Wednesday, February 1, 2023

बर्फीली-सर्पीली सड़कों से पिंडारी ग्लेशियर की यात्रा

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Janchowk Official Journalists in Delhi

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उत्तराखंड के मुख्य हिमालय क्षेत्र में बसा पिंडारी ग्लेशियर अपने आप में एक आकर्षण लिए हुए है जो कि पूरे विश्व को अपनी ओर खींचता है। खैर…! हिमालय पर्वत, पर्वत की चोटियां, दूर-दूर तक फैले बुग्याल और झरने किसे आकर्षित नहीं करते हैं? क्योंकि यह मेरे शहर बागेश्वर में आता है इसलिए मैं यहां जाना चाहती थी। बागेश्वर में गरूड़ रोड पर कुछ साल पहले जब एक साईन बोर्ड लगा और उसमें पिंडारी ग्लेशियर 90 किलोमीटर लिखा देखा तो लगा कि मैं तो गाड़ी से पिंडारी ग्लेशियर जा सकती हूं, जैसे लोग लद्दाख घूम लेते हैं। बाद में पता चला कि ये उत्तराखंड है, स्विट्जरलैंड नहीं है जहां ग्लेशियरों के पास तक ट्रेन, रोपवे बने हैं। बोर्ड पर लिखी गई जानकारी गलत निकली। वैसे भी गुलाम भारत में अंग्रेजों ने ग्लेशियरों तक जो रास्ते बना दिए उन्हीं की देखभाल सरकारें नहीं कर सकी हैं। प्रकृति प्रेमी अपनी जान जोखिम में डाल बंदरों की तरह उछलते-कूदते हुए इन रास्तों से आते-जाते हैं। 

पिंडारी ग्लेशियर कभी जाना भी हो पाएगा… इतना पास तो है। न जाने कितनी बार ये ख्यालात दिलो-दिमाग में घूमते रहते थे। अंतत: ये सपना सच हो ही गया जब पापा ने मुझे बताते हुए पूछा कि, रेलवे वाले जोशीजी की टीम पिंडारी ग्लेशियर जाने वाली है, मैं भी जा रहा हूं.. तूने भी चलना है क्या? गर्दन अपने आप ही हां.. हां.. में हिलने लगी।

जोशीजी ने बताया कि कि हम दोनों खाती गांव पहुंचे हमारे वाहनों में जगह नहीं हो पाएगी। नार्दर्न रेलवे की टीम में बच्चे से लेकर बुजुर्ग कुल 58 जने हैं। पापा को मैंने सहमति तो दे दी लेकिन मैं अपनी आधी छुट्टियां अपनी दोस्त के साथ और केदारनाथ की अकेले की यात्रा में पहले ही खर्च कर चुकी थी। असमंजस में थी कि मैं जाऊं या ना जाऊं, लेकिन फिर सोचा कि पिंडर की वादियों में जाना पिंडर नदी को उसके उद्गम से निकलते हुए नजदीक से देखने का सपना बार-बार पूरा नहीं होता। आनन-फानन में स्कूल से छुट्टी ली और दोपहर करीब साढ़े बारह बजे पापा के साथ हो ली पिंडर की रहस्यमयी घाटी की ओर। जाते वक्त पर्वतारोही केशव भट्टजी ने ट्रैकिंग में काम आने वाले कुछ जरूरी सामान दिया और उनसे विदा ले खाती गांव के मनोहर दानू की जीप में सवार हो लिए। सरयू नदी के साथ-साथ सर्पीली सड़क में जीप दौड़ रही थी। ठंडी हवा के झोंके मन को थपकियां देते महसूस हो रहे थे।

‘एक दो सवारियां देख लेता हूं मैं..आप लोग चाय-पानी पी लो तब तक..’ मनोहर की आवाज से तंद्रा टूटी। भराड़ी बाजार से आगे मनोहर ने सड़क किनारे जीप खड़ी कर दी। जल्द ही जीप भर गई तो रीठाबगड़ के पास से सरयू नदी को पार कर अब हम कर्मी गाड़ के किनारे बलखाती डरावनी सड़क से कर्मी की चढ़ाई में थे। कई जगहों पर तो सड़क कीचड़ से पटी पड़ी थी। कर्मी गांव से होते हुए जीप उप्पर दूसरी सड़क जो कि सौंग, चौड़ास्थल, पेठी से आती है, में पहुंचने के बाद बाएं को मुड़ गई। कर्मी गांव दूर तक फैलाव लिए हुए दिखा। यहां पशुपालन विभाग का भेड़ फार्म भी है।

दो घंटे के अंतराल में कर्मी विनायक पार कर अब हम मल्ला दानपुर में थे। इसे ही एक तरह से पिंडर घाटी कहा जाता है। बाईं ओर दूर अली बुग्याल से ऊपर नजर गई तो केलुवा विनायक, नंदा घूंघट, त्रिशूल फिर से बुलाता हुआ जैसा लगा। 2020 में कोरोना के बाद जब पाबंदिया धीरे-धीरे हटने लगी थी तब पापा के साथ मैं एक बड़े ग्रुप के साथ रूपकुंड हो आई थी। सामने मैकतोली की चोटी में टुकड़े-टुकड़े बादलों की मीटिंग चल रही थी। ‘ये रास्ता बधियाकोट को जाता है।’ धूर नामक जगह के पास से बाईं ओर इशारा कर पापा बता रहे थे। आधे घंटे बाद जीप रूकी तो पता चला कि ये खरकिया है। पहले यही मोटर मार्ग का अंतिम पड़ाव था। पिंडारी, कफनी, सुंदरढूंगा यात्रा को लिए यहां से पैदल यात्रा शुरू हो जाती थी।

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पहले यहां से खाती गांव को साढ़े पांच किलोमीटर का पैदल रास्ता था। अब खाती गांव तक कच्ची सड़क बन गई है। अभी सड़क में काम चल ही रहा है। खरकिया से जब जीप आगे बड़ी तो सड़क के हाल देख सिहरन सी उठी। फिर सोचा जब यहां तक मनोहर ने पहुंचा ही दिया तो आगे भी पहुंचा ही देगा। वैसे मनोहर का ये गांव का इलाका हुआ और वो इस सड़क से अच्छे ढंग से वाकिफ भी हुआ। वो तो इस सड़क में जीप ऐसे चला रहा था जैसे गांव में बच्चे मिट्टी वाले रास्तों में अपनी तार के पहिये से बनाई गोल गाड़ी को लिए दौड़ते फिरते हैं।

खाती गांव में पीडब्ल्यूडी के पास सड़क खत्म हो गई। जीप रूकी तो सांस वापस लौट आई। सामान उतारा। पापा के पहचान के बहुत थे तो वो सभी से आत्मीयता से मिलने में लगे थे। पापा एक बार केशव भट्टजी के साथ पिंडारी यात्रा पर गए थे, लेकिन तब बहुत बर्फबारी होने से वो लोग फुरकिया से आगे नही जा पाए। पापा को इसी बात का मलाल था। अब पिंडारी जाने का उन्हें मौका मिला तो वो बच्चे जैसे बन चहकने में लगे थे।

