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राहत की स्मृति: ‘वो गर्दन नापता है नाप ले, मगर जालिम से डर जाने का नहीं’

अब ना मैं हूं ना बाक़ी हैं ज़माने मेरे
फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे
कुछ ऐसे ही हालात हैं, शायर राहत इंदौरी के इस जहान-ए-फानी से जाने के बाद। उनको चाहने वाला हर शख्स, इस महबूब शायर को अपनी—अपनी तरह से याद कर रहा है। उनके अशआर को दोहरा रहा है। राहत इंदौरी बेहद आन-बान और शान वाले शायर थे। पूरे तीन दशक तक मुशायरों में उनकी बादशाहत कायम रही। सिर्फ उनका नाम ही मुशायरों की कामयाबी की जमानत होता था। लोग उनका नाम सुनकर ही मुशायरे में खिंचे चले आते थे।

सुनने वालों में ऐसी शोहरत और मोहब्बत बहुत कम शायरों को हासिल होती है। वे जब मंच पर अपना कलाम सुनाने के लिए खड़े होते, तो श्रोताओं का इंतजार खतम हो जाता और उनमें एक नया जोश, नया जज्बा पैदा हो जाता। राहत इंदौरी की सिर्फ शायरी ही नहीं, उनके कहने का अंदाज भी निराला था। सच बात तो यह है कि ज्यादातर सामयीन उनकी शायरी के साथ-साथ, उसकी अदायगी के दीवाने थे।

एक-एक लफ्ज पर वे जिस तरह से जोर देकर, कभी आहिस्ता तो कभी बुलंद आवाज में पूरी अदाकारी के साथ अपने अशआर पढ़ते, तो हजारों की भीड़ सम्मोहित हो जाती। मुशायरे का मैदान या पूरा हॉल ‘‘मुकर्रर इरशाद-मुकर्रर इरशाद’’ (फिर से कहिए) की आवाजों से गूंज उठता। वे वाकई महफिल लूट लेने वाले शायर थे। ऐसे शायर दुनिया में एक मुद्दत के बाद आते हैं।

मध्य प्रदेश के मालवा अंचल में साल 1950 की पहली तारीख, यानी 1 जनवरी को जन्मे राहतउल्ला कुरैशी ने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि वे शायर बनेंगे, लेकिन किस्मत उन्हें वहां ले गई जिसके लिए वे बने थे। उनके वालिद इंदौर की एक कपड़ा मिल में काम करते थे। जाहिर है कि राहत इंदौरी का बचपन बेहद संघर्षमय गुजरा। उन्होंने अपनी पढ़ाई के दौरान व्यावसायिक पेंटिग की। सिनेमा आदि के लिए होर्डिंग बनाए।

चित्रकारी के साथ-साथ उन्हें शायरी का भी शौक था और यह शौक उन्हें उतना ही अजीज था, जितना कि मुसव्विरी। जैसा कि वे अपने हर इंटरव्यू में इस बात को बतलाते थे, ‘‘आगे चलकर उनके शायर ने मुसव्विर को ओवरटेक कर लिया और वे पूरी तरह से शायर बन गए।’’ उन्हें बचपन से ही सैंकड़ों शेर मुंहजुबानी याद थे।

राहत इंदौरी से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा है, जो अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद सुनाया था। एक मुशायरे के दौरान उनकी मुलाकात मशहूर शायर जां निसार अख्तर से हुई। ऑटोग्राफ लेते वक्त उन्होंने उनके सामने खुद के शायर बनने की आरजू जाहिर की। जां निसार अख्तर साहब ने उनके इस सवाल का जवाब देते हुए कहा, ‘‘पहले पांच हजार शेर जुबानी याद कर लें। फिर वो शायरी खुद-ब-खुद लिखने लगेंगे।’’ अख्तर साहब का यह जवाब सुनकर, राहत इंदौरी ने उनसे बेसाख्ता कहा, ‘‘पांच हजार शेर तो मुझे पहले से ही याद हैं।’’ यह सुनकर, अख्तर साहब लाजवाब हो गए और उन्होंने कहा, “फिर तो तुम पहले से ही शायर हो, देर किस बात की है, स्टेज संभाला करो।’’

