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मुजफ्फरनगर के 41 में से 40 दंगों के सभी अभियुक्त रिहा, केवल एक मामले में हुई सजा जिसमें आरोपी थे मुस्लिम

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Muzaffarnagar riots front

नई दिल्ली। मुजफ्फरनगर दंगे में तकरीबन सभी आरोपी छूट चुके हैं जिसमें हत्या जैसे संगीन मामलों के कई आरोपी भी शामिल हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक दंगों में 65 लोगों की जानें चली गयी थीं। इनमें 10 हत्या के मामले थे। और अब तक चले मामलों में 41 पर फैसला आ चुका है।

ज्यादातर मामलों में आरोपी गवाहों के पलटने के चलते छूटे हैं। और ज्यादातर गवाह पीड़ितों के रिश्तेदार थे। लेकिन दबाव और डर के आगे उन्हें भी झुकना पड़ा। हत्या के 10 मामलों में कोर्ट ने सभी आरोपियों को छोड़ दिया।

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इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2013 के दौरान हुई इन घटनाओं की सुनवाई जनवरी 2017 से फरवरी 2019 के बीच संपन्न हुई। रिपोर्ट के मुताबिक 2017 से अभी तक कुल 41 मामलों में फैसला आ चुका है। मुसलमानों पर हमले के इन मामलों में शामिल सभी 40 लोग छूट गए।

ये सभी मुकदमे अखिलेश यादव की सरकार के दौरान दर्ज हुए थे और उनकी जांच भी उसी सरकार ने किया था उस पर मुकदमा सपा और बीजेपी दोनों सरकारों के दौरान हुआ। जिस एक मामले में सजा हुई है उसमें अभियुक्त मुसलमान थे। इसी साल 8 फरवरी को सुनाए गए इस फैसले में सात लोगों को आजीवन कारावास की सजा हुई है। जिसमें मुजम्मिल, मुजासिन, फुरकान, नदीम, जनांगीर, अफजल और इकबाल शामिल हैं। इनको 27 अगस्त, 2013 को कवाल गांव में हुए गौरव और सचिन भाइयों की हत्या के मामले में सजा हुई है। गौरतलब है कि इसी घटना के बाद मुजफ्फरनगर में दंगों की शुरुआत हुई थी।

इंडियन एक्सप्रेस ने इस तरह के 10 मामलों की जांच की है। जिसमें उसने कोर्ट रिकार्ड की जांच और शिकायतकर्ताओं से लेकर गवाहों और 10 से ज्यादा सरकार से जुड़े लोगों से बातचीत की है। इसमें एक परिवार के जिंदा जला देने, तीन मित्रों को खेत में खींचकर उन्हें मार देने, एक पिता की तलवारों से हत्या और एक चाचा की पीट-पीट कर हत्या जैसी घटनाएं शामिल हैं। लेकिन इन मामलों में शामिल सभी 53 अभियुक्त छूट गए।

इतना ही नहीं इसी तरह से सामूहिक बलात्कार की चार घटनाओं और दंगे के 26 मामलों में भी हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कानून से जुड़े सरकारी अधिकारियों ने कहा कि इन फैसलों को ऊपरी कोर्ट में चुनौती देने की उनकी कोई योजना नहीं है।

जिले के सरकारी वकील दुष्यंत त्यागी ने बताया कि “हम 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के किसी भी मामले में अपील नहीं करने जा रहे हैं। जिनका अंत रिहाइयों के तौर पर हुआ है। क्योंकि सभी मामलों में अभियोजन पक्ष के सिद्धांत पर खरा उतरता हुआ न देख कोर्ट ने सभी मुख्य गवाहों के पलटने की घोषणा कर दी। आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट गवाहों के बयानों के आधार पर दायर की गयी थी।”

त्यागी के मुताबिक अपनी गवाही से मुकरे सभी गवाहों के खिलाफ सीआरपीसी के सेक्शन 344 के तहत नोटिसें जारी की गयी हैं।

10 हत्याओं के ट्रायल का एक्सप्रेस ने जो जायजा लिया है उसमें निम्न बातें सामने आयी हैं:

-शिकायतकर्ताओं द्वारा 69 लोगों के खिलाफ शिकायत की गयी लेकिन केवल 24 लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाया गया। दूसरे जिन 45 लोगों का मुकदमे में जिक्र किया गया उनका असली शिकायत में नाम तक शामिल नहीं था।  

– हालांकि हर हत्या के एफआईआर में हथियारों का जिक्र किया गया है लेकिन पुलिस ने प्रमाण के तौर पर केवल 5 में ही उन हथियारों को बरामद किया। उदाहरण के लिए 8 सितंबर, 2013 को बुढ़ाना में हुए तीन लोगों अमरोज, मेहरबान औऱ अजमल की हत्या में कोर्ट ने तीन अलग-अलग मामलों में रिहाई के आदेश दिए। एक आरोपी के यहां से पुलिस को हत्या के हथियार के तौर पर बलकट्टी हासिल हुई। लेकिन एक मामले में हथियार कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया। जबकि दूसरे में इसे प्रमाण के तौर पर पेश किया गया लेकिन पुलिस का कहना था कि “उस पर खून का कोई धब्बा नहीं था।” और इसलिए उसने उसे आगे किसी वैज्ञानिक जांच के लिए नहीं भेजा। तीसरे मामले में बरामद हथियार पेश किया गया था लेकिन उसको पाए जाने के मामले में किसी भी पुलिस गवाह से पूछताछ नहीं की गयी।

