारी करे।

रिकवरी की यह कार्रवाई इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 के तहत की जाएगी। इस संहिता में डीफॉल्ट से निपटने के लिए लोन की रीस्ट्रक्चरिंग (जैसे रीपेमेंट के शेड्यूल में बदलाव करना) या डीफॉल्टर के एसेट्स को लिक्विडेट करना (यानी बेचने) का समयबद्ध प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है।

यस बैंक के संकट में घिरने के पीछे रिलायंस ग्रुप के बकाया लोन को लेकर अनिल अंबानी के नेतृत्व वाले कॉरपोरेट समूह ने सफाई दी है। रिलायंस ग्रुप ने एक बयान जारी कर कहा है कि यस बैंक से उसकी ओर से लिया गया लोन पूरी तरह से सुरक्षित है और इसे सामान्य कारोबार के मकसद से लिया गया था।

कर्ज के संकट में पहले से ही घिरे रिलायंस ग्रुप ने कहा है कि वह यस बैंक से लिए गए कर्ज को चुकाने के लिए तत्पर है। अपनी संपत्तियों को बेचने से मिलने वाली रकम के जरिए वह इस कर्ज को चुकाएगा।

भाजपा सांसद ज़ी न्यूज़ वाले  सुभाष चंद्रा के एस्सल ग्रुप की 16 कंपनियों ने 8,400 करोड़ का लोन यस बैंक से लिया है, लेकिन भाजपा सांसद ज़ी न्यूज़ वाले सुभाष चंद्रा के एस्सेल ग्रुप की 16 कंपनियों ने 8,400 करोड़ के लोन की अदायगी को लेकर शर्मनाक चुप्पी ओढ़ रखी है। ज़ी/एस्सेल पर आज बहुत सारा कर्ज संदिग्ध है और रेटिंग वापस ले ली गई हैं। एस्सेल की कोई 14 कंपनियां यस बैंक के लिए 8400 करोड़ रुपये की कर्जदार हैं।

पूरी बैंकिंग प्रणाली के मामले यह राशि कुल कितनी है इसका तो अभी अंदाजा भी नहीं है। सिर्फ एक फर्म में, एलआईसी और अन्य बैंकों के 1414 करोड़ रुपये हैं, जबकि यस बैंक के केवल 418 करोड़ रुपये है (कुल 8400 करोड़ रुपये में से एस्सेल को जो येस बैंक को देने हैं)। और इन कर्जों में से बहुत सा पिछले आठ महीने में बढ़ा होगा, क्योंकि एस्सेल रेटिंग एजेंसियों के साथ सहयोग नहीं कर रहा था। ज़ी के शेयर बिक चुके हैं और एस्सेल को कुछ करोड़ रुपये देने हैं। किसी भी संपत्ति का कोई खरीदार ढूंढना संभव नहीं है।

एनपीए की वजह से हुई यस बैंक की बदहाली पूरे बैंकिंग सेक्टर के कर्ज के हालात को सतह पर ला दिया है। रिज़र्व बैंक के आंकड़ें बताते हैं कि मार्च 2013 में कुल एनपीए 205 हज़ार करोड़ था। मार्च 2019 में यह बढ़कर 1,173 हज़ार करोड़ हो गया। इस दृष्टि से मार्च 2019 में 237 हज़ार करोड़ राइट ऑफ़ कर दिए गए। मोदी सरकार के बीते पांच सालों के दौरान बैंकों ने 660 हज़ार करोड़ रुपये राइट ऑफ़ कर दिया। यह पूरी राशि कुल एनपीए के तक़रीबन 50 फीसदी से ज्यादा है।

प्राइवेट सेक्टर के यस बैंक को चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर, 2019) के दौरान 18,564 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में बैंक को 1,000 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ था। वित्तीय संकट से जूझ रहा यह बैंक इस वक्त भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के प्रतिबंधों के दायरे में है।

चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में बैंक का सकल फंसा कर्ज (ग्रॉस एनपीए) बढ़कर 18.87 प्रतिशत पर जा पहुंचा। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में बैंक का एनपीए 7.39 प्रतिशत रहा था। समीक्षाधीन अवधि में बैंक को एनपीए के मद में 24,765 करोड़ रुपये का प्रावधान करना पड़ा।

बैंक के नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी के कारण बैंक को इतना बड़ा घाटा हुआ है। इसके साथ ही बैंक में डिपोजिट बेस में भी जबरदस्त कमी दर्ज की गई है। यस बैंक को जुलाई-सितंबर, 2019 तिमाही में 600.08 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ था।

यस बैंक में संकट की मुख्य वजह कथित रूप से सह संस्थापक और पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी राणा कपूर का कुप्रबंधन रहा है। रिजर्व बैंक ने कामकाज के संचालन में खामियों के बाद कपूर का कार्यकाल घटा दिया था। कपूर के उत्तराधिकारी रवनीत गिल ने बैंक के बही खाते में दबाव वाली संपत्तियों की पहचान शुरू की। मार्च, 2019 को समाप्त तिमाही में बैंक को पहली बार तिमाही घाटा हुआ।

सार्वजनिक बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के अंत तक 7.34 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गई। इसका अधिकांश हिस्सा कॉरपोरेट डिफाल्टरों के कारण रहा। वित्त मंत्रालय ने इन आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा, ’30 सितंबर 2017 तक सार्वजनिक बैंकों का समग्र एनपीए 7,33,974 करोड़ रुपये तथा निजी बैंकों का 1,02,808 करोड़ रुपये रहा। वित्त मंत्रालय ने कहा कि इसमें करीब 77 प्रतिशत हिस्सेदारी शीर्ष औद्योगिक घरानों के पास फंसे क़र्ज़ का है।

भारतीय स्टेट बैंक की एनपीए सर्वाधिक 1.86 लाख करोड़ रुपये रही।इसके बाद पंजाब नेशनल बैंक 57,630 करोड़ रुपये, बैंक ऑफ इंडिया 49,307 करोड़ रुपये, बैंक ऑफ बड़ौदा 46,307 करोड़ रुपये, केनरा बैंक 39,164 करोड़ रुपये और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का 38,286 करोड़ रुपये का नंबर रहा।

निजी बैंकों में आईसीआईसीआई बैंक 44,237 करोड़ रुपये के एनपीए के साथ शीर्ष पर रहा है। इसके बाद एक्सिस बैंक 22,136 करोड़ रुपये, एचडीएफसी बैंक 7,644 करोड़ रुपये और जम्मू एंड कश्मीर बैंक का एनपीए 5,983 करोड़ रुपये रहा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों को जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 16, 2020 10:22 am

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