भूटान से लौटकर रामशरण जोशी: हिमालयी देश जहां राजा सिखा रहा है लोकतंत्र का पाठ

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रामशरण जोशी

हिमालय की गोद में बसा भूटान दक्षिण एशिया का एक छोटा सा देश है। तिब्बत और भारत के बीच स्थित यह देश मुख्यत: पहाड़ी है और दक्षिणी भाग में थोड़ी सी समतल भूमि है। यह सांस्कृतिक और धार्मिक तौर से तिब्बत से जुड़ा है, लेकिन भौगोलिक और राजनीतिक रूप से यह भारत के करीब है। अभी कुछ दिनों पहले भूटान में हुए चुनाव ने वहां व्यापक राजनीतिक परिवर्तन किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भूटान और भारत का संबंध पूर्ववत बना रहेगा? चंद दिनों पहले ही मैं भूटान से लौट कर आया हूं। वहां मैंने पांच दिन और छह राते गुजारी। इतने कम समय में किसी देश की राजनीति को समझ कर आने वाले दिनों में उसकी विदेशनीति क्या होगी? अधिकारपूर्वक कुछ कहा नहीं जा सकता है।

आज पूरी दुनिया जहां जीडीपी बढ़ाने पर लगी है वहीं प्रकृति की गोद में बसा भूटान खुशहाली पर जोर देता है। यही बात उसको विश्व के अन्य देशों से अलग करती है। ऐसे में इस खूबसूरत देश पहुंचने पर मेरी पहली दिलचस्पी भूटान के लोगों के खुश रहने के पीछे का कारण जानने की थी।भूटान की राजधानी थिम्फू और दूसरे महत्वपूर्ण शहर पारो और सुदूर गांवों में घूमने के बाद यह पाया कि यहां के लोगों के चेहरों पर खुशी झलक रही है। खुशहाल और सुखी जीवन की जो कसौटी है, भूटान उस पर खरा उतरता है। 

मैं यह नहीं कह सकता कि उनका जीवन पूरी तरह समृद्धि से परिपूर्ण है। लेकिन गांव से लेकर शहर तक सबके चेहरे पर एक अभूतपूर्व प्रसन्नता दिखाई देती है। जो भारत में नहीं दिखती। औसत भूटानवासी आपसे विनम्रता और सौम्यता से बात करेगा। बात करते समय यह नहीं दिखता कि वे किसी तनाव में है। सड़कों पर जिस तरह उन्मुक्त भाव से युवक-युवतियां साथ-साथ चलते हुए दिखे। वहां लव जिहाद का खतरा नहीं है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि भूटान का समाज सांस्कृतिक रूप से काफी उन्नत है। स्त्री-पुरुष में समानता है। लड़की पैदा होने पर माता-पिता किसी बोझ तले नहीं दबते हैं।

देश में संसाधन कम होने के बावजूद सरकार लोगों की बुनियादी जरूरतों के प्रति संवेदनशील है।शिक्षा,स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है।दसवीं तक शिक्षा नि:शुल्क है। पूरे देश में पब्लिक स्कूलों की संस्कृति नहीं है। स्वास्थ्य सुविधा भी सरकारी अस्पतालों के हावाले है। देशी-विदेशी चाहे जो हो,यदि भूटान में रहते हुए बीमार हुआ है तो उसका निशुल्क ईलाज होगा।

भूटान की यह मेरी पहली यात्रा थी। ऐसे में यह नहीं कह सकता कि यह कब से है। लेकिन देखने में यह पता चलता है कि वहां विकास सिर्फ ऊपर नहीं बल्कि नीचे तक हुआ है। इस व्यवस्था का श्रेय वहां की शासन-व्यवस्था को जाता है। भूटान की शासन व्यवस्था में राजशाही और लोकशाही का अद्भुत समिश्रण है। आम जनता द्वारा जनप्रतिनिधियों का चुनाव होता है। लेकिन मंत्रियों को चुनने और किसी विवादित मुद्दे पर अंतिम अधिकार राजा के पास सुरक्षित है।

आज जब समूची दुनिया में लोकतंत्र का बोलबाला है तो भूटान में राजशाही लोकप्रिय है। भूटान की राजशाही नेपाल जैसी नहीं है जिसे खत्म करने के लिए माओवादी आंदोलन ने जन्म लिया। भूटान के वर्तमान राजा ने नेपाल के राजनीतिक परिवर्तन से सीखते हुए अपनी बहुत सी शक्तिओं को निर्वाचित प्रतिनिधियों को दे दे दिया। आज भी वहां के राजा-रानी आम लोगों में बहुत लोकप्रिय हैं। सरकारी भवनों और कार्यालयों को तो छोड़ दीजिए होटलों और निजी आवासों और ढाबों में भी राजा-रानी की तस्वीर देखने को मिलती है। 

उत्सुकतावश जब मैंने एक आदमी से पूछा तो उसने कहा कि हम लोग राजा को पसंद करते हैं। राजा हम लोगों के लिए काम करते हैं। राजशाही के प्रति यह सम्मान किसी दबाव में नहीं है।आठ लाख की आबादी में लगभग 75 फीसद लोग बौद्ध धर्म के अुनयायी हैं। भूटान की लगभग 25 प्रतिशत जनता नेपाली और भारतीय मूल के हिंदू है।