8 सितंबर, 2013 को फुगाना में हुए असीमुद्दीन और हलीमा जोड़े की हत्या में पुलिस ने जांच और बरामदगी संबंधी प्रमाणों के सिलसिले में दो स्वतंत्र गवाहों के नाम दर्ज किए थे। लेकिन दोनों ने कहा कि उनकी मौजूदगी में किसी भी तरह के हथियार नहीं पाए गए। और उन्हें पुलिस द्वारा एक सादे कागज पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया था। उसी तरह से टिटवई में 8 सितंबर को हुए रोजुद्दीन की हत्या में भी हुआ। स्वतंत्र गवाह ने कहा कि उसकी मौजूदगी में कोई भी हथियार बरामद नहीं हुआ। और उसका हस्ताक्षर लेने से पहले सभी दस्तावेज पुलिस स्टेशन में तैयार किए गए थे।

-मीरापुर में शारिक, टिटवई में रोजुद्दीन और मीरापुर में नदीम की हत्या में अभियोजन पक्ष में पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर को ही गवाह बनाया गया था। लेकिन कोर्ट में डॉक्टरों से केवल दस्तावेजों के मेडिकल जांच को प्रमाणित करने के लिए कहा गया। उनसे मौतों की वजह या फिर किन हथियारों से हत्या हुई है उसके बारे में भी नहीं पूछा गया।

-असीमुद्दीन और हलीमा की हत्या में अभियोजन पक्ष ने पोस्टमार्टम की रिपोर्ट ही नहीं पेश की। जिसमें कोर्ट ने इस बात को चिन्हित किया कि “अभियोजन पक्ष ने केवल शिकायत, एफआईआर, सामान्य डायरी एंट्री और रिकवरी का साइट प्लान पेश किया। अभियोजन पक्ष द्वारा इसके अलावा प्रमाण या फिर कोई भी दस्तावेज नहीं पेश किया गया।”

इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण फुगना में हुई इस्लाम (65) की हत्या है। 8 सितंबर 2013 को हुई इस हत्या की एफआईआर उनके बेटे जरीफ ने दर्ज करायी थी। जिसमें उन्होंने कहा था कि “आरोपी हरपाल, सुनील, ब्रह्म सिंह, श्रीपाल, चस्मवीर, सुमित, कुलदीप और अरविंद धार्मिक नारा लगाते हुए हथियारों के साथ हमारे परिवार पर हमला कर दिए। एक धारदार हथियार से श्रीपाल ने मेरे पिता के सिर पर हमला किया और छह दूसरे उन पर तलवारों के साथ टूट पड़े। उन्होंने घर में आग लगा दी। मेरा भाई पिता को अस्पताल लेकर भागा जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।”

लेकिन ट्रायल के दौरान रिहाई के आदेश के मुताबिक जारिफ ने कोर्ट को बताया कि “मेरे पिता की हत्या हुई थी और शिकायत गुलजार (रिश्तेदार) द्वारा दर्ज करायी गयी थी। मैंने शिकायत पर केवल हस्ताक्षर किया था। कोर्ट में मौजूद आरोपी हत्या में शामिल नहीं थे।” तीन दूसरे गवाहों ने भी यही बात कही कि आरोपी हत्या में नहीं शामिल थे।

पेशे से मजदूर जरीफ ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा कि उसे ट्रायल के दौरान हुई गवाही की तारीख नहीं याद है। कोर्ट के रिकार्ड में उनकी गवाही में दर्ज है कि वह आरोपियों को पहचानने में नाकाम रहे।

लेकिन अपने पिता की हत्या का दिन उसे पूरी तरह से याद है। उसने बताया कि हत्या के कुछ देर बाद ही उनकी अस्पताल में मौत हुई थी। उसने हरपाल, सुनील, ब्रह्म सिंह, श्रीपाल, चस्मवीर, सुमित, कुलदीप और अरविंद को पहचान लिया था। इन सभी अभियुक्तों का नाम एफआईआर में दर्ज है क्योंकि मेरे पिता ने इन सभी को पहचान लिया था।

जरीफ ने बताया कि “सभी मुस्लिम परिवार गांव छोड़कर भाग गए थे केवल हम लोग रुके थे। सरपंच समेत गांव के बड़े हम लोगों को मस्जिद में ले गए और वहां भरोसा दिलाया था कि वो लोग हमारी रक्षा करेंगे। क्योंकि यह वादा एक पूजास्थल पर किया गया था लिहाजा हम लोगों ने उस पर भरोसा किया।”

“लेकिन कुछ ही घंटों में हमें पता चल गया कि परिस्थिति बेहद तनावपूर्ण है। मेरे पिता ने थाना इंचार्ज को फोन किया लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला। उसके बाद हम लोगों ने एक स्थानीय नेता से विनती की उन्होंने कहा कि सेना रास्ते में है। लेकिन उसके बाद बहुत देर हो चुकी थी। उन्हीं लोगों ने जिन्होंने हमें सुरक्षा का भरोसा दिलाया था हमारे पिता पर हमला कर उन्हें मार डाला।”

हालांकि 9 अक्तूबर, 2018 को जज हिमांशु भटनागर के सामने जरीफ ने किसी भी आरोपी को पहचानने से इंकार कर दिया। पूछने पर ऐसा क्यों किया जरीफ ने कहा कि “जो लोग रिहा हुए हैं वो एक वक्त हत्या में शामिल थे। कमजोर होने के चलते हमें समझौता करना पड़ा। अगर हमारे पास क्षमता होती तो हम हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक केस को लड़ते। जब हमारे पास अपने परिवारों का पेट भरने के लिए पैसा नहीं है तो फिर कोर्ट से न्याय मांगने का क्या मतलब है।”

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