Wednesday, February 8, 2023

इलाहाबाद विश्वविद्यालय: चार सौ गुना फीस वृद्धि के विरोध में 880 दिन से आंदोलन, आमरण अनशन का 98वां दिन

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प्रदीप सिंह
प्रदीप सिंहhttps://janchowk.com
दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

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नई दिल्ली। देश के शैक्षणिक जगत में पूरब का आक्सफोर्ड के नाम से विख्यात इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पिछले दो वर्षों से छात्रसंघ का चुनाव नहीं हुआ है और छात्र संघ भवन पर ताला लगा दिया गया है। विश्वविद्यालय के स्नातक, स्नातकोत्तर और अन्य पाठ्यक्रमों की फीस को लगभग 400 फीसदी तक बढ़ा दिया गया है। छात्र आंदोलन की राह पर हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन मौन है। परिसर में पठन-पाठन का माहौल अस्त-व्यस्त है। और कुलपति परिसर स्थित कार्यालय से नहीं बल्कि अपने आवास से ही विश्वविद्यालय को चला रहीं हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन और जिला प्रशासन उनके रसूख के चलते उनके समक्ष नतमस्तक है।

पिछले तीन महीने से छात्र विश्वविद्यालय परिसर में आमरण अमशन कर रहे हैं तो कुछ छात्रनेता परिसर से बाहर लखनऊ और दिल्ली में सत्ताधीशों से विश्वविद्यालय को बचाने की गुहार लगा रहे हैं। दिल्ली के पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और राजनेताओं से मिलकर छात्रहितों की रक्षा करने की आवाज उठा रहे हैं।

इसी कड़ी में 13 दिसंबर यानी मंगलवार को दिल्ली के प्रेस क्लब में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आए छात्रसंघ संयुक्त छात्र मोर्चा के छात्रों ने एक प्रेस कांफ्रेंस किया। छात्र नेताओं ने बताया कि विश्वविद्यालय में पिछले 880 दिन यानी 21 जुलाई 2020 से आंदोलन चल रहा है। छात्र संघ बहाली और 400 गुना फीस वृद्धि को वापस करने की मांग की जा रही है। लेकिन प्रशासन के कान पर जूं नहीं रेंग रहा है। प्रशासन की हठधर्मिता को देखते हुए छात्र संघ भवन पर पिछले 98 दिन यानी 6 सितंबर, 2022 से छात्रों का आमरण अनशन भी चल रहा है लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से एक भी जिम्मेदार अधिकारी छात्रों से बात करने नहीं आया। विश्वविद्यालय प्रशासन का रवैया तानाशाही वाला है। आमरण अनशन करते हुए अब तक करीब 45 छात्रों की तबियत बिगड़ने से जान बचाने के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था।

प्रेस कांफ्रेस के संबोधित करते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रनेता अजय सिंह यादव ‘सम्राट’ ने कहा कि, “ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एक प्रतिष्ठा रही है। यहां के छात्रसंघ के कई पदाधिकारी देश और प्रदेश की राजनीति में एक मुकाम तक पहुंचे। छात्र राजनीति को भावी राजनीति की नर्सरी कहा जाता है। लेकिन दो साल से छात्रसंघ भंग है। छात्रसंघ की बात तो अलग है प्रशासन ने एक झटके में 400 गुना फीस बढ़ा दिया। अब पूर्वांचल के गरीब किसान, पिछड़ों और दलितों की बात तो छोड़ दीजिए मध्यम परिवारों से आने वाले बच्चे भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ नहीं सकते हैं। छात्रावास की फीस बहुत ज्यादा बढ़ा दिया गया है। छात्रावासों की फीस को बढ़ाकर पेइंग गेस्ट रूम के बराबर कर दिया गया है।”

उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि छात्रों ने कई बार विश्वविद्यालय प्रशासन से फीस वृद्धि को वापस लेने का अनुरोध किया, लेकिन प्रशासन ने छात्रों की बात को अनसुना कर दिया। उन्होंने कहा कि एक लोकतांत्रिक देश में हम लोकतांत्रिक तरीके से अपने शिक्षा के अधिकार को मांग रहे हैं। लेकिन सरकार और प्रशासन हमें शिक्षा से वंचित कर रहा है।

छात्रनेता अजय सिंह यादव ‘सम्राट’ कहते हैं कि, आंदोलन करने का खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है। योगी सरकार और जिला प्रशासन ने हमें डरा-धमका कर आंदोलन से अलग होने का संदेश दिया। इसके बाद प्रयागराज विकास प्राधिकरण के बुलडोजर को मेरे गांव भेजकर घर तुड़वाने की धमकी दी। लेकिन बिना डरे हम अपने हक की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए आज दिल्ली आए हैं। उन्होंने भावुक होकर कहा कि जिस तरह से पुलिस-प्रशासन मेरे पीछे पड़ा है, हो सकता है कि मैं फिर दिल्ली न आ सकूं, लेकिन मैं संघर्ष करता रहूंगा। वह कहते हैं कि प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने के बावजूद पीएचडी में मेरे प्रवेश को रोक दिया गया।

