Monday, January 24, 2022

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पर्यावरण को बचाने के लिए मंडी लोकसभा उप चुनाव में लोगों ने किया नोटा का इस्तेमाल

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किन्नौर की शांत वादियों में इस बार भगत सिंह के नारे की गूंज नौजवानों के मुंह से सुनाई दी। मंडी लोक सभा के लिए शनिवार को हुए उप चुनाव से पहले किन्नौर के नौजवानों ने अपने पर्यावरण, जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए उनकी भाषा में कहें तो किन्नौर का अस्तिव बचाने के लिए नोटा बटन दबाओ अभियान चलाया और ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रूरत’है का नारा लगाया। नौजवान नोटा बटन दबाने के लिए जनता को जागरूक कर रहे थे तो जनता उनसे कई कदम आगे बढ़ कर चुनाव का बहिष्कार करने का नारा लगाने लगी। इतना ही नहीं किन्नौर के देवताओं ने भी लोगों से चुनाव का बहिष्कार करने का आदेश दिया।

हिमाचल प्रदेश के दूरदराज के जनजातीय बहुल जिले किन्नौर के नौजवान कई महीनों से जल विद्युत परियोजनाओं के खिलाफ ‘नो मीन्स नो’अभियान चला रहे हैं। जल विद्युत परियोजनाओं ने किन्नौर के पर्यावरण और आर्थिक जन जीवन को बुरी तरह से बर्बाद कर दिया है। इस सब के खिलाफ वहां के नौजवानों में सालों से जमा हुआ आक्रोश नोटा को वोट करने के रूप में निकल कर सामने आ रहा है।

हिमाचल प्रदेश की तीन विधानसभा सीटों और एक संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में मतदान हुआ। चुनाव आयोग के अनुसार मंडी में 57.73 फीसदी मतदान हुआ, जबकि फतेहपुर, अर्की और जुब्बल-कोटखाई में क्रमश: 66.20, 64.97 और 78.75 फीसदी मतदान हुआ। सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक मतदाताओं ने मतदान किया । चुनाव तीन सीटों को लेकर हुए लेकिन सब की निगाहें मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर के गृह क्षेत्र मंडी संसदीय उपचुनाव पर टिकी रहीं जहाँ किन्नौर क्षेत्र के मतदाओं ने नोटा दबाकर और बहिष्कार कर अपना विरोध दर्ज किया। किन्नौर में केवल 54.61 प्रतिशत लोगों ने वोट डाले जबकि मतदाताओं की संख्या 57 हजार से ज्यादा है। वहीं इस उप चुनाव में सबसे कम वोट प्रतिशत मंडी संसदीय क्षेत्र का रहा।

किन्नौर से स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार 3 पंचायतों में कल मतदान का लोगों ने पूर्ण रूप से बहिष्कार किया। रारंग, जंगी और अकपा पंचायत के लोगों का विरोध प्रस्तावित जंगी ठोपन जल विद्युत परियोजना को लेकर है। इन्हीं पंचायतों में अपने स्थानीय देवता पथोरो के आदेशानुसार लोगों ने चुनाव का बहिष्कार किया।
पिछले कई सालों से ही किन्नौर की जनता जलविद्युत परियोजना से अपनी नदियों और जंगलों को बचाने की लड़ाई लड़ रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि आधा किन्नौर पहले ही इन जल विद्युत परियोजनाओं के दुष्परिणाम देख चुका है। उनके मुताबिक जल विद्युत परियोजना से पानी के जलस्रोत सूख चुके हैं, तेजी से बर्फ के ग्लेशियर पिघल रहे हैं, भूस्खलन बढ़ा है, परियोजना के निर्माण के समय होने वाले बारुदी सुरंगों के धमाकों और पानी के लिए बनाई जाने वाली सुरंगों से यहां के पहाड़ खोखले हो चुके हैं। गांव के नीचे से सुरंगें निकलने के चलते वहां के घरों, खेतों और सेब के बगीचों को काफी नुकसान हुआ है।

खादरा गाँव के सुंदर नेगी का कहना है कि चुनाव का बहिष्कार करने वाले लोग जंगी थोपन प्रोजेक्ट को रद्द करने की मांग कर रहे हैं, यदि सरकार उनकी नहीं सुनती है तो आगे आने वाले विधान सभा चुनाव में भी उनका विरोध जारी रहेगा। 29 अक्तूबर को अकपा गांव में युवाओं ने NOTA की मुहिम के दौरान महिला मंडल और युवक मंडल के साथ एक बैठक की थी जिसमें उन्होंने नोटा की बजाए मुहिम को मजबूती देने के लिए बहिष्कार का सुझाव रखा। सुझावों पर चर्चा के उपरांत सर्व सहमति से युवक मंडल व महिला मंडल ने पूर्ण रूप से चुनाव का बहिष्कार का निर्णय लिया।

