Friday, April 19, 2024

मनरेगा पर सरकार का चौतरफा हमला

बेरोजगारी और आर्थिक मंदी के इस दौर में मनरेगा की ग्रामीण भारत में बहुत अहम भूमिका है। मनरेगा ग्रामीण परिवारों को सौ दिन का रोजगार देकर न केवल उनके लिए आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करता है बल्कि नागरिको की खरीद शक्ति में इज़ाफ़ा करके बाजार में रौनक भी लाता है।

मनरेगा के तहत किए जाने वाले ज्यादातर काम भूमि विकास, जल सरंक्षण, कृषि और इससे जुड़े हुए हैं, जिनका कृषि पर सकारात्मक असर पड़ता है। भारत सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण 2022-23 इस बात की पुष्टि करता है कि मनरेगा का प्रति परिवार आय, कृषि उत्पादकता और उत्पादन संबंधी खर्च पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

लेकिन देश की सरकार ज़मीनी हक़ीक़त को दरकिनार कर अपने नवउदारवादी एजेंडे को लागू करने के लिए कटिबद्ध है और नवउदारवाद की नीति मनरेगा को केवल गैरजरूरी ही नहीं मानती बल्कि देश की तथाकथित तरक्की के लिए अड़चन मानती है। इसलिए एक दिन पहले आर्थिक सर्वेक्षण 2022-23 में मनरेगा की अहमियत को रेखांकित करने के बावजूद बजट में मनरेगा पर आवंटन में बड़ी कटौती की गई है।

बीजेपी सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मनरेगा विरोधी रुख किसी से छिपा नहीं है। प्रधानमंत्री तो संसद में खुले तौर पर मनरेगा का मज़ाक उड़ाते हुए इसे केवल यूपीए की विफलताओं का जीता जागता स्मारक के रूप में बनाये रखने की अपनी योजना जाहिर कर चुके हैं। हालांकि ऐसा कहते हुए उन्होंने ‘काम के अधिकार के कानून’ (मनरेगा) की पूरी अवधारणा और महत्व को ही अस्वीकार किया था।

इससे पता चलता है कि बीजेपी के पास ग्रामीण भारत के विकास का कोई रास्ता ही नहीं है। बीजेपी सरकार मोदी जी के कथन को लागू करने के लिए ही काम कर रही है। सैद्धांतिक तौर पर मनरेगा को ख़त्म नहीं किया जा सकता है लेकिन चौतरफा नीतिगत हमले करते हुए इसे केवल ‘स्मारक’ में तब्दील करने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी गई है।

लगातार कम होता बजट

मांग पर आधारित काम उपलब्ध करवाना मनरेगा का एक आधारभूत गुण है। इसके लिए मज़दूरों के पंजीकरण और काम की मांग के आधार पर केंद्र सरकार हर वर्ष बजट में इसके लिए आवंटन करती है। यह कोई साधारण कल्याणकारी योजना नहीं है जिसमे लाभार्थियों की संख्या सिमित और लक्षित होगी। यह तो सार्वभौमिक कानून है।

किसी भी ग्रामीण परिवार का बेरोजगार व्यस्क तयशुदा दिहाड़ी पर अकुशल कामगार के तौर पर इसमें प्रतिवर्ष 100 दिन का काम करने का हक़दार है। केंद्र सरकार का बड़ा हमला है मनरेगा के इसी पहलू को ख़त्म करने पर। और सबके लिए मांग के आधार पर 100 दिन का काम मुहैया करवाने में सबसे बड़ी बाधा है बजट की कमी।

हर वर्ष के बजट में यह साफ़ दीखता है कि यह मनरेगा के लक्ष्य को हासिल करने की जरूरत से कोसों दूर है। पिछले वर्ष ग्रामीण विकास पर संसदीय समिति ने भी मनरेगा के केंद्र सरकार द्वारा कम बजटीय आवंटन के पीछे तर्क पर सवाल उठाया है। वर्ष 2021-22 में सरकार ने मनरेगा के लिए 73 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए, जो वर्ष 2020-21 के संशोधित अनुमान से 34% कम थे।

वर्ष के अंत में अतिरिक्त आवंटन से संशोधित बजट का यह आंकड़ा अंततः बढ़कर 98 हजार करोड़ रुपये हो गया। लेकिन वर्ष 2022-23 के लिए सरकार ने एक बार फिर इस कार्यक्रम के लिए 73 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए थे। प्रत्येक वर्ष आवंटित बजट का लगभग 20% पिछले वर्ष की भुगतान में कमी को पूरा करने में चला जाता है।

