देश की अदालतों और संविधान से ऊपर है योगी सरकार का नया अध्यादेश

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इस अध्यादेश में राजनीतिक जुलूस, प्रदर्शन, हड़ताल, बंद, दंगों और बलवों के दौरान सरकारी एवं निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने पर उपद्रवियों से वसूली के लिए प्रावधान किए गए हैं। 

राज्य सरकार ने यह फैसला लखनऊ में 19 दिसम्बर को आयोजित सीएए विरोधी प्रदर्शनों में शामिल व्यक्तियों के नाम, फोटो एवं अन्य विवरणों वाली होर्डिंग लगाये जाने के खिलाफ याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी के आलोक में किया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए होर्डिंग पर इस तरह की जानकारी के पोस्टर से उन व्यक्तियों की निजता के अधिकारों के उल्लंघन का हवाला देते हुए उन होर्डिंग को तत्काल हटाने का आदेश दिया था, लेकिन राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के ओदश को चुनौती दी थी, जिसके बाद शीर्ष अदालत की अवकाश कालीन खंडपीठ ने भी इस तरह के कदम को लेकर कड़ी आपत्ति जताते हुए राज्य सरकार से पूछा था कि आखिर उसने ऐसा किस कानून के तहत किया है? 

उसी के बाद सरकार ने इस संबंध में एक अध्यादेश लाने का फैसला किया और तब 13 मार्च को यूपी कैबिनेट ने इस अध्यादेश को मंजूरी दी जो राज्यपाल के आदेश से अब जारी हो गया है। संक्षेप में इस अध्यादेश के मुख्य प्रावधान इस प्रकार से हैं। 

दावा करने का प्रावधान

● अध्यादेश के प्रावधानों के तहत विरोध प्रदर्शनों के दौरान यदि निजी सम्पत्ति का नुकसान होता है तो उस सम्पत्ति का मालिक पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कर सकता है।

● सार्वजनिक सम्पत्ति के हुए नुकसान के लिए जिला मजिस्ट्रेट/ पुलिस आयुक्त दावा न्यायाधिकरण के समक्ष तीन माह के भीतर दावा पेश करने के लिए आवश्यक कदम उठायेंगे। 

● यह कदम इस तरह की घटना को लेकर दर्ज प्राथमिकी के आधार पर संबंधित पुलिस सर्किल ऑफिसर की रिपोर्ट के आधार पर उठाया जायेगा।

दावा न्यायाधिकरण या क्लेम ट्रिब्यूनल

● राज्य सरकार रिटायर्ड जिला जज की अध्यक्षता में क्लेम ट्रिब्यूनल बनाएगी। 

● इसके फैसले को किसी भी अन्य न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। 

● ट्रिब्यूनल को आरोपी की संपत्ति अटैच करने अधिकार होगा।

● वह अधिकारियों को आरोपी का नाम, पता एवं फोटोग्राफ प्रचारित-प्रसारित करने का आदेश दे सकेगा ताकि आम लोग उसकी संपत्ति की खरीदारी न करें।

न्यायाधिकरण ( ट्रिब्यूनल ) का गठन

ट्रिब्यूनल में अध्यक्ष के अलावा उतने सदस्य होंगे जितने सरकार निर्धारित करेगी। यानी सदस्यों की संख्या घट बढ़ सकती है। 

● अध्यक्ष सेवानिवृत्त डिस्ट्रिक्ट जज, और इसका सदस्य अतिरिक्त आयुक्त से कम रैंक का अधिकारी नहीं होगा। 

● ट्रिब्यूनल नुकसान के आकलन के लिए क्लेम कमिश्नर की तैनाती कर सकेगा।

● ट्रिब्यूनल, क्लेम कमिश्नर की मदद के लिए प्रत्येक जिले में एक-एक सर्वेयर भी नियुक्त कर सकता है, जो नुकसान के आकलन में तकनीकी विशेषज्ञ की भूमिका निभाएगा। 

● क्लेम कमिश्नर को 30 दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट ट्रिब्यूनल को सौंपना होगा।

दावा न्यायाधिकरण ( ट्रिब्यूनल ) की प्रक्रिया

● सभी दावा याचिकाएं घटित घटना की तारीख के तीन माह के भीतर ट्रिब्यूनल के समक्ष दायर कर दी जानी होंगी।

●  उचित कारण दर्शाये जाने के बाद याचिका दायर करने में 30 दिन के विलम्ब को भी मंजूरी प्रदान की जा सकेगी।

