Saturday, October 16, 2021

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बांग्ला साहित्य की विद्रोही दलित चेतना का हिंदी दीप

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जब बांग्ला साहित्य और समाज की उदार और विद्रोही चेतना को हिंदी इलाके के संकीर्ण राष्ट्रवाद और बंगाल में पहले से मौजूद हिंदू चेतना से पराजित करने का राजनैतिक अभियान और सांस्कृतिक आख्यान अपने चरम पर हो तब प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे की पुस्तक `दलित आंदोलन और बांग्ला साहित्य’ को हिंदी जगत में विद्रोही चेतना का हस्तक्षेप कहा जा सकता है। यह पुस्तक बताती है कि बंगाल नवजागरण के इतिहास और साहित्यिक आख्यान के माध्यम से चर्चा में आई वहां के समाज की उथल पुथल के बारे में व्यापक हिंदी समाज जो जानता है वह उस समाज को जानने के लिए बहुत कम है। वर्णवादी व्यवस्था से मुक्ति का संग्राम सिर्फ महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और बाद में उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ही नहीं चला बल्कि बंगाल में उसका बहुत पुराना और प्रभावशाली इतिहास है। उस संघर्ष के प्रभाव में और उसके साथ-साथ वहां बहुत कुछ ऐसा लिखा गया है जो भद्रलोक की चेतना से न सिर्फ टकराता है बल्कि उसके आभामंडल की ओजोन के छतरी में घातक किस्म का छेद करने की सामर्थ्य रखता है। 

हिंदी समाज का दुर्भाग्य यह है कि उसने मराठी दलित साहित्य से तो अपना परिचय स्थापित किया और उसकी प्रेरणा से यहां दलित साहित्य और दलित आत्मकथाओं का दौर चला लेकिन जिस तरह हिंदी लेखकों के साहित्य में रवींद्र नाथ ठाकुर, बंकिम चंद्र और शरदचंद्र, विमल मित्र, महाश्वेता देवी और आशापूर्णा देवी जैसे रचनाकारों का प्रभाव है वैसा प्रभाव बांग्ला साहित्य के दलित लेखकों का नहीं है। इस कमी को बांग्ला समाज से परिचित दलित लेखक एचएल दुसाध भी शिद्दत से महसूस करते हैं।

लेकिन कृपा शंकर चौबे ने बांग्ला साहित्य के दलित लेखकों के संघर्ष और रचना का एक सघन और समृद्ध वर्णन प्रस्तुत करके हिंदी समाज को यह प्रेरणा दी है कि वह उस दिशा में अपनी निगाह डाले और साहित्य के माध्यम से उस समाज को समझे। चौबे जी की यह कृति दो मायने में महत्वपूर्ण है। एक तो यह आख्यान शैली में लिखा गया एक शोधपूर्ण विमर्श है और दूसरा यह कि यह संकीर्णता के अंधेरे बंद कमरे में चक्कर लगा रहे हिंदी समाज को उदार बनाने का एक प्रयास भी है। यह पुस्तक न सिर्फ साहित्य का समाजशास्त्रीय अध्ययन है बल्कि समाज का रचनात्मक विश्लेषण है। इसीलिए यह कहना कठिन है कि इसे साहित्य की श्रेणी में डाला जाए या समाजशास्त्र और इतिहास की। 

आठ अध्यायों में विभाजित यह पुस्तक साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से दलित विमर्श की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की चर्चा करती है। वह एक रोचक अध्याय है लेकिन उसका बहुत सारा हिस्सा पहले से विविध लेखों और पुस्तकों के माध्यम से हिंदी में उपलब्ध है। यह एक परिचयात्मक अध्याय है हालांकि इसमें ब्योरे काफी करीने से रखे गए हैं और वे दृष्टि संपन्न हैं। लेकिन इसी अध्याय के आखिरी पैरा में पुस्तक के विस्तार का बीज छुपा है। जब लेखक यह कहता है कि बांग्ला के दलित साहित्य पर हरिचंद-गुरुचंद ठाकुर का सर्वाधिक प्रभाव है। बांग्ला का शायद ही ऐसा कोई दलित साहित्यकार हो जो हरिचंद-गुरुचंद ठाकुर और उनके मतुआ धर्म का अनुयायी न हो। आगे की पुस्तक इसी कथन का विस्तार है।

