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छत्तीसगढ़ की ग्राउंड रिपोर्ट: जहां वोट देने के लिए तय करना पड़ता है 20 किमी का रास्ता

तामेश्वर सिन्हा

कांकेर (बस्तर)। उत्तर बस्तर जिले का विधानसभा क्षेत्र अंतागढ़ छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में खासा महत्व रखता है। यह वही हाईप्रोफाइल विधानसभा सीट थी जहां 2014 के उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी ने अपना नाम वापस ले लिया था और बीजेपी जीत गई थी, बाद में बीजेपी पर विधायक खरीद फरोख्त के आरोप लगे थे ।

ये सीट भारतीय जनता पार्टी का गढ़ रही है। चुनाव हो या फिर उपचुनाव, बीजेपी ने हर बार यहां पर जीत दर्ज की है। 2014 में यहां हुए उपचुनाव में भी बीजेपी के भोजराज नाग ने जीत दर्ज की थी। लेकिन इस विधानसभा में उनका टिकट काट कर सांसद रहे और तीन बार विधान सभा चुनाव में विजयी रहे विक्रम उसेंडी को टिकट देकर प्रत्याशी बनाया गया है ।

लेकिन मौजूदा बीजेपी प्रत्याशी अपने क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं को मुहैय्या कराने में नाकाम रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने अपने क्षेत्र से ही खुद को दूर रखा हुआ है। नक्सल समस्या का हवाला देने वाले विक्रम उसेंडी सिर्फ हवाई दौरे पर निर्भर हैं। वनमंत्री ने माना था कि वे नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव व अपने जीवन पर बने खतरे के कारण पिछले आठ वर्षों से अपने विधान सभा क्षेत्र के अधिकांश गांवों में नहीं जा पा रहे हैं।

वहीं कांग्रेस अपने नेतृत्व क्षमता की कमी के चलते बीजेपी की इस नाकामी का फायदा नहीं उठा पा रही है। हालांकि क्षेत्रवासी इस बार बीजेपी की सरकार बदलने के मूड में दिखाई दे रहे हैं।

इस सीट पर कांग्रेस ने अनूप नाग को टिकट दिया है । ज्ञात हो कि साल 2014 के उप चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मंतूराम पवार नामांकन वापस लेकर बीजेपी में चले गए थे और यह मुकाबला बीजेपी और अंबेडकराइट पार्टी ऑफ इंडिया के प्रत्याशी रूपधर पुडा के बीच था। यह वही विधानसभा है जहां लोकतंत्र को मंडी में तब्दील कर भाजपा पर विधायक खरीद फरोख्त के आरोप लगे थे। इस विधानसभा के चुनाव में बीजेपी-कांग्रेस के अलावा 9 प्रत्याशियों ने नामांकन डाला है।

आदिवासी और बंग समाज का खासा प्रभाव

अंतागढ़ विधानसभा में आदिवासी और बंग समाज का खासा प्रभाव देखने को मिलता है। बंग समाज के वोटर्स यहां प्रत्याशियों के जीत-हार का फैसला करते हैं। दो तहसील वाले इस पखांजुर विधानसभा में बंग समाज के सबसे ज्यादा वोटर्स रहते हैं। अंतागढ़ विधानसभा क्षेत्र में कुल 1 लाख 59 हजार 129 मतदाता हैं। जिसमें अंतागढ़ तहसील में 62 हजार 705 मतदाता हैं तो वहीं पखांजुर में 96 हजार 424 मतदाता रहते हैं। मतदान प्रतिशत अंतागढ़ और पखांजुर क्षेत्र से आता है लेकिन निर्णायक कोयलीबेड़ा और आमाबेड़ा अक्सर मतदान से होता है।

4 सालों से अंतागढ़ विधानसभा बीजेपी की झोली में है लेकिन विकास की बात करें तो पूरी तरह से जर्जर हालत है। मूलभूत सुविधाओं की कमी तो है ही ऊपर से ग्रामीणों को सरकारी दफ्तर से लेकर बैंक का काम कराने के लिए 100 किमी का सफर तय करना पड़ता है।