लेकिन केंद्र सरकार ने इस साफ़ दिख रही जरूरत को नज़र अंदाज करते हुए वर्ष 2023-24 के लिए केवल 60 हजार करोड़ रुपये आवंटित किये जबकि 2023 के लिए संशोधित अनुमान 89,400 करोड़ रुपये था। अगर हम गौर से देखें तो असल में मनरेगा के लिए बजट लगातार कम हो रहा है।

वित्तीय वर्ष 2009 में मनरेगा के लिए बजट कुल बजट का 3.4 प्रतिशत था जो वर्ष 2023-24 में कम होकर केवल 1.3 प्रतिशत रह गया है। इस अवैज्ञानिक आवंटन का नतीजा यह है कि हर साल अक्टूबर और नवंबर महीने तक राज्यों में आवंटित बजट खत्म हो जाता है, जिससे रोजगार का संकट पैदा हो जाता है| इसका सीधा असर होता है मज़दूरों के काम के दिनों में कटौती और मज़दूरी भुगतान में देरी।

अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार मनरेगा में वर्तमान जॉब कार्ड धारको को 100 दिन का काम मुहैया करने के लिए कम से कम 2.72 लाख करोड़ रुपये के सालाना आवंटन की जरूरत है। 

काम के दिनों में कमी और देरी से भुगतान

कम बजट के चलते मांग बढ़ने के बावजूद मनरेगा मज़दूरों के लिए प्रतिवर्ष काम के दिनों में कमी होती जा रही है। मनरेगा के तहत वर्ष 2021-2022 के लिए औसत कार्य दिवस केवल 49.7 दिन ही थे, यानी 100 दिनों के रोजगार की गारंटी के आधे से भी कम कार्य दिवस। इस वर्ष तो हालात और भी ख़राब है, जब प्रति परिवार को केवल 42 दिन का काम मिला है।

दिसंबर तक केवल 10.488 लाख परिवारों को 100 दिनों का काम प्रदान किया गया है, जो कुल जॉब कार्डों का 0.61 प्रतिशत और सक्रिय जॉब कार्डों का 1 प्रतिशत ही है। मनरेगा मजदूर आम तौर पर ग्रामीण भारत में दिहाड़ी कमाई करने वालों में सबसे वंचित तबकों से आते हैं। मजदूरी के भुगतान में देरी उनके जीवन को अनिश्चितताओं की ओर धकेल रही है। इससे मनरेगा कार्य में शामिल होने के लिए मजदूर हतोत्साहित भी होते हैं।

मनरेगा पोर्टल के अनुसार दिसबंर 2022 तक 29,46,25,614 करोड़ रुपयों की मजदूरी का लेन-देन किया गया और 44,53,536.32 करोड़ रुपयों के हस्तांतरण में देरी हुई। 15 दिनों की देरी के बाद भुगतान की जाने वाली कुल राशि 16,21,94,710 करोड़ रूपये थी। एक प्रावधान है कि यदि भुगतान देर से आता है, तो मजदूर को देरी की अवधि के लिए, प्रति दिन बकाया मजदूरी के 0.05% की दर से ब्याज के साथ मुआवजा दिया जाना चाहिए। लेकिन यह प्रावधान कभी लागू नहीं किया जाता है।

तेलंगाना में देरी से किए गए भुगतान का अनुपात सबसे अधिक है। नवंबर, 2022 तक राज्य में मनरेगा मजदूरी के 33.2 प्रतिशत राशि के भुगतान में देरी हुई है। छत्तीसगढ़ में 23.3 प्रतिशत राशि के भुगतान में देरी हुई। केंद्र सरकार के द्वारा जारी किये गए आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2022 में केंद्र सरकार ने 18 राज्यों को 4700 करोड़ रुपये केवल मज़दूरी के बकाया देने थे।

इसका मतलब पिछले बजट के आवंटन का लगभग आधा हिस्सा मजदूरी केंद्र सरकार ने राज्यों को नहीं दी थी। सबसे अधिक बकाया राशि पश्चिम बंगाल की 2,620.87 करोड़ रुपये है। इसके अलावा उपयोग की जाने वाली सामग्री की लागत के रूप में 2,537.32 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित हैं। 

काम की मांग को कृत्रिम तौर पर कम करने के हथकंडे

मनरेगा के बारे में समाज में कई तरह का दुष्प्रचार होता है जिसके जरिए पंचायतो को काम शुरू करने और मज़दूरों को इसमें काम करने के लिए हतोत्साहित किया जाता है। कम मज़दूरी और मज़दूरी का देरी से मिलना इसमें प्रमुख है।