इस वाकिये के बाद राहत इंदौरी को जैसे जिंदगी के लिए एक रहगुजर मिल गई और वे इंदौर के आस-पास के इलाकों की अदबी बैठकों और महफिलों में शिरकत करने लगे। यह सब कुछ पढ़ाई और मुसव्विरी के साथ-साथ चलता रहा। वे खुद कहते थे, ‘‘उर्दू की मोहब्बत में, मैं शायरी की जानिब आया।’’

बहरहाल, राहत इंदौरी की इब्तिदाई और आला तालीम इंदौर में ही हुई। बाद में उन्होंने उर्दू लिट्रेचर में पीएचडी की डिग्री हासिल की। सोलह साल तक इंदौर के एक विश्वविद्यालय में स्टूडेंट्स को उर्दू अदब पढ़ाया। राहत इंदौरी की पीएचडी का मौजू ‘उर्दू मुशायरा’ था, जो आगे चलकर उनकी जिंदगी से पूरी तरह से वाबस्ता हो गया। दुनिया भर में उन्हें जो भी शिनाख्त हासिल हुई, शोहरत मिली वह मुशायरों से मुमकिन हुई। इंदौर में पैदाइश, परवरिश, तालीम-ओ-तर्बीयत की वजह से उन्होंने अपना तखल्लुस ‘इंदौरी’ मुंतखब किया। इस तरह राहत कुरैशी, राहत इंदौरी हो गए। अपनी इस पहचान पर उन्हें हमेशा फख्र रहा।

वे दुनिया में जहां भी जाते, मालवा की खुशबू उनसे पल भर के लिए जुदा नहीं होती। इंदौर, हमेशा उनके दिल में रहा। राहत इंदौरी शुरुआत में मुशायरों के अंदर अपनी शायरी तरन्नुम में पढ़ा करते थे, लेकिन बाद में वे तहत में पढ़ने लगे। आगे चलकर उन्होंने अपना खुद का एक अलग स्टाइल बना लिया। एक नया लहजा ईजाद किया, जो लोगों को खूब पसंद आया। उनके शेर पढ़ने-सुनाने की शैली मकबूल हो गई। राहत इंदौरी ने ज्यादातर गजलें ही लिखीं और वे भी छोटी बहर की, लेकिन उनकी इन गजलों का मौजू और लफ़्ज़ों का जादू दोनों ही सुनने वालों पर गहरा असर करता था।

सादा और आमफहम जुबान में वे सब कुछ कह जाते थे, जिसके लिए कई शायर अरबी-फारसी के कठिन अल्फाजों और बड़ी बहर का इस्तेमाल करते हैं। यही वजह है कि उनके शेर अवाम में कहावतों और मुहावरों की तरह दोहराए जाते थे। उनके एक नहीं, ऐसे कई मकबूल शेर हैं, जो बच्चे-बच्चे की जुबान पर हैं।

एक ही नदी के हैं ये दो किनारे दोस्तों
दोस्ताना मौत से जिंदगी से यारी रखो

अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए
कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए

किसने दस्तक दी, कौन है
आप तो अंदर हैं बाहर कौन है?

हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

दोस्ती जब किसी से की जाए
दुश्मनों की भी राय ली जाए

राहत इंदौरी अपनी जिंदगी में हमेशा इस कौल के कायल रहे, शेर उसी को कहिए जो दिल से निकले और दिल तक पहुंचे।

वाकई, उनके शेर और तमाम अशआर दिल से निकलते थे और बहुत जल्द ही सभी के दिलों में अपनी जगह बना लेते थे। वे मिजाज़ से एहतिजाज और बगावत के शायर हैं। उन्होंने रोमानी शायरी बहुत कम की है, लेकिन जितनी भी लिखी, उसकी रंग-ओ-बू औरों से जुदा है। भाषा की रवानगी और खिलंदड़पन उसमें खूब नजर आता है। शायरी में भाषा और बोलियों को किस तरह से बरता जाता है, कोई यह हुनर उनसे सीखे।