खाती गांव बहुत ही सुंदर गांव लगा, रंग बिरंगा इंद्रधनुष जैसा। पता चला कि हंस फाउंडेशन ने मल्ला दानपुर में ग्रामीणों के लिए कई योजनाएं चलाई हैं, मसलन स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी, सोलर प्लांट आदि। इसी तरह की एक योजना में गांव के मकानों में रंग बिरंगा पेंट कर उन्हें सजाया गया। इसके साथ ही कुछ घर-परिवारों के बुजुर्गों की वीरता के किस्से-कहानियों को उनके घरों में खूबसूरत तरीके से चित्रों में उकेरा है। इन रंगों से गांव के मकानों की छतों को बारिश के पानी के अंदर आने से बचाने के लिए नीली पन्नियों से झांकती गरीबी ढक जैसी जाती है। काश..! जो लाखों रूपया इन दीवारों को रंगने में लगाया गया उससे इन घरों की छतें ही ठीक हो जातीं तो बर्फ-बारिश के मौसम में इन घरौंदों में रहने वालों को सुकून तो मिलता। ये तो कुछ ऐसी बात हो गई कि, भुखमरी से परेशान हो फ्रांस के लोग जब आंदोलन कर रहे थे तो फ्रांस की रानी मैरी एंटोनेट ने अपनी सेविका से आंदोलन का कारण पूछा तो उसने बताया कि इन लोगों के पास खाने के लिए रोटी नहीं है। जिस पर रानी ने कहा कि तो वे केक क्यों नहीं खाते?

बागेश्वर निगम के इंचार्ज कपकोटीजी से मुलाकात हुई तो उन्होंने बताया कि खाती गांव से लगभग किलोमीटर भर आगे पिंडारी मार्ग में कुमाऊं मंडल विकास निगम में आज रात्रि विश्राम है। घंटे भर बाद जोशीजी, बच्चों से लेकर बुजुर्गों की 58 ट्रैकरों की टीम के साथ लिए खाती पहुंचे तो लगा जैसे रेलगाड़ी का एक डिब्बा पिंडारी की यात्रा में चला आया है। आहा रे इतने ज्यादा लोग! वह भी देश के हर कोने से। अपने संकोची स्वभाव की वजह से अजनबियों से बात करने की पहल करने में, मैं थोड़ा सा असहज महसूस करती हूं। मैंने किसी से ज्यादा बात नहीं की और अपने पापा के पीछे-पीछे पूंछ की तरह चिपकी रही। पापा और मुझे मिलाकर अब कुल 60 लोग हो गए थे। निगम में कमरे तो थे लेकिन 60 लोगों के लिए नहीं थे। इसलिए वहां मैदान में टेंट लगाए गए थे।

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अंधेरा घिर आया था। जोशीजी ने सभी को बाहर मैदान में इकठ्ठा करवा दिया। परिचय का दौर चला तो महसूस हुआ जैसे समूचा हिंदुस्तान यहीं आ गया हो। भिन्न-भिन्न राज्य-प्रांतों के विभिन्न भाषा के लोग पिंडारी ग्लेशियर जाने के नाम पर चहक रहे थे। परिचय के दौर के बाद कपकोटीजी और गाइडों ने भी अपने हिलते हुए शरीर को किसी तरह थामे हुए ट्रैकिंग के नियम कानून और आगे के पड़ावों के बारे में बताया। जिसमें हमारे दल के गाइड दीपक रावत की यही बात समझ में आई कि, अगले दिन से पैदल ट्रैक शुरू होगा। पहला पड़ाव द्वाली है जो कि खाती से लगभग 12 किलोमीटर का पैदल ट्रैक है। इस ट्रैक में सभी को साथ-साथ चलना है ताकि सभी सुरक्षित रहें। नियम-कायदों का पाठ खत्म हुआ तो सभी को भोजन का बुलावा आ गया। ठंड अपने होने का एहसास कराने लगी थी। खाना लाजवाब था। झटपट भोजन निपटाने के बाद मैं और पापा एक टेंट में समा गए।

हर रोज जल्दी उठने की आदत से मजबूर पापा ने मुझे भी उठा दिया। टेंट के अंदर मैं अपना रकसेक पैक कर रही थी कि पापा ने चाय के लिए पुकार लिया। चाय की चुस्कियों में पापा ने बताया कि खाती गांव में काली मां का मंदिर बहुत खूबसूरत है क्यों न उसके दर्शन कर आएं। इस पर नॉर्दर्न रेलवे टीम में शामिल पश्चिम बंगाल के मालदा जिला निवासी कोहलीजी भी हमारे साथ हो लिए। मंदिर वाकई बहुत सुंदर था। आधे घंटे में हम वापस निगम में नाश्ते में शामिल हो गए। चाय-नाश्ता लेने के बाद हम सभी 60 लोगों ने अपने रकसेक को कांधों के हवाले कर द्वाली का रास्ता नापना शुरू कर दिया।

पिंडर नदी पर बने झूला पुल तक रास्ता उतार लिए है। पुल पार करने के बाद मीठी चढ़ाई थी। हमारे गाइड दीपक ने बताया कि अभी खाती से द्वाली तक की दूरी लगभग 12 किलोमीटर है, पहले 11 किलोमीटर थी। ‘वो सामने मलियाधौड़ है। पुराना रास्ता यहीं से था। 2013 की आपदा में पैदल रास्तों समेत द्वाली से उनिया के पास बधियाकोट को जाने वाले पिंडर नदी पर बने सभी पैदल पुल बह गए।’ अपनी आदत से मजबूर पापा सभी सदस्यों से बात कर रास्ते के बारे में बताते जा रहे थे। मैं भी चुपचाप उनकी बातें सुनते-सुनते आगे बढ़ रही थी। रास्ता धीरे-धीरे हमें उंचाई को ले जा रहा था। 2013 की आपदा के दशं का मंजर आज भी साफ नजर आ रहा था। कमाल की बात यह दिखी कि खाती से द्वाली तक रास्ते को ठीक करने के नाम पर करोड़ों रूपये डकारने के बाद यह रास्ता आज तक भी ठीक नहीं हुआ है।

उतार-चढ़ाव लिए रास्ते में दोनों ओर अब रिंगाल का घना जंगल शुरू हो गया था। कुछ आगे नए रास्ते का पुराने रास्ते से मिलन हो गया था। पिंडर नदी के पार के झरने रूकने को मजबूर कर दे रहे थे। मन करता था कि कुछ पल यहां रूक मस्ती से झर-झर झूमते झरने को देखती ही रहूं। ‘चलो आगे रूकेंगे।।’ पापा की आवाज सुन मैं अपने ख्यालों से वापस लौट आई। आगे-पीछे देखा तो पापा और मेरे अलावा इस घने जंगल को कोई नहीं दिखा। गाइड दीपक के दिशा-निर्देश हवा हो गए थे और ग्रुप तितर-बितर हो गया था। छोटे बच्चों में काफी जोश था तो वो ग्लेशियर के नजदीक जाने की चाह में काफी आगे निकल लिए थे। उम्र दराज लोग भी जोश से लबरेज थे लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे चलकर प्रकृति का आनंद लेते हुए चलने में ज्यादा समझदारी जताई, फिर भी हम साथ नहीं थे।