पिछले साल भी मनरेगा की मज़दूरी में मामूली बढ़ोतरी की गई थी जो मज़दूरों को निराश ही करती है। हालांकि प्रावधान है कि मनरेगा के तहत न्यूनतम मजदूरी राज्य विशेष के खेत मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी से कम नहीं होनी चाहिए। लेकिन कई राज्यों में मनरेगा के तहत अधिसूचित मजदूरी की दरें, राज्यों में खेत मजदूरों के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम हैं।

खेत मजदूरों के लिए मजदूरी की राष्ट्रीय औसत 375 रुपये है, लेकिन मनरेगा के तहत औसत मजदूरी दर इससे कम है। उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश में अधिसूचित मजदूरी दर 257 रूपये है, लेकिन अप्रैल 2022 से दिसंबर 2022 तक मजदूरों को प्राप्त औसत मजदूरी दर इससे कम है। आंध्र प्रदेश में मनरेगा मजदूरों को सबसे अधिक औसत मजदूरी सितंबर के महीने में 238 रुपये और सबसे कम अप्रैल के महीने में 183 रुपये प्राप्त हुई थी।

सामान्यता मनरेगा को केवल भ्रष्टाचार के साधन के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है। हालांकि भ्रष्टाचार से लड़ाई राजनितिक इच्छाशक्ति के बिना नहीं हो सकती। इसे बहाना बनाकर मनरेगा के काम को लागू नहीं होने देने के लिए वातावरण बनाना इसके खिलाफ राजनीतिक समझ का नतीजा है। पिछले कुछ समय में केंद्र सरकार ने इसी मंशा के साथ मनरेगा पर कई हमले किये हैं। 

पिछले अनुभवों से न सीखते हुए केंद्र सरकार ने 1 जनवरी 2023 से मनरेगा में काम कर रहे सभी मज़दूरों की हाज़िरी राष्ट्रीय मोबाइल निगरानी प्रणाली (एनएमएमएस) से अनिवार्य कर दी है। पायलट के तौर पर लागू करने के बाद जब 22 मार्च 2022 को ग्रामीण विकास मंत्रालय की बैठक में इसे पूरे देश में लागू करने का फैसला लिया गया था तो उसी बैठक में विभिन्न तकनीकी समस्याओं, जैसे: हाज़री के लिए विकसित किए गए सर्वर में खराबी, मोबाइल फोन का ऐप से तालमेल न बैठाना और इंटरनेट एक्सेस आदि पर सवाल उठाए गए थे।

मंत्रालय ने इस आपत्तियों और अब तक इस प्रणाली के लागू होने से मज़दूरों को हो रहे नुकसान को नज़रअंदाज करते हुए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाया है। हालांकि मंत्रालय के अपने आंकड़ों के अनुसार ही अनिवार्य तौर पर लागू होने के बावजूद 40 प्रतिशत पंचायतों ने इस पर हाज़िरी रिपोर्ट नहीं की है।

मंत्रालय के अनुसार कुल 269637 ग्राम पंचायतों में से केवल 158390 ने ही ऑनलाइन हाज़िरी रिपोर्ट की है। अभी तक एन०एम०एम०एस० पर 383421 मेट पंजीकृत हुए हैं लेकिन केवल 99687 मोबाइल ही हाज़िरी के लिए प्रयोग किये गए हैं जो केवल 25.9% प्रतिशत है।

इस प्रणाली के कारण मज़दूरों को कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिसका सीधा असर उनको मज़दूरी न मिलने या देरी से मिलने पर होता है। हम जानते हैं कि मनरेगा के तहत काम ‘पीस वर्क’ होता है। इसमें निर्धारित मापदंड के हिसाब से मज़दूर को एक निश्चित काम करना होता है और तकनीकी इंजीनियर काम का आंकलन करके मजदूरी तय करते हैं। जब काम पीस वर्क है, तो दिन में दो बार उपस्थिति दर्ज कराने की क्या जरूरत है?

