बैंकों को तगड़ी चोट के बाद साख बहाली के लिए अब अडानी का सड़क पर तमाशा

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हिंडन वर्ग रिपोर्ट के आने के बाद से एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा, जब शेयर बाजार में अडानी समूह के शेयरों में तेजी से गिरावट नहीं देखी गई। पिछली शाम जब बाजार बंद हुआ तो अडानी 38वें नंबर पर थे और महज बत्तीस दिनों में ही अडानी समूह को 12,00,000 करोड़ रुपये या 150 बिलियन डॉलर का नुकसान हो चुका है।

अगर अडानी एंटरप्राइजेज के शेयरों में 10% की और गिरावट निकट भविष्य में होती है तो यह 52 सप्ताह के सबसे निचले स्तर को पार कर जाएगा। जिस तरह से शेयरों के दाम में गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही है, उससे अब यह स्पष्ट हो चला है कि अडानी समूह ने शेयर कीमतों में हेराफेरी या ओवर प्राइसिंग की है।

यदि कोई अन्य सरकार होती तो सेबी, एनएसई और बीएसई की नाक के नीचे हुई इस धांधली के किस्से तमाम अखबार और टीवी चैनल गला फाड़ फाड़ कर बयान करते। लेकिन अब सब चुप हैं। मीडिया का यह रेंगता हुआ चरित्र इस कालखंड के पत्रकारिता का एक त्रासद काल है।

अब सरकार चाहे जो कुछ भी कहे या चुप बनी रहे, सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाओं पर चाहे जो भी फैसला हो, पर हकीकत यही है कि निवेशकों, जिसमें स्वदेशी और विदेशी दोनों हैं, ने, अडानी को बुरी तरह से नकार दिया है। अगर समूह की पांच कंपनियों से सर्किट लिमिट हटा दी जाए तो वे जल्दी ही गिरकर कबाड़ के भाव हो जाएंगी।

अडानी के प्रति सरकार के खुले पक्षपात ने भारत की नियामक सस्थाओं और कानून लागू करने वाली एजेंसियों तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को बहुत नुकसान पहुंचाया है। अडानी का साम्राज्य जैसे जैसे दरक रहा है सरकार और विशेषकर प्रधानमन्त्री पर तरह तरह के आक्षेप और आरोप उठने लगे हैं।

हिंडनबर्ग खुलासे का असर अडानी समूह की माली हालत पर तो पड़ा ही है, पर उसका सीधा असर उसके शेयरों में पूंजी लगा कर कुछ पैसा बना लेने की आशा बांधे सामान्य निवेशकों पर भी पड़ा है। लेकिन इसका यह अर्थ बिलकुल भी नहीं है कि अडानी का एक भी शेयर न खरीदने वाले सामान्य नागरिक इस धमाके से अछूते रह जायेंगे।

अडानी की पूरी पूंजी ही बैंकों से लिए कर्ज पर आधारित है। यदि वह समय पर बैंकों, एलआईसी और अन्य वित्तीय संस्थानों को कर्ज की अदायगी नहीं कर पाता है तो, उसका असर बैंको पर पड़ेगा और उस असर के प्रभाव से हमारे आप जैसे सामान्य खाताधारक भी अछूते नहीं रहेंगे। वैसे भी बैंकों का एनपीए या कर्ज को राइट ऑफ करने की प्रवृत्ति इधर बढ़ी है, वह भी कम चिंता की बात नहीं है।

बैंकों या कर्ज देने वाले किसी भी वित्तीय संस्थान का एक साधारण सार्वभौमिक नियम है कि दुनिया का कोई भी बैंक आपको आपकी संपत्ति से अधिक उधार नहीं देता है। लेकिन उद्योगपति गौतम अडानी को उनके द्वारा गिरवी रखी गई संपत्ति से कई गुना ज्यादा कर्ज दिया गया है। गौतम अडानी ने संपत्ति के रूप में अपने शेयर रखे हैं, जो अब धीरे धीरे अपनी चमक और कीमत खोते जा रहे हैं। अडानी के अधिकतर लोन और निवेश सरकारी बैंकों जैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, SBI, या एलआईसी जैसी संस्थाओं से आए हैं।

