Sunday, October 24, 2021

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अलापन दिल्ली नहीं जाएंगे, केंद्र ने डाला ट्रिब्यूनल में कैविएट

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कोलकाता। राज्य सरकार के मुख्य सचिव अलापन बंद्योपाध्याय दिल्ली नहीं जाएंगे। राज्य सरकार ने उन्हें रिलीज नहीं करने का फैसला लिया है। इधर शुक्रवार को केंद्र सरकार ने अलापन बंद्योपाध्याय को आदेश दिया था कि वह सोमवार को सुबह दस बजे डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग में रिपोर्ट करें। लिहाजा तलवारें खिंच गई हैं और इस लड़ाई में अलापन मुख्य मुद्दा बन गए हैं। दूसरी तरफ पूर्व नौकरशाहों और सभी राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार के इस कदम की तीखी आलोचना की है।

राजनीतिक दलों ने कहा है कि इस आदेश में पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के पराजय कि खीज़ नजर आती है। पूर्व नौकरशाहों का कहना है कि यह आदेश देश के संघीय ढांचे की भावना के विपरीत है। इसके साथ ही इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का कैविएट दायर करना उसकी प्रति हिंसा की भावना को उजागर करता है। केंद्र सरकार की एडवोकेट अमृता पांडे बताती हैं कि केंद्र सरकार की तरफ से सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट में कैविएट दायर की गई है। यह एक एहतियाती कार्रवाई है ताकि केंद्र सरकार को सुने बगैर कोई आदेश नहीं दिया जाए। इस मुद्दे पर एडवोकेट आशीष चौधरी कहते हैं कि कैविएट दाखिल करने की जरूरत ही क्या थी।

केंद्र सरकार इस तरह का आदेश दे ही सकती है। लेकिन कैविएट दायर करना जाहिर करता है कि कहीं न कहीं मन में खोट तो है। केंद्र सरकार ने इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस कैडर रूल्स 1954 के रूल6 (1)  के तहत यह आदेश जारी किया है। इस कानून में पहले चरण में आपसी सहमति की बात कही गई है तो दूसरे चरण में कहा गया है कि अगर केंद्र और राज्य सरकार एकमत नहीं हो पाते हैं तो केंद्र सरकार का आदेश प्रभावी माना जाएगा। पर यहां तो पहले चरण की कार्रवाई की ही नहीं गई और सीधे दिल्ली से शाम को फरमान जारी कर दिया गया कि अलापन सोमवार को  दिल्ली पहुंच जाएं। इसी मुद्दे पर केंद्र सरकार को झटका लग सकता है और इसीलिए कैविएट दायर की गई है। बहरहाल सोमवार को रिपोर्ट लिखे जाने तक राज्य सरकार या अलापन की तरफ से कोई कानूनी कार्यवाही की पहल नहीं की गई है। इसके अलावा एडवोकेट चौधरी कहते हैं कि इस कैविएट ने राज्य सरकार को हाई कोर्ट में जाने का एक हथियार दे दिया है। राज्य सरकार कह सकती है कि प्रशासनिक आधार पर नहीं बल्कि बदला लेने की कार्रवाई के लिहाज से यह आदेश दिया गया है।

दूसरी तरफ इसे बदले की कार्रवाई बताते हुए पूर्व आईएएस अफसरों के बयान आने लगे हैं। राज्य के पूर्व मुख्य सचिव समर घोष ने कहा है कि केंद्र सरकार का यह आदेश बिल्कुल गलत है। उन्हें पहले तीन माह का एक्सटेंशन दिया गया और फिर इसके उलट आदेश जारी कर दिया गया। यह सवाल भी उठाया है कि 31 मई अलापन के कार्यकाल का अंतिम दिन है तो फिर किस जनहित में उन्हें कुछ घंटों के लिए दिल्ली ज्वाइन करने को कहा गया है। राज्य के पूर्व मुख्य सचिव अर्धेंदु सेन कहते हैं कि यह आदेश वैधानिक नहीं है और इसके पीछे कोई मंशा छिपी हुई है। इसके अलावा प्रोटोकॉल के मुताबिक मुख्य सचिव हमेशा ही मुख्यमंत्री के अधीन होते हैं और इसलिए उन्होंने कोई गलत कार्य नहीं किया किया है।

यहां याद दिला दें कि मुख्य सचिव प्रधानमंत्री की बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ दीघा चले गए थे। पूर्व केंद्रीय अर्थ सचिव सुभाष चंद्र गर्ग कहते हैं कि इससे केंद्र की जोर जबर्दस्ती की मानसिकता का संदेश मिलता है। केंद्र और राज्य के बीच मत विरोध हो सकता है पर इसका अर्थ यह नहीं कि किसी अफसर को इसका शिकार बनाया जाए। पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह कहते हैं कि केंद्र सरकार के पास अधिकार है पर संघीय ढांचे की परंपरा के मुताबिक राज्य सरकार से भी चर्चा की जानी चाहिए थी। अलापन को कुछ विशेष जिम्मेदारियां निभाने के लिए ही एक्सटेंशन दिया गया है।

दूसरी तरफ केंद्र सरकार के इस आदेश का सभी राजनीतिक दलों ने आलोचना की है। सभी का कहना है कि बंगाल के चुनाव में पराजय को भाजपा हजम नहीं कर पा रही है। लोकसभा में विपक्ष व कांग्रेस के नेता अधीर चौधरी कहते हैं कि केंद्र ने अवैधानिक तरीके से कार्य किया है। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने इसे केंद्र की तानाशाही करार दिया है। कांग्रेस के नेता और एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है कि 74 वर्षों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी राज्य के मुख्य सचिव को राज्य सरकार से चर्चा किए बगैर ही तबादला कर दिया गया है।

अब अलापन बंद्योपाध्याय के सामने विकल्प क्या है। एडवोकेट प्रियंका अग्रवाल कहती हैं कि वह इस्तीफा दे सकते हैं या अदालत में भी जा सकते हैं। जबकि नौकरशाही के एक वर्ग का कहना है कि अलापन 31 मई को सेवानिवृत्त किए जाने का आवेदन दे सकते हैं। एक दूसरे वर्ग का कहना है कि इससे जटिलता बढ़ भी सकती है और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली सुविधाएं प्रभावित हो सकती हैं। इसके साथ ही कुछ अफसरों का कहना है कि सर्विस रूल्स के मुताबिक अफसरों को सेवानिवृत्ति से 6 माह पहले उनके गृह राज्य में तैनात किए जाने की परंपरा रही है तो फिर अलापन बंद्योपाध्याय इस सुविधा का फायदा क्यों नहीं उठा सकते हैं।

(कोलकाता से वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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