दलित आंदोलन और बंगाल, बांग्ला दलित काव्य का इतिहास, बांग्ला दलित उपन्यासों का इतिहास, बांग्ला दलित आत्मकथाओं का इतिहास, आदिवासी समाज और बांग्ला साहित्य, त्रिपुरा का दलित आंदोलन और दलित साहित्य और पूर्वोत्तर की जनजातीय कविता जैसे अध्यायों के माध्यम से यह पुस्तक गागर में सागर भरती है। कथा शैली में प्रस्तुत किया गया यह विमर्श हिंदी पाठकों के मन में बांग्ला दलित साहित्य के प्रति एक गहरी रुचि पैदा करता है। हालांकि हिंदी का हर पाठक कृपाशंकर चौबे की तरह बांग्ला को अपनी मातृभाषा की तरह बोल लिख नहीं सकता इसलिए वह उसका आनंद तो अनुवाद की गई कृतियों में ही ले सकता है। 

ऊपरी तौर पर जिन्हें लगता है कि बंगाल का समाज जातियों में उतना नहीं विभाजित है जितना दक्षिण का मराठी और तमिल समाज और उत्तर भारत का हिंदी समाज वे पुस्तक में दिए गए ऐतिहासिक वर्णनों के माध्यम से जान सकते हैं कि वहां पाल वंश के महीपाल द्वितीय के अत्याचारी शासन के विरुद्ध 1070 में कैवर्त नामक कथित निम्न जाति के लोगों ने विद्रोह किया और उस शासन को सफलतापूर्वक उखाड़ फेंका। कैवर्त समाज अपने मूल्यों में आधुनिक और लोकतांत्रिक था। विद्रोह की दूसरी लहर 18 वीं सदी के मध्य और उत्तरार्ध में चकमा जातियों की ओर से उठती है और चटगांव के आसपास के इलाकों में उसका लंबा सिलसिला चलता है। विद्रोह की तीसरी लहर नमशूद्रों के आंदोलन के रूप में आती है और इसका नेतृत्व हरिचंद ठाकुर और उनके बेटे गुरुचंद ठाकुर करते हैं।

यह आंदोलन चांडाल जातियों का सवर्ण अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह था और उनकी मांग थी कि उन्हें गांव में जूता पहनने का अधिकार मिले, उनकी नवव्याहता को पालकी में बैठने का हक मिले और उनके नाम के आगे चांडाल न लिखकर नमशूद्र लिखा जाए। इसी विद्रोह से निकली चेतना को हरिचंद ठाकुर ने मतुआ आंदोलन में परिवर्तित किया और मतुआ धर्म चलाया। बीसवीं सदी में बंगाल में दलित आंदोलन को नया रूप देने वाले थे जोगेंद्र नाथ मंडल जो नमशूद्र आंदोलन और मतुआ आंदोलन से जुड़े थे। वे बाबा साहेब आंबेडकर के समर्थक थे और उन्होंने बाबा साहेब के महाराष्ट्र से हारने के बाद उन्हें बंगाल से चुनवा कर संविधान सभा में भिजवाया था। लेकिन जोगेंद्रनाथ मंडल विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए और वे वहां के कानून और श्रम मंत्री बने। उन्हें उम्मीद थी कि मुस्लिम लीग सरकार दलितों की स्थिति को सुधारेगी लेकिन उनकी इस उम्मीद को बुरी तरह झटका लगा। वे हार कर भारत लौटे लेकिन तब तक उनका प्रभाव घट गया था।

बीसवीं सदी के अंत और इक्कीसवीं सदी के आरंभ में बंगाल के दलित आंदोलन में हुई गतिविधियों का भी इस पुस्तक में वर्णन है जिसमें लोधा जाति की लड़की चुन्नी कोटाल की आत्महत्या से विचलित बंगाल समाज और महाश्वेता देवी के हस्तक्षेप का भी ब्योरा है। बांग्ला दलित काव्य के संक्षिप्त इतिहास में लेखक ने बताया है कि एक हजार साल पहले बौद्ध सहजिया कवियों ने `चर्यापद’ की रचना की थी। उसके बाद वहां पुकारवचन और खनन वचन जैसे पदों की भी रचना की गई। बंगाल में पंद्रहवीं सदी में पैदा हुआ बाउल संगीत का जन्म भी अस्पृश्य जाति के गंगाराम से माना जाता है। हालांकि उनके एक ब्राह्मण शिष्य छकु ठाकुर भी थे। लालन शाह फकीर और पांजशाह ने बाउल गायन के माध्यम से जाति व्यवस्था को चुनौती दी और कहा कि ब्राह्मण को तो जनेऊ पहना देंगे लेकिन ब्राह्मणी को कैसे पहनाएंगे। दलित चिंतक श्रीमंत नमस्कर की पुस्तक जातिचंद्रिका में बताया गया है कि किस तरह माइकल मधुसूदन दत्त की रचना `मेघनाथ बध’ और रवींद्र नाथ ठाकुर की रचना `अपमानित’ एक दलित कविता है। रवींद्र नाथ ठाकुर की  `ब्राह्मण’ कविता को भी लेखक ने उद्धृत किया है।

