Wednesday, December 8, 2021

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ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल पर रोक नहीं, बेरियम बेस्ड पटाखे प्रतिबंधित: सुप्रीम कोर्ट

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उच्चतम न्यायालय के जस्टिस एमआर शाह और ज‌स्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने स्पष्ट किया है कि पटाखों के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, केवल उन पटाखों पर प्रतिबंध लगाया गया है जिनमें बेरियम बेस्ड रसायनों का प्रयोग होता है। पीठ ने बेरियम आधारित रसायनों से बने पटाखों पर प्रतिबंध‌ लगाने के पहले के आदेश के कार्यान्वयन और केवल ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल के संबंध में कई निर्देश जारी किए हैं।

पीठ ने कहा कि यदि प्रतिबंधित पटाखों का निर्माण, बिक्री और उपयोग किसी विशेष क्षेत्र में पाया जाता है तो संबंधित राज्यों के मुख्य सचिव, सचिव (गृह) संबंधित क्षेत्र के पुलिस आयुक्त, जिला पुलिस अधीक्षक और संबंधित पुलिस स्टेशन के प्रभारी एसचओ/पुलिस अधिकारी व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे।पीठ ने यह भी कहा कि राज्य सरकारों/राज्य की एजेंसियों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से किसी भी चूक को गंभीरता से लिया जाएगा। किसी को भी इस न्यायालय/अदालतों द्वारा जारी निर्देशों का उल्लंघन और/या अवज्ञा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

पीठ ने एक सप्ताह पूर्व कहा था कि हमने पटाखे पर प्रतिबंध को लेकर जो आदेश पारित कर रखा है, उसका प्रत्येक राज्य पालन करें। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह उत्सव के खिलाफ नहीं है, लेकिन इंसान की जिंदगी को खतरे में डालकर उत्सव मनाने की छूट नहीं दी जा सकती है। उत्सव फुलझड़ी चलाकर या बिना शोर के भी हो सकता है। पीठ ने कहा है कि ग्रीन पटाखे की आड़ में पटाखा निर्माता प्रतिबंधित रसायन का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे जहां लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है वहीं, वातावरण भी प्रदूषित होता है।

23 अक्तूबर 2018 को दिए आदेश में पीठ ने पटाखे बनाने, बेचने और उन्हें फोड़ने पर पूरी तरह बैन लगाने से इनकार किया था, लेकिन पूरे देश में पटाखों के इस्तेमाल के लिए कड़ी शर्तें लगाई थीं। पीठ ने कहा था कि इन शर्तों के उल्लंघन पर संबंधित थानों के एसएचओ पर कोर्ट की अवमानना का केस चलेगा। पीठ ने ग्रीन पटाखे यानी पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाने वाले पटाखों को बनाने और बेचने की ही अनुमति दी थी।

पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पटाखों के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है और कहा कि केवल उन पटाखों पर प्रतिबंध लगाया गया है जिनमें बेरियम बेस्ड रसायनों का प्रयोग होता है। पीठ ने कहा, कि यह स्पष्ट किया जाता है कि पटाखों के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। केवल उन पटाखों पर प्रतिबंध लगाया गया है,जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं और नागरिकों, विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों और बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 4 नवंबर 2020 को कर्नाटक और तमिलनाडु सहित 18 राज्यों को पटाखों पर प्रतिबंध लगाने के लिए नोटिस जारी किया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के रिकॉर्ड के अनुसार, एनजीटी पीठ ने कहा है कि इन राज्यों के 122 शहरों में हवा की गुणवत्ता अनुकूल सीमा से नीचे है। एनजीटी के इस नोटिस के बाद दिल्ली सहित छह राज्यों ने अपने यहां पर नवंबर में पटाखे जलाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है।

राजधानी दिल्ली में प्रदूषण को देखते हुए दिवाली पर पटाखे जलाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा हुआ है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने दिल्ली में पटाखा बेचने और जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। ये रोक जनवरी 2022 तक लगा हुआ है। हरियाणा और ओडिशा सरकार ने भी इस पर रोक लगा दी है। चंडीगढ़ यूटी प्रशासन लगातार दूसरे साल आतिशबाजी पर रोक लगा चुका है। इसके अलावा कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, सिक्किम में भी पिछले साल पटाखों पर प्रतिबंध की घोषणा की गई थी। दूसरी ओर महाराष्ट्र सरकार ने भी एसओपी जारी करते हुए पटाखे न जलाने की अपील की है।

राजस्थान सरकार ने एनसीआर क्षेत्र को छोड़कर अन्य जिलों में दीपावली पर दो घंटे रात 8 से 10 बजे तक के लिए ग्रीन पटाखों को चलाने की अनुमति दी है। गृह विभाग की ओर से जारी आदेशों में क्रिसमस और नववर्ष पर रात्रि 11.55 से रात्रि 12.30 बजे, गुरु पर्व पर रात्रि 8 से रात्रि 10 बजे तक तथा छठ पर्व पर सुबह 6 से सुबह 8 बजे तक ग्रीन पटाखे चलाने की अनुमति होगी। कुछ दिन पहले प्रदूषण और कोरोना मरीजों को होने वाली परेशानियों को देखते हुए सरकार ने राज्य में 1 अक्तूबर 2021 से 31 जनवरी 2022 तक इनके विक्रय व उपयोग पर रोक लगा दी थी,जिसमें अब संशोधन कर दिया गया है।

तय सीमा में आवाज और धुएं वाले पटाखों को ग्रीन पटाखे कहते हैं। उच्चतम न्यायालय ने इसे ईको फ्रेंडली पटाखा माना है। ग्रीन पटाखे दिखने, जलाने और आवाज में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं, लेकिन इनसे प्रदूषण कम होता है। इनमें नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड की कम मात्रा इस्तेमाल होती है। सामान्य पटाखों की तुलना में इन्हें जलाने पर 40 से 50 प्रतिशत तक कम हानिकारक गैस पैदा होती है। नीरी के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. साधना रायलू कहती हैं, इनसे जो हानिकारक गैसें निकलेंगी, वो कम निकलेंगी। ये कम हानिकारक पटाखे होते हैं।

सामान्य पटाखों के जलाने से भारी मात्रा में नाइट्रोजन और सल्फर डाई ऑक्साइड गैस निकलती हैं। जो हमारे शरीर के लिए नुकसानदेह होती हैं। पटाखों से सबसे ज्यादा नुकसान उन बुजुर्गों को होता है, जो एक तरफ बुढ़ापे की मार झेल रहे होते हैं और दूसरी तरफ तमाम बीमारियों से घिरे होते हैं। गर्भवती महिलाओं के लिए तो पटाखे किसी विनाशकारी हथियार से कम नहीं हैं। पटाखों की धुंध यानी स्मॉग से सांस फूलने, घबराहट, खांसी, हृदय और फेफड़े संबंधी दिक्कतें, आंखों में संक्रमण, दमा का अटैक, गले में संक्रमण आदि के खतरे होते हैं।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष दिवाली के दिन दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक का स्तर 414 था। वहीं, अगले दिन यह बढ़कर 435 हो गया। इस स्तर को गंभीर श्रेणी में माना जाता है। यह स्थिति तब थी जब दिल्ली में पटाखे पर पूर्ण प्रतिबंध लगा हुआ था।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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