वोटबैंक के साथ कांग्रेस का बैंक भी खाली!

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प्रदीप सिंह

लगातार हार की वजह से कांग्रेस में पैसे का संकट

कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। 2014 में भाजपा के हाथों केंद्रीय सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस के हाथ से एक-एक करके राज्यों की सूबेदारी भी छिनती जा रही है। राजनीतिक रूप से कमजोर कांग्रेस अब आर्थिक बदहाली के कगार पर है।

पार्टी कोष में फंड की कमी के चलते पाई-पाई का हिसाब लगाना पड़ रहा है। आलम यह है कि संगठन संचालन और चुनाव खर्च के लिए जरूरी पैसों की मांग पर भी हाईकमान ने हाथ खड़े कर दिए हैं। राज्य प्रभारी और प्रदेश अध्यक्षों के केंद्रीय नेतृत्व से गुहार लगाने पर उन्हें टके सा जवाब मिलता है कि पार्टी के पास पैसा नहीं है।
अभी हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस में फंड की कमी का मामला सामने आया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का सपा से गठबंधन राजनीतिक आधार की कमी के साथ ही आर्थिक तंगी भी एक कारण था। पंजाब का मसला इससे अलग है।

पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने चुनाव प्रचार से लेकर खर्च तक सब अपने कंधे पर ले लिया था। पंजाब चुनाव में केंद्रीय नेताओं की भूमिका बहुत सीमित रही। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों को पार्टी हाईकमान ने थोड़ी बहुत मदद देने के बाद उन्हें स्थानीय समर्थकों की मदद से चुनाव लड़ने का निर्देश दिया था। चुनावी समर के बीच धन की किल्लत को पार्टी नेताओं ने सार्वजनिक नहीं होने दिया।

गोवा की विषम राजनीतिक परिस्थिति ने कांग्रेस की बदहाली की पोल खोल दी है। गोवा विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। लेकिन किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था।

ऐसे में भाजपा ने नितिन गडकरी के नेतृत्व में निर्दलीय विधायकों और छोटे दलों को पटा कर सरकार बनाने की चाल चली। जिसमें वह सफल भी हुई। सू़त्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इसी दौरान कांग्रेस महासचिव एवं गोवा चुनाव प्रभारी दिग्विजय सिंह ने पार्टी हाईकमान से भाजपा की रणनीति बताते हुए मदद मांगी। दिग्विजय सिंह ने निर्दलीय विधायकों को अपने पक्ष में करने के लिए खर्च होने वाले 30 करोड़ रुपये की मांग की। कहा जाता है कि पार्टी हाईकमान ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि सरकार बने चाहे न बने। कांग्रेस के पास इतना पैसा नहीं है। हम तीस करोड़ खर्च करेंगे, भाजपा तीन सौ करोड़ खर्च कर देगी।

उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के चुनाव के बाद अब गुजरात और हिमाचल प्रदेश की बारी है। इस वर्ष किसी भी समय दोनों राज्यों के चुनाव की घोषणा हो सकती है। गुजरात में पिछले 22 सालों से कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में है। इस लिहाज से वहां पार्टी नेता अपने दम पर सक्रिय हैं। हिमाचल प्रदेश को वीरभद्र सिंह के जिम्मे छोड़ दिया गया है।
लेकिन सबसे बुरी स्थिति मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की है। तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। 2018 में वहां विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस हाईकमान ने राज्य के नेताओं को अभी से चुनाव की तैयारी में लगने का निर्देश दिया है। धरना-प्रदर्शन और रैलियां करके सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की बात हो रही है। लेकिन मध्य प्रदेश के कांग्रेसी नेता पैसे के लिए पार्टी हाईकमान का मुंह ताक रहे हैं।
मध्य प्रदेश में कांग्रेस के कई दिग्गज नेता सरकार बनने की स्थिति में मुख्यमंत्री के दावेदार हैं। जिसमें दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ और सत्यव्रत चतुर्वेदी शामिल हैं। राजनीतिक कार्यक्रमों में होने वाले खर्च के लिए वे सब हाईकमान के भरोसे बैठे हैं। यह सब तब हो रहा है जब ये सारे नेता अपनी संपन्नता को लेकर मीडिया की सुर्खियों में रहते हैं। लेकिन पार्टी चलाने के लिए वे अपना पैसा खर्च नहीं करना चाहते हैं।
भाजपा के पुराने नेता आज भी राजमाता का नाम बहुत आदर से लेते हैं। इसका सीधा कारण जनसंघ को चलाने में उनका योगदान है। आरएसएस के एक पुराने कार्यकर्ता का कहना है कि यदि राजमाता विजयराजे सिंधिया न होती तो उस दौर में जनसंघ के लिए जरूरी संसाधनों को जुटाना मुश्किल था। कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी दादी से कुछ सीखकर भी आगे नहीं बढ़ना चाह रहे हैं। ऐसे समय में जब कांग्रेस दुर्दिन में है। कांग्रेस सिपहसालार मुश्किलों को कम करने की बजाय मदद की उम्मीद में बैठे हैं।
आम जनता को इस पर विश्वास करना मुश्किल है कि कांग्रेस पाई-पाई की मोहजात है। लेकिन इस हकीकत के पीछे ठोस तर्क और तथ्य हैं। लंबे समय तक कांग्रेस की देश और प्रदेश में सरकारें रहीं। तब पार्टी चलाने के लिए न तो इतने पैसे की जरूरत थी और सरकार होने के चलते न खर्चा मिलने में कमी थी। अभी हाल तक कांग्रेस का खर्चा राज्य सरकारों के जिम्मे था। राज्यों के मुख्यमंत्री पार्टी कोष में फंड जमा करते थे। सूत्रों का कहना है कि इसमें सबसे अधिक योगदान हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा का था। लेकिन हरियाणा में कांग्रेस के हारने के बाद वह स्रोत बंद हो गया।

राजनीति में जीत हार तो आम बात है। लेकिन कांग्रेस की बदहाली अचानक एवं अनायस नहीं है। एक समय यह कहा जाता था कि पैसे से चुनाव नहीं जीता जाता है। थैलीशाह एवं पूंजीपति इसमें केवल मदद कर सकते हैं। ऐसा न होता तो हर पूंजीपति के पास कंपनियों के अलावा एक पार्टी भी होती।

लेकिन 2014 के आम चुनाव ने इस तर्क की धज्जियां उड़ा के रख दी है। नरेन्द्र मोदी ने राजनीतिक खर्च के मानक को ही बदल दिया है। पार्टियों द्वारा चंदा इकट्ठा करने के अभियान चलाने के बजाय अब कारपोरेट सीधे राजनीतिक दलों का चुनावी खर्च फाइनेंस कर रहे हैं। सरकार बनने के बाद नीतियों को उनके पक्ष में फेरबदल करके उसकी भरपाई की जाती है। बदले दौर में भाजपा ने जिस तरह से रैलियों एवं चुनाव प्रचार में पानी की तरह पैसा बहाया है,उसका मुकाबला दूसरे दल नहीं कर पा रहे हैं। भाजपा की समृद्धि के आगे दूसरे दल गरीब नजर आ रहे हैं।

भाजपा सरकार ने पार्टी फंडिंग को भी कमजोर किया है। राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता लाने की बात हो रही है। लेकिन ऐसे कारपोरेट और पूंजीपितयों को डराने-धमकाने का भी काम हो रहा है जो सत्तारूढ़ दल के अलावा अन्य दलों की मदद कर रहे हैं। कुछ समय पहले तक पार्टी के चंदे और फंड की देखरेख के लिए हर पार्टी में एक कोषाध्यक्ष होता था। राजनीतिक पार्टियों में यह पद अब हाथी का दांत हो गया है। जो केवल दिखाने के लिए है। असली कोषाध्यक्ष की भूमिका में कारपारेट आ गया है। जिसमें विपक्षी दल चाहे जो भी हो वो पीछे हो गया है।

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