प्रोफेसर चौबे बताते हैं कि वैसे तो बांग्ला में उपन्यासों की परंपरा उन्नीसवीं सदी से ही शुरू होती है लेकिन पहला दलित उपन्यास 1956 में आता है। उसका नाम है –तितास एकटि नदीर नाम । इसके लेखक हैं अद्वैत मल्ल वर्धन। दुर्भाग्य से यह उपन्यास लेखक के जीवन काल में नहीं आया क्योंकि पुस्तक प्रेमी वर्धन भयंकर आर्थिक संकटों में रहे। वे किसी के सामने हाथ नहीं फैलाते थे और अपने अध्ययन लेखन में सिमट कर रह गए जिसके कारण उनकी अकाल मृत्यु हो गई। इस उपन्यास में तितास नदी के किनारे बसे लोगों के जीवन का वर्णन है। वहां ज्यादातर निवासी मालो हिंदू जाति के हैं लेकिन उनके अलावा वहां बाउल, सूफी और अध्यात्म संप्रदाय के लोग भी बसते हैं। कुछ मुसलमान किसान भी हैं। यह उपन्यास अपनी वर्णनशैली में तो अद्भुत है ही इसमें दलित समाज के साथ जुड़ी छुआछूत और जातिप्रथा की यातना के साथ गरीबी, भुखमरी, पलायन और प्रेम का विस्तृत वर्णन है। देखा जाए तो इस उपन्यास में बंगाल की नदियों और उससे जुड़े जीवन का वह वर्णन मिलता है जिसकी कमी नीरद सी चौधरी परवर्ती बांग्ला साहित्य में देखते हैं।

बांग्ला के इस श्रेष्ठ दलित उपन्यास के बाद लेखक  `उजानतलीर उप कथा’, `बसंत हारिए कथा’, `क्षमा नेई’,  `माटी एक माया माने’ और `मुकुलेर गंध’ को महत्वपूर्ण उपन्यास मानता है। इनके लेखक हैं क्रमशः कपिलकृष्ण ठाकुर, श्यामल कुमार प्रामाणिक, नकुल मल्लिक, महीतोष विश्वास और अनिल धड़ाई। उजानतलीर कथा में विभाजन की त्रासदी है। `बसंत हारिए कथा’ में अपनी जमीन से निर्वासित किए जाने वालों का दर्द है। इसी संदर्भ में महाश्वेता देवी के उपन्यास `श्री श्री गणेश महिमा’ का भी जिक्र किया गया है।

दलित साहित्य का वर्णन तब तक पूरा नहीं होता जब तक उसमें आत्मकथाओं को शामिल न किया जाए। मराठी साहित्यकार दया पवार, शरणकुमार लिंबाले, अर्जन डांगले, कैशल्या वैसंत्री, सुनीता टाकभोरे अगर अपनी आत्मकथाओं से प्रसिद्ध हुए तो हिंदी में भी ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिसराय, श्योराज सिंह बेचैन और डॉ. धर्मवीर जैसे लेखकों ने चर्चित आत्मकथाएं लिखी हैं। दरअसल दलितों का जीवन जातिगत असमानता और उसकी यातना से इतना ग्रसित होता है कि वह वर्णन अपने में भोगी गई पीड़ा और किए गए संघर्ष का रोचक आख्यान बन जाता है। वह अपने में जहां साहित्यिक आलोचना का विषय होता है वहीं समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय होता है। इस लिहाज से पुस्तक का दलित आत्मकथाओं का इतिहास अध्याय भी अहम है। बांग्ला की पहली दलित आत्मकथा का प्रकाशन 1959 में  `दीनेर आत्मकथिन बा सत्य परीक्षा’। इसका अर्थ है गरीब की आत्मकथा या सत्य के प्रयोग। इसके लेखक हैं राइचरण सरदार। उसके बाद बांग्ला में आत्मकथाओं की लाइन लगी हुई है जिसमें मनोरंजन सरकार की `एकजन दलितेर आत्मकथा’, वनमाली गोस्वामी की `अबर बेलाय पाड़ी’, मनोरंजन व्यापारी की `इतिवृत्ते चांडाल जीवन’ और कल्याणी ठाकुर की `आमि केनो चांडाल लिखी’ की रचनाएं महत्वपूर्ण हैं।

