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नॉर्थ ईस्ट डायरी: असम में बीजेपी की जीत के रास्ते के सबसे बड़े रोड़े बन गए हैं बदरुद्दीन अजमल

ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक यूनाइटेड फ्रंट या एआईडीयूएफ के नेता बदरुद्दीन अजमल ट्विटर पर पिछले दिनों एक वायरल वीडियो में कथित तौर पर “भारत एक इस्लामिक राज्य बन जाएगा” कहते हुए नजर आए थे।

बाद में, विभिन्न तथ्य जांचों ने साबित कर दिया कि इस क्लिप को फर्जी तरीके से तैयार किया गया था और एआईडीयूएफ नेता अजमल ने वास्तव में ऐसी घोषणा कभी नहीं की थी।

असम विधानसभा चुनावों से पहले से ही एक इत्र व्यापारी, एक इस्लामिक हीलर और अब एक प्रभावशाली नेता अजमल लगातार भारतीय जनता पार्टी की आंख की किरकिरी बने हुए हैं। फर्जी वीडियो के वायरल होने की घटना पर उन्होंने कहा कि भाजपा उन पर हमला करके जनता का ध्यान हटाने की कोशिश कर रही थी।

एआईयूडीएफ के साथ कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन में शामिल होने के बाद  अजमल अब राज्य में भाजपा की जीत के लिए एक महत्वपूर्ण रुकावट बन चुके हैं। भगवा पार्टी ने अजमल के सामने “आत्मसमर्पण” करने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि मुस्लिम नेता असम के “दुश्मन” हैं।

केंद्र द्वारा पेश किया गया नया नागरिकता संशोधन अधिनियम असम में एक विवादित विषय है। भाजपा ने राज्य को “अवैध प्रवासियों” से बचाने की कसम खाई है और उसने अजमल को असम में अवैध प्रवासियों का चेहरा बताया है।

भाजपा की रणनीति को अच्छी तरह समझते हुए अजमल का कहना है कि भगवा पार्टी उनका चेहरा दिखा कर सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण कर रही है, ‘मुगल’ कह कर संबोधित कर रही है, और मुस्लिम समुदाय को एक खतरे के रूप में चित्रित कर रही है।

इस बार चुनाव में राज्य में एआईडीयूएफ के प्रभाव को कम करके नहीं आंका जा सकता। 2005 में अजमल द्वारा स्थापित पार्टी ने 2006 के चुनावों में 10 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की, जो 2011 में बढ़कर 18 हुई तो 2016 में घटकर 13 तक पहुंच गई।

लेकिन राज्य में अजमल का प्रभाव उनके व्यवसाय के चलते रेखांकित किया जाता रहा है। उनके पिता के बारे में कहा जाता है कि वे 1950 में मुंबई चले गए थे और अरब के व्यापारियों से मिलकर इत्र बनाने के लिए उनके साथ सहयोग करते थे। अगर लकड़ी का तेल इत्र के लिए प्रमुख कच्चा माल था, जिनमें से कुछ असम के खेतों से प्राप्त होते थे।

उनका ब्रांड अजमल परफ्यूम्स 270 से अधिक दुकानों के साथ पश्चिम एशिया में प्रमुख ब्रांड माना जाता है। हालाँकि अजमल विरासत के बारे में विनम्र प्रतीत होते हैं। उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता कि हमारा कुल राजस्व क्या है। मुझे बताया गया है कि हमारी कंपनियों के राजस्व में कोविड के दौरान भी वृद्धि हुई है। मेरे चार बेटे व्यवसाय में हैं। मैं अपने पांचवें बेटे मोहम्मद अहमद को राजनीति में लाना चाहता हूं।”

परिवार का साम्राज्य ज्यादातर तब तक अस्पष्ट रहा जब तक कि दुबई के उप शासक शेख हमदान बिन राशिद अल मकतूम को कंपनी के एक कार्यक्रम में नहीं देखा गया, जो राजनीतिक गलियारे में उनके प्रभाव का प्रतीक था।

लेकिन अजमल का राज्य की राजनीति में उस समय प्रवेश हुआ जब एक विवादास्पद कानून – अवैध प्रवासियों (ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारण) अधिनियम, 1983 को निरस्त कर दिया गया। यह कानून राज्य में अनिर्दिष्ट प्रवासियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करता था। इससे प्रभावित लोगों की एआईडीयूएफ द्वारा सहायता दी जाती रही है और इससे अजमल राज्य में एक तबके के लिए खलनायक बन गए।

हालांकि वे कहते रहे हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री पद में कोई दिलचस्पी नहीं है और केवल असम के लिए “विकास” चाहते हैं। सीएए के साथ, एक बार फिर से असम में पहचान की राजनीति चरम पर है, और राज्य में अपनी सत्ता बनाए रखने के भाजपा के आक्रामक प्रयासों से बदरुद्दीन अजमल इस चुनाव में एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभरकर सामने आ सकते हैं।

(दिनकर कुमार द सेंटिनल के पूर्व संपादक हैं। और आजकल गुवाहाटी में रहते हैं।)

This post was last modified on April 5, 2021 12:21 pm

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