ब्लॉक मुख्यालय कोयलीबेड़ा दफ्तर 100 किमी दूर

अंतागढ़ विधानसभा में आने वाले कोयलीबेड़ा ब्लाक मुख्यालय जिसके अन्तर्गरत 17 पंचायत आते हैं। ब्लॉक ऑफिस पिछले 15 सालों से 100 किमी दूर पखांजुर में लग रहे हैं। कोयलीबेड़ा में बाकायदा ऑफिस बने हैं फर्नीचर मौजूद है लेकिन ब्लाक मुख्यालय के सारे दफ्तर अघोषित तरीके से पखांजुर शिफ्ट कर दिए गए हैं। पहले दफ्तर का संचालन पखांजुर में चोरी-छिपे किया जाता था लेकिन हाल के पांच सालों के अंदर प्रशासन ने स्वीकार किया है कि कोयलीबेड़ा ब्लाक मुख्यालय के सारे दफ्तर 100 किमी दूर पखांजुर से संचालित होता है और कोयलीबेड़ा में बने सारे सरकारी दफ्तरों में ताला लटका रहता है, दफ्तर में एक चपरासी जरूर मौजूद रहता है जो दफ्तर कभी-कभी खोल लेता है ।

आप को बता दें कि 3 बार विधायक चुने गए और 1 बार सांसद रह चुके बन मंत्री विक्रम उसेंडी को क्षेत्र के ग्रामीणों ने कई बार रैली निकाल कर ब्लाक मुख्यालय में दफ्तर लगाने की गुहार लगा चुके हैं।

कोयलीबेड़ा क्षेत्र के ग्रामीण सुखराम सलाम ने बताया कि “हमें छोटा सा काम कराने के लिए भी 100 किमी सफर तय करना पड़ता है। यह दफ्तर है लेकिन कोई मौजूद नहीं रहता है।”

मूलभूत सुविधाओं को तरसते आदिवासी

आजादी के 72 साल बाद भी अंतागढ़ विधानसभा के कोयलीबेड़ा ब्लॉक के आदिवासी बुनियादी सुविधाओं पानी, बिजली, स्कूल से महरूम हैं। आज भी यहां के आदिवासी झरिया का पानी पी कर अपनी प्यास बुझाते हैं। सड़क यातायात के लिए आज भी क्षेत्र के आदिवासी तरस रहे हैं। अंतागढ़ से कोयलीबेड़ा मार्ग आज तक अधूरा है। दुष्यंत मंडावी बताते हैं कि कोयलीबेड़ा में एक मात्र निजी आईसीआईसीआई बैंक है। जिसका लिंक हमेशा फेल रहता है। ग्रामीण बैंक, कॉआपरेटिव बैंक, स्टेट बैंक 70 किमी दूर अंतागढ़ में स्थित हैं। लिहाजा बैंक न होने के चलते ग्रमीणों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है।

बावजूद इसके बीजेपी के प्रत्याशी विधानसभा सीट जीतते आई है। इस संबंध में क्षेत्र के आदिवासी समाज का नेतृत्व कर रहे सहदेव उसेंडी ने बात-चीत में बताया कि “क्षेत्रवासियों के पास बीजेपी को वोट देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, जिसका कारण विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेतृत्व क्षमता की कमी थी। इसीलिए बीजेपी यहां से जीतती आ रही है। वरना क्षेत्र के लोगों के लिए खोले गए दफ्तर 100 किमी दूर कर दिए जा रहे हों उन्हें वोट कौन देता? बरहाल इस विधानसभा चुनाव में ऐसा नहीं होगा। हमारे पास भाजपा कांग्रेस के आलवा तीसरा विकल्प आप पार्टी के प्रत्याशी का भी है क्षेत्र के लोगों में काफी आक्रोश है।”

आप को बता दें कि क्षेत्रवासियों ने समस्याओं का निराकरण नहीं होने पर मतदान बहिष्कार की चेतवानी दी है। सहदेव आगे यह भी बताते हैं कि इस क्षेत्र में बीजेपी की एक पार्टी बैठक तक नहीं हुई है। कोई भी बीजेपी कार्यकर्ता क्षेत्र का दौरा नहीं करता और न चुनाव में किया है। आप को यह भी बताते चलें कि विक्रम उसेंडी का अंतागढ़ विधान सभा के बोंदानार गांव में पैतृक निवास है। अंतागढ़ विधानसभा के अन्तर्गत आदिवासी बाहुल्य कोयलीबेड़ा ब्लाक आता है।