घना जंगल खत्म हुआ तो पापा ने हाथ के इशारे से बताया कि सामने पिंडर और कफनी नदी के संगम के किनारे ऊपर पहाड़ी टिले पर है द्वाली। आगे रास्ते का काम पूरा नहीं हुआ था तो मुख्य रास्ता छोड़ अब पिंडर नदी की ओर को उतरना शुरू कर दिया। शिलाओं के समुद्र में रास्ते के नाम पर कुछ पत्थर दाएं-बाएं रख रास्ते होने का एहसास भर करा रहा था। सामने द्वाली देखने में नजदीक लग रहा था लेकिन ज्यों-ज्यों हम बड़ते जाते रास्ता किसी मृग मरीचिका की तरह खत्म होने का नाम ही नही लेता। पत्थरों के समतल रास्ते अब ढ़लान के बाद पिंडर नदी पर लकड़ी से बना पैदल पुल दिखा तो कुछ राहत सी मिली कि अब द्वाली आने ही वाला है।

पुल पार करते वक्त उफनती पिंडर का गर्जन आतंक भरा था। आगे चढ़ाई लिए हुए घुमावदार रास्ता पार करने के बाद एक पुल और दिखा जो कि कफनी नदी पर बना था। पुल पार कर चढ़ाई के बाद पीडब्लूडी का डाक बंगला मिला। हमारा आज का पड़ाव आगे निगम में था। द्वाली में पिंडर और कफनी ग्लेशियर से उद्गम होने वाली कफनी नदी का संगम होता है। मैंने कफनी ग्लेशियर और इस घाटी के बारे में सुना कि ये बहुत खूबसूरत है। ग्लेशियर से पहले दूर तक फैले मखमली बुग्याल थकान का एहसास होने ही नही देते हैं। वहीं पिंडारी ग्लेशियर की अपेक्षा कफनी ग्लेशियर को नजदीक से निहार सकते हैं। कफनी का रास्ता भी 2013 की आपदा के बाद से अभी तक नही बन सका है।

मैं हमेशा से ही उन नदियों को जिनका जिक्र मानचित्र से गायब होता है, उन्हें और उनके संगम को निहारते हुए महसूस करना चाहती रही हूं। पिंडर और कफनी के संगम को देखना मेरे लिए बहुत गजब का एहसास रहा। निगम में पहुंचते ही रसना के जूस से सभी का स्वागत किया गया।

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तीनों ओर से तीखे पहाड़ों के ढलान पर है द्वाली। मैं सोच रही थी कि अभी मई महिने में जब ठंड इतनी है तो सर्दियों में बर्फबारी में हर ओर तो सफेदी की चादर में सब डूब जाता होगा। कफनी नदी के पार की घाटी की ओर नजर गई तो देखा कि कुछ बादलों की मीटिंग हुई और धीरे-धीरे वो पिंडारी की ओर जाने लगे थे।

‘आशू’ की आवाज से मैं अपने में लौट आई। पापा ईशारा कर रहे थे खाना खाने के लिए।

द्वाली की सुबह बहुत ठंडी थी। सामने के पहाड़ों में धूप हमें चिढ़ा सी रही थी। दो नदियों के संगम से उठ रही ठंडी बयार में ही नाश्ता किया। कल खाती से द्वाली की पैदल यात्रा में ट्रैकरों की उड़ान से सबक लेकर आज हमारे गाइड ने टीम के सभी सदस्यों को एक साथ लेकर चलने का निर्णय किया जो कि आगे पैदल यात्रा में काफी सही साबित हुआ। ट्रैकिंग के सख्त नियमों के प्रति ताकीद किया गया कि हिमालयी ट्रैक में कई तरह के खतरे होते हैं अब आज से कोई भी ट्रैकर गाइड से आगे नहीं जाएगा। इस पर सभी ने सहमति जता दी। द्वाली से आज हमारा अगला पड़ाव फुरकिया था। रकसेक कांधो में डाल आगे पेड़ों के झुरमुटों से हल्की मीठी चढ़ाई चढ़नी शुरू कर दी। रास्ता उंचाई को लेते जाता महसूस हुआ।

गाइड से आगे नही जाने का नियम आज बखूबी फलीभूत होता दिख रहा था। हम सभी साथ थे लेकिन हर एक चीज का अपना ड्राबैक भी हो जाने वाला हुवा। इसका ड्राबैक यह रहा कि आगे पतले रास्ते में जब भी ढलान वाली जगह आती तो गाइड वहां सबको एक-एक कर सुरक्षित रास्ता पार कराने के लिए रुक जाता। अब गाइड के पीछे सभी सदस्यों को रुकना पड़ता। ढलान वाली जगह पर अपने आपको एक भारी रकसेक के साथ खड़े रखना बिना रुके चलने से ज्यादा थका देने वाला लग रहा था। नतीजा ये रहा कि आज के दिन मैं काफी थक गई और मेरे जैसा ही हाल बाकी तेज चलकर आगे भागने वाले वाले सदस्यों का भी हो रहा था। कुछेकों के चेहरे तो डायनासोर की तरह हो गए थे, बस गनीमत ये रही कि उनके मुंह से आग की लपटें नहीं निकलीं।

मुझे तेज भागने में कोई दिलचस्पी नहीं है बल्कि मेरे लिए ‘नजारे इंपॉर्टेंट रहते हैं।’ मैं और पापा धीरे-धीरे शांतचित्त हो प्रकृति को आत्मसात करते हुए बिन बातें किए हुए चल रहे थे। बीच-बीच में पापा भट्टजी के साथ किए गए अधूरे पिंडारी के ट्रेक के अनुभव बांचते हुए बता देते कि आगे अब ये आने वाला है। लेकिन मैं उनकी बातों पर ध्यान नहीं देने की कोशिश में लगी थी। बस हूं-हां कर रही थी। मैं पहली बार अपने सपने को साथ लिए पिंडारी ग्लेशियर को जा रही थी और पापा मेरा सारा एक्साइटमेंट खत्म करने पर तुले थे। अरे..! जैसे आप यहां पहली बार आए और प्रकृति के नजारों को देख विस्मित हुए थे तो उसी तरह से मुझे भी महसूस करने दो ना.. हर किसी को कोई नई मूवी के स्पॉइलर्स नहीं चाहिए ऐसे ही मुझे भी रास्ते के स्पॉइलर्स नहीं चाहिए थे। तुरंत मन को समझाया कि पापा हैं और ऊपर से उन्होंने मुझे पिंडारी ग्लेशियर के ट्रैक की हामी भरी है तो पापा की बात सुननी चाहिए तो बस मैं सुन ही रही थी।