यह कहा जा सकता है कि अडानी का कारोबार बड़ा था और अडानी की साख भी कम नहीं थी। लेकिन अडानी समूह, टाटा और बिड़ला जैसे पारंपरिक औद्योगिक घरानों की तरह मजबूत और भौतिक संपत्ति वाला घराना नहीं है। यह अभी खड़ा हो रहा था और एक तथ्य इसके पक्ष में था कि यह वर्तमान सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अतिशय कृपापात्र है।

2014 के चुनाव में भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अडानी के जिन निजी विमानों से चुनाव प्रचार कर रहे थे, उन विमानों पर अडानी ग्रुप का लोगो और नाम भी था। एक पूंजीपति का यह राजनैतिक निवेश था, जिसका लाभ अडानी को मिला। 2014 के बाद अडानी का कारोबार भी आसमान छूने लग गया।

राजकृपा से इस समूह का विकास हुआ और अमीरों की अंतर्राष्ट्रीय सूची में यह 609 अंक से तेजी से बढ़ते हुए तीसरे नंबर तक पहुंच गया था। पर अब हिंडनबर्ग खुलासे के बाद यह समूह फिर खिसक कर 38वें स्थान पर आ गया है। पतन का यह सिलसिला अभी जारी है।

चुनावों में भ्रष्ट उद्योगपतियों की आर्थिक मदद लेना भारत में एक परंपरा के रूप में विकसित हो चुका है। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के समय भी उस समय कांग्रेस पर औद्योगिक घराना बिड़ला और धीरूभाई अंबानी जैसे उद्योगपतियों से मदद लेने के आरोप लगते रहते थे। लेकिन तब यह खेल इतना खुलकर और निर्लज्ज तरह से नहीं खेला जा रहा था और न ही जांच एजेंसियों और निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को इस खेल में खुलकर शामिल किया गया था।

मोदी सरकार की एक औद्योगिक समूह से अतिशय निकटता और पूंजी का राजनीति में निर्द्वंद्व और निर्लज्ज प्रवाह की चाहत से आज भारत की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी है। अडानी समूह की विकास गाथा में सरकार का कितना योगदान है और सरकार ने किस किस कंपनी को अडानी अधिग्रहित कर सकें, इसके लिए कैसे नियमों को तोड़ा और पक्षपातपूर्ण नियम बनाए, ईडी, प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई और आयकर जैसी जांच एजेंसियों का दुरुपयोग किया, इस पर एक लम्बी सीरीज लिखी जा सकती है।

सरकारी अफसर या नौकरशाही एक घोड़े की तरह होती है जो अपने सवार का इशारा समझती है। जब अडानी समूह अपना एफपीओ लाने वाला था, तब भी सेबी के कुछ अधिकारियों को अडानी के फूले गुब्बारे जिसमें कर्ज की हवा भरी थी, की तथ्यता की जानकारी थी। पर सरकार और विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी की गौतम अडानी से निकटता को देखते हुए सेबी (भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) ने अडानी को आईपीओ के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दे दी।

तब यह संकेत मिलने लगे थे कि यह कंपनी घाटे में जा सकती है। सेबी के अधिकारी इस बात को समझ रहे थे और वे इसके अंजाम से अच्छी तरह वाकिफ थे। ऐसी स्थिति में सेबी को इन आईपीओ, एफपीओ पर रोक लगानी चाहिए थी, लेकिन सेबी के भ्रष्ट अधिकारियों ने अडानी के साथ वित्तीय गठजोड़ कर लिया और अडानी के भ्रष्ट तरीकों का समर्थन किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आज लाखों निवेशकों का नुकसान हुआ और यह नुकसान अब भी जारी है। साथ ही भारत की अर्थव्यवस्था और बैंकिंग सेक्टर तथा एलआईसी की साख और हैसियत पर भी असर पड़ने लगा है।

ऐसा नहीं है कि सेबी ने केवल अडानी की ही कंपनियों के प्रति ऐसी शातिर नरमदिली दिखाई हो बल्कि एक ऐसी ही कंपनी थी पेटीएम, जिसपर, सेबी की मेहरबानी हुई थी। यह कंपनी घाटे में चल रही थी और सेबी को चाहिए था कि पेटीएम के आईपीओ को खारिज कर दे। लेकिन सेबी के अधिकारियों ने पेटीएम के बॉस विजय शेखर शर्मा से हाथ मिला लिया था। नतीजतन लाखों ग्राहकों को धोखा मिला, यह देश में एक बड़ा वित्तीय घोटाला है।