रचनाशीलता से उफनते हुए बांग्ला समाज में दलित समाज की रचनाशीलता तो स्वागत योग्य है ही लेकिन उससे भी ज्यादा स्वागत योग्य आलोचक कृपाशंकर चौबे द्वारा प्रस्तुत उनका यह सार हैः—

बांग्ला की सभी की सभी दलित आत्मकथाएं कठिन जीवन संग्राम पर विजय की गाथाएं हैं। कठिन से कठिन समय में बांग्ला के दलित साहित्यकारों ने हार नहीं मानी। 

पुस्तक का छठा अध्याय आदिवासी समाज और बांग्ला साहित्य का है। इसमें संथाली के रचनाकारों माझी रामदास टुडू, पाल झुझार सोरेन, साधु रामचंद्र मुर्मू की रचनाओं का वर्णन है। शायद लेखक ने इस अध्याय में संथाली भाषा का जिक्र इसलिए किया है क्योंकि वह आदिवासी समाज की स्वाभाविक भाषा है और वह सब- आल्टर्न साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। लेकिन वे रचनाएं बांग्ला में नहीं हैं। बांग्ला में आदिवासी समाज पर विपुल लेखन किया है महाश्वेता देवी ने। प्रोफेसर चौबे उनके बेहद निकट रहे हैं और उनके साहित्य के विशेषज्ञ भी हैं। उन्होंने  `अरण्येर अधिकार’, `सालगिरह की पुकार पर’, `टेरोडेक्टिल’, `अक्लांत कौरव’ , `अग्निगर्भ’, `बांयेन’ जैसी प्रसिद्ध रचनाओं का सृजन किया और आदिवासी समाज की बेहतरी के लिए संघर्ष किया। आखिरी दो अध्यायों में त्रिपुरा के दलित आंदोलन और साहित्य के साथ पूर्वोत्तर की जनजातीय कविता का वर्णन है। पहले में त्रिपुरा सरकार में मंत्री रहे डॉ. अनिल सरकार के प्रशासकीय  और रचनात्मक योगदान की चर्चा है तो दूसरे और अंतिम अध्याय में पूर्वोत्तर की कवयित्री तेमसुला आओ, एसबी सुब्बा, इबालिन मारक, सोसाथाम, चंद्रकांत मूड़ासिंह, सुधन्य त्रिपुरा,नरेंद्र देववर्मा और महेंद्र देववर्मा जैसे कवियों की कविताओं को उद्धृत किया गया है। 

अलग-अलग लेखों के रूप में फेसबुक पर लिखी गई यह पुस्तक एक ओर नफरत और अफवाह का मंच बनते जा रहे सोशल मीडिया को गंभीर, रचनात्मक और सार्थकता प्रदान करने वाली है वहीं प्रकाशित साहित्य जगत में अपनी दृष्टिसंपन्न और शोधपरक उपस्थिति दर्ज करती है। इस पुस्तक का हर अध्याय अपने में अलग पुस्तक की सामर्थ्य रखता है। इस काम को प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे जैसे साहित्य अनुरागी और संग्रहालय जैसी स्मरणशक्ति रखने वाले विशेषज्ञ पूरा भी कर सकते हैं। वे हिंदी और बांग्ला समाज के बीच एक सांस्कृतिक दूत की तरह काम करते हैं जो एक साथ दोनों भाषाओं के साहित्य और उसके साहित्यकारों से बेहद अंतरंग रिश्ता रखते हैं। उससे ज्यादा इस पुस्तक का योगदान यह है कि यह कट्टर होते हिंदी समाज को उदार बनाने में एक महती भूमिका निभा सकती है। 

बांग्ला साहित्य और दलित आंदोलन, नई किताब प्रकाशन, नवीन शाहदरा, दिल्ली-92. पृष्ठ-128, मूल्य-295।

(समीक्षक अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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