Friday, December 9, 2022

आजमगढ़ की उपजाऊ जमीन को हवाई अड्डे के हवाले क्यों कर रही है सरकार?

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आजमगढ़ पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक जीवंत जिला है। यहां के लोगों की उद्यमिता के गुण के कारण इसे उत्तर प्रदेश का केरल भी कहा जाता है। यहां से पूरे देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोग काम करने के लिए जाते हैं। आजमगढ़ से मजदूर के रूप में कुछ पीढ़ी पहले त्रिनिदाद व टोबागो गए एक परिवार के वंशज बासुदेव पाण्डेय वहां के प्रधान मंत्री भी बने। पूर्व में आजमगढ़ से पलायन करने वाले अधिकांश लोग हवाई जहाज से बाहर नहीं गए।

अब आजमगढ़ में मन्दुरी हवाई पट्टी का विस्तार कर एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाने का प्रस्ताव है। इसमें 8 गांवों – हसनपुर, कादीपुर हरिकेश, जमुआ हरिराम, जमुआ जोलहा, गदनपुर छिन्दन पट्टी, मन्दुरी जिगिना करमपुर व जेहरा पिपरी – की 670 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की जाएगी व करीब दस हजार लोग प्रभावित होंगे। यहां की जमीन बहुत उपजाऊ है। पहले तो लोग यह पूछ रहे हैं कि आजमगढ़ के आस-पास वाराणसी, कुशीनगर, गोरखपुर, अयोध्या और अब तो लखनऊ भी, क्योंकि पूर्वांचल एक्सप्रेसवे बन जाने से दो-ढाई घंटे में लखनऊ पहुंचा जा सकता है, में अंतर्राष्टीय हवाई अड्डे होते हुए आखिर यहां हवाई अड्डे की क्या जरूरत है और दूसरा बनाना भी है तो उपजाऊ जमीन पर क्यों बनाया जा रहा, कोई बंजर भूमि क्यों नहीं चुनी गई?

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फिर कुछ लोगों का यह भी कहना है कि दूसरी जगहों पर सरकार हवाई अड्डों को अडानी को सौंप चुकी है, फिर वह यहां क्यों हवाई अड्डा बनाना चाह रही है? क्या यह हवाई अड्डा भी बना कर अडानी को ही सौंपा जाना है? यदि ऐसा है तो अडानी को ही हवाई अड्डा बनाना चाहिए। सरकार क्यों किसानों की जमीनें लेकर उन्हें रियायती शर्तों पर एक पूंजीपति के हवाले करना चाह रही है?

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जिला प्रशासन ने पहले 12-13 अक्टूबर की रात पुलिस की मदद से भूमि का सर्वेक्षण कराने की कोशिश की जिसका ग्रामीणों ने यह कह कर विरोध किया कि वे जब जमीन देना ही नहीं चाहते तो सर्वेक्षण का क्या औचित्य है? पुलिस ने महिलाओं के साथ अभद्रता भी की। जब प्रशासन की इस तरह दाल न गली तो उसने लोगों को आतंकित करने का फैसला किया। ग्राम प्रधानों के माध्यम से लोगों पर दबाव बनाने का प्रयास हुआ। जमुआ हरिराम के ग्राम प्रधान को उप जिलाधिकारी ने झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दी, थाने पर बैठाकर रात में गांव में सर्वेक्षण कराने की कोशिश की, लेकिन ग्राम प्रधान ने समर्पण करने से इंकार कर दिया। एक बार जब उसको पुलिस के वाहन में बैठा कर ले जाने की कोशिश की गई तो गांव की महिलाओं ने वाहन घेर लिया और अंततः पुलिस को उसे वाहन से उतरने के लिए कहना पड़ा।

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ग्राम प्रधान ने उप जिलाधिकारी को टका सा जवाब दे दिया कि यदि उसका गांव ही नहीं रहेगा तो वह ग्राम प्रधान कहां रह जाएगा? उसने कहा कि वह जनता की भावना के खिलाफ नहीं जा सकता। इसी तरह जब हसनपुर के ग्राम प्रधान को पुलिस ने रात को थाने पर बुलाया तो उसने जाने से इंकार कर दिया। सवाल यह उठता है कि यदि हवाई अड्डे के नाम पर सरकार विकास करना चाहती है तो उसे जनता को आतंकित करने के तरीकों को इस्तेमाल क्यों करना पड़ रहा है? यह कैसा विकास है जो लोगों की इच्छा के विरुद्ध उन पर थोपा जा रहा है?