आज भी सेबी अडानी के शेयर घोटाले की जांच की बात तो कर रहा है, पर अडानी के साथ साथ सेबी की भी साख इस कदर गिर गई है कि उनकी निष्पक्षता पर जनता को संदेह है। यदि आप स्प्राउट्स वेबसाइट पर उमेश गुजराती के लेख अनट्रस्टवर्दी सेबी पढ़ेंगे तो सेबी के घोटालों के बारे में कई हैरान करने वाले तथ्य मिलेंगे।

उमेश ने सेबी अधिकारियों के भ्रष्टाचार को उजागर करते हुए 19 और 20 नवंबर 2021 को दो विशेष रिपोर्ट भी जारी की थी। पेटीएम में करोड़ों का घोटाला स्प्राउट्स की वेबसाइट पर उपलब्ध है। लेकिन दुर्भाग्य से यह कांड भी दबा दिया गया। सेबी के वही अधिकारी आज भी अडानी के समर्थन में घूम रहे हैं।

हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी के शेयरों को 85 फीसदी ओवरवैल्यूड बताया और अडानी ग्रुप पर शेयरों में हेरफेर का आरोप लगाया था। हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद से अडानी की 10 लिस्टेड कंपनियों की मार्केट वैल्यू 146 अरब डॉलर या करीब 60 फीसदी घट गई है। यह आंकड़ा तीन चार दिन पहले का है। अडानी के कुछ शेयरों में तो लगातर लोअर सर्किट लग रहा है। सिर्फ अडानी ही नहीं एलआईसी (LIC) और कुछ बैंकों के शेयर भी नीचे आए हैं। कुछ सरकारी बैंकों के शेयर 18 फीसदी तक लुढ़क गए हैं।

आइए जानते हैं कि ये कौन से बैंकों के शेयर हैं।

  • सरकारी क्षेत्र के बैंक ऑफ इंडिया का शेयर पिछले एक महीने में 18 फीसदी से अधिक गिर गया है। यह शेयर 24 जनवरी को ₹80.55 पर था। इस शेयर का 52 हफ्ते का उच्च स्तर ₹103.50 और 52 हफ्ते का निम्न स्तर ₹40.40 है। इस बैंक का बीएसई पर मार्केट कैप शुक्रवार को ₹28,745.48 करोड़ था।
  • इंडियन ओवरसीज बैंक का शेयर बीते एक महीने में 17 फीसदी टूट गया है। यह शेयर 24 जनवरी को 29.15 रुपये पर था। शुक्रवार को यह 24.20 रुपये पर बंद हुआ था। इस शेयर का 52 हफ्ते का उच्च स्तर 36.70 रुपये और निम्न स्तर 15.25 रुपये है।
  • यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का शेयर बीते एक महीने में 16.7 फीसदी टूट गया है। यह शेयर एक महीने पहले ₹80 का था, जो शुक्रवार को ₹67.05 पर बंद हुआ है। इसका 52 हफ्ते का उच्च स्तर ₹96.40 और निम्न स्तर ₹33.55 है।
  • सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का शेयर बीते एक महीने में 16.47% टूट गया है। यह शेयर शुक्रवार को ₹25.35 रुपये पर बंद हुआ था।
  • पंजाब एंड सिंध बैंक की बात करें, तो यह शेयर बीते एक महीने में 15.6% टूटा है। यह शुक्रवार को 4.86 फीसदी या ₹1.30 गिरकर ₹25.45 पर बंद हुआ है।

अडानी ग्रुप इस समय साख के संकट से जूझ रहा है। साख बहाली के लिए जरूरी है कि यह समूह एक निष्पक्ष ऑडिट कराकर हिंडनबर्ग के हर निष्कर्ष का बिंदुवार समाधान प्रस्तुत करे और अपनी वित्तीय स्थिति को पारदर्शिता से सबके सामने रखे। लेकिन ऑडिट कराने और हिंडनबर्ग पर मुकदमा करने की बात कह कर अब अडानी ने इन दो महत्वपूर्ण साख बहाली के कदमों पर विराम लगा दिया है।

