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Thursday, September 16, 2021

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उर्मिलेश की कलम से

अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता-वापसीः अमेरिका की मजबूरी, समर्पण या किसी नये षड्यंत्र का प्रकल्प?

अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी को लेकर कुछ भारतीय मीडिया प्लेटफार्म्स और कथित सामरिक विशेषज्ञ बेवजह भ्रम फैला रहे हैं। उन्हें यह तालिबान के समक्ष अमेरिका के समर्पण जैसा कुछ लग रहा है। कुछ को इसमें वियतनाम...

मीडिया संस्थानों पर छापेमारी के भारी विरोध के बीच संकीर्णता की कुछ आवाजें

गुरुवार की सुबह, दैनिक भास्कर समूह के दफ्तरों और उसके मालिकों के घरों पर सरकारी एजेंसियों की छापेमारी की खबर सुनकर मेरी सुबह की चाय का मजा ही बिगड़ गया। कुछ ही समय बाद पता चला कि लखनऊ (यूपी)...

योगी का फैसला दिल्ली को नहीं, नागपुर को करना है!

संघ-भाजपा और योगी की तमाम तिकड़मी राजनीति के बावजूद उनके सामने यहीं एक बड़ा अवरोधक आ खड़ा होता है। वह है-कोरोना संक्रमण से बेहाल और तबाह हुए लोगों के प्रति शासन का रवैया। शिक्षक हों या आम लोग, अवर्ण...

हिंदी-भाषी क्षेत्र के लिबरल-कुनबे और केरल के ओ. राजगोपाल

इस लेख का शीर्षक आपको अटपटा लग सकता है। भारत के कुछ खास किस्म के बुद्धिजीवियों को इन दिनों लिबरल कहने-कहलाने का चलन बढ़ा है। हम लोग जब विश्वविद्यालयों में पढ़ते थे तो ऐसे लोगों को आमतौर पर...

राजनीति को नया रास्ता दिखाता किसान आंदोलन और हिंदी-भाषी क्षेत्र की खतरनाक जड़ता

एक बनता हुआ राष्ट्र अगर भारत जैसा विशाल, विविधता और इस कदर असमानता-ग्रस्त हो तो उसकी चुनौतियां बड़ी और जटिल हो जाती हैं। आज के भारत में बेरोजगारी-बेहाली-महामारी का संकट सिर्फ प्रशासकीय कारणों से नहीं है। इसके मूल में...

अतीत के किसान आंदोलनों से क्यों अलग और खास है यह आंदोलन!

कुछ भयानक प्रदूषित महानगरों को छोड़कर मुझे तो भारत का हर हिस्सा सुंदर लगता है। कुछ सूबे/इलाके ज्यादा अच्छे लगते हैं, जैसे पंजाब, केरल, बंगाल-असम-झारखंड-छत्तीसगढ़ के कुछ इलाके, गोवा, महाराष्ट्र के कुछ इलाके और कश्मीर भी! पर पंजाब का...

अर्नब प्रकरण के बहाने भारतीय मीडिया पर एक टिप्पणीः मीडिया उद्योग का गहराता अंधेरा, सत्ता और पत्रकारिता की उम्मीदें

बीते कुछ घंटों से देश के मीडिया और राजनीति में मुंबई पुलिस द्वारा एक न्यूज चैनल के प्रधान की गैर-पत्रकारीय मामलों में गिरफ्तारी को लेकर विवाद मचा हुआ है। यह मामला है-दो लोगों की आत्महत्या का। प्राथमिकी में न्यूज...

बिहार महागठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी कांग्रेस क्यों?

बिहार विधानसभा की कुल 243 में 70 सीटों पर कांग्रेस ने उम्मीदवार दिये हैं। ये 70 सीटें उसे राजद-कांग्रेस-वाम महागठबंधन के तहत मिली हैं। राष्ट्रीय जनता दल का नेतृत्व कांग्रेस को 40 से अधिक सीट देने का इच्छुक नहीं...

हमेशा जनता के आदमी बन कर रहे स्वामी अग्निवेश

स्वामी अग्निवेश का जाना बेहद दुखद! वह ऐसे समय गये हैं, जब उन जैसे लोगों की हमारे समाज को आज ज्यादा जरूरत है। स्वामी जी से मेरा परिचय सन् 1978 हुआ.. उन्हीं के यहां पहली दफा किसी वक्त कैलाश...

महामारी के बीच स्वतंत्रता दिवस और राष्ट्र के स्वास्थ्य पर प्रधानमंत्री के नये ऐलान का मतलब

भारत के स्वतंत्र देश बनने के बाद पहली बार हमने अपना स्वतंत्रता दिवस एक भयावह महामारी के बीच मनाया। ऐसी महामारी बीते 73 वर्षों में कभी नहीं आई। अनेक देशवासियों को लग रहा था कि प्रधानमंत्री इस महामारी से...
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यूपी में नहीं थम रहा है डेंगू का कहर, निशाने पर मासूम

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने प्रदेश में जनसंख्या क़ानून तो लागू कर दिया लेकिन वो डेंगू वॉयरल फीवर,...
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