आसमान से बरसती आग: दोषी कौन?

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पिछले कुछ दिनों से उत्तर भारत में बढ़ती गर्मी और लू को लेकर आम लोगों ने चिंता व्यक्त करनी शुरू कर दी थी। लेकिन कल जब अचानक दिल्ली का तापमान 52.9 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया तो पूरे देशभर में आम चुनाव की बजाय गर्मी और ग्लोबल वार्मिंग सबसे हॉट टॉपिक बन गया। हालांकि दोपहर बाद दिल्ली में कुछ इलाकों में बूंदाबांदी और हवा में रफ्तार के चलते यह इतना व्यापक नहीं बन पाया, लेकिन रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के आंकड़े पर आम लोगों की प्रतिक्रिया से सरकार बहादुर हरकत में आ गई, और बाद में मौसम विभाग ने उत्तर-पश्चिमी दिल्ली में स्थित मुंगेशपुर में रिकॉर्ड किये गये अपने ही तापमान के बारे में यह सफाई दे दी कि संभव है कि सेंसर में कोई त्रुटि हो, या संभव है कि आउटर क्षेत्र होने की वजह से तापमान में इतनी अधिक वृद्धि हुई हो। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का कार्यभार संभाल रहे केंद्रीय मंत्री किरण रिजूजू भी इस बारे में सफाई देते देखे गये।

चलो मान लिया कि सेंसर में गड़बड़ी की वजह से भारतीय मौसम विभागे के मुंगेशपुर में रिकॉर्ड किये गये तापमान को देश दरकिनार कर देता है, लेकिन सफदरजंग में जो 46.8 डिग्री सेल्सियस तापमान अंकित किया गया है, जो पिछले 79 वर्षों में सर्वाधिक है। क्या इसे भी झुठलाया जा सकता है? राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सर्वाधिक हरित क्षेत्र में से एक सफदरजंग जैसे इलाके से जब इतने ज्यादा तापमान को रिकॉर्ड किया जा रहा है, तो सोचिये अनधिकृत इलाकों में रहने वाली दिल्ली की 70% आबादी और औद्योगिक क्षेत्रों में गर्मी का हाल क्या होगा? फिर मौसम विभाग क्या अपने नजफगढ़ से दर्ज 49.1 डिग्री तापमान के रिकॉर्ड को भी झुठला सकता है?

दिल्ली बढ़ती बेतहाशा गर्मी पर अब सरकारी महकमा जाग रहा है। इसकी एक बानगी दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर वीके सक्सेना के प्रधान सचिव के दिल्ली राज्य सरकार के प्रधान सचिव के नाम लिखी चिट्ठी से समझी जा सकती है। इस पत्र में दिल्ली सरकार को बढ़ती गर्मी और हीटवेव के चलते आम लोगों को हो रही भारी दिक्कतों के प्रति असंवेदनशीलता का जिक्र करते हुए दिशानिर्देश दिए गये हैं।

राज निवास की ओर से दिल्ली सरकार को दिशानिर्देश देते हुए कहा गया है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कार्यरत सभी कंस्ट्रक्शन साइट्स पर दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक कोई काम नहीं होगा। श्रमिकों के लिए पेयजल, वाटर-कूलर और नारियल पानी का इंतजाम किया जाये। राजभवन से ऐसी ही दरियादिली की उम्मीद थी, लेकिन यहां पर सवाल खड़ा होता है कि दिल्ली में गर्मी कोई एक-दो दिन से तो हो नहीं रही है। 4 मई 2024 से दिल्ली का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या इससे अधिक है, जिसे हीटवेव की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। 17 मई से तापमान 44 और अब 46-47 डिग्री पहुंच चुका है।

दिल्ली सरकार में मंत्री सौरभ भरद्वाज ने राज भवन की एडवाइजरी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए अपने बयान में कहा है कि एलजी आम लोगों को गुमराह कर रहे हैं। हमने 8 मार्च से ही दिल्ली में गर्मी को ध्यान में रखते हुए विभिन्न विभागों को दिशानिर्देश जारी कर दिए थे, और समय-समय पर अस्पतालों, स्कूलों और एम्बुलेंस सेवाओं के लिए एडवाइजरी जारी कर रहे हैं। भारद्वाज ने एलजी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि पिछले दिनों डीडीए ने लाखों लोगों के घरों को अनधिकृत बताकर जमींदोज कर दिया था, जो आपके ही अधीन काम करता है। लेकिन एलजी साहब ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

खैर ये तो रहा दिल्ली और दिल्ली की सियासत का हाल, जिसे हम सभी पिछले 10 वर्षों से झेलते आ रहे हैं। यहां पर चाहे वायु प्रदूषण का सवाल हो या दिल्ली में बाढ़ का मुद्दा हो, हुक्मरानों की आँखें तभी खुलती हैं जब पानी सिर से ऊपर बहने लगे या लुटियंस ज़ोन भी हाय-तौबा करने लगे। इस समय दिल्ली की 80% जनता पीने के पानी की समस्या से जूझ रही है। ऐसे तमाम इलाके हैं जहां हफ्तों से नल में पानी नहीं आया। दिल्ली जल निगम के टैंकरों और टैंकर माफिया के जरिये अधिकांश रिहायशी इलाकों में लोग अपना गुजर-बसर चला रहे हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश परीक्षा (सीयूईटी) के लिए देश भर से लाखों छात्र-छात्राओं को हर 3-4 दिन के अंतराल में विभिन्न परीक्षा केन्द्रों में जाने की मजबूरी है। परीक्षा केंद्र भी इतने दूर-दूर और हर बार अलग-अलग जगह रखे गये हैं कि परीक्षार्थी को 3-4 घंटे का सफर कर भयंकर लू और गर्मी में तपती छत के नीचे पंखे के आसरे अपना भाग्य आजमाना पड़ रहा है।

नागरिकों को सिर्फ नियमों का पालन करना है

उदाहरण के लिए, सात्विक जोकि दक्षिणी दिल्ली के इलाके में रहता है, का कल सीयूईटी का तीसरा एग्जाम मंगोलपुरी के किसी विद्यालय में था। घर से निकलकर साकेत मेट्रो और तीन मेट्रो बदलकर ढाई घंटे में पीरागढ़ी मेट्रो पहुंचा। उसके बाद बाहर निकलकर गूगल मैप और ऑटो की मदद से एग्जाम सेंटर पहुंचने और भरी दोपहरी में प्रश्न पत्र हल कर जब रात 9 बजे वापस घर पहुंचा तो वह लू और बुखार से पीड़ित था। लेकिन जो लोग दिल्ली से नहीं हैं, विशेषकर लड़कियों और उनके माँ-बाप के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा कितनी अधिक कष्टदायी साबित हो रही होगी, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

एलजी साहब के प्रधान सचिव ने तो भयंकर गर्मी और लू को देखते हुए अपनी ओर से दिशानिर्देश जारी कर दिए, लेकिन भंयकर सर्दी में हजारों झुग्गी-झोपड़ियों को बुलडोज करने का आदेश भी उन्हीं ने दिया था। दिल्ली के ये लाखों बाशिंदे किस हाल में होंगे, इसका उन्हें अंदाजा भी नहीं होगा। कंस्ट्रक्शन साईट पर वाटर कूलर और नारियल पानी की व्यवस्था की बात कोरी बकवास है। निर्माणाधीन स्थलों पर काम करने की क्या स्थिति होती है, शायद उन्हें इसका कोई अंदाजा ही नहीं है। दिल्ली-एनसीआर में हजारों पेड़ों को काटकर ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं, सड़क चौड़ीकरण, अंडरपास और हजारों टन के कंक्रीट गार्डर लगाकर दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे या द्वारका एक्सप्रेसवे जैसे प्रोजेक्ट का निर्माण कौन करा रहा है?

