Subscribe for notification

दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, हाशिमपुरा नरसंहार मामले में पीएसी के 16 जवानों को उम्रकैद की सजा

चरण सिंह

नई दिल्ली। 31 साल बाद ही सही आखिरकार हाशिमपुरा नरसंहार पीड़ितों को न्याय मिल ही गया। दिल्ली हाईकोर्ट ने सभी 16 आरोपी पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। 1987 के इस मामले में आरोपी पीएसी के 16 जवानों को 42 लोगों की हत्या करने और अन्य अपराधों के आरोपों से बरी करने के तीन साल पुराने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गई थी।

उत्तर प्रदेश राज्य, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) और नरसंहार में बचे जुल्फिकार नासिर सहित कुछ निजी पक्षों की अपीलों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने छह सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। मामले में तत्कालीन गृहराज्य मंत्री पी चिदंबरम की कथित भूमिका का पता लगाने के लिए आगे की जांच की मांग को लेकर भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर भी फैसला सुरक्षित रखा गया था। 31 साल चले मुकदमे में 21 मार्च 2015 को तीस हजारी कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए आरोपी 16 जवानों को बरी कर दिया था।

दिल्ली हाईकोर्ट में एनएचआरसी की अपील पर केस का रुख इसी साल 28 मार्च को तब मुड़ा, जब घटना के समय पुलिस लाइन में तैनात 78 वर्षीय रणवीर सिंह विश्नोई पेश हुआ और उसने तीस हजारी कोर्ट में अतिरिक्त साक्ष्य के तौर पर पुलिस की जनरल डायरी पेश की। सेशन कोर्ट ने माना था कि हाशिमपुरा से पीएसी के ट्रक में 40-45 लोगों को अगवा किया था और इनमें से 42 लोगों को गोलियां मारकर मुरादनगर गंगनहर में फेंका गया था। कोर्ट में पेश जीडी में 22 मई 1987 की सुबह 7.50 बजे लिसाड़ी गेट थानांतर्गत पिलोखड़ी पुलिस चौकी पर पीएसी भेजे जाने, पीएसी जवानों, शस्त्रों और गोलियों का ब्यौरा दर्ज था।

पीएसी के 17 जवानों, जिनमें सुरेंद्र पाल सिंह, निरंजन लाल, कमल सिंह, श्रवण कुमार, कुश कुमार, एससी शर्मा, ओम प्रकाश, समीउल्लाह, जयपाल, महेश प्रसाद, राम ध्यान, लीलाधर, हमवीर सिंह, कुंवर पाल, बुद्ध सिंह, बसंत वल्लभ और रामबीर सिंह के नाम दर्ज थे।

आपको बता दें कि फरवरी 1986 में केंद्र सरकार ने अयोध्या के विवादित भूमि के ताले खोलने का आदेश दिया तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में माहौल गरमा गया। इसके बाद 14 अप्रैल 1987 से मेरठ में धार्मिक उन्माद शुरू हो गया। कई लोगों की हत्याएं हुईं, तो दुकानों और घरों को आग के हवाले कर दिया गया था। हत्या, आगजनी और लूट की वारदातें होने लगीं। इसके बाद भी मेरठ में दंगे की चिंगारी शांत नहीं हुई थी।

मई का महीना आते-आते कई बार शहर में कर्फ्यू जैसे हालात पैदा हो गए। और अंत में सरकार को कर्फ्यू लगाना पड़ा। दरअसल 22 मई 1987 को हापुड़ रोड पर गुलमर्ग सिनेमा के सामने हाशिमपुरा मोहल्ले में पुलिस, पीएसी और मिलिट्री ने सर्च अभियान चलाया था। आरोप है यहां रहने वाले किशोर, युवक और बुजुर्गों समेत सैकड़ों लोगों को ट्रकों में भरकर पुलिस लाइन ले जाया गया था। इनमें से एक ट्रक को दिन छिपते ही पीएसी के जवान दिल्ली रोड पर मुरादनगर गंग नहर पर ले गए थे।

उस ट्रक में करीब 50 लोग थे। वहां ट्रक से उतारकर लोगों को गोली मारने के बाद एक-एक करके गंग नहर में फेंका गया था। कुछ लोगों को ट्रक में ही गोलियां मारकर ट्रक को गाजियाबाद हिंडन नदी पर ले जाया गया जहां उन्हें हिंडन नदी में फेंका दिया गया। इनमें से जुल्फिकार, बाबूदीन, मुजीबुर्रहमान, मोहम्मद उस्मान और नईम गोली लगने के बावजूद सकुशल बच गए थे। बाबूदीन ने ही गाजियाबाद के लिंक रोड थाने पहुंचकर रिपोर्ट दर्ज कराई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी थी।

सात साल बाद 1994 में सीबीसीआईडी ने अपनी रिपोर्ट दी। फरवरी 1995 में गाजियाबाद के सीजेएम की अदालत में पीएसी के 19 अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए। इस मामले में 161 लोगों को गवाह बनाया गया। 1997 से 2000 तक कोर्ट ने अभियुक्तों के खिलाफ 6 जमानती और 17 गैर जमानती वारंट जारी किए। इस दौरान 3 की मौत हो गई। 2002 में दंगा पीड़ितों की अर्जी के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केस गाजियाबाद से दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वकील नियुक्त नहीं होने की वजह से 2006 तक 2 एसपीपी इस केस के पैरवी करते रहे ।

This post was last modified on December 3, 2018 6:13 am

Share
Published by
Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi