Thursday, December 9, 2021

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चंद्रमा पर ऑक्सीजन का अक्षय भंडार !

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इसी साल अक्टूबर 2021के महीने में ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी और सुप्रतिष्ठित अंतरिक्ष एजेंसी नासा के बीच आर्टेमिस कार्यक्रम के अंतर्गत एक समझौते पर हस्ताक्षर हुआ है,जिसका उद्देश्य है कि ऑस्ट्रेलिया के जॉन ग्रांट सदर्न क्रास यूनिवर्सिटी, लिस्मोर के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों द्वारा बनाए गए एक रोबोट रोवर को चंद्रमा पर इस उद्देश्य से भेजा जाए जो वहाँ उपस्थित ऐसी चट्टानों, वैज्ञानिक भाषा में जिसे रिजोलिथ या Regolith कहते हैं, को इकट्ठा करके उनका रासायनिक विश्लेषण करे और फिर यह पता लगाए कि उनमें 45 प्रतिशत तक उपलब्ध ऑक्सीजन को कैसे विलग किया जा सकता है।

अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के अनुसार हमारी धरती और चंद्रमा के वायुमंडल में मूलभूत अंतर यह है कि जहाँ हमारी पृथ्वी पर उपस्थित वायुमंडल में 20.95 प्रतिशत ऑक्सीजन सहित नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, कॉबन-डाईऑक्साइड आदि समेत बहुत सी गैसें हैं। जिनमें मानव सहित इस पर उपस्थित समस्त जैवमण्डल सांस लेता है,परन्तु चंद्रमा का वायुमंडल बहुत ही विरल है, उसमें बहुत ही अल्प मात्रा में हाइड्रोजन, नियॉन और ऑर्गन जैसी गैसें हैं,परन्तु उसमें ऑक्सीजन की उपलब्धता शून्य है जिससे उसमें मनुष्य सहित कोई भी प्राणी जीवित ही नहीं रह सकता है।

लेकिन अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का यह कहना है कि चंद्रमा के वायुमण्डल में ऑक्सीजन की उपलब्धता भले ही शून्य हो लेकिन वहां की चट्टानें जो ऑक्सीजन युक्त खनिजों मसलन सिलिकॉन, एल्युमिनियम, लौह और मैग्नीशियम ऑक्साइड से भरपूर हैं और वहाँ की मिट्टी जिसे चंद्र मिट्टी या Lunar Soil और वैज्ञानिक भाषा में रिजोलिथ या Regolith कहते हैं, में ऑक्सीजन की बहुत प्रचुर मात्रा उपलब्ध है लेकिन यह छुपे रूप में है। चंद्रमा की मिट्टी और हमारी धरती की मिट्टी में रासायनिक तौर पर बहुत अंतर है। मसलन वैज्ञानिकों के अनुसार रेजोलिथ में 45 प्रतिशत तक ऑक्सीजन है।

एक वैज्ञानिक आकलन के अनुसार चंद्रमा पर उपस्थित 1 घन मीटर रेजोलिथ में लगभग 630 किलोग्राम तक ऑक्सीजन की मात्र संभाव्य है। नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार एक मनुष्य को 24 घंटे में केवल 800 ग्राम ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। इस प्रकार चंद्रमा की 1 घन मीटर रिजोलिथ से निकली ऑक्सीजन से मनुष्य 2 साल से भी ज्यादे समय तक आसानी से सांस ले सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार अगर मान लिया जाए कि चंद्रमा की सतह पर उपस्थित रिजोलिथ की गहराई 10 मीटर भी हो और यह भी कि हमारे पृथ्वी के वैज्ञानिक चंद्रमा पर उपस्थित संपूर्ण रिजोलिथ से ऑक्सीजन को पृथक कर लें तो ऑक्सीजन की वह राशि इतनी बड़ी होगी कि उससे हमारी इस धरती के 8 अरब लोग लगभग एक लाख वर्षों तक सांस ले सकते हैं। 