लेकिन..! मन मुझे चुपचाप समझाने में लगा था कि, किसी चीज को जब तक आप स्वयं अनुभव नहीं करते तब तक किसी और का अनुभव आपको अनुभवी नहीं बना सकता, हां आपका ज्ञान बढ़ सकता हैं और ज्ञान बढ़ाने में कोई बुराई नहीं है। आप जब मैदान के इलाके से पहाड़ की ऊंचाइयों पर चढ़ना शुरू करते हैं पहाड़ की ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ प्रकृति में कई सारे बदलाव देखने को मिलते हैं जैसे द्वाली से फुरकिया की ओर नजर जाती है तो आप देखेंगे कि जितने भी बड़े पेड़ थे उनका आकार अब छोटा होने लग गया है। कहीं-कहीं पर तो पेड़ विहीन हरे-भरे घास के बुग्याली मैदान पसरे हुए मिलेंगे। मन डोलता सा है कि इसी मखमली घास में हम भी पसर जाएं। घने जंगल में धीरे-धीरे घास के मैदानों की तरफ बढ़ते ही प्रकृति के प्रति नतमस्तक होते चले जाता है।

पिंडर नदी के सुसाट-घुघाट के साथ ही इस पिंडर घाटी में जगह-जगह से धरती के सीने से फूटते झरनों की आवाज और चिड़ियों की चहचहाहट के संगीत में मैं एकदम खो गई थी कि तभी मेरा ये सम्मोहन पंजाबी गानों ने तोड़ दिया। अंबाला के जगाधरी से आए बेअंत सिंहजी अपने साथ ब्लूटूथ डिवाइस लिए घूम रहे थे जिसमें उन्होंने उंची आवाज में पंजाबी गाने लगाए थे। पंजाबी गाने पसंद तो हैं लेकिन इस शांत जगह में जो वह बजा रहे थे वह मेरे कानों को नहीं सुहा रहे थे।

फुरकिया पहुंचने तक उन दस गानों को मैं दस बार सुन चुकी थी। वो मुझे याद हो ही जाते लेकिन मन ने कान में चुपचाप कहा कि मैं अपनी यात्रा पर ज्यादा ध्यान दूँ बजाय लोगों के। रास्ते में दर्जनों ढेर सारे झरनों को देख कुछ शांति मिली। सोचा कि कुछ तस्वीरें ले लूं फिर पिट्ठू बैग ने चेताया कि अभी आगे और चढ़ाई है, बस यूं ही इन्हें अपने भीतर समा लो न.. अभी वापसी में देखा जाएगा।

केरल निवासी जयकृष्णन ने बताया कि वो पहली बार उत्तराखंड भ्रमण पर आए हैं। हिंदी में उनकी फीस माफ थी तो हम दोनों टूटी-फूटी अंग्रेजी में बात कर रहे थे। उनकी बातों से पता चला कि वो घूमने और लिखने के काफी शौकीन हैं। झरनों की कल-कल के बीच पहाड़ों पर चढ़ते-उतरते पिंडर घाटी की खूबसूरती को निहारते हुए हल्की सी चढ़ाई पर एक डाक बंगला दिखा तो चाल में तेजी आ गई। अंतत: हम फुरकिया पहुंच ही गए। फुरकिया अपने नाम के अनुरूप ही लगा। ठंड से मैं वहां फुर्फुराने लगी थी। अपने को गर्म रखने के लिए तुरंत ही रकसेक से मैंने अपना विंडप्रूफ जैकेट निकाल पहन लिया। फुरकिया में केएमवीएन की एस्किमो टाइप के हट दिखे। कुछ स्थानीय लोग भी वहां रहते थे जिन्होंने अपना छोटा सा होमस्टे बना रखा है। सारी टीम पहुंच गई तो सबको गिलासों में रसना देते हुए गाइड ने बताया कि अब यहां से पिंडारी मात्र सात किलोमीटर ही दूर है।

फुरकिया की घाटी में ठंडी हवा की सरसराहट में ठंड जमाने वाली थी। हमारा ग्रुप बड़ा था तो सभी के अपने-अपने मन मुताबिक के ग्रुप बन गए थे। अब इस ठंड में कोई हट में तो कोई किचन में घुसे गए थे। कुछेक बाहर झोपड़ीनुमा दुकानों में बैठ बतियाने में लग गए थे। झुंडनुमा कुछ लोगों के साथ मैं भी आग के चारों तरफ बैठ गई। दिल्ली से आई अनुभा मैम ने किशोर कुमार के गानों के साथ एक समां सा बांध दिया। उनकी आवाज बहुत मीठी लगी। और फिर वह किशोर कुमार के गाने हुवे, सदाबहार। उनको देखा-देखी और लोग भी उनके सुर में सुर मिलाने लगे। अब संगीत मीठा हो तो किस बेवकूफ को पसंद नहीं आएगा।

दोपहर में सूर्य ने अपने होने का थोड़ा सा एहसास कराया तो तुरंत ही खाने की सीटी बज गई। इस ठंड में गरमा-गरम खाना मिला तो आनंद आ गया। खाना खाने के बाद सारी टीम जहां-तहां पसर गई। कुछ पलों बाद हरीश जोशी ने बताया कि अब हम सभी हाई एल्टीट्यूड में हैं और हम सभी को कुछ न कुछ एक्टिविटी करते रहनी होगी, नहीं तो हाई एल्टीट्यूड सिकनेस की समस्या हो जाएगी। उन्होंने बताया कि सभी लोग किलोमीटरभर आगे के बुग्याल में घुमने जाएंगे। ठीक है जी ये ही सही..! अब आए हैं हिमालय में तो वही करना होगा जो अनुभवी लोग कहेंगे। बुग्याल से पहले रास्ते में एक अल्पाइन ग्लेशियर मिला।

दरअसल ‘अल्पाइन ग्लेशियर’ को शार्ट टाइम वाले ग्लेशियर कहा जाता है जो कि धूप न पड़ने से कभी-कभार दोएक सालों तक ये जिंदा रह कर हर किसी के लिए मुसीबतें पैदा कर एक तरह से सबका इंतेहान ले खुश होते रहते हैं। लेकिन इनका अपना कोई अस्तित्व नहीं होने वाला हुवा। ज्यादा बर्फबारी हो जाने के बाद घाटियों में ये कुंभकरण की तरस पसरे रहते हैं। इस अल्पाईन ग्लेशियर को सावधानी से पार करते हुए इसके नीचे बहते हुए पानी की सरसराहट बहुत ही रोमांचित कर रही थी। बुग्याल में पहुंचे तो हरीश जोशीजी की टीम ने एक बड़ी सी रॉक में रोप फिक्स कर दी। अब बारी थी उसके किनारे से ऊपर जाओ और सीट हार्नेस लगाने के बाद उस रस्सी से नीचे की ओर रेपलिंग करते हुए उतरो।

हमारी टीम में कुछेक जन विज्ञान के विद्यार्थियों ने तो सीट हार्नेस लगाने के बाद तुरंत ही उप्पर की ओर दौड़ लगा दी। रस्सी को थाम एक-एक कर सभी फोटो खिंचाते हुए नीचे को रेपलिंग करते हुए नीचे को आते रहे। मैंने रेपलिंग स्कूल के टाइम पर की थी। आज न जाने कितने सालों बाद इस रोमांच का मौका मिला। फोटो सेंशन के मोह से मैं भी नही बच पाई। रस्सी को थामे नीचे पिंडर के साथ ही उप्पर नजर गई तो नंदा खाट को देख एक पल के लिए मैं ठगी सी रह गई। लगा स्वर्ग कुछ इसी तरह का होता होगा।