नव-उदारीकरण की देन अब भारी पड़ने लगी है

यहां पर हमें यह भी ध्यान देना होगा कि तापमान मापने के लिए मौसम विभाग हवा में कितनी गर्मी है, का अंकन करता है। दिल्ली-एनसीआर की आबादी 2.5 करोड़ या इससे भी अधिक है। दिल्ली, गुरुग्राम और नोयडा जैसे इलाकों में हाल के दशकों में बहुमंजिला इमारतों की संख्या तेजी से बढ़ी है। सीमेंट, बालू और कांच से बनी बिल्डिंगों में रहने के लिए बड़ी तेजी से खाली प्लाट, खेत और घरों को ध्वस्त किया जा रहा है। इन बहुमंजिला रिहायशी और कमर्शियल भवनों में रहने के लिए एयरकंडीशनिंग का होना पहली शर्त है। बहुमंजिला इमारतें हवा के प्रवाह को भी बाधित करते हैं। ऊपर से कंक्रीट या अस्फाल्ट सड़क 5-6 डिग्री तापमान में इजाफा ही करते हैं। अगर मौसम विभाग 45 डिग्री सेल्सियस की घोषणा करता है, तो ऐसे इलाके 50-51 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच झुलस रहे होते हैं।

ऊपर से यातायात के लिए मध्य वर्ग सार्वजनिक वाहन की जगह स्वंय के वाहन को प्राथमिकता देने लगा है। हवा में हर तरफ कार्बन उत्सर्जन करने वाला शहरी नागरिक आज जब 52.9 डिग्री तापमान देख हाय-तौबा कर रहा है, तो क्यों न समझा जाये कि यही समय है जब उसे ग्लोबल वार्मिंग के बारे में भी गंभीरता से विचार करने के लिए कहा जाये।

असल में हममें से अधिकांश लोग यही माने बैठे हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए हमारी सरकार काफी कुछ कर रही है। आईपीसीसी के सम्मेलनों में बड़ी गर्मजोशी से हिस्सा लेने वाले हमारे पीएम जब विश्व के शीर्ष नेतृत्व के साथ मंच साझा कर 2030 तक दुनिया को पूर्व-औद्योगिक क्रांति के समय से 1।5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि पर रोक देने की कसमें खा रहे होते हैं, तो उस सम्मेलन के स्पोंसर्स को हम पूरी तरह से नजरअंदाज कर जाते हैं। असल में ऐसे वैश्विक मंच की गंभीरता तो तभी संदेह के घेरे में आ जाती है, जब दुनियाभर में पेट्रोल, गैस पर मोनोपली बनाये हुई बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा ऐसे सम्मेलनों की स्पांसरशिप प्रदान की जाती है।

घोषणा और बयानबाजी का शोर

अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर क्लाइमेट चेंज पर गहरी चिंता जताने वाले राष्ट्राध्यक्ष यूक्रेन-रूस और इजराइल-फिलिस्तीन युद्ध की पूर्वपीठिका तैयार करते दिख जाते हैं। हालत यह है कि जर्मनी जैसे देश जिसने ऊर्जा उत्पादन क्षेत्र में खुद को पूरी तरह से गैर-परमाणु ऊर्जा से लैस करने की ओर निर्णायक कदम बढ़ा लिया था, आज उल्टा कोयले से चलने वाली थर्मल प्लांट्स का सहारा ले रहा है। भारत में थर्मल पॉवर पर निर्भरता को कम करने का वादा धरा का धरा रहा गया है। इसके उलट देश में उर्जा जरूरतों को देखते हुए बड़े पैमाने पर थर्मल प्लांट को मंजूरी ही नहीं निजी कॉर्पोरेट घरानों को कोयला ब्लॉक का आवंटन किया जा रहा है।