राजशाही के अलावा भूटान की दूसरी सत्ता बौद्ध धर्म है। जनता पर बौद्ध लामाओं का अद्भुत प्रभाव देखने को मिलता है। जगह-जगह आपको बौद्ध विहार देखने को मिल जाएगे। मंदिर और मस्जिद भी हैं। लेकिन लंबे समय से वहां की जनता पर लामाओं का प्रभाव बरकरार है। वहां के हर बौद्ध विहार में आप छोटे-छोटे बच्चों को भिक्षु के रूप में देख सकते हैं। जो आगे चलकर लामा बनते हैं।

हमने लोगों से पूछा कि क्या ये बच्चे स्कूल जाते हैं, तो पता चला कि वे बौद्ध विहारों में बौद्ध धर्म और दर्शन की शिक्षा लेते हैं। लोगों ने बताया कि लामा बनने वाले 95 प्रतिशत बच्चे गरीब घरों के होते हैं। यहां आप धर्म और गरीबी का नजदीकी रिश्ता देख -समझ सकते हैं। भूटान में जब कोई परिवार अपने बच्चे को भिक्षु बनाने का फैसला करता है तो समाज में अचानक उस परिवार का सम्मान बढ़ जाता है। सरकार की तरफ से ऐसे माता-पिता को हर महीने एक निश्चित धनराशि मिलने लगती है।

लेकिन इसी बीच एक सवाल हमने पूछा कि इतनी छोटी उम्र में जो बच्चे अपने माता-पिता की इच्छानुसार लामा बनने भेज दिए जाते हैं,युवावस्था में क्या वे लामा जीवन के प्रति स्थिर रहते हैं। इसका जवाब था नहीं? लगभग दस प्रतिशत बच्चे शिक्षा-दीक्षा पूर्ण होने के बाद गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने का निर्णय करते हैं। ऐसे में कुछ दिनों तक उस बच्चे और उसके परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा कम हो जाती है। लेकिन बाद में वे सामन्य जीवन जीने लगते हैं। भिक्षु शिक्षा पूर्ण होने के बाद ढेर सारे लामा जापान, थाईलैंड या यूरोपीय देशों में चले जाते हैं। इस प्रक्रिया में यह समझा जा सकता है कि गरीब ही किसी धर्म का ध्वजावाहक होता है।

बदलाव की बयार पूरे विश्व में है तो भूटान में भी है। मैंने भी देखा कि धर्म के साथ ही वहां भौतिकता भी बढ़ रही है। थिम्पू और दूसरे शहरों में निर्माण कार्य तेजी से हो रहे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि अधिकांश निर्माण मजदूर बिहार और नेपाल के हैं। गांव में ईंट और लकड़ी के घर हैं। शहरों में पत्थरों का इस्तेमाल हो रहा है। पांच-पांच मंजिला अपार्टमेंट्स बन रहे हैं। लेकिन भवन बनाने के साथ ही वहां पौधारोपण भी किया जाता है। कृषि,पर्यटन और कुटीर उद्योग वहां के लोगों की जीविका का आधार है। हर एक वस्तु भारत से जाती है। वहां हमने अमूल की लस्सी पी। 

भूटान में सौ में से अस्सी लोग लोग हिंदी जानते हैं। एक छोर से दूसरे छोर तक हिंदी से काम चला सकते हैं। हिंदी का यह प्रचार भारत सरकार ने नहीं बल्कि हिंदी फिल्मों ने की है। भूटान में तीन भाषाएं भूटानी, अंग्रेजी और हिंदी पढ़ाई जाती है। हिंदी का इतना बोलबाला है कि भूटान में आप कोई सामान खरीदते समय बोहनी शब्द (किसी दुकानदार से पहली बिक्री-खरीदारी) सुन सकते हैं। भूटान का मुख्य आर्थिक सहयोगी भारत हैं। यहां भारतीय रुपया से आसानी से विनिमय किया जा सकता है। विश्व के सबसे छोटी अर्थव्यवस्थाओं में से एक भूटान का आर्थिक ढांचा मुख्य रूप से कृषि और वन क्षेत्रों और अपने यहां निर्मित पनबिजली के भारत को विक्रय पर निर्भर है। औद्योगिक उत्पादन लगभग नगण्य है और जो कुछ भी है, वे कुटीर उद्योग की श्रेणी में आते हैं। भूटान की पनबिजली और पर्यटन के क्षेत्र में असीमित संभावनाएं हैं।

थिम्पू और पारो शहरों में घूमने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि भूटान में जो नया राजनीतिक परिवर्तन हुआ है। उसका शहर लेकर गांवों तक व्यापक समर्थन और स्वागत हुआ है। नए प्रधानमंत्री पेशे से डॉक्टर है। गांव से लेकर कस्बों और शहर तक उनकी लोकप्रियता है। भूटान को लेकर उनके मन में एक कल्पना है। नई सरकार उनके जीवन स्तर में सुधार के लिए और काम करेगी।

भूटान के शहर बिलकुल साफ, पारदर्शी और शांत हैं। यहां की पहाड़ी हरियाली से ढकी है। जबकि हमारे यहां उत्तराखंड और राजस्थान के पहाड़ पूरी तरह उजाड़ दिए गए हैं। विकास और खुशहाली के बीच भूटान में चारो तरफ हरियाली ही हरियाली है। भूटानी लोग प्रकृति का बहुत सम्मान करते हैं। उनका प्रकृति के प्रति प्रेम महसूस किया जा सकता है। वे इन पहाड़ों से दिल से जुड़े हुए हैं।  लेकिन भूटान की सबसे बड़ी सफलता तो कुछ और है। धीरे-धीरे ही सही विकास और ख़ुशी को लेकर दुनिया का नजरिया बदल रहा है।

(वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी से बातचीत पर आधारित)

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