चंद्रमा पर पाए गए इस बेशकीमती खनिज से ऑक्सीजन निकालने के लिए बहुत बड़ी ऊर्जा की आवश्यकता होगी, क्योंकि सबसे पहले उन ऑक्सीजन युक्त ठोस खनिजों को तरल अवस्था में बदलना पड़ेगा। इसके लिए सौर ऊर्जा या चंद्रमा पर उपस्थित ऊर्जा के अन्य वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों का उपयोग करना पड़ेगा। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के अनुसार अनंत अंतरिक्ष में स्थित अरबों किलोमीटर दूर अवस्थित ग्रहों या उपग्रहों पर जाने और सुदूर अंतरिक्ष यात्राओं के लिए पृथ्वी से ईंधन सहित अन्य सब कुछ ले जाने की निर्भरता को कम करना बेहद जरूरी है। इसके लिए यह रास्ता बनाया जा सकता है जिसमें अंतरिक्ष यानों के ईंधन के लिए चंद्रमा की मिट्टी में उपस्थित ऑक्सीजन सहित अन्य संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जाए। 

पृथ्वी पर ऑक्सीजन को ऑक्साइड वाले खनिजों से अलग करने के लिए सामान्यतः इलेक्ट्रोलिसिस विधि अपनाई जाती है, वैसे तो इलेक्ट्रोलिसिस एक बहुत ही सरल विधि है, लेकिन इसमें ऊर्जा की बहुत ज्यादा जरूरत पड़ती है। चंद्रमा पर इलेक्ट्रोलिसिस विधि द्वारा ऑक्सीजन उत्पादित करने के लिए सौर ऊर्जा या चंद्रमा पर उपस्थित कोई अन्य वैकल्पिक ऊर्जा का ही उपयोग करना पड़ सकता है। चंद्रमा पर ऑक्सीजन बनाने के लिए काफी बड़े-बड़े उपकरण भी लगाने पड़ेंगे। इस विधि से ऑक्सीजन को विलग करने के लिए इन ऑक्साइड अयस्कों को ठोस अवस्था से द्रव अवस्था में लाने के लिए या तो इलेक्ट्रोलिसिस विधि अपनानी पड़ेगी या उसे बहुत ज्यादा तापमान तक गर्म करना पड़ेगा।

पृथ्वी पर तो यह एक बहुत सामान्य सा क्रियाकलाप है,लेकिन चंद्रमा पर इस विधि को अपनाने के लिए बहुत से भारी उपकरणों को वहाँ ले जाना पड़ेगा। इस साल बेल्जियम की एक स्टार्टअप स्पेस एप्लिकेशन ने घोषणा किया है कि वह ऐसे 3 प्रयोगात्मक संयत्र बना रही है,जिसकी मदद से इलेक्ट्रोलिसिस पद्धति द्वारा ऑक्सीजन का उत्पादन बहुत बेहतरीन ढंग से किया जा सकता है, जिसे वह 2025 तक यूरोपियन स्पेस एजेंसी के सीटू रिसोर्स  यूटिलाइजेशन या ISRU अभियान के तहत चंद्रमा पर भेजेंगे।

चंद्रमा पर ऑक्सीजन निकालने के लिए इतना भारी-भरकम निवेश भी बहुत फायदेमंद है, क्योंकि भविष्य की सुदूरवर्ती ग्रहों-उपग्रहों की अंतरिक्ष की यात्राओं के लिए चंद्रमा से मिलने वाले ऑक्सीजन के इस अकूत खजाने से चंद्रमा अंतरिक्षयानों के लिए एक बेहतरीन ईंधन फिलिंग स्टेशन बनने जा रहा है। चंद्रमा की सतह पर मिले इन ऑक्साइड अयस्कों से कहा जा सकता है कि अकूत मात्रा में ऑक्सीजन की उपलब्धता होने जा रही है।

इस बात से हम धरती के मानवों को यह पुरजोर प्रेरणा मिल रही है कि जिस चंद्रमा को हम शुष्क पत्थरों और धूल का निर्जन और वीरान उपग्रह मान बैठे थे, वही भविष्य का अनन्त ऑक्सीजन से भरपूर ऊर्जा का एक अक्षय स्रोत साबित होने जा रहा है। उसकी तुलना में हमारी शस्य-श्यामला, नीली धरती, जो इस पूरे ब्रह्मांड में मनुष्य सहित सांस लेने वाले, रंग-बिरंगी, तितलियों, परिंदों, खेलते-कुलाँचे भरते लाखों किस्म के जीवों की शरणस्थली बनी हुई है। लिहाजा इसकी मिट्टी, चट्टानों और सभी प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने की भरपूर कोशिश की ही जानी चाहिए।

(निर्मल कुमार शर्मा पर्यावरणविद हैं और सामाजिक विषयों पर लेखन भी करते हैं।)

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