हिमाचल प्रदेश सरकार के आपदा प्रबंधन, राजस्व विभाग अपनी प्रस्तुति में मानता है कि प्रदेश में मानसून के दौरान अधिक भूस्खलन होता है, क्योंकि भौगोलिक रूप से हिमालय नवीन पर्वत श्रृंखला है और इसकी ढलानें अभी टिकाऊ नहीं हैं, पिछले दशक में तेजी के साथ अनुचित रूप से मानवीय गतिविधियों में इजाफा हुआ है, हिमाचल प्रदेश की नाजुक भू-गर्भीय संरचना और जल-मौसम संबंधी परिस्थितियां भू-स्खलन की संभावनाओं को और बढ़ाते हैं। खासतौर पर जलवायु परिवर्तन, बारिश के स्वरूप में बदलाव, रोड कटिंग, माइनिंग, भूमि उपयोग स्वरूप में बदलाव, जंगलों का कटाव, बढ़ते निर्माण ढांचे के लिए सीधे रूप में जिम्मेदार हैं। 17000 के करीब स्थान चिह्नित किए गए हैं जहां पर भू-स्खलन हो सकता है। इसमें से 6000 स्थान भारतीय भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण ने जमीनी अध्ययन के बाद चिह्नित किए हैं। ये 6000 स्थान अकेले चंबा, किन्नौर, कुल्लू और लाहौल स्पिति में पड़ते हैं। लेकिन फिर भी राज्य और केंद्र सरकार जन जातीय जिलों को अनदेखा कर रही है, और लगातार जल विद्युत परियोजनाओं को मंजूरी दे रही है। हाल ही की रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ था कि हिमाचल में बर्फ आच्छादित इलाका 4300 वर्ग किलोमीटर घट गया है जिसमें से आधा से ज्यादा इलाका किन्नौर का था।

जिला निर्वाचन अधिकारी एवं उपायुक्त किन्नौर अपूर्व देवांगन ने बताया कि जिले में मंडी संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव को लेकर किन्नौर के 129 मतदान केंद्रों में लोगों ने वोटिंग की है। चुनाव शांतिपूर्ण रहा है।

हिमाचल की जनता दोनों पार्टियों से दुखी है

मंडी विधानसभा क्षेत्र में मात्र 57.73प्रतिशत मतदान हुआ जिससे बीजेपी की नींद उड़ गई है। क्योंकि 2019 के चुनाव में यहां से बीजेपी के प्रत्याशी राम स्वरूप वर्मा ने रिकार्ड तोड़ जीत दर्ज करवाई थी। उनको 4 लाख से अधिक मतों से विजय हासिल हुई थी। उस दौरान वोटों का प्रतिशत 77 था। इससे साबित होता है कि आम लोग वोटों की राजनीति से ऊब चुके हैं।

इसी क्षेत्र में उपचुनाव के लिए मतदान से भरमौर विधानसभा क्षेत्र से दस गांवों के मतदाताओं ने किनारा कर लिया। सड़क सुविधा न मिल पाने से खफा ग्रामीणों ने यह फैसला लिया है। और पूरे मंडी सांसदीय क्षेत्र का यही हाल है। मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र सराज में भी मात्र 70.34प्रतिशत लोगों ने वोट डाले हैं।

चुनाव को लेकर जब समाजसेवी संत राम से बात हुई तो उन्होंने कहा कि लोग कोरोना काल में फैली अव्यवस्था और महंगाई से बहुत अधिक परेशान हैं। हमारे गांव में कुल 810 में से केवल 398 लोगों ने ही वोट डाले हैं ।गाँव की जनता वोट डालने में ज़रा भी इछुक नहीं थी ,देखने मे आया है कि कुछ मतदान पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा लोगों को अपनी गाड़ियों में ले जाने पर हुआ है । पिछले तीन सालों में डिपो में मिलने वाला सरसों का तेल 60 रुपए से 170 रुपए हो चुका है।

वहीं भाकपा के राज्य सचिव श्याम सिंह चौहान ने बताया कि लोगों को चुनावी बूथ तक खींचने में बीजेपी और कांग्रेस पूरी तरह से विफल साबित हुई हैं। दोनों ही पार्टियों ने गांव लेवल पर जाकर डोर डू डोर सघन अभियान नहीं चलाया। बीजेपी से लोग इतने नाराज थे कि वह गांव में जा नहीं सकते थे और कांग्रेस ने पूरी तरह शिथिलता दिखाई। वह केवल इसका इंतजार करती है कि एक दिन सत्ता परिवर्तन होगा। कम वोट पड़ने का फायदा किस को होगा यह अभी कहा नहीं जा सकता। चुनाव से आम जनता के मुद्दे गायब थे।

(रितिका ठाकुर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं।)

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