उसकी कत्थई आंखों में हैं जंतर-मंतर सब
चाक़ू-वाक़ू, छुरियां-वुरियां, ख़ंजर-वंजर सब
जिस दिन से तुम रूठीं मुझ से
रूठे-रूठे हैं, चादर-वादर, तकिया-वकिया, बिस्तर-विस्तर सब
मुझसे बिछड़ कर वह भी कहां अब पहले जैसी है
फीके पड़ गए कपड़े-वपड़े, ज़ेवर-वेवर सब
आखिर मैं किस दिन डूबुंगा फ़िक्रें करते हैं
कश्ती-वश्ती, दरिया-वरिया लंगर-वंगर सब

तिस पर उनके सुनाने का मस्ताना अंदाज सामयीन पर और भी जादू कर जाता था। आम शायरों में जो इशारों में बात करने का हुनर होता है, वह राहत इंदौरी में बिलकुल नहीं था। शायरी में वे अपनी बात बेखौफ और बेबाक तरीके से रखते थे। सिस्टम की गड़बड़ियों को सामने लाने और हुकूमत से सीधे-सीधे टकराने का माद्दा उनमें था।

यदि अवाम में हम राहत इंदौरी की मकबूलियत की वजह तलाशें, तो उसमें उनके उन शेरों का बड़ा योगदान है, जो सत्ता या सिस्टम के खिलाफ लिखे गए हैं। जिनमें सिस्टम की नाकामियों और नकारेपन पर गहरी चोट है। मजलूम, बेबस अवाम राहत इंदौरी के इस तरह के शेर सुनती, तो उन्हें लगता कि यह उन्हीं के जज्बात की तर्जुमानी है। जो बात वे नहीं कह पा रहे हैं, कोई तो है जो उनको अपनी आवाज दे रहा है। हुकूमत, सरमाएदारों और फिरकापरस्त ताकतों को चैलेंज कर रहा है। इस मामले मेंं उनका शजरा पाकिस्तान के अवामी शायर हबीब जालिब से मिलता था।

हमारे मुल्क में आज जिस तरह के हालात हैं, उसमें उनके कई शेर प्रासंगिक हो गए हैं। जबकि यह शेर आज से कई बरस पहले लिखे गए थे। खास तौर पर सीएए और एनआरसी कानून के खिलाफ मुल्क में जो तहरीक चली, उसमें राहत इंदौरी की यह गजल तो जैसे एक नारा बन गई।

लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में
यहां पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है
जो साहिबे मसनद हैं, कल नही होंगे
किरायेदार हैं कोई जाति मकान थोड़ी है
सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में
किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है


कुछ ऐसे ही तेवर इन शेरों के हैं,
वो गर्दन नापता है, नाप ले
मगर जालिम से डर जाने का नहीं

सारा दिन जेल की दीवार उठाते रहिए
ऐसी आजादी की हर शख्स रिहाई मांगे

राहत इंदौरी की पॉलिटिक्स क्लियर थी। उनकी पक्षधरता और जवाबदेही अपने समाज केे प्रति थी। जो समाज में सबसे ज्यादा हाशिए पर हैं, वे अपनी शायरी में उन्हींं की बात करते थे। उन्हीं की नगमें गाते थे। अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने बड़ी ही साफगोई और बेबाकी से यह बात कही थी,‘‘अदब, मुआशरे का आइना होता है।

एक-एक लफ्ज़ में उसकी अक्काशी होती है। शायर को अपनी शायरी में वही कहना चाहिए, जो वह महसूस कर रहा है। समाज में यदि कहीं आग लग रही है और हम इश्क-मोहब्बत के गीत गा रहे हैं, तो यह हम अपने फन के साथ नाइंसाफी कर रहे हैं। अपने समाज और मुल्क से गद्दारी कर रहे हैं।’’

जाहिर है कि राहत इंदौरी ने अपने फन से कभी नाइंसाफी नहीं की। अपने मुल्क की गंगा-जमुनी तहजीब और सतरंगी विरासत से उन्हें हद दर्जे की मोहब्बत थी। लिहाजा जब भी कभी इस पर जरा सी भी आंच आती, उनका दर्द और गुस्सा उनकी शायरी में झलक जाता था। उनके पाठक और श्रोता भी उनसे इसी तरह के कलाम की उम्मीद करते थे। राहत इंदौरी को मालूम होता था कि वे क्या लिख रहे हैं और इसका अवाम पर क्या असर होगा?