सभी ने रेपलिंग कर ली तो सामान समेट वापस फुरकिया को लौट चले। ‘आप क्या करती हैं?’ साथ में चल रहे एक साथी के सवाल पर मुझे बताना ही पड़ा कि मैं भूगोल की टीचर हूं। ये बताना था कि ग्रुप में सभी बच्चे बन गए और मुझ पर सवालों की झड़ी सी लग गई। उनके सवाल इतने अजीबोगरीब थे कि मुझे न जाने क्यों ऐसा लगा कि उन्होंने कभी अपनी सामाजिक विज्ञान की क्लास में अपने अध्यापक की बातों पर ध्यान दिया होता तो इनके सवाल बे-सवाल की तरह नही होते।

मैं यहां प्रकृति को जानने-समझने गई थी लेकिन उनकी बातों से लगा जैसे कि मैं अभी स्कूल में ही हूं। इस बीच सभी से बातें करते-करते दिनेश बाबू की बातों में मेरा ध्यान गया। वो तमिलनाडु से थे और पहली बार ट्रैकिंग पर आए थे। और इस वक्त उन्हें अपने घर-परिवार और अपने बच्चों की बहुत याद सताने लगी थी। अब यहां इस जगह पर तो मानसिक तरंगों से ही संपर्क हो पाने वाला हुआ, चिट्ठी लिख भी लो तो उसके पहुंचने तक तो वो खुद ही घर पहुंच उसे खुद ही पढ़ेंगे वाली बात हुई।

इस बार के ट्रैक में, मैं अपने से एकदम अलग लोगों से मिल रही थी। मुझे बहुत उत्सुकता थी बहुत चीजें जानने की। हमने बहुत ढेर सारी बातें उत्तराखंड और तमिलनाडु के प्रसिद्ध जगहों के बारे में की।

फुरकिया पहुंचे तो गर्मागम चाय से काफी सुकून मिला। अंधेरा घिर आया था तभी गाइड ने हमें बताया कि अगले दिन सुबह हम सभी पांच बजे से पहले-पहले पिंडारी ग्लेशियर की ओर को निकल जाएंगे। सभी को अपने जरूरी सामान के साथ तैयार रहना है। 

रात का भोजन लेने के बाद हम सभी सो गए। रात काफी ठंड भरी थी और दिमाग में सुबह जल्दी उठने की बात थी तो मैं सुबह 3:35 पर ही उठ गई थी और 4:15 तक तैयार भी हो गई। लेकिन साठ लोगों के उठने, उन्हें तैयार होने, हल्का नाश्ता लेने के साथ ही दिन के लिए हल्का चबैना अपने रकसेक में रखने तक पांच बज गए थे। लगभग साढ़े पांच बजे हमारा कारवां पिंडारी ग्लेशियर की ओर रवाना हुए। फुरकिया से पिंडारी जीरो पॉइंट सात किलोमीटर दूर है। हमारी किस्मत बहुत अच्छी रही क्योंकि मौसम एकदम साफ था। मुझे अपने पापा की हिम्मत को मानना पड़ेगा वह मुझसे काफी तेज चल रहे थे। मुझसे ही क्या सबसे तेज ही चल रहे थे। हल्की चढ़ाई लिए रास्ता कई जगहों पर काफी कठिन था। जिस अल्पाइन ग्लेशियर को पार करके कल उस बुग्याल में गए थे वह शाम थोड़ा सा टूटा था।

आज सुबह देखा तो पूरा टूट चुका था। मटमैली चादर अपने में ओढ़े हुवे अल्पाइन ग्लेशियर धीरे-धीरे पिघल रहा था और उसके नीचे बहता पानी का एक अलग ही स्वर निनाद सुनाई दे रहा था। ये जगह ज्वारपानी था। यहां ऊपर कहीं-कहीं पर बहुत मोटी तो कहीं-कहीं पर पतली बर्फ की परत थी जो कि धीरे-धीरे टूट रही थी। इस पर गाइड ने तय किया कि वो दूसरे रास्ते से ग्रुप को ले जाएंगे लेकिन हमने उसी अल्पाइन ग्लेशियर के ऊपर से ही जाना था। क्योंकि मैं पापा के साथ थी तो मुझे सबसे ज्यादा चिंता उन्हीं की हो रही थी कि वह कैसे इसे पार करेंगे लेकिन जब उन्होंने बेहतर प्रशिक्षित तरीके से उस अल्पाइन ग्लेशियर को पार किया तो मैं हैरान हो गई। मेरे सवालिया चेहरे को देख हसते हुए पापा ने बताया कि, ‘अरे ! वो जब भट्टजी के साथ आया था ना तब फुरकिया से यही तक ही आ पाए। तब बर्फबारी बहुत होने लगी थी और फुरकिया से पिंडारी तक का रास्ता बर्फ से ढका था। तब भट्टजी ने इस तरह के अल्पाईन ग्लेशियरों में आने-जाने की खूब प्रैक्टिस कराई कि पांव किस तरह मार कर जमाना है, तो वो आज काम आ गई। अरे..! फौंजी को एक बार कोई चीज सीखा दी जाए तो वो भूलता थोड़े है..’

रास्तेभर में हमें तीन अल्पाइन ग्लेशियर मिले। बमुश्किल से उन्हें पार किया और टूटे रास्ते को दौड़ते हुए पार किया। आगे पापा को बागेश्वर के ही उनके कोई परिचित युवा मित्र मिल गए। पापा से वो आधी उम्र के थे और काफी फुर्तीले से। चलते हुए पापा और उनके बीच गपशप होने लगी तो पापा ने भी उन्ही की तरह अपने कदमों की चाल तेज कर दी। घुरड़-काकड़ की तरह वो दोनों लगभग दौड़ते हुवे से जाने लगे तो मैंने इस तरह दौड़ते हुए चलने के लिए हार मान अपनी लयवद्व चाल से चलना ही ठीक समझा।

चढ़ाई खत्म होते ही आगे हरे भरे मखमली बुग्याल के साथ ही नंदा खाट पर्वत का नजारा दिखा तो सभी लोग इस नजारे को अपने मोबाइल/कैमरे में कैद करने में जुट गए। एकपल उन्हें देख लगा कि प्रकृति में जो अच्छा मिल रहा है उसे तुरंत ही झपट लो वाले नियम का ये बखूबी पालन कर रहे हैं। मेरा भी मन मचल गया तो दिल्ली वाले अमृत को रोक उसे अपना मोबाइल थमा एकाध फोटो लेने के कहा। फोटो सेशन खत्म हुआ। आगे दूर तक नजर गई तो देखा कि पापा लगभग आठेकसौ मीटर आगे अपनी मस्तानी चाल में चलते चले जा रहे हैं। इधर अमृत के दोस्त भी उसे छोड़ आगे पिंडारी देखने की चाहत में भाग जैसे लिए। अब मैं और अमृत धीरे-धीरे गप्पें मारते हुए आगे को बढ़ने लगे।

