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असम चुनाव: महंत को उनकी पार्टी ने ही कर दिया पैदल, उनकी सीट सहयोगी बीजेपी को सौंपी

गुवाहाटी। छात्रावास से निकलकर सीधे मुख्यमंत्री निवास में पहुंचे प्रफुल्ल कुमार महंत को उनकी पार्टी ने इस बार टिकट नहीं दिया है। असम गण परिषद ने उनकी सीट ब्रहमपुर अपनी साझीदार भारतीय जनता पार्टी के लिए छोड़ दी है। आप को बता दें कि महंत असम गण परिषद के संस्थापक रहे हैं और 1991 से लगातार ब्रहमपुर से ही विधायक बनते रहे हैं। 1985 में वे नौगांव से चुने गए थे। पैंतीस साल से लगातार विधायक और दो बार मुख्यमंत्री रहे दिग्गज नेता को नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर मतभेद के कारण बेटिकट होना पड़ा है। अब प्रश्न है कि महंत उस कांग्रेस के नेतृत्व में बने महागठबंधन की ओर जाएंगे जिसके खिलाफ लगातार संघर्ष करते रहे हैं या फिर असमिया जातीयतावाद का झंडा बुलंद करने नवगठित असम जातीय परिषद के नेतृत्व में बने गठबंधन को मजबूत बनाने का रास्ता चुनेंगे। अगर ऐसा होता है तो असम विधानसभा का यह चुनाव बेहद दिलचस्प हो जाएगा।

धीरे-धीरे एकदम साफ होता जा रहा है कि असम विधानसभा का यह चुनाव “नागरिकता संशोधन अधिनियम”(सीएए) के इर्द-गिर्द होने जा रहा है। जिस दिन यह अधिनियम पारित हुआ, उस दिन असम में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे। केन्द्रीय सुरक्षा बलों के साथ जगह-जगह झड़पें हुईं जिसमें कम से कम छह लोगों की जान गई। राज्य सरकार में शामिल अगप के मंत्रियों ने इस्तीफा भी दे दिया। लेकिन बाद में पता चला कि उसके सांसद वीरेन वैश्य ने संशोधन विधेयक के पक्ष में मतदान किया था। धीरे-धीरे अगप के मंत्रियों की सरकार में वापसी हो गई, लेकिन उसके कई नेता लगातार इस नए कानून के खिलाफ रहे।

नागरिकता कानून के खिलाफ हुए विद्रोह को राजनीतिक ताकत देने की गरज से छात्र-युवाओं की टोली ने एक नई पार्टी का गठन किया जिसका नाम असम जातीय परिषद है और जिसके अध्यक्ष लुरिन ज्योति गोगोई हैं। उसी विद्रोह में शामिल रहने के आरोप में गिरफ्तार अखिल गोगोई लगातार जेल में हैं। हालांकि अखिल पहले से ही सरकारी जमीन पर बसे भूमिहीनों को जमीन के दस्तावेज दिलाने के लिए कृषक मुक्ति संघर्ष वाहिनी के बैनर तले किसानों, मजदूरों के संघर्ष का नेतृत्व करते रहे हैं। अखिल ने भी अपनी राजनीतिक पार्टी राइजर दल (असमिया शब्द राइज का अर्थ आम जनता होता है) का गठन किया है। अब असम जातीय परिषद और राइजर दल के बीच चुनावी समझौता हो गया है। जाहिर है कि इनका मुख्य चुनावी मुद्दा नागरिकता संशोधन अधिनियम है।

बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ छह साल चले आंदोलन का समापन 1985 में जिस असम समझौते से हुआ था, उस पर हस्ताक्षऱ करने वालों में प्रफुल्ल महंत भी थे। वे तब असम छात्र संघ के अध्यक्ष थे। असम के वर्तमान मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल भी उसी आसू के अध्यक्ष रह चुके हैं और बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने में राज्य सरकार की अक्षमता के लिए आईएमडीटी एक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्हीं की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण (एनआरसी) तैयार करने का निर्देश दिया। पर करीब डेढ़ हजार करोड़ रुपए और छह साल का समय खर्च करने के बाद जो दस्तावेज तैयार हुआ, उसे उनकी सरकार ने स्वीकार नहीं किया। इस तरह सारी कवायद बेमतलब हो गई।

इन चुनावों में नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण निश्चित तौर पर मुद्दा बनेगा। इसके साथ ही असम की जातीय पहचान का मुद्दा भी उठेगा। यह तय होगा कि असम तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के साथ जाएगा या क्षेत्रीयतावादी गठबंधन के साथ अपनी पृथक पहचान कायम रखना चाहेगा। ऐसे में प्रफुल्ल कुमार महंत का अगला रुख असम की राजनीति के लिए काफी महत्वपूर्ण हो गया है।

(असम से अमरनाथ झा की रिपोर्ट।)

This post was last modified on March 6, 2021 10:30 pm

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