मौसम पूर्वानुमान में भ्रामक स्थिति

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मौसम पूर्वानुमान करने के क्षेत्र में निजी संस्थानों के आने से भ्रामक स्थिति बन गई है। कई बार अलग अलग संस्थाओं के पूर्वानुमान अलग होते हैं। यह भ्रामक स्थिति इतनी विकट हो गई है कि मौसम विभाग के महानिदेशक ने बकायदा बयान जारी किया है कि मौसम संबंधी पूर्वानुमान जारी करने के लिए वह एकमात्र आधिकारिक नोडल एजेंसी है।

मौसम विभाग ने इस वर्ष सामान्य का 96 प्रतिशत वर्षा होने का अनुमान जारी किया है। उसने अल नीनो परिघटना के प्रभावों को नकारते हुए कहा है कि इसकी वजह से वर्षा कम होने का अनुमान लगाना कठिन है। पिछले 15 वर्षों में छह वर्ष ऐसे रहे जब अल नीनो प्रभाव के बावजूद मानसून पूरी तरह सामान्य रहा।

इस भविष्यवाणी के ठीक एक दिन पहले निजी मौसम पूर्वानुमान संस्था स्काईमेट ने कहा था कि इस वर्ष मौसम का मिजाज उखड़ा हुआ रहेगा। अप्रैल से मई के बीच भीषण गर्मी पड़ सकती है। जून से सितंबर के बीच वर्षा औसत से कम होगी। मौसम भविष्यवाणी करने वाली निजी संस्थाओं में स्काईमेट अव्वल है।

मौसम पूर्वानुमान असल में हवा व बादलों की गति की गणना पर निर्भर करती है। गणना में गलती होने या गति के बारे में बुनियादी आंकड़े कम मात्रा में उपलब्ध होने का असर पूर्वानुमान पर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम के बारे में पूर्वानुमान करना विश्व भर में कठिन होने लगा है। गणना करने की प्रचलित पद्धति सटीक नहीं रह गई है। इस चुनौती से निपटने के लिए रडारों की संख्या बढ़ाई जा रही है। गणना प्रणाली को अद्यतन किया जा रहा है। यह सब वैश्विक स्तर पर हो रहा है। भारत भी इसमें शामिल है।

उल्लेखनीय है कि देश की 52 प्रतिशत खेती वर्षा पर निर्भर है। देश के किसान अब मौसम पूर्वानुमानों के आधार पर फसल बोने लगे हैं। इसलिए मौसम पूर्वानुमान का महत्व बढ़ गया है और उसका सटीक होना जरूरी हो गया है। परन्तु दुनिया के किसी देश का मौसम इतना विविधतापूर्ण, दिलचस्प व हलचल भरा नहीं है जितना भारत का है। कारण है कि इसके एकतरफ अरब सागर है तो दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी। एक तरफ हिमालय है तो दूसरी तरफ थोड़ी ही दूर पर भूमध्य रेखा। इसलिए भारतीय मौसम को समझने में दुनिया भर के वैज्ञानिक दिमाग लगाते हैं।

मौसम विभाग के पास 1901 से लेकर अबतक के मौसम का आंकड़ा उपलब्ध है। इस आंकड़ों के आधार पर मौसम वैज्ञानिकों को लगता है कि बादलों की सघनता धीरे धीरे घट रही है। बादलों के बरसने की क्षमता घट रही है। इसे देखते हुए वर्षा में अनियमितता देखी जा रही है।

आमतौर पर मौसम मापक यंत्रों की गणना के अनुसार अगर नब्बे प्रतिशत से कम वर्षा होती है तो कमजोर मानसून कहा जाता है। 96 प्रतिशत से 104 प्रतिशत वर्षा को सामान्य मानसून कहा जाता है। अगर वर्षा 104 से 110 प्रतिशत होती है तो इसे सामान्य से अच्छी वर्षा कहा जाता है। वर्षा घटने का एक बड़ा कारण वनक्षेत्र का कम होते जाना भी है। जंगलों के घटते जाने से बादलों की मोटाई और सघनता घट रही है। नतीजा है कि वर्षा कम होने लगी है या एकबारगी बरस कर अतिवृष्टि की स्थिति तैयार करती है।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जब उत्तर-पश्चिम भारत में मई-जून में धरती तपती है और भीषण गर्मी पड़ती है, तब कम दाब का क्षेत्र बनता है। इस कम दाब के क्षेत्र की ओर दक्षिणी गोलार्ध की ओर से भूमध्य रेखा के निकट की हवाएं दौड़ती हैं, निरंतर चक्कर लगाने से हवाओं का मंथन होता है।

दक्षिण गोलार्ध से आ रही दक्षिणी-पूर्वी हवाएं भूमध्य रेखा पार करते ही पलटकर कम दाब वाले क्षेत्र की ओर गतिमान हो जाती हैं। ये हवाएं भारत में प्रवेश करने के बाद हिमालय से टकराकर दो हिस्सों में बंट जाती हैं। इनमें से एक हिस्सा अरब सागर की ओर से केरल तट में प्रवेश करता है और दूसरा हिस्सा बंगाल की खाडी की ओर से प्रवेश कर ओडीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड होते हुए हरियाणा, पंजाब तक चला जाता है।

इन मानसूनी हवाओं पर भूमध्य सागर और अरब सागर के ऊपर की हवाओं के मिजाज का असर रहता है। प्रशांत महासागर के ऊपर प्रवाहमान हवाओं का भी हमारे मानसून पर प्रभाव पड़ता है। वायुमंडल के इन क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थिति का निर्माण होता है तो मानसून के रुख में परिवर्तन होता है और वह कम या ज्यादा बरसात के रूप में धरती पर बरसता है। बीते तीस वर्षों (1989-2018) में दक्षिण-पश्चिम मानसून से होने वाली वर्षा में कमी देखी गई है।

वर्षा के दैनिक आंकड़ों (1970 से अब तक) के विश्लेषण से पता चलता है कि भारी वर्षा के दिनों में वृद्धि हुई है जबकि हल्की व मध्यम वर्षा के दिनों में कमी आई है। इसे जलवायु परिवर्तन का नतीजा माना जा सकता है। बिजली गिरने की घटनाओं में बढोतरी हुई है। गर्म हवाएं जैसे जैसे ऊपर उठती हैं, उनके तापमान में कमी आती जाती है। अनुमान है कि प्रति एक हजार मीटर पर तापमान 6 डिग्री सेल्सियस कम हो जाता है। यह परिघटना वायुमंडल की सबसे ऊपरी परत तक चलती है। उस परत की ऊंचाई भूमध्य रेखा से करीब पंद्रह हजार मीटर आंकी गई है।

(अमरनाथ झा वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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