Thursday, December 9, 2021

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ग्रह पृथ्वी के पर्याय के रूप में मानव शरीर

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यह एक बहुत ही मौलिक सत्य है कि हम जिस समय में जी रहे हैं, उस समय में बहुत से लोग भूल गए हैं कि अधिकांश सामान्य मनुष्यों के पास मरते दम तक अपने शरीर के साथ जीते रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

 फिर भी, लोगों से एक आकस्मिक सर्वेक्षण में पूछे जाने पर, कि वे शरीर के बारे में क्या जानते हैं, यह स्पष्ट रूप से अधिकांश मनुष्यों के संपूर्ण अस्तित्व में सबसे बड़ा ‘ब्लाइन्ड स्पाॅट’ है। यहां तक ​​कि, एक ऐसे युग में,जहां हर जगह हर तरह की जानकारी कीअधिकता है, ज्यादातर लोग – जो चिकित्सकीय रूप से प्रशिक्षित नहीं हैं – मानव शरीर के काम करने की पद्धति में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते। किसी ऐसी चीज के बारे में जिज्ञासा की कमी, जो हमारा इतनी गहराई से प्रतिनिधित्व करता हो, और जो हमारे जीवित होने की अभिव्यक्ति हो, हैरान और परेशान करने वाली बात भी है। 

शरीर और उसके अंगों को लेकर भय और घृणा निश्चित रूप से ऐतिहासिक है, चिकित्सा के इतिहास में सबसे पुरानी वर्जनाओं में से एक मानव शरीर की शव परीक्षा आयोजित करने के खिलाफ रही है। शरीर मानव आत्मा का भंडार था, और उसे छेड़ा नहीं जाना चाहिए, सभी धर्मों में धर्मशास्त्रियों ने दावा किया। और यह भी कि जिन्होंने अवज्ञा की, उन्हें परमेश्वर और पृथ्वी पर उनके प्रतिनिधियों द्वारा दंडित किया जाएगा।

आज विज्ञान की दुनिया ने मानव शरीर के कोने-कोने का उसके आनुवंशिक और आणविक स्तरों तक अन्वेषण किया है। बेशक, अभी भी कई रहस्यों को सुलझाया जाना बाकी है, लेकिन इनमें से कोई भी वर्जित या मनुष्य की पहुंच से बाहर नहीं माना जाता। फिर भी, जब दुनिया भर के अनेकों नागरिकों की बात आती है, तो शरीर की अज्ञानता जारी रहती है, जो कई कारकों से प्रेरित होती है- भय से लेकर सरासर आलस्य तक।

तानाशाह के रूप में दिमाग

मानव शरीर का अन्वेषण निश्चित रूप से कमजोर दिल वालों के बस की बात नहीं है। जटिल रास्ते, गुप्त कक्ष और दरारें, अपने शिकार को निगलने के लिए तैयार अजगर की तरह खुलने और सिकुड़ने वाले लहरदार पाइप। बैक्टीरिया, बलगम, रक्त, मवाद और शरीर के अन्य तरल पदार्थ, जिन्हें हम सांस्कृतिक रूप से नापसंद करने के लिए प्रशिक्षित हैं, वे सब वहाँ हैं। हमारे द्वारा खाई जाने वाली हर चीज को पचा लेने वाले गर्म, धुंआ छोड़ने वाले एसिड का नजारा ही आपके पेट को मथने के लिए काफी है!  कौन संयमित दिमाग वाला होगा, जो मानव शरीर में प्रवेश करना चाहेगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि उसकी असलियत क्या है?

मेरे विचार में, मानव शरीर के बारे में जिज्ञासा प्रदर्शित करने में मानव अनिच्छा के लिए घृणा से भी अधिक गहरे कारण हैं। यह मन और शरीर के बीच ‘हाइरार्की’ की वजह से है, एक गुरु-दास संबंध जो ऐतिहासिक रूप से मानव विकास के दौरान ही उभरा है। जब हम चार पैर वाले प्राइमेट से दो पैर वाले बाइपेड बनने की ओर बढ़े, तो हमारे हाथों ने औजारों का आविष्कार किया और हमारा दिमाग तेज हो गया। दिमाग के विकास ने हमें अपने आस-पास की दुनिया में हेरफेर और बदलाव करने की क्षमता दी- और ऐसा लगता है, तब से, ‘बुद्धि’ क्या है इसपर विचार बदल गया। 