अभी हाल ही में सरकार ने मनरेगा मज़दूरों पर एक और फैसला थोपा है जिसके तहत मंत्रालय ने अधिसूचना जारी की है कि 1 फरवरी से मनरेगा मज़दूरों को सभी तरह के भुगतान केवल ‘आधार आधारित भुगतान प्रणाली’ (ABPS) से ही किये जायेंगे। इसके आलावा किसी भी तरह से भुगतान पर रोक लगाई गई है।

इससे मज़दूरों को बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ेगा क्योंकि अभी तक केवल 44 प्रतिशत मज़दूर ही एबीपीएस के तहत भुगतान के योग्य हैं और 56% मज़दूर मज़दूरी से महरूम रह जाएंगे। लगभग 14 राज्यों में 50 प्रतिशत मज़दूर एबीपीएस के लिए योग्य नहीं है। महाराष्ट्र जैसे राज्य में 80 प्रतिशत मज़दूरों की एबीपीएस के तहत औपचारिकताएं पूरी नहीं हुई हैं। 

पंचायतों में मनरेगा का काम शुरू करने के लिए एक उच्चतम सीमा तय कर दी गई है। एक पंचायत में एक समय में चलने वाले कामों की संख्या 20 दिन तक सिमित कर दी गई है। इसके चलते पंचायत के काम की रफ़्तार काफी कम हो गई है, जिससे सबको 100 दिन के काम का लक्ष्य हासिल करना नामुनकिन हो गया है।

इस पर कई राज्य सरकारों ने भी आपत्ति जताई थी और राज्य सरकार के पुरजोर विरोध के बाद केरल राज्य में इसमें छूट दी गई थी। इसके आलावा सरकार ने अपनी हठकर्मिता को जारी रखते हुए मनरेगा को विभिन्न जातिगत श्रेणियों- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के अनुसार लागू करने के निर्णय को वापिस नहीं लिया है।

इसके तहत मजदूरों की विभिन्न श्रेणियों के लिए अलग-अलग फंड ट्रांसफर ऑर्डर और अलग श्रम बजट बनाया जा रहा है जिससे मज़दूरी के भुगतान में नई जटिलताएं पैदा हो गई हैं। परिणामस्वरूप मजदूरी के भुगतान में और देरी हो रही है।

यह समझना बहुत जरूरी है कि यह प्रक्रिया मनरेगा के मूल सिद्धांत के खिलाफ है। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि मनरेगा एक सार्वभौमिक और मांग आधारित कार्यक्रम है। आवंटन के साथ जाति वर्गीकरण को जोड़कर इस कानून की अनदेखी की जा रही है।

इससे ग्रामीण भारत में मज़दूरों की जातिगत पहचान मज़बूत हो रही है और अलग अलग जातियों की मज़दूरी में भुगतान में अलग अलग समय लगने से जाति के आधार अलगाव भी बढ़ रहा है जो कानून के उचित और न्यायपूर्ण संचालन के खिलाफ है।

भविष्य में बड़ा खतरा

एक खतरनाक संकेत ग्रामीण विकास मंत्री दे रहे हैं जो मनरेगा पर सरकार के अगले हमले की तरफ इशारा करता है। द हिन्दू अख़बार के अनुसार मंत्री जी ने कहा है कि वह मानते हैं कि संसद में मनरेगा में संशोधन करके मनरेगा मज़दूरी के बजट को केंद्र सरकार द्वारा वहन करने के स्थान पर इसे केंद्र और राज्य सरकारों में 60:40 के अनुपात में बांटना चाहिए।

यह बहुत ही खतरनाक बयान है जिसे केवल मंत्री के दिमाग की उपज नहीं माना जा सकता बल्कि सरकार के खतरनाक उद्देश्य को बेनक़ाब करता है। काफी चर्चा, विमर्श और ग्रामीण भारत की स्तिथि पर कई अध्ययनों के बाद आंदलनों के दबाव में मनरेगा लागू किया गया था।

लोगों की आमदनी में इज़ाफ़ा करके और खेत मज़दूरों की दिहाड़ी में कुछ स्थिरता लाकर मनरेगा ने अपना महत्व सिद्द किया। सामाजिक और आर्थिक तौर पर वंचितों के लिए मनरेगा बिना भेदभाव के सहारा बना है। मनरेगा में अनुसूचित जाति और जनजाति के मजदूरों की भागीदारी, उनकी जनसंख्या के सामान्य प्रतिशत से अधिक है।

वहीं महिलाओं को भी गांव में ही काम करने के मौके दिए गए। वर्ष 2022-23 में कुल कामगारों में लगभग 56% महिलायें थीं। ऐसे कई अध्ययन हैं जिनसे सामने आया है कि लॉकडाउन के समय आय क्षति की 20 से 80 फीसदी की भरपाई मनरेगा ने की है। इसलिए सरकार का मनरेगा के प्रति यह रवैया ग्रामीण भारत के लोगों के जीवन के लिए बहुत खतरनाक परिणाम लाने वाला है।

(विक्रम सिंह अखिल भारतीय कृषि श्रमिक संघ के संयुक्त सचिव हैं)

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