सरदार पटेल की सबसे ऊंची मूर्ति और “नकलची वृत्ति” की वैचारिक दरिद्रता

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अमेरिका के ‘स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ की तर्ज पर गुजरात के सरदार सरोवर बांध के पास ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ का लोकार्पण हो गया! स्थानीय आदिवासी किसान इस सरकारी परियोजना के अतिशय विस्तार और जबरन भूमि अधिग्रहण का लंबे समय से विरोध कर रहे थे। आज भी किया। स्वाधीनता आंदोलन में बारदोली के महान किसान अभियान के संगठक और नेता रहे सरदार पटेल की स्मृति सहेजने का यह कैसा प्रकल्प है!

अमेरिका में ‘स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ है तो हमारे शासकों ने भी अपने इस प्रकल्प का नाम रख लिया: ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी!’ क्या इसमें हमारे शासकों-योजनाकारों की नकलची प्रवृत्ति नहीं दिखती? अरे भाई, कुछ मौलिक नाम रखते! देसी भाषायी-अंदाज, पटेल साहब के व्यक्तित्व के मुताबिक माटी की महक और नामकरण में कुछ धारणात्मक-मौलिकता होती! ये चीजें सिरे से गायब हैं!

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दूसरी बात, इस प्रकल्प के विचार पर है!  क्या वाकई ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ से भारत के लोग प्रेरित होकर ज्यादा एकजुट होंगे? क्या यह 182 मीटर ऊंची मूर्ति हमारे समाज में बढ़ते वर्णवादी भेदभाव, लिंगभेद, सांप्रदायिकता, कट्टरपंथ और सामुदायिक विद्वेष आधारित विभाजन को रोकने में सहायक होगी?

तीसरी बात कि 182 मीटर ऊंची प्रतिमा लगाकर हम समाज और दुनिया को क्या संदेश देना चाहते हैं? आज देश के सभी अखबारों और चैनलों में ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के रंगारंग  विज्ञापन छपे हैं। इसमें 182 मीटर की ऊंचाई का ऊपर ही जिक्र किया गया है। फिर नीचे नारा दिया गया है: ‘सबसे ऊंचे सबसे शानदार- लौह पुरुष हमारे सरदार!’

क्या इससे सरदार पटेल या भारत क्रमशः  दुनिया के सभी महापुरुषों और देशों में सिरमौर या सर्वोच्च हो गये या हो जायेंगे? क्या भूख, बीमारी, असमानता, अपराध, भ्रष्टाचार, उत्पीड़क वर्णवाद और लिंगभेद के  वैश्विक सूचकांक के हमारे निकृष्ट और निचले स्तर को नजरंदाज कर दुनिया इस ऊंची मूर्ति स्थापना के बाद हमें ऊंचा और श्रेष्ठ मान लेगी? 

थोड़ी देर के लिए दुनिया को छोड़ दें तो क्या अपने देशवासी भी इस मूर्ति-स्थापना के बाद पहले से ज्यादा सुखी, खुश और गौरवान्वित महसूस कर सकेंगे? देश की क्या कहें, जहां यह महान् स्मारक बना है, वहां के 72 गांवों के किसान और आदिवासी इस सरकारी प्रकल्प के भूमि-विस्तार और भारी खर्च आदि के सवाल पर काफी समय से विरोध प्रकट कर रहे हैं।

इस परियोजना में उनकी जमीन गई है! आसपास के दर्जनों गांवों में स्कूल और अस्पताल आदि की ठीक से व्यवस्था नहीं है! स्थानीय आदिवासी-किसान अपनी बेहाली और मुश्किलों का हल चाहते हैं! क्या बेहतर नहीं होता, इस इलाके में सरदार पटेल विश्वविद्यालय, सरदार पटेल कृषि अनुसंधान केंद्र और सरदार पटेल राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान संस्थान खोले गये होते?

हम आपके मूर्ति बनाने के अधिकार को चुनौती नहीं दे रहे हैं! आप शासन में हैं, आपको अधिकार है, परियोजना और प्रकल्प तैयार करने का। लेकिन सिर्फ मूर्ति ही क्यों, अपने समाज और आम नागरिकों को बेहतर और खुशहाल बनाने की परियोजना और प्रकल्प क्यों नहीं शुरू करते?

(उर्मिलेश राज्यसभा टीवी के संस्थापक कार्यकारी संपादक रहे हैं। और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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