मन ने स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया और शरीर और सभी शारीरिक कार्यों पर शासन करने वाला तानाशाह बन बैठा । प्लेटो के बाद से, विभिन्न समाजों में स्वयंभू संतों ने कृत्यों पर विचारों की श्रेष्ठता की घोषणा की। रेने डेसकार्टे ने प्रसिद्ध रूप से किसी के भौतिक अस्तित्व के प्रमाण के रूप में सोचने की क्षमता का दावा किया;  ‘ मैं सोचता हूं, इसलिए मैं हूं। इस प्रक्रिया में, उन्होंने सरल सत्य को उलट दिया कि यह शरीर का अस्तित्व है जो मन को संभव बनाता है। 

तथाकथित ‘सभ्य’ मानव समाजों में शरीर के अवमूल्यन और मन के महिमामण्डन के गंभीर परिणाम हुए हैं। इस विकृत तर्क का एक सामाजिक परिणाम यह रहा है कि हमने उस व्यक्ति की तुलना में, बुद्धिजीवी को अधिक महत्व दिया है, जो हाथ से काम करता है और जो अपने शरीर को उत्पादन में लगाता है। भारत में, इस दृष्टिकोण ने जाति व्यवस्था को जन्म दिया और जाति व्यवस्था के वैश्विक संस्करण में आज वित्त, मीडिया और अन्य ‘सॉफ्टवेयर’ के महानायक पूर्ण शक्ति में हैं, जबकि किसान और श्रमिक, जो शरीर का उपयोग करते हुए सबसे आवश्यक कार्य करते हैं, वे कंगाल हो गए हैं। अपने मूल में सामंतवाद और पूंजीवाद दोनों ही धर्म, संस्कृति, बाजार और मुनाफे जैसे अमूर्त कारकों के नाम पर अन्य लोगों के शरीर का शोषण करने के बारे में हैं। 

स्वास्थ्य के क्षेत्र में सबसे स्पष्ट परिणाम यह है कि जैसे-जैसे हम अपने विचारों और शब्दों के साथ अधिक मुखर, चतुर और चालाक होते जाते हैं, वैसे-वैसे हमारा शरीर दिन-ब-दिन कमजोर होता जाता है। हम एक ऐसी जगह पर आ गए हैं जहां हम खुद महसूस करने लगे हैं कि हमारे बैंक खाते की शेष राशि और सोशल मीडिया प्रोफाइल का स्वास्थ्य हमारे भौतिक अस्तित्व से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। फेसबुक पर लाइव और वास्तविक दुनिया में मृत – हमारे समय का आदर्श वाक्य बन गया है।

चिकित्सा का रहस्योद्घाटन

डर का एक और गंभीर परिणाम जो मानव आबादी के एक बड़े हिस्से को अपने शरीर को महत्व देने और इसके बारे में अधिक जानने से रोकता है, वह है ज्ञान में बड़ा अंतर जो उनके और चिकित्सा पेशेवरों के बीच उभरा है। 

यह कई लोगों को डॉक्टरों की इलाज करने की शक्ति पर आँख मूंद कर विश्वास करनेऔर हर छोटी बीमारी के लिए उन्हें दिखाने के लिए प्रेरित करता है। दूसरी ओर जब उपचार काम नहीं करते या उनकी बीमारी जटिल हो जाती है तो वे दुखी हो जाते हैं और चिकित्सा पेशे के प्रति आलोचनात्मक हो जाते हैं।

इस कहानी को समझना चिकित्सा प्रशिक्षण विहीन लाखों आम लोगों के लिए चिकित्सा की दुनिया का रहस्योद्धाटन करने हेतु आवश्यक है, ताकि वे निश्चित रूप से भगवान और उनके दूतों, दोनों के हाथों से अपने शरीर का नियंत्रण वापस ले सकते हैं!

डॉक्टरों और मरीजों के बीच भारी अंतराल अक्सर शक्ति के दुरुपयोग का कारण बनता है। कुछ देशों में, चिकित्सा कदाचार की खबरों के बिना एक दिन भी नहीं बीतता है, विशेष रूप से, रोगियों को अधिक भुगतान करवाने के लिए अनावश्यक नैदानिक ​​परीक्षणों या महंगी दवाओं के निर्देश।

यदि रोगी स्वास्थ्य, चिकित्सा और रोग की बुनियादी बातों के बारे में अधिक जानकार होते और चिंता और भय से कम प्रेरित होते, वे अपने और चिकित्सा पेशेवरों के बीच शक्ति के इस असंतुलन को ठीक कर सकते। एक सतर्क और जागरूक रोगी डॉक्टरों को अपना काम बेहतर ढंग से करने में मदद कर सकता है, और चारों ओर सही संदेश फैलाकर पूरे समाज के समग्र स्वास्थ्य में योगदान दे सकता है।

