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भारत की संप्रभुता को ताक पर रखकर अमेरिका से किया गया ‘फाउंडेशनल एग्रीमेंट’

3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी चुनाव से ठीक एक सप्ताह पहले 26-27 अक्तूबर को राजधानी दिल्ली के हैदराबाद हाउस में भारत और अमेरिका के बीच ‘टू प्लस टू’ वार्ता की तीसरी कड़ी के तहत दो मंत्री स्तर का समझौता संपन्न हुआ। तीसरे ‘टू प्लस टू’ वार्ता समझौता में अमेरिकी पक्ष की अगुआई विदेश मंत्री माइक पोंपियो और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर ने की। जबकि विदेश मंत्री एस जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में भारतीय दल ने हिस्सा लिया।

दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों की सोमवार को अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें हुई थीं जिसमें रणनीतिक सहयोग की भावी रूपरेखा पर चर्चा हुई थी। ‘टू प्लस टू’ वार्ता तकरीबन तीन घंटे चली। इसके बाद उक्त चारों नेताओं की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अलग से एक बैठक हुई। इस विशेष बैठक में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और नई दिल्ली में अमेरिकी राजदूत केन जस्टर भी शामिल हुए थे।

तीसरे ‘टू प्लस टू’ वार्ता समझौता में ‘बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट’ (BECA) पर दस्तखत किया गया। कहा जा रहा है कि इससे दोनों देशों के बीच जियो-स्पेशल यानी अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग बढ़ेगा। BECA के तहत भारत को यह मंजूरी मिल सकेगी कि वह दुश्मन पर हमले के लिए क्रूज या फिर मिसाइल का प्रयोग अगर करता है तो अमेरिका के जियो मैप का प्रयोग कर सकेगा।

BECA पर हस्ताक्षर के बाद भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने प्रेस कान्फ्रेंस में कहा, “भारत और अमेरिका के बीच सैन्य कोऑपरेशन बढ़ रहा है। समुद्री क्षेत्र में सहयोग पर चर्चा हुई है। डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भर भारत हमारे अमेरिका के साथ सहयोग के केंद्र में है। दोनों देशों के बीच व्यापार और तकनीक शेयर की जाएगी। हम सभी देशों की स्वतंत्रता, शांति और संप्रभुता के समर्थक हैं।” जबकि भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मीडिया से कहा, “अमेरिका के साथ ग्लोबल स्ट्रैट्जिक पार्टनरशिप पर बात हुई। साइंस एंड टेक्नोलॉजी में कोऑपरेशन की बातचीत हुई है। भारत और अमेरिका अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए तैयार हैं। दोनों ही देशों ने इस बात को माना है कि क्रॉस बॉर्डर टेररिज्म को स्वीकार नहीं किया जाएगा।”

ये तो रही भारत की बात पर आखिर यूएसए में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से ठीक एक सप्ताह पहले ट्रंप सरकार के दो मंत्री भारत दौरे पर क्या हासिल करने आए थे। और क्या लेकर गए इसकी विस्तृत चर्चा आगे।

“टू प्लस टू” क्या आफ़त है

सबसे पहले जानते हैं कि ‘टू प्लस टू’ है क्या बला। दरअसल ‘टू प्लस टू वार्ता’ एक ऐसी मंत्री स्तरीय वार्ता होती है जो दो देशों के दो मंत्रालयों के बीच आयोजित की जाती है। ‘टू प्लस टू’ वार्ता बैठक दरअसल भारत और अमेरिका के बीच सुरक्षा, रक्षा और रणनीतिक साझेदारी की समीक्षा पर ‘फाउंडेशनल एग्रीमेंट’ की दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक मंच प्रदान करता है।

जून, 2017 में व्हाइट हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच तय हुआ था कि ‘टू प्लस टू’ वार्ता साल में दो बार होगी। अभी तक दो बार यह बातचीत हुई है। इसके तहत तीन बैठकों का दौर चलता है। पहले दोनों देशों के विदेश व रक्षा मंत्रियों की अलग-अलग बैठक होती है। इसके बाद एक संयुक्त बैठक होती है।