क्या आपने सफेद रंग के बुरांश देखे हैं? मैंने आखरी बार सफेद रंग के बुरांश तुंगनाथ में देखें थे। यूं ही मैंने अमृत से पूछ लिया था। फिर ख्याल आया कि बुरांश का सीजन तो चला ही गया है अब क्या ही बुरांस देखने को मिलेंगे। आगे अचानक ही रास्ते के दाहिने ओर ठंडी हवा में मचलते हुए ढेर सारे सफेद बुरांस खिले दिखे तो अमृत ने खुश हो मुझे इस तरह देखा कि जैसे आगे क्या होगा मुझे सब मालूम हो।

रास्ते भर में ढ़ेर सारी तस्वीरें लेते-लेते अंततः हम पिंडारी के पास स्वामी धर्मानंद की कुटिया के पास पहुंचे तो सामने एक बोर्ड पर नजर गई। पिंडारी ग्लेशियर ढेड़ किलोमीटर। बलखाती हुवी मीठी सी चढ़ाई थी तो सभी जन धीरे-धीरे आगे को बढ़ते चले जा रहे थे। सामने हिमालय की कई चोटियां हमें खींच सी रही थी, लेकिन किसका क्या नाम है पता ही नहीं चला। होने को तो हमारे साथ चार गाइड थे जो कि काफी युवा, हष्ट पुष्ट और दिखने में सुंदर भी, लेकिन यह सारे गुण किसी काम की नहीं थे। इनमें से किसी को भी पिंडारी से दिखने वाली पर्वत चोटियों के ठीक-ठीक नाम तक का पता नहीं था और ना ही उनको पिंडारी के इतिहास की कुछ जानकारी थी। इस पर यहां पर मेरा मूड थोड़ा खराब रहा। इस वक्त मुझे केशव भट्टजी की काफी कमी महसूस हो रही थी। वो यहां पहले कई बार आ चुके थे और उन्हें इस ट्रैक समेत सारी चोटियों की जानकारी भी हुई। जीरो पॉइंट पर एक ढलान के बाद आगे रास्ता बंद हो गया था। सामने नजर गई तो वहां पापा मुस्कुराते हुए मुझे देख रहे थे। वो एक घंटे से मेरा यहां पर इंतजार कर रहे थे ताकि बापू और बेटी की साथ में फोटो तो खींचे।

अल्मोड़ा निवासी अजय चौधरी जी अपने साथ तीन पर्यटकों को पिंडारी घुमाने लाए थे और वो पापा के पहचान के निकल गए। मेरी जिज्ञासा को शांत करते हुए अजयजी ने मुझे यहां से दिखने वाली सारी पर्वत चोटियों के नाम बताए। बाएं से बल्जूरी, पनवालीद्वार, नंदाखाट, छागुंच, नंदाकोट और सामने पिंडारी ग्लेशियर के ऊपर ट्रेल दर्रा। ट्रेल दर्रा नाम सुन मुझे याद आया कि, अरे! इसके बारे में तो कई बार मुझे भट्टजी ने कहानी सुनाई थी।

पिंडारी ग्लेशियर के प्रसिद्ध ट्रेल दर्रा के साथ कुमाऊं के पहले सहायक आयुक्त जार्ज डब्ल्यू ट्रेल और सूपी निवासी साहसी मलक सिंह ‘बूढ़ा’ के जज्बे की कहानी जुड़ी हुई है। ट्रेल साहब खुद तो यह दर्रा पार नहीं कर पाए लेकिन उनकी प्रबल इच्छा पर मलक सिंह ने 1830 में इस कठिन दर्रे को पार किया। हालांकि बाद में लोगों ने इस दर्रे को ‘ट्रेल पास’ का नाम दे दिया। पिंडारी ग्लेशियर के शीर्ष पर स्थित इस दर्रे के रास्ते पहले दानपुर और जोहार-दारमा के बीच व्यापार के लिए व्यापारियों का आना-जाना लगा रहता था। 17वीं सदी के अंत तक पिंडारी ग्लेशियर में जगह-जगह दरारें पड़ गई तो आवागमन बंद हो गया। अप्रैल 1830 में कुमाऊं के पहले सहायक आयुक्त जार्ज विलियम ट्रेल इस दर्रे को खोलकर आवागमन बहाल करने के मकसद से पैदल ही बागेश्वर होते हुए दानपुर पहुंचे।

स्थानीय लोगों के साथ उन्होंने हिम दरारों के ऊपर लकड़ी के तख्ते डालकर पिंडारी के इस दर्रे को पार करने का प्रयास किया। महीनों तक वो इस काम में जुटे रहे। लेकिन बर्फ की चमक (रिफ्लैक्सन) से उनकी आंखों में दिक्कत आ गई तो वो आगे नहीं बढ़ सके। इस पर सूपी निवासी 45 वर्षीय मलक सिंह टाकुली अकेले ही दर्रे को पार करके मुनस्यारी होते हुए वापस लौट आए। अल्मोड़ा में नंदा देवी की पूजा के साथ ही ईलाज के बाद ट्रेल की आंखेें ठीक हो गई। ट्रेल पास करने पर उन्होंने मलक सिंह को बुलाकर बूढ़ा (वरिष्ठ) की उपाधि दी और उन्हें पटवारी, प्रधान और मालगुजार नियुक्त कर दिया। मलक सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र स्.। दरबान सिंह बूढ़ा को यह अधिकार मिला। इस परंपरा के अंतिम पटवारी प्रवीण सिंह टाकुली थे। बाद में आजादी के बाद यह व्यवस्था खत्म हो गई। हालांकि पिंडारी ग्लेशियर के शीर्ष को ‘ट्रेल दर्रे’ का नाम दे दिया गया।

बहरहाल! हमारे ग्रुप में कुल मिलाकर चार गाइड थे और उन चारों में से कोई भी उन चोटियां तो छोड़ो इस ट्रेल दर्रे के बारे में किसी भी तरह की जानकारी से मरहूम थे। शायद उन्हें लगा नहीं होगा कि कोई उनसे इस बारे में भी पूछ सकता है। जैसे मुझे नहीं लगा था कि लोग मुझसे भूगोल के बजाय सामाजिक विज्ञान के बारे में सवाल पूछेंगे।