चिकित्सकों के लिए, ‘डू नो हार्म!’ की सदियों पुरानी उक्ति के बाद पालन करने वाला पहला सिद्धांत है ‘अपने रोगी को जानो!’ यह डॉक्टरों और अन्य चिकित्सा कर्मियों के एक अलग प्रशिक्षण की मांग करता है, ताकि उन्हें विभिन्न संदर्भों और पृष्ठभूमि के रोगियों को समझने और सहानुभूति देने में मदद मिल सके।

हालांकि, हमें यह स्वीकार करना होगा कि कई कारणों से औशधि शास्त्र एक जटिल विषय है। ज्ञान के मोर्चे पर भी चुनौतियां कठिन हो सकती हैं, हालांकि दुर्गम नहीं। जबकि हर प्राकृतिक विज्ञान में बहस और असहमति होती है, उनमें से कोई भी चिकित्सा के क्षेत्र जैसे विविध और गंभीर नहीं है। जीवन और मृत्यु के मुद्दों के साथ व्यवहार करते हुए, चिकित्सा सही में सभी मानव विषयों में सबसे जटिल है।

मानव शरीर के अभी भी बहुत सारे रहस्य हैं जिन्हें ठीक से समझा जाना बाकी है। इलाज खोजने की तो बात ही छोड़िए, मधुमेह, कैंसर या यहां तक ​​कि हाइपरटेन्शन के पीछे छिपी अंतर्निहित क्रियाविधि को अभी भी पूरी तरह से आधुनिक चिकित्सा द्वारा समझाया नहीं गया है। नतीजतन, ‘वैकल्पिक’ उपचार जन्म लिये और प्रतिद्वंद्वी चिकित्सा धाराओं द्वारा प्रतिदावे भी किये गए। 

एक अन्य महत्वपूर्ण कारक जो स्वास्थ्य, रोग और चिकित्सा के बारे में हर किसी की समझ को अस्पष्ट करता है, वह है पैसा और इसकी संदिग्ध भूमिका; स्वास्थ्य पर खर्च प्रत्येक नागरिक के नियमित खर्च का एक बड़ा हिस्सा निर्मित करता है और जिसके परिणामस्वरूप चिकित्सा उद्योग द्वारा भारी मात्रा में धन का संचय होता है। खासकर कम्पनियों द्वारा । पैसे का लालच ऐसा है कि यह पेशा पारंपरिक और आधुनिक दोनों क्षेत्रों में कई धोखेबाजों को आकर्षित करता है। स्थिति वास्तव में इतनी खराब है कि शोधकर्ता, नियामक और चिकित्सक समान रूप से आज बाजार की जरूरतों के अनुरूप अपने नुस्खे और उपचारों को तैयार करने के इच्छुक हैं और आधुनिक चिकित्सा के विज्ञान के हिस्से से भी समझौता कर चुके हैं।

चिकित्सा और स्वास्थ्य भी केवल हमारे व्यक्तिगत शरीरों के बारे में नहीं हैं, बल्कि बड़े समूह हैं – मनुष्यों के सामूहिक से लेकर अन्य प्रजातियों तक, और वास्तव में संपूर्ण ग्रह पृथ्वी के लिए। व्यक्ति और समूह का स्वास्थ्य अविभाज्य है और न केवल भावनात्मक कारणों से, बल्कि इसलिए कि यह वैज्ञानिक वास्तविकता है। मानव शरीर और ग्रह पृथ्वी पर्यायवाची हैं – जबकि पैमाने अलग हैं, गुणात्मक रूप से दोनों समान हैं।

हमारे पास बहुत कुछ हैं

इससे पहले कि मैं इस पर विस्तार से बताऊं, मैं यहां स्पष्ट कर दूं कि उन आशंकाओं, पूर्वाग्रहों और अन्य बाधाओं को दूर करने के लिए, जो मानव शरीर के अनुसंधान को बाधित करते हैं और यह देखने के लिए कि यह वास्तव में क्या है, बीमारी के नकारात्मक लेंस से दूर हटना होगा। शरीर और मानव स्वास्थ्य केवल उन समस्याओं और बीमारियों के बारे में नहीं है जिनके अधीन हम सभी हैं, बल्कि इस तकनीकी चमत्कार की अभूतपूर्व क्षमताएं भी हैं, जो लाखों वर्षों में विकसित हुई हैं।

शरीर के अद्भुत कार्यों के अध्ययन और समझ से प्राप्त की जाने वाली खुशी की मात्रा की कोई सीमा नहीं है, जिनमें से अधिकांश को दोहराने या थाह लेने में हम बमुश्किल सक्षम हैं। 