भारत और अमेरिका के बीच यह तीसरी ‘टू प्लस टू वार्ता’ थी। पहली वार्ता 2018 में नई दिल्ली में आयोजित की गयी थी और दूसरी, पिछले साल वाशिंगटन डीसी में। पिछले तीन ‘रणनीतिक’ समझौतों पर दोनों पक्षों ने हस्ताक्षर किए थे। अगस्त 2016 का लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA), सितंबर 2018 का संचार संगतता और सुरक्षा समझौता (COMCASA) और दिसंबर 2019 का औद्योगिक सुरक्षा समझौता (ISA) था। जिसे 2002 में दोनों देशों द्वारा हस्ताक्षरित सामान्य सुरक्षा समझौते (GSOMIA) के जनरल सिक्योरिटी के हिस्से के रूप में जाना जाता है।

यूएसए ने इसे भारत-विशिष्ट बनाने के लिए मूल नाम लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट (LSA) को बदलकर इसका नाम CISMOA (कम्युनिकेशन इंटेरोपेराबिलिटी एंड सिक्योरिटी मेमोरैंडम ऑफ एग्रीमेंट) का इसी तरह COMCASA में संशोधन किया गया था।

भारत और अमेरिका के बीच 6 सितम्बर, 2018 को नई दिल्ली में संपन्न हुए पहले ‘टू प्लस टू’ आयोजन बैठक में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भारत की ओर से अमेरिका की अफगान नीति का समर्थन किया था। एनएसजी सदस्यता, अफगान नीति, रक्षा और सुरक्षा पर चर्चा के साथ ही दोनों देशों के बीच अहम सुरक्षा समझौते COMCASA पर हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते के तहत अमेरिका संवेदनशील सुरक्षा तकनीकों को भारत को बेच सकेगा।

18 दिसंबर, 2019 को भारत और अमेरिका के विदेश और रक्षा मंत्रियों के बीच वाशिंगटन में दूसरा ‘टू प्लस टू वार्ता’ संपन्न हुआ। इस वार्ता में एक तरफ जहां हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संबंध प्रगाढ़ बनाने को लेकर स्पष्टता देखी गई वहीं अमेरिका की निजी क्षेत्र की रक्षा कंपनियों द्वारा भारत में अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों के निर्माण की राह में एक बड़ी अड़चन समाप्त हो गई है। दोनों देशों ने इसके लिये ‘इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी एनेक्स’ नामक समझौते को मंज़ूरी दी। रक्षा प्रौद्योगिकी और व्यापार पहल कार्यक्रम के तहत रक्षा व्यापार के क्षेत्र में निष्पादित किए जाने वाले प्राथमिकता पहलों की पहचान की गई। भारत और अमेरिका की तीनों सेनाओं के बीच नवंबर 2019 में ‘टाइगर ट्राइंफ’ नामक युद्धाभ्यास का आयोजन किया गया जिसे वार्षिक रूप से आयोजित किए जाने पर सहमति बनी थी।

फाउंडेशनल एग्रीमेंट क्या है

फाउंडेशनल एग्रीमेंट अमेरिका उन देशों के साथ साइन करता है जिनके साथ इसके घनिष्ठ सैन्य संबंध हैं। जिनके पास अधिकाधिक कॉमन ग्राउंड है, इसका मतलब है कि वे बुनियादी मानकों का निर्माण करते हैं और सामान्य मानकों और प्रणालियों का निर्माण करके सैन्य बलों के बीच पारस्परिकता को बढ़ावा देते हैं। इसके तहत उन्हें अमेरिका द्वारा महत्वपूर्ण तकनीकी की बिक्री और हस्तांतरण भी किया जाता हैं, यानि इस समझौते के तहत पार्टनर देश के पास एक मजबूत वाणिज्यिक तत्व है जो स्पष्ट रूप से दुनिया के सबसे बड़े हथियार निर्यातक अमेरिका को लाभ पहुंचाता है।

भारत के लिए फिर से अनुकूलित किया गया। BECA भी भारत के साथ संवेदनशील डेटा के साझाकरण की सुविधा प्रदान करेगा और मिलिट्री इन्फ्रास्ट्रक्टर जिसमें रसद सहयोग और दोबारा ईंधन भरना भी शामिल है के नाम पर दोनो देशों को पहुंच स्थापित करेगा। यह अतिरिक्त रूप से उन्हें रक्षा से संबंधित मुद्दों के लिए उपयोगी भू-स्थानिक जानकारी और खुफिया जानकारी साझा करने में सक्षम बनाता है, और अमेरिका को उपग्रह और अन्य सेंसर डेटा साझा करने की अनुमति देता है जो भारतीय सेना की लक्ष्यीकरण और नेविगेशन क्षमताओं को बेहतर बनाने में मदद करेगा, उदाहरण के लिए, भारतीय मिसाइलों को अधिक सटीक बनाने में मददगार साबित होगा।