पक्षकारों को नोटिस, पेशी एवं फाइलिंग

● शिकायत मिलने के बाद न्यायाधिकरण द्वारा प्रतिवादी को नोटिस जारी किया जायेगा तथा उसके साथ दावा याचिका की एक प्रति भी संलग्न की जायेगी। 

● नोटिस में निर्दिष्ट तारीख को पेश न होने की स्थिति में एकपक्षीय आदेश जारी कर दिया जायेगा। 

● प्रतिवादी नोटिस प्राप्त होने के 30 दिन के भीतर अपना लिखित जवाब दे सकता है।

● ट्रिब्यूनल अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए किसी पार्टी को किसी वकील के माध्यम से पेश होने की अनुमति दे सकता है।

● ट्रिब्यूनल को दीवानी न्यायालय का पूरा अधिकार होगा और यह भू-राजस्व की तरह क्लेम वसूली का आदेश दे सकेगा। इसके पास जांच के किसी भी चरण में घटनास्थल पर जाकर जांच का अधिकार होगा।

इस अध्यादेश में यह प्रावधान है कि दावा न्यायाधिकरण के फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के अंतर्गत हाईकोर्ट में, और फिर अनुच्छेद 136 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर करने का अधिकार सुरक्षित है। 

अब कुछ बातें, कानून से इतर हट कर जो धरना और प्रदर्शन के दौरान अनायास घटित होती हैं। धरना या प्रदर्शन करने वाला कोई भी राजनीतिक दल या मजदूर संगठन या अन्य कोई भी संगठन कभी भी हिंसक आंदोलन का आह्वान नहीं करता है। क्योंकि उसे यह भली प्रकार से पता है कि ऐसा आह्वान न केवल विधि विरुद्ध है बल्कि एक दंडनीय अपराध भी है। होता यह है कि शांतिपूर्ण ढंग से किये जा रहे धरना प्रदर्शन में अक्सर या तो आंदोलनकारी धैर्य खो कर उत्तेजित हो हिंसा पर उतर आते हैं या उस हुजूम में असामाजिक तत्व घुस कर हिंसा कर बैठते हैं। जिससे पूरा आंदोलन हिंसक हो जाता है और न केवल निजी और सरकारी संपत्ति का ही नुकसान होता है बल्कि लूटपाट या अन्य बड़ी घटना भी घट जाती है। 

ऐसे में उन आंदोलनों के नेताओं पर आईपीसी की विभिन्न धाराओं में मुक़दमे दर्ज होते हैं। आपराधिक धाराओं में दर्ज मुकदमों के बावजूद वे नेता न तो आपराधिक मानसिकता के होते हैं और न ही वे पेशेवर अपराधी हैं। ऐसे मुक़दमे वाले नेता लगभग सभी दलों में आज भी हैं और कुछ तो महत्वपूर्ण मंत्री भी हैं।  लेकिन इस सारे नुकसान की जिम्मेदारी उन नेताओं पर ही आ जाती है, क्योंकि आंदोलन का वे ही नेतृत्व कर रहे थे। ऐसे मुक़दमे कभी कभी दुश्मनी वश किसी का नाम एफआईआर में लिखवा देने से भी आ जाते हैं। मामला अगर राजनीतिक है तो राजनैतिक दलगत प्रतिद्वंद्विता की एक बड़ी भूमिका भी इन आरोप प्रत्यारोप में होती है।  

राजनीतिक विवादों से घिरे ऐसे मामलों में अक्सर पुलिस की भूमिका और उसकी विवेचना सवालों के घेरे में आ जाती है। भीड़ में उन असामाजिक तत्वों को पकड़ना और फिर उनका अपराध साबित करना पुलिस के लिये आसान नहीं होता है। कुछ तो सुबूतों, गवाहों की अनुपलब्धता के कारण और कुछ राजनीतिक दबाव की वज़ह से। इसीलिए सामूहिक आंदोलन या दंगों के दौरान अगर कोई अपराध भीड़ के द्वारा किया गया है तो उसमें सज़ा बहुत ही कम होती है। अपराध में सज़ा हो भी जाए तो संपत्ति के नुकसान की जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती है। 

अब यह देखना है कि सार्वजनिक और निजी संपत्ति के नुकसान से जुड़ा यह नया अध्यादेश अपने लक्ष्य में कितना सफल होता है। 

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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