20 किमी दूर मतदान केंद्र

कोयलीबेड़ा अंतर्गत गुड़ाबेड़ा में पोलिंग बूथ स्थापित है। संवेदनशील गोम्मे मर्राम, पानीडोबीर अंतिम छोर में स्थित गांव है जहां के सैकड़ों ग्रामीण गुड़ाबेड़ा पोलिंग बूथ आते हैं जिसकी दूरी 15 किमी है। ठीक वैसे ही गट्टाकाल, कामतेड़ा क्षेत्र के सैकड़ों ग्रामीण मतदाता जिरमतराई मतदान केंद्र वोट डालने आते हैं जिसकी दूरी 20 किमी दूर है। क्षेत्रवासियों ने बताया कि इधर संवेदनशील बता कर मतदान केंद्र ही नहीं बनाया जाता है। ग्रामीणों ने बात-चीत में बताया कि अगर पानीडोबीर में मतदान केंद्र लगता तो आस-पास के गांव वालों को मतदान करने में आसानी होती, ज्यादा दूरी तय कर मतदान के लिए जाना नहीं पड़ता। आप को बता दें एक ओर जहां नक्सल दबाव में इस क्षेत्र में मतदान होते हैं वहीं अगर ग्रामीण स्वयं से मतदान करने आना चाहें तो उन्हें चुनाव आयोग ही मतदान केंद्रों की दूरी बता कर रोक रहा है।”

क्षेत्र के मांझी रामजी आंचला कहते हैं कि “इस क्षेत्र में ग्रामीण अपने मत का प्रयोग करना चाहते हैं वो नक्सलियों के दबाव से भी मुक्त रहते हैं लेकिन मतदान केंद्र पहुंचने के लिए 15 से 20 किमी का सफर कौन तय करेगा। इस क्षेत्र में न तो बीजेपी का कोई नेता है न कांग्रेस का। और विकास तो आजादी के बाद से अब तक इन गांवों में लंबित है।”

हमने विधानसभा क्षेत्र के पखांजुर में देखा कि पखांजुर में अधिकतर बंगाली समुदाय के वोटर मौजूद हैं। जिन्हें बंगाल विभाजन के समय इंदिरा गांधी की सरकार ने शरण दिया था। लेकिन आज वे काफी तादाद में मौजूद हैं, जिन्हें बीजेपी अक्सर वोट बैंक में रूप में इस्तेमाल करती रही है। यहां बंगाली समुदाय और आदिवासी समुदाय के बीच अक्सर विवाद की स्थिति बनी रहती है। पखांजुर में कई वर्षों से पत्रकारिता कर रहे राजेश हालदार कहते हैं कि इस विवाद को दोनों समुदायों में मौजूद कांग्रेस-भाजपा के राजनीतिक नेता पैदा करते हैं ताकि बंगाली वोट बैंक बनाएं रख सके।

क्षेत्र के बंगाली समुदाय के लोगों से बात-चीत में सामने आया कि लगातार बीजेपी के प्रत्याशी यहां से इस लिए जीत रहे हैं क्योंकि अक्सर बंगालियों को भाषा का अधिकार, आरक्षण का अधिकार दिलाने की बात करते हैं, जिससे बंगाली समुदाय का वोट बीजेपी के खाते में आता है।  यहां के लोगों ने माना कि कांग्रेस के नेतृत्व क्षमता कमजोर रही है। लेकिन इस बार बंगाली समुदाय को ठग पाना मुश्किल है। और अपने अधिकारों को पाने के लिए सरकार बदलने के मूड में दिख रहा है ।

तीसरा सबसे बड़ा मुद्दा अंतागढ़ क्षेत्र में रावघाट खदान का है। यहां के आदिवासियों की जमीन को रावघाट खदान ने लील लिया है। जिससे क्षेत्र के आदिवासी काफी आक्रोश में हैं। यही नहीं बीजेपी सरकार द्वारा वन विद्यालय बनाने की घोषणा अभी तक अधर में है।

अंतागढ़ एसटी समुदाय के लिए आरक्षित सीट है, ऐसे में यहां पर पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग के वोटरों की संख्या काफी अधिक है। इस बार जिस तरह से बसपा और अजीत जोगी की पार्टी का गठबंधन हुआ है। उसका नतीजा भी देखना दिलचस्प होगा।

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This post was last modified on November 5, 2018 8:39 am

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