Tuesday, October 26, 2021

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उर्मिलेश की कलम से

उत्तराखंड डायरी-2: उत्तराखंडी राजनीति का ‘बाम्हन-ठाकुर फ्रेम’और पचपन फीसदी सबाल्टर्न आबादी

तीन-चार दिनों के उत्तराखंड-प्रवास में राजनीतिक दलों के नेताओं से मिलने की बजाय मैंने समाज के कुछ जागरूक और सक्रिय लोगों से मुलाकात पर ज्यादा जोर दिया। एक पत्रकार के लिए यह कोई अच्छा फैसला नहीं था। वह भी...

उत्तराखंड डायरी-1: दो शताब्दियों की यादें, गिर्दा की कोठरी और पहाड़ के नये-पुराने दोस्त

फरवरी, 2020 के बाद यह पहला मौका था, जब मेरे जैसा घुमक्कड़ अपने घर-शहर से बाहर निकला। कोविड-19 के प्रकोप और आतंक ने मनुष्यता को जितना सताया और डराया है, वह अभूतपूर्व है। साढ़े छह दशक के अब तक...

स्व-श्रेष्ठता के दंभ में हर किसी को खारिज करने के खतरे

अभी हाल की बात है, एक दिन मैंने अपने फेसबुक पेज पर दक्षिणपंथी खेमे के एक वरिष्ठ संपादक की असमय मौत पर दुख प्रकट करते हुए संक्षिप्त श्रद्धांजलि-लेख लिखा। इस पर कुछ ‘वामपंथी’ और ‘समाजवादी’ किस्म के बुद्धिजीवी खासे...

क्या बसपा अब राजनीतिक रूप से संदिग्ध हो गई है?

कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती जी ने दो बड़ी घोषणाएं कीं। पहली ये कि उनकी पार्टी यूपी का चुनाव अपने बल पर लड़ेगी। दूसरी कि जिला पंचायत प्रमुखों के चुनाव में वह...

कुछ चुनाव-रणनीतिकार अगर सीएम-पीएम बनाने लगें तो बचे-खुचे लोकतंत्र का क्या होगा?

नेताओं और दलों को 'चुनाव रणनीति' बताने और बनाने वालों के 'बाजार' के किसी 'कामयाब कारोबारी' को अगर ये भ्रम हो जाय कि नेता क्या, वह किसी को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री भी बना सकता है तो इसे आप क्या...

उपन्यास, आलोचना और वीरेंद्र यादव का समाज-बोध

मार्क्सवादी साहित्यालोचक वीरेंद्र यादव के कुछ लेख और टिप्पणियां मैंने पढ़ी थीं। पर उनकी आलोचनात्मक पुस्तक पढ़ने का पहला मौका हाल के दिनों में मिला। यह पुस्तक है-उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता।* 2017 में पुस्तक का दूसरा संस्करण प्रकाशित...

बंगाल में हिन्दुत्वा-कारपोरेट वैचारिकी का सबाल्टर्न-मुखौटा कितना कारगर होगा?

बंगाल के चुनावी नतीजे चाहे जो हों लेकिन चुनाव प्रचार की रणनीति के स्तर पर भारतीय जनता पार्टी ने अपने राजनीतिक जीवन का सबसे अनोखा प्रयोग किया है। उसका यह प्रयोग ‘राजनीतिक-पंडितों’ को ही नहीं, आरएसएस-भाजपा की राजनीतिक-धुरी समझे...

कांशीराम स्मरणः खवासपुर के फकीर का राजनीतिक सफर और आज की बहुजन राजनीति!

हिंदी-भाषी क्षेत्र में बहुजन-राजनीति के नायक और बेमिसाल संगठक कांशीराम जी का आज परिनिर्वाण दिवस है। सन् 2006 में आज ही के दिन उन्होंने दिल्ली में अंतिम सांस ली। एक संगठक और राजनीतिज्ञ के रूप में कांशीराम जी को...

हिंदी दिवस सिर्फ एक फालतू कर्मकांड ही नहीं, राष्ट्रीय क्षति भी!

लंबे समय तक मैं हिंदी दिवस के कार्यक्रमों में जाया करता था। एक हिंदी पत्रकार होने के नाते मुझे इस मौके पर हर साल कभी कोई सरकारी संस्थान बुलाता, कभी किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग तो कभी...

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हाल-ए-यूपी: बढ़ती अराजकता, मनमानी करती पुलिस और रसूख के आगे पानी भरता प्रशासन!

भाजपा उनके नेताओं, प्रवक्ताओं और कुछ मीडिया संस्थानों ने योगी आदित्यनाथ की अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त फैसले...