जीरो पॉइंट के बारे में हमारे गाइड सिर्फ इतना ही बता सके कि अब पिंडारी ग्लेशियर बहुत दूर हो गया है। अब ये सब तो मुझे भी सामने देखकर महसूस हो ही रहा था। ग्लोबलाइजेशन के असर से ये ग्लेशियर भी अछूता नही रहा। हालांकि पर्वतारोही और ग्लेशियरों पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिक ग्लेशियर के स्नोआउट तक जाते रहते हैं। मैंने दूर से हिमालयी चोटियां, ग्लेशियर के साथ ही ट्रेल पास को देख भर लिया था। लेकिन मैं यह नहीं कह सकती कि मैं पिंडारी ग्लेशियर को हाथ से छूकर आई। बापू के साथ और अलग से अपनी ढेर सारी तस्वीरें लेने के बाद हमने वापसी की राह पकड़ी और आधे घंटे में स्वामीजी उर्फ बाबाजी की कुटिया के बाहर पहुंच गए। लोगों से ना मिलने की अपनी आदत की वजह से मैं बाबाजी से भी नहीं मिल पाई। हालांकि मैंने उनके बारे में अपने पापा और भट्टजी से बहुत कुछ सुना है। स्वामीजी ओडीशा के मूल निवासी हैं और लगभग 30-32 साल से यही पिंडारी में कुटिया बना ध्यान करने के साथ ही पिंडर घाटी में बसे जरूरतमंद ग्रामीणों की मदद करते रहते हैं।

स्वामीजी की कुटिया से थोड़ा आगे हमने स्नो स्लाइडिंग भी कि जो कि काफी रोमांचित कर देने वाली रही। घंटे भर के खेल के बाद गाइडों ने सीटी बजा सबको चलने का इशारा किया। अब वापसी में पिंडारी से वापस जाते वक्त मुझे रास्ता न जाने क्यों बहुत लंबा लगने लगा था। मन कह रहा था कि किसी ने इस रास्ते को खींचकर कुछ लंबा सा कर दिया होगा। अब मन की क्या कहें.. कभी चांद पर तो कभी हिमालय में।

दोपहर बाद तक हमारा दल वापस फुरकिया पहुंच गया। आसमान में नजर गई तो दिखा कि बादलों की मीटिंग शुरू होने लगी है और वो कभी भी बरस सकते हैं। गर्मागर्म भोजन करने के बीच ही गाइड ने उद्घोषणा की, कि सभी को इसके बाद आज ही द्वाली पहुंचना है, क्योंकि यहां आज अगला ग्रुप पहुंचने वाला है। मेरा क्या किसी का भी मन नीचे जाने का बिल्कुल भी नहीं था। लेकिन हिमालयी घाटी में ये सब होता ही होगा सोच मन को फिर से मना लिया। रकसेक कांधों में डाल ये सब सोच ही रही थी कि अचानक ही झमाझम बारिश होने लगी। इस पर गाइड ने सभी को रोक लिया। दसेक मिनट रूकने के बाद बारिश का वेग कम हुवा तो चलने की सीटी बज गई। तब तक सबने अपने रेन कोट पहन लिए और रकसेक कांधो में डाल चल पड़े वापस द्वाली की ओर।

ग्रुप में हैदराबाद से आई वाणी बहुत धीरे चल रही थी। सबसे पहले दिन सारा ग्रुप अलग-अलग दौड़ रहा था तो गाइड ने एक तरकीब निकाली। उन्होंने वाणी और वाणी की दोस्त भूमि को सबसे आगे कर दिया। फिर क्या था, दूसरे दिन से आखरी दिन तक हम सब साथ-साथ लाइन बनाते हुए जिससे नहीं मिले थे उन लोगों से मिलते हुए बातचीत करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़े। यह तरीका वाणी और भूमि के लिए कारगर साबित हुआ लेकिन तेज व सबसे आगे पहुंचने का मन रखने वाले लोग नाराज थे, जिसका गाइड को कोई फर्क नहीं पड़ा, वह सभी को साथ-साथ ले गए। द्वाली पहुंचने के बाद सभी लोग बहुत खुश थे कोई शहर की हलचल से पहाड़ की शांत वादियों में आकर खुश था। कोई इसलिए खुश था क्योंकि वो सबसे पहले जीरो पॉइंट पहुंच गए थे। कोई इसलिए खुश था उन्होंने एक और ट्रैक अच्छे से कर लिया तो कोई इसलिए खुश था क्योंकि वे घर वापस जाने वाले थे। द्वाली में एक शाम रहने के बाद हम दूसरे दिन धीरे-धीरे वापस खाती गांव की ओर बढ़े।

द्वाली में गाइड और ग्रुप लीडर हरीश जोशीजी ने पूरे ग्रुप को चार ग्रुप्स ए, बी, सी, डी में बांट दिया और हमें कहा गया कि अपना ग्रुप लीडर चुने ग्रुप का स्लोगन बनाएं। मेरे ग्रुप का नाम डेल्टा 14 था। सभी सदस्यों की सहमती से दिल्ली के मानस पाठक को ग्रुप लीडर बनाया गया जो कि शायद 12 मे पढ़ता था। केरल के आजाद चिन्नापल्ली ने जबरदस्ती स्लोगन सुझाया जिसे हमारे पूरे ग्रुप के सहायक ग्रुप लीडर सुनील सर लिख पाने में असमर्थ थे। स्लोगन कुछ ऐसा था।। ‘टा – टडा – टा – टा – टा या हुआ पिण्डारी’ ये गेम बहुत मजेदार रहा।

द्वाली से गाइडों के निर्देशन में धीरे-धीरे खाती गांव का रूख किया। रास्ते में झरनों के साथ ही रिंगाल का जंगल मुस्कुराते हुए मिला।

दोपहर दो बजे तक हम सभी खाती पहुंच गए थे। सारी टीम सकुशल वापस पहुंचने की खुशी में ग्रुप लीडर्स ने बताया कि आज रात के खाने में बड़ा खाना होगा। ‘बड़े खाने’ के नाम पर ग्रुप में जो मांसाहारी थे उनकी तो लार ही टपकनी शुरू हो गई। वह सभी खुश हो गए, इतने दिन बाद आज कुछ अलग उनके मन पसंद खाने को मिलेगा।

सामान कमरे में रख मैंने झटपट नहाया तो पिंडारी ट्रैक की थकान उतर गई। दिल्ली से आए अमृत, सार्थक और गुनगुन के साथ मेरी खाती गांव की गलियों में तफरीह पर निकलने की योजना बन गई।

‘भोजन लग गया है।।’ कि आवाज आई तो सभी जन धीरे-धीरे अपने दड़बों से निकल अपनी प्लेटें ले दाल-भात में टूट पड़े। भोजन के बाद कुछ देर हम पेड़ों की शाखाओं से छन-छन कर आ रही गुनगुनी धूप में अधलेटे से पड़ इस यात्रा के बारे में बतियाते रहे। घंटाभर आराम के बाद फिर केएमवीएन रेस्ट हाउस से खाती गांव की ओर निकल पड़े। गांव का रास्ता कई जगहों पर टूटा हुआ है। गुनगुनी धूप ने सार्थक और गुनगुन को आलसी बना दिया तो उन्होंने हंसते हुए गांव जाने के नाम पर अपनी गर्दन दाएं-बाएं घुमानी शुरू कर दी तो उन्हें छोड़ मैंने और अमृत ने नीचे का रास्ता नापना शुरू कर दिया। ऊपर से नीचे गांव पर नजर पड़ी तो कुछ पल रूक खाती गांव को निहारते रहे। गांव बहुत सुंदर लगा।

गांव की गलियों में घुमते हुए गांव के किनारे पिंडर नदी की ओर बने कालिका मंदिर के फिर से दर्शन किये। वहां हमें तमिलनाडु और केरल से आए हुए ग्रुप के सदस्य घूमते मिले। उनमें से कुछ यहां की जड़ी-बूटी का आनंद लेना चाहने की ख्वाहिश में परेशान हो रहे थे, लेकिन संकोच कर रहे थे कि वह कहां मिलेगी और खरीदे कैसे?