मानव शरीर के अंदर का भूभाग अपार सुंदरता से परिपूर्ण है। आप में से कोई भी, जिसने हमारे शरीर के अंदर की स्कैन की गई इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप छवियों को देखा है, वह स्वीकार करेगा कि – यह अजीब लग सकता है – हमारे अंदर नदियाँ, पहाड़, जंगल, दलदली भूमि, उठते-गिरते घास के मैदान और रेगिस्तान हैं, जैसे हमारे बाहर हैं, इस ग्रह पर। और क्यों नहीं? आखिरकार, मानव शरीर प्रकृति की अन्य प्रजातियों और तत्वों के साथ-साथ, अपने सभी बारीक और जटिल विवरणों में, धरती माता की उत्पत्ति है।

जो कोई भी विकासवादी विज्ञान से परिचित है, उसके लिए बाहर के सजीव और निर्जीव दोनों रूपों के साथ मानव शरीर की संरचना के बीच गहरे संबंध के कारण बहुत स्पष्ट हैं। इस तथ्य को देखते हुए कि सभी जीवन पिछले 4 अरब वर्षों में एकल-कोशिका जीवों से विकसित हुए हैं, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हम अभी भी अपने भीतर, अनगिनत प्रजातियों के छापों को समाहित करते हैं, जिन्होंने हमें आकार दिया।

बैक्टीरिया, मछली, उभयचर, पौधे, प्रारंभिक प्राइमेट – और कौन जाने कि अन्य कौन-कौन सी प्रजातियां – सभी ने मानव शरीर के निर्माण में योगदान दिया है। हर आनुवंशिक उत्परिवर्तन, व्यवहार में हर छोटा बदलाव जिसने जीवित रहने में मदद की, लाखों वर्षों से हमें विरासत में मिले हैं । और, इन सभी के साथ-साथ तथाकथित ‘निर्जीव’ तत्व जैसे अग्नि, मिट्टी, जल और आकाश भी । और, ज़ाहिर है, बाकी सब भी -हमारे हीमोग्लोबिन में लौह सामग्री, हमारे आहार में जस्ता और मैग्नीशियम, ऑक्सीजन जो हम सांस लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड, जिसे सूर्य के प्रकाश की मदद से क्लोरोप्लास्ट भोजन में बदलते हैं।    

मैं जो इंगित करना चाहता हूं वह बहुत सीधा है। वास्तव में, आधुनिक वैज्ञानिक शब्दों में, मनुष्य के रूप में हम जिस चीज से बने हैं, और हमारे बाहर की दुनिया में कोई अंतर नहीं है। वास्तव में, शरीर की अत्यधिक पोरस प्रकृति को देखते हुए, अपने भीतर और बाहर की बात को पृथक करके देखने का भी कोई मतलब नहीं होगा, चाहे वह प्रकृति के तत्व हों या सूक्ष्म जीव।

उदाहरण के लिए, हमारे अंदर जीवाणुओं के पैमाने से देखें, तो ‘मानव शरीर’ जैसी कोई चीज नहीं है। उनके लिए, हमारे शरीर में रहने का अनुभव शायद हमारी अंतरिक्ष यात्रा से बहुत अलग नहीं है। उसी समय, यदि हम अपने बाहर की दुनिया को एक ठीक-ठाक दूरबीन के माध्यम से देखते हैं, तो हम महसूस करते हैं कि हम भी वास्तव में ब्रह्मांड के वृहद् संदर्भ में सूक्ष्म जीव हैं- पैमाने में भारी अंतर को देखते हुए। दूसरे शब्दों में, हम एक साथ सूक्ष्म जीव और ग्रह भी हैं, जो इस पर निर्भर है कि कौन देख रहा है।

यह सब मनुष्यों, ग्रह और अन्य प्रजातियों के बीच गहरे संबंध की ओर इशारा करता है – हम एक दूसरे की अभिव्यक्ति हैं, और हमारी उत्पत्ति और नियति समान हैं। यही कारण है कि जब हम अपने खजाने – सोना, खनिज और तेल की खुदाई करके ग्रह को गंभीर रूप से घायल करते हैं; वनों को शहरी बंजर भूमि में परिवर्तित करके उसकी सांस लेने की क्षमता को नष्ट करते हैं; इसके पानी को जहरीले कचरे से विषाक्त बनाते हैं, और अन्य जीवित प्राणियों को नष्ट करते हैं, वास्तव में, हम यह सब अपने शरीर पर कर रहे होते हैं।