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स्थनीय अखबारों के अनुसार जिला प्रशासन ने सर्वेक्षण करा कर उत्तर प्रदेश शासन को सौंप दिया है। लोग यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि जब उन्होंने सर्वेक्षण होने ही नहीं दिया तो शासन को कौन सा सर्वेक्षण सौंपा है?

असल में सोचा जाए तो हवाई अड्डे का इस्तेमाल तो पैसे वाले ही करेंगे। पैसे वालों को यदि हवाई जहाज से चलना होगा तो वह दो घंटे की दूरी पर स्थित वाराणसी या लखनऊ से भी जहाज पकड़ सकते हैं। आजमगढ़ के ज्यादातर लोग दूर की यात्रा करने के लिए रेलगाड़ी का इस्तेमाल करते हैं। जरूरत तो इस बात की है कि आम जनता के लिए रेलगाड़ियों की संख्या व क्षमता बढ़ाई जाए ताकि आम लोग सुविधाजनक ढंग से यात्राएं कर सकें। अभी तो रेल के सामान्य श्रेणी में मनुष्यों को जानवरों की तरह यात्रा करनी पड़ती है। फिर कोरोना काल के बाद तो कई रेलगाड़ियों में सामान्य श्रेणी के डिब्बे ही खत्म कर दिए गए हैं।

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यानी जनता के चलने के लिए सबसे सस्ता साधन खत्म किया जा रहा है और बदले में बहुत महंगा साधन खड़ा किया जा रहा है। क्या इसी को विकास कहते हैं? यदि यमुना एक्सप्रेसवे को ही देख लें तो बहुत सीमित संख्या में वाहन इस पर चलते देखे जा सकते हैं। यानी जो तेज रफ्तार से सफर करने के साधन निर्मित किए जा रहे हैं उनका उपयोग तो आम लोग कर ही नहीं रहे या महंगा होने के कारण कर सकते नहीं। पैसे वालों के पास, जिनके लिए पहले से ही तमाम विकल्प मौजूद हैं, और साधन खड़े किए जा रहे हैं। पूंजीवादी विकास का इससे बढ़िया नमूना देखने को नहीं मिलेगा।

यात्रा के साधन की रफ्तार जितनी अधिक होगी प्रदूषण भी उतना ही अधिक होगा। उदाहरण के लिए हवाई जहाज से उसी दूरी को तय करने में जितना प्रदूषण होगा रेल या बस से यात्रा करने में उससे कम होगा। यूरोप में एक किशोरी ग्रेटा थुनबर्ग, जो अब जलवायु परिवर्तन के खिलाफ युवाओं के एक विश्वव्यापी आंदोलन का नेतृत्व कर रही है, ने अपनी जिंदगी में एक व्यक्तिगत फैसला लिया है किवह हवाई जहाज से यात्रा नहीं करेगी। इतना ही नहीं उसने अपनी मां को भी इसके लिए राजी कर लिया है।

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ग्रेटा से प्रेरित कई यूरोपवासी अब हवाई जहाज की जगह रेल से यात्रा कर रहे हैं। जब ग्रेटा को अमरीका स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण देने जाना था तो उसने यूरोप से अमरीका की यात्रा पुराने जमाने की तरह पानी के जहाज से की। यूरोप ने तय किया है कि 2050 तक वह कार्बन तटस्थ बन जाएगा यानी कार्बन उत्सर्जन में उसकी कोई भूमिका नहीं रहेगी। भारत ने अपना यह लक्ष्य 2070 का रखा है।

विकास के नाम पर ज्यादा तेज रफ्तार से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देना या जगह जगह रेलवे या बस स्टेशनों की तरह हवाई अड्डे बना कर पृथ्वी के नीचे पेट्रोलियम के सीमित भण्डार की लूट और जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने का पूंजीवादी खेल है जिसमें जाने-अनजाने जनता हिस्सा बन रही है।

हमें समझना चाहिए कि दुनिया जलवायु परिवर्तन के दबाव में किस तरह बदल रही है। एक तरफ विकसित देश के लोग अब अपनी जीवन शैली के प्रति ज्यादा सजग हो रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं कि कार्बन उत्सर्जन में उनका योगदान कम हो जाए तो भारत व चीन अभी भी उसी विकास का आंख मूंद कर अनुसरण कर रहे हैं जो ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार होगा। हम एक तरीके से अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं और आने वाली पीढ़ी के लिए जिंदगी और कठिन बना रहे हैं। हम तो प्रदूषण कर के चले जाएंगे लेकिन हमारे किए का परिणाम आने वाली पीढ़ी को झेलना पड़ेगा।

(इस लेख को राजीव यादव, अरुंधती धुरू और संदीप पाण्डेय ने मिलकर लिखा है।)

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