अब अडानी समूह ने साख बहाली के लिए इस हफ्ते रोड शो करने का कार्यक्रम जारी किया है। खबर है कुछ एशियाई देशों में अडानी ग्रुप इस हफ्ते फिक्स्ड-इनकम इन्वेस्टर रोड शो करेगा। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अरबपति गौतम अडानी का ग्रुप 27 फरवरी को सिंगापुर में रोड शो करेगा। इसके बाद 28 से एक मार्च तक हांगकांग में रोड शो होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अडानी ग्रुप का यह रोड शो निवेशकों को रिझाने के लिए हो रहा है। अडानी समूह चाहता है कि उसके शेयरों में लोगों का भरोसा फिर से पैदा हो। बार्कलेज पीएलसी, बीएनपी परिबा एसए, डीबीएस बैंक लिमिटेड, डॉयचे बैंक एजी, अमीरात एनबीडी कैपिटल, आईएनजी, आईएमआई-इंटेसा सानपोलो एसपीए, एमयूएफजी, मिजुहो, एसएमबीसी निक्को और स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक ने रोड शो के लिए संभावित इन्वेस्टर्स को न्योता भी भेजा है।

सिंगापुर और मॉरीशस जैसे देश टैक्स हैवन देश माने जाते हैं। इन देशों की कई कंपनियां अडानी ग्रुप के शेयरों में निवश करती आई हैं। यहां से अडानी के शेयरों के भाव को सपोर्ट मिलता है। अडानी ग्रुप इन निवेशकों का भरोसा फिर से जीतना चाहता है। इसके लिए यह ग्रुप दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में रोड शो आयोजित कर रहा है।

बिजनेस अखबारों और वेबसाइट्स के अनुसार, “अडानी समूह, ग्लोबल बाजार में, बॉन्ड की साख के लिए, निरंतर प्रयासरत है। स्टॉक मार्केट में जो स्थिति दिख रही है उसमें इतनी जल्दी रिकवरी की उम्मीद नहीं दिख रही है। निवेशक जिन परियोजनाओं के आधार पर अडानी समूह में निवेश कर रहे थे, समूह ने कई परियोजनाओं ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। जिसका असर निवेशकों पर देखने को मिल रहा है।

अब जो फिक्स्ड इनकम इंवेस्टर्स हैं, उसपर कंपनी फोकस कर रही है। फिक्स्ड इनकम इवेस्टर्स वो निवेशक हैं, जिन्होंने अडानी समूह के बॉन्ड खरीद रखे हैं। अडानी समूह इन निवेशकों के घबराहट को कम करना चाहता है। उनका भरोसा जीतने की कोशिश कर रहा है।”

बेचैनी बॉन्ड बाजार में भी है। बॉन्ड निवेशकों को लुभाने के लिए, उनके डर और बेचैनी को खत्म करने के लिए, उनके भऱोसे को जीतने के लिए अडानी ग्रुप ने इस रोड शो योजना को लागू किया है। इसका क्या प्रभाव अडानी समूह की साख और शेयर पर पड़ता है यह भविष्य बताएगा।

इस दौरान कंपनी अपने बॉन्ड निवेशकों के सामने अपनी स्थिति, अपने कैश फ्लो, अपने कर्ज, अपनी प्लानिंग, रेवेन्यू, अपनी परियोजनाओं में आ रहे निवेश आदि की डिटेल साझा कर उनका विश्वास जीतने की कोशिश करेगी। ताकि ये निवेशक समूह के साथ बने रहे। समूह की कोशिश रहेगी कि बॉन्ड निवेशकों का भरोसा बना रहे।

अगर बॉन्ड निवेशकों की घबराहट को अडानी समूह कम कर पाने में सफल रहा तो वो हिंडनबर्ग के इस चोट से उबरने की दिशा में एक और कदम बढ़ा लेगा। फिलहाल तो ऑफशोर शेल कंपनियों से मनी लांड्रिंग कर के धन मंगाने से लेकर, विकिपीडिया Wikipedia के लेखों के साथ छेड़छाड़ करने तक, अडानी समूह अब तक, सबसे घोटालेबाज पूंजीपति घराने के रूप में सामने आ रहा है। शेल कंपनियों में यदि मुंद्रा ड्रग जैसी ड्रग तस्करी का भी पैसा लगा हो तो, आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस हैं)

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