छत्तीसगढ़ में हसदेव के जंगलों की कटाई कर लाखों टन कोयला निकाला जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में लाखों पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से जल, जंगल और जमीन के साथ-साथ लाखों आदिवासियों को उनके ही घर से बेदर्दी के साथ बेदखल किया जा रहा है। नतीजा, दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में 6000 मेगावाट की जगह 8,300 मेगावाट की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके और भारतीय कॉर्पोरेट की भी चांदी होती रहे।

लेकिन इसके नतीजे भी जल्द हमारे सामने क्लाइमेट चेंज के तौर पर आ रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि इंसान का शरीर 40 डिग्री सेल्सियस तक किसी तरह बर्दाश्त कर सकता है। लेकिन जैसे-जैसे तापमान में वृद्धि होने लगती है, हमारा शरीर जवाब देने लगता है। 50 डिग्री सेल्सियस तक आते-आते शरीर की मांसपेशियां जवाब देने लगती हैं, जिसका अर्थ है शरीर के विभिन्न अंग एक-एक कर जवाब दे सकते हैं। ऐसे में उन लोगों की अकाल मृत्यु हो सकती है जो विभिन्न प्रकार की गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। कोविड महामारी में भी देखा गया कि ऐसे लोगों की मृत्यु दर काफी अधिक थी।

समूचे उत्तर भारत में आग बरस रही है

ऐसा नहीं है कि केवल दिल्ली-एनसीआर ही भीषण गर्मी की मार से पीड़ित है। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब सहित यूपी और बिहार में भी भयंकर लू चल रही है। बिहार में कल शेखूपुरा में स्कूल से लौट रही कई छात्राएं एक-एक कर गश खाकर गिरने लगीं, जिन्हें तत्काल प्राथमिक उपचार के बाद अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती किया गया। आज मुख्यमंत्री नितीश कुमार को याद आया कि बिहार में चुनाव ही नहीं स्कूल भी चल रहे हैं। लिहाजा उन्होंने आज घोषणा की है कि बिहार के सभी स्कूल और कोचिंग संस्थान 30 मई से 8 जून तक बंद रहेंगे।

किरण रिजूजू के आधिकारिक X मीडिया हैंडल पर दिल्ली में अप्रत्याशित तापमान वृद्धि की कोई सूचना नहीं है। लेकिन यह हैंडल खुद बड़े गर्व के साथ कुछ अन्य शहरों में अब तक के सर्वाधिक तापमान वृद्धि की मुनादी कर रहा है। इसमें बताया गया है कि 28 मई को आगरा में 48.6 डिग्री, झाँसी में 49 डिग्री, दिल्ली के आयानगर में 47.6 डिग्री, हमीरपुर (हिमाचल प्रदेश) में 48.2 डिग्री, नारनौल-हरियाणा में 48.5 डिग्री और रीवां-मध्य प्रदेश में 48.2 डिग्री तापमान अब तक का सबसे उच्च तापमान दर्ज किया गया है। सब कुछ ऐसे बताया जा रहा है, गोया इन शहरों ने ओलिंपिक में कोई पदक हासिल किया है। लेकिन दिल्ली में अगर पारा बढ़ा तो लुटियंस ज़ोन में रहने वाले गणमान्य देशी-विदेशी और देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर बट्टा जरुर लग सकता है।

कुल मिलाकर अभी भी नहीं लगता कि हम प्रकृति के द्वारा बार-बार दी जा रही चेतावनियों के प्रति जरा भी गंभीर हैं। हमारा काम सिर्फ हेडलाइन्स को अपने मनमुताबिक बनाकर पेश करना है, ताकि निकट भविष्य तक अपना और अपनों का हित सधता रहे। क्लाइमेट चेंज, सूखा, भयानक हीट वेव, बाढ़ और हिमालयी क्षेत्रों में भारी विनाश का कारण सिर्फ और सिर्फ हमारी नीतियां हैं, जो तात्कालिक लाभ के लिए हमारे संपूर्ण विश्व के कल के विनाश को आमंत्रण दे रही है।

(रविंद्र पटवाल जनचौक संपादकीय टीम के सदस्य हैं)

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