 ग्रह स्वास्थ्य

यह हमें प्लैनेटरी हेल्थ के विषय पर लाता है, एक अवधारणा जिसे द रॉकफेलर फाउंडेशन-लैंसेट कमीशन ऑन प्लैनेटरी हेल्थ की 2015 की रिपोर्ट द्वारा गढ़ा गया है। आयोग ने स्पष्ट रूप से माना कि मानव स्वास्थ्य और हमारे ग्रह का स्वास्थ्य अटूट रूप से जुड़ा हुआ है, और यह कि हमारी सभ्यता समृद्ध प्राकृतिक प्रणालियों और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण प्रबंधन पर निर्भर करती है। मानव इतिहास में प्राकृतिक प्रणालियों को एक हद तक अभूतपूर्व रूप से अपमानित किए जाने के साथ, हमारा और हमारे ग्रह का स्वास्थ्य दोनों ही संकट में पड़ गए हैं। 

जलवायु परिवर्तन मानव कार्यों का स्पष्ट परिणाम है, जो दुनिया भर में मनुष्यों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने के लिए वापस आ रहा है। हालांकि, आज जिस चीज की जरूरत है वह तकनीकी समाधानों का एक और सेट नहीं है जो ‘जलवायु और स्वास्थ्य’ को देखता हो, बल्कि एक व्यापक ग्रह स्वास्थ्य परिप्रेक्ष्य जो सामाजिक, सांस्कृतिक और यहां तक ​​कि आध्यात्मिक भी हो । एक अर्थ में ग्रह स्वास्थ्य का विचार कुछ ऐसा है जिसे दुनिया भर के मूलनिवासी लोग सदियों से दिन-प्रतिदिन अभ्यास कर रहे हैं।  

यह विशेष रूप से एंडियन क्षेत्र में है, धरती मां की उनकी अवधारणा के साथ। इसके मूल में मूलनिवासी दृष्टिकोण यह है कि मनुष्यों को अपने इस विश्वास को त्यागने की आवश्यकता है कि हम ही केवल एक ऐसी प्रजाति हैं जो जीने के हकदार हैं – अन्य सभी को गुलाम बनाया जाना है या विलुप्त होने की ओर ढकेलना है।

अन्य प्रजातियों के बिना पृथ्वी पर कोई जीवन संभव नहीं है, विशेष रूप से अदृश्य जीवित प्राणी, जैसे बैक्टीरिया। अपने स्वयं के कल्याण पर मनुष्यों का विशेष ध्यान न केवल अन्य प्रजातियों द्वारा हमारे अस्तित्व और अस्तित्व के लिए किए गए योगदान के प्रति गहरी कृतघ्नता है, बल्कि एक सर्वनाशीय पैमाने पर मूर्खता भी है।

यदि वे नहीं जीते हैं, हम भी एक प्रजाति के रूप में नहीं जीयेंगे।  क्योंकि, हम जीवन के उसी जाल का हिस्सा हैं, जहां हम ‘उनके’ और ‘ हमार ‘ के बीच जो कृत्रिम रूप से हर अंतर निर्मित कर रहे हैं, वे मानव जाति के मकबरे में केवल एक और ईंट जोड़ते हैं। यदि कोई पारिस्थितिक और वास्तव में स्वदेशीय परिप्रेक्ष्य से ‘मजदूर वर्ग’ के मार्क्सवादी विचार को ले, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि इस शब्द में न केवल मनुष्य, बल्कि हमारे ग्रह पर अन्य सभी प्रजातियां और धरती मां भी शामिल होनी चाहिए!

मानव कल्याण और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से, निहितार्थ यह है कि हमें ग्रह को अपने शरीर के एक अविभाज्य विस्तार के रूप में देखना होगा। धरती माता के साथ जो किया जाता है वह हम में से प्रत्येक के साथ भी किया जाता है और जिस तरह हम अपने आप पर किसी भी तरह के जहर या हमले को बर्दाश्त नहीं करेंगे, उसी तरह हमें भी समान दृढ़ संकल्प और प्रतिबद्धता के साथ ग्रह की रक्षा करनी होगी। 

यही वह अहसास है जो हमारी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं में भविष्य की क्रांतियों की कुंजी लिए हुए है। और उसके माध्यम से स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी एक क्रांति।

नोट: यह लेख 25 अक्टूबर 2021 को इंस्टिट्यूट दि सालुद सोशियोम्बिएंटल, रोसारियो, अर्जेंटीना द्वारा आयोजित कॉन्ग्रेसो दि सालुद सोशियोम्बिएंटल में की गई एक प्रस्तुति पर आधारित है।

 सत्या सागर एक जन-स्वास्थ्य काय्रकर्ता और पत्रकार हैं। उनसे  sagarnama@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

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