इस बारे में मैंने खेत में जा रही एक अम्मा से वहीं की भाषा में पूछा तो मुस्कुराते हुए वो घर में गई और एक छोटा सा टुकड़ा लाकर मेरे हाथ में दे दिया। ‘कितने पैसे हुए..?’ पूछने पर वो हाथ हिला मना करते हुए अपने खेतों की ओर तेजी से निकल गई। ‘काली बूटी’ ग्रुप वालों को थमाई तो उनके चेहरों में मदर टेरेसा के चेहरे की तरह ऐसे भाव आ गए थे जैसे हिमालय की संजीवनी मैंने उन्हें इतनी आसानी से उपलब्ध करा दी, जबकि वो तो नाउम्मीद ही हो चुके थे।

जड़ी-बूटी ने हमारे बीच काफी अच्छी खासी दोस्ती करा दी थी। मेरे इस एहसान पर उन्होंने अपने-अपने भगवानों से ढ़रों आशीष नवाजी और संजीवनी बूटी के साथ वे सभी गेस्ट हाउस की ओर उड़ते हुए चले गए। ये बूटी बहुत आनंददायी होती है, ये मैंने सुना तो है लेकिन बूटी किस तरह की आनंदमयी होती है मुझे इसका कोई अनुभव नही। कभी किसी ने बताया था कि इसे लेने के बाद वो शख्स एक निश्चित उंचाई में पहुंच चांद-तारों से किसी संत की तरह बतियाते हुए धरती को प्रेमपूर्वक निहारते रहता है। मुझे ज्यादा तो समझ में नहीं आया बस यही सोचा कि, एक तरह से इसे लेने के बाद वो एक तरह से जेट विमान में सवार हो लेते होंगे।

कुछ देर अमृत और मैंने गांव के खेतों में बलखाते रास्तों में चहलकदमी की और फिर वापस लौट गए अपने ठिकाने पर। अंधेरा घिर आया था कि तभी ‘बड़ा खाना’ खाने वालों को हृदय विदारक सूचना मिली कि यहां आज किसी भी प्रकार का ‘बड़ा खाना’ संभव नही है। सभी ग्रुप लीडर्स पर चढ़ बैठे कि ये किस तरह का मजाक है। भई! दूल्हे की बारात घर के दरवाजे पर खड़ी है और आप कह रहे हो कि यहां तो लड़के की बारात आज ही सुबह गई है दुल्हन लेने.. बस कुछ पल भर रूकिये बारात दुल्हन लेके आने ही वाली होगी?

दूर किनारे से ‘बूटी वाले’ यह सब मग्न हो देख रहे थे। वो अपने आनंद में थे। बमुश्किल हो-हंगामा करने वालों को ये बात समझ में आई कि सभी चौपाया अभी बुग्यालों में हैं और दो-पाया नाम के मुर्गे-मुर्गी गांव में हैं ही नहीं। एक-आध होंगे भी कल उनकी फोटो खींच लेना और अपने दोस्तों को बताना कि ये उड़ते हुए हमारे उदर में चली आई.. बहुत ही मजेदार थी इसकी उड़ान…

इस बात सब हंसने लगे तो घबराहट में ग्रुप लीडर को छोड़ किनारे खड़ी उनकी आत्मा भी वापस उनमें लौट आई। सभी ने मजे से दाल-चावल-रोटी के साथ ही पापड़-सलाद का भंजन करने के बाद सभी आग के घेरे में बैठ अपने सपनों में खाने के विभिन्न व्यंजनों का स्वाद लेने लगे। अचानक ही एक ने गाने का जो स्वर छेड़ा तो उस पर समवेत सुर मिलते चले गए। देर रात तक नाच-गाकर उन्होंने अपने दिल को थोड़ा जोड़ लिया। आग के घेरे में बच्चे से लेकर बुजुर्ग देर रात तक थिरकने के बाद रजाई ओढ़ ठंड के साये में सो लिए।

सुबह ठंड भरी थी। आज सभी ने अपने-अपने घरौंदो को लौटना था। जीपों में सामान लाद हम भी उनमें समा गए।

तमिलनाडु-केरल से आए सभी लोगों से मेरा काफी अच्छा तालमेल बन गया तो फोन नंबरों का आदान-प्रदान भी हो गया। वो मुझसे पूछने लगे कि यहां से यादगार के तौर पर वो क्या ले जा सकते हैं।। मैं थोड़ा असमंजस में थी कि हम तो जब अच्छा कपड़ा लेने की सोचते हैं तो यही सोचते हैं कि काश वह दक्षिण भारत से बनकर आया हो। दक्षिण भारत की साड़ियां तो पूरे विश्व में प्रचलित हुई। मेरे समझ में कुछ नहीं आया तो मैंने सोचा क्यों ना तमिलनाडु और केरल से आए हुए सभी लोगों को मैं उत्तराखंड की मिठाइयां खिलाऊं। मैंने निर्णय लिया कि जब हरीश जोशीजी केशव भट्टजी से मिलने जाएंगे तो मैं वहां से मिठाई ले आऊंगी लेकिन रास्ते में पता चला कि हरीश जोशीजी बागेश्वर नहीं रुक रहे हैं वह सीधे यहां से जाने वाले हैं।

जल्दबाजी में मुझे और कुछ नहीं सुझा तो मैंने किसी और दुकान से बंगाली मिठाइयां ले ली। जैसे ही मैं उन्हें देने जाने लगी तो मैंने रास्ते में केशव भट्टजी को देखा जो अपनी फटफटिया लेकर जोशीजी को मिठाइयां देने जा रहे थे। यह काफी हास्यप्रद स्थिति हो गई जिसके लिए मैं कुछ नहीं कर सकती थी। मैं उनकी फटफटिया में बैठ टीआरसी पहुंची। उन्होंने मिठाइयां हरीशजी को दी और मैंने तमिलनाडु और केरल से आए हुए सभी लोगों को यह सोच कर दी कि ना जाने अब कब फिर से वह यहां आएंगे। नम आंखों से हमने एक-दूसरों को विदाई दी। रूपकुंड के बाद यह मेरा सबसे अच्छा सफर था बहुत यादगार.. पिंडर घाटी के साथ ही पिंडारी ग्लेशियर को देखने का मेरा सपना पूरा जो हो गया था…

(आंचल परिहार का यात्रा वृतांत)

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Anand Kumar jha

Nice travelogue. I went there in 2015 on bullet bike. By mistake I opted the most dangerous road of my life via loharkhet . The trek was enjoyable. But I got so fearful about bike driving that I hired local guy to drop my bike at bharari and returned by jeep.
Your free flowing language is nice. Keep on writing.
I am also a social science teacher and wandering in Himalayas (uttrakhand) since 2012 (easy treks).

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