हुकूमत और सियासतदां इस पर क्या रद्देअमल करेंगे? कई बार उनका लहजा इतना तल्ख हो जाया करता था कि राहत इंदौरी के मुखालिफीन, जहर उगलने लगते थे। उनके खिलाफ तरह-तरह के इल्जाम लगाते थे, लेकिन अपनी आलोचनाओं की उन्होंने कभी परवाह नहीं की। उन्होंने वही लिखा, जो उनके दिल को भाता था। मुखालिफीन के विरोध और आलोचनाओं की वजह से राहत इंदौरी ने अपना स्टैंड नहीं बदला। वे मुशायरों के एंग्री यंग मैन थे, जिनकी हर अदा, उनके दीवानों को पसंद थी। राहत इंदौरी की गजलों में ऐसे कई शेर हैं, जो जितने लिखते वक्त सामयिक थे, उतने ही आज मौज़ू हैं। और आगे भी उनकी प्रासंगकिता बनी रहेगी।

जिन चिरागों से तआस्सुब का धुआं उठता है
उन चिरागों को बुझा दो, तो उजाले हों

या फिर जब वे यह कहते हैं,
अपने हाकिम की फकीरी पर तरस आता है
जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे

तो पूरा हाल तालियों से गूंज उठता था।

कई मर्तबा वे बतकही के अंदाज में बड़ी मानीखेज बातें कह जाते थे,
आप हिंदू, मैं मुसलमान, ये इसाई, वो सिख
यार छोड़ो ये सियासत है, चलो इश्क़ करें

सरहद पर तनाव है क्या
ज़रा पता तो करो चुनाव है क्या

राहत इंदौरी शेर-ओ-सुखन के अलावा अदब, कल्चर, मौसिकी, सिनेमा और देश-दुनिया के तमाम मसाइल पर भी अपनी राय खुलकर रखते थे। आज के नामवर कलाकारों, ‘मिलेनियम’ स्टारों की तरह मुल्क के ज्वलंत मसलों और सवालों पर उन्होंने कभी सोची-समझी खामोशी नहीं ओढ़ी। न ही किसी के डर से वे अपनी बात कहने में हिचकिचाए। वे जितने अपनी शायरी में बेबाक, बेखौफ और मुखर थे, उतने ही अपनी ज़ाती जिंदगी में।

पहले के मुशायरे और आज के मुशायरों में क्या बड़ा फर्क आया है ?, इसके मुताल्लिक राहत इंदौरी का ख्याल था, ‘‘मुशायरों में अब पहले की तरह उर्दू अदब की तहजीब और कद्रें नहीं मिलतीं, जो किसी जमाने में उर्दू अदब का सरमाया होती थीं। मुशायरे अब कल्चरल इवेंट हो गए हैं। मुशायरे में भी अब बाजार आ गया, जिसकी वजह से इनका  मैयार गिर गया। मुशायरे में भी कारोबारी लोग आ गए, जिन्होंने उसे बिजनेस बना दिया। सामयीन के मिजाज और जरूरत के मुताबिक कलाम लिखा और पढ़ा जाने लगा।’’

अलबत्ता यह बात अलग है कि राहत इंदौरी खुद, इस तरह के मुशायरों से लंबे अरसे तक जुड़े रहे। उन्होंने इस चलन से अपना इख्तिलाफ नहीं जाहिर किया। मुशायरों में वे अपनी वही ग़ज़लें बार-बार पढ़ते-सुनाते रहे, जिन्हें सामयीन सुनना चाहते थे।

मुल्क में उर्दू का क्या मुस्तकबिल है, उर्दू की कैसे हिफाजत की जाए? इस सवाल पर उनकी स्पष्ट राय थी, जिससे शायद ही कोई नाइत्तेफाकी जताए, ‘‘उर्दू हमारी मुल्क की आबोहवा में घुली हुई है। यह हमारी सरजमीं से पैदा हुई। कई स्थानीय बोलियों से मिलकर बनी है। लिहाजा जब तक यह बोलियां जिंदा रहेंगी, उर्दू भी जिंदा रहेगी। हमें किसी सरकारी इदारे और हुकूमत से यह तवक्को नहीं करना चाहिए कि वह उर्दू को बचाएगी। उर्दू की हिफाजत और उसे फरोग देने का जिम्मा हर उर्दू वाले का है। अपने बच्चों को उर्दू पढ़ाएं, बर्ताव में लाएं, कोर्स में शामिल करें और उसे ज्यादा से ज्यादा रोजगार से जोड़ें। यदि किसी जबान को पढ़ने वाले ही नहीं होंगे, तो वह जबान कैसे बचेगी।’’ सिर्फ अकेले उर्दू ही नहीं, उनकी यह बात मुल्क की हर जबान और बोली के लिए फिट बैठती है।

राहत इंदौरी ने कुछ हिंदी फिल्मों सर, खुद्दार, इश्क, तमन्ना, जुर्म, मुन्ना भाई एमबीबीएस, घातक, मर्डर, मिशन कश्मीर, मीनक्षी, करीब और बेगमजान के लिए नगमें भी लिखे, लेकिन फिल्मों से उनका नाता ज्यादा नहीं रहा। सच बात तो यह है कि उन्हें न तो मुशायरों से ही फुर्सत मिलती थी और न ही फिल्मी दुनिया की फितरत उन्हें रास आई। लिहाजा वे फिल्मों से दूर ही रहे। अलबत्ता मुशायरों के सिलसिले में वे दुनिया भर के हर गोशे में घूमे। वे जितने हिंदुस्तान में मकबूल थे, उतने ही विलायत में। उनके चाहने वाले हर मुल्क में थे।

राहत इंदौरी की उर्दू और हिंदी जबान में कई किताबें आईं। अवाम में मकबूलियत को देखते हुए खास तौर पर उनकी हिंदी में बहुत किताबें शाया हुईं। जिनमें कुछ अहमतरीन किताबें हैं ‘लम्हे-लम्हे’, ‘मेरे बाद’, ‘रुत’, ‘दो कदम और सही’, ‘धूप बहुत है’ और ‘नाराज’ आदि। उन्होंने एक त्रैमासिक पत्रिका ’शाखें’ का भी दस साल तक संपादन किया। उर्दू अदब की खिदमत के लिए राहत इंदौरी को कई एजाज और अवार्डों से नवाजा गया। अलबत्ता, हुकूमतों ने उन्हें कभी इस काबिल नहीं समझा। देश के अनेक बड़े सम्मान, जो उनसे कई दर्जे जूनियर और नाकाबिल लोगों को अभी तक मिल चुके है, उनसे दूर ही रहे।

आज जब देश में चारों और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो रहा हैै, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरा है और यहां तक कि संविधान पर भी खतरा मंडरा रहा है, राहत इंदौरी जैसे सजग शायर और बुद्धिजीवी की ज़रूरत पहले से कहीं ज्यादा है। तब वे हमें अकेला छोड़कर चले गए। लाखों दिलों को राहत पहुंचाने वाला, उनमें नई उम्मीदें और यकीन जगाने वाला यह हरदिल अजीज शायर, अपने चाहने वालों को ना भुलाए जाने वाला गहरा सदमा, दर्द-ओ-गम देकर जुदा हुआ है। अवामी शायर राहत इंदौरी को दिल की गहराईयों से खिराज-ए-अकीदत!

(मध्यप्रदेश निवासी लेखक-पत्रकार जाहिद खान, ‘आजाद हिंदुस्तान में मुसलमान’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ समेत पांच किताबों के लेखक हैं।)

This post was last modified on August 19, 2020 1:15 am

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