विश्वविद्यालय में एलएलबी के छात्र मुंबस्सिर हसन कहते हैं कि सिर्फ फीस वृद्धि ही नहीं हुई है बल्कि मोदी सरकार ने अल्पसंख्यकों को मिलने वाले मौलाना आजाद छात्रवृत्ति का बजट भी कम कर दिया है। जिससे अब अल्पसंख्यक छात्रों को वजीफा नहीं मिल पा रहा है।

एलएलबी के ही छात्र हरेंद्र यादव ने कहा कि, चार सौ गुना फीसवृद्धि कर कुलपति अपनी अयोग्यता से लोगों का ध्यान हटाना चाहती हैं। दरअसल वह कुलपति बनने के योग्य ही नहीं हैं। इसलिए वह छात्रसंघ को भंग करके और फीस को बढ़ा करके लोगों का ध्यान बांटना चाह रही हैं।

देश-विदेश में अपनी गुणवत्तापरक शिक्षा और अकादमिक योगदान के लिए मशहूर इलाहाबाद विश्वविद्यालय का शैक्षणिक माहौल और साख कई बार सवालों के घेरे में आया। लेकिन हर बार विश्वविद्यालय के कुलपति, प्राध्यापक और छात्रों ने मिलकर उठने वाले हर सवाल का उचित जवाब देकर विश्वविद्यालय की गरिमा पर आंच नहीं आने दिया। लेकिन अब सवाल विश्वविद्यालय पर नहीं बल्कि कुलपति पर है। कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव की नियुक्ति और योग्यता पर सवाल उठ रहे हैं। मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित है। लेकिन उनके प्रभावशाली रसूख के कारण कोई उनका बाल बांका नहीं कर पा रहा है।

कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव की नियुक्ति को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका संख्या 1150/2022 दाखिल किया गया है। याचिका में कहा गया है कि तत्कालीन कुलसचिव ने कूटरचना करके प्रो. संगीता श्रीवास्तव के प्रोफेसर पद पर नियुक्ति संबंधी झूठे एवं गलत दस्तावेज शिक्षा मंत्रालय को भेजा था। इस कूटरचना के संदर्भ में तत्कालीन कुलपति ने शिक्षा मंत्रालय को तत्काल सूचित भी किया था। विश्वविद्यालय में उपलब्ध अभिलेकों के अनुसार संगीता श्रीवास्तव की प्रोफेसर पद पर नियुक्ति तिथि से कुलपति बनने की तिथि तक दस वर्ष नहीं हुए थे, जो किसी कुलपति बनने के लिए आवश्यक होता है।

छात्र राहुल पटेल कहते हैं कि कुलपति विश्वविद्यालय नहीं आती हैं। जिस दिन भी वह परिसर में प्रवेश करती हैं, पूरा विश्वविद्यालय पुलिस छावनी में तब्दील हो जाता है। फीस वृद्धि के विरोध में आंदोलन कर रहे छात्रों ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति के लापता होने का पोस्टर भी जारी किया था। निवेदक के रूप में तीस हजार छात्र लिखा गया था। जारी पोस्टर में लिखा गया था, कि पिछले कई महीने से विश्वविद्यालय के 30 हजार छात्र कुलपति को खोज रहे हैं, पर कहीं दिखाई नहीं दे रहीं। अंतिम बार उन्हें दिल्ली की फ्लाइट लेते हुए देखा गया था।

छात्र नवनीत कहते हैं कि, जिस तरह से अतार्किक तरीके से फीस वृद्धि की गयी है उसे छात्र मानने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने बताया कि सभी कोर्सों में तकरीबन एक हजार रुपये सालाना फीस लगा करती थी जो 4 गुना हो गई है। बीए की फीस 975 से बढ़ाकर 3901 (लैब फीस के साथ 4151 रुपये),  बीएससी की 1125 से बढ़ाकर 4151,  बीकॉम की 975 से बढ़ाकर 3901,  एमए की 1561 से बढ़ाकर 5401 रुपये,  एमएससी की 1861 से बढ़ाकर 5401 रुपये, एमकॉम की 1561 से बढ़ाकर 4901 रुपये,  एलएलबी की 1275 से 4651 रुपये,  एलएलएम की 1561 से बढ़ाकर 4901 रुपये कर दिया गया है। इसी तरह पीएचडी की 501 रुपये से बढ़ाकर 15 हजार 800 कर दिया गया है। 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि, पिछले 110 वर्षों से प्रति माह ट्यूशन फीस 12 रुपये है, चालू बिजली बिलों का भुगतान करने और अन्य रखरखाव के लिए शुल्क बढ़ाया जाना जरूरी था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उसी अनुपात में फीस वृद्धि की गई है जिस अनुपात में अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों की फीस में वृद्धि हुई है। फीस वृद्धि के बाद भी विश्वविद्यालय में कोर्स की फीस तुलनात्मक रूप से अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तुलना में कम है।

दिल्ली प्रेस क्लब में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आए छात्रसंघ संयुक्त संघर्ष समिति की तरफ से आनंद, सिद्धार्थ, गोलू, अंकित कुमार, अतीक अहमद, गौरव, कपिल यादव और राहुल शामिल थे।

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