LEMOA भारत और अमेरिका की फौज को ठहरने, ईंधन भरने, मरम्मत या रसद भरने के लिए बंदरगाहों और नौसैनिक अड्डों तक पहुंचने में सक्षम बनाता है। एक सहायक वाणिज्यिक शिपिंग सूचना समझौता (सपोर्टिव कामर्शियल शिपिंग इनफर्मेशन एग्रीमेंट), उनके नौसेनाओं को उनके क्षेत्रों की रक्षा करने और वैश्विक वाणिज्य को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने के लिए मिलकर काम करने में मदद करता है।

अमेरिका द्वारा भारत को अत्यधिक संवेदनशील संचार सुरक्षा उपकरणों और रियल-टाइम ऑपरेशनल इनफार्मेशन कोड हस्तांतरण करने के लिए COMCASA एक कानूनी ढांचा प्रदान करता है। यह भारत को अमेरिकी खुफिया के बड़े डेटा बेस तक पहुंच प्रदान करता है, जिसमें रीयल-टाइम इमेजरी, साथ ही साथ हाई-एंड मिलिट्री प्लेटफॉर्म को सज्जित करने वाली उच्च-कूटयुक्त संचार प्रणाली, जैसे कि C-130J, सुपर हरक्यूलिस, C-17  ग्लोबमास्टर और P8I पोसिडॉन, अमेरिका भारत को बेच सकता है । आईएसए अमेरिका और भारत की निजी संस्थाओं के बीच वर्गीकृत प्रौद्योगिकी और सूचना के हस्तांतरण की अनुमति देता है।

फाउंडेशनल एग्रीमेंट के नफ़ा नुकसान

COMCASA से जुड़ी जो सबसे बड़ी चिंता है वो ये है कि यह अमेरिकी निरीक्षण के लिए भारत के सैन्य ठिकानों को खोलता है। हालांकि इसका विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। लेकिन दक्षिण कोरिया के साथ अमेरिका द्वारा भिन्न CISMOA साइन किया गया है, उसके तहत अमेरिकी कर्मियों द्वारा विशेष रूप से अमेरिकी उपकरणों के रखरखाव और मरम्मत का काम शामिल है। कह सकते हैं कि इस समझौते के तहत भागीदार देशों को उनकी रक्षा सुविधाओं को अमेरिका के सामने उघाड़ने के लिए बाध्य किया जाता है।

भारत में जो सैन्य ठिकाने हैं, उनमें उच्च तकनीक वाली सैन्य संपत्तियां हैं जो कि विभिन्न देशों से प्राप्त होती हैं, जिनमें से कई अमेरिका के अनुकूल नहीं होंगी। जैसे कि, भारत की लगभग 60 प्रतिशत सैन्य हार्डवेयर की आपूर्ति रूस द्वारा की गई है, जिसमें भारतीय नौसेना को लीज पर अकुला श्रेणी की परमाणु-संचालित पनडुब्बी भी शामिल है।

भारत और अमेरिका के बीच हुआ ये कथित फाउंडेशनल एग्रीमेंट पूर्व में अमेरिका और दूसरे नॉन-अलॉइन पार्टनर्स के बीच संपन्न हुए एग्रीमेंट से यकीनन ही अलग नहीं है। जिसे भारत द्वारा अपनी संप्रभुता को होने वाले नुकसान के बारे में चिंता किए बिना ही साइन कर दिया गया है।

यह भी कहा गया कि रसद आपूर्ति, संचार सुरक्षा प्रणाली और भू-स्थानिक डेटा जैसे वस्तुओं और प्रणालियों की आवश्यकता के बिना भी अमेरिका द्वारा भारत को हस्तांतरण के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करना है। यह एग्रीमेंट हस्ताक्षरकर्ता देश के बनिस्बत अमेरिका के लिए ज़्यादा फायदेमंद होता है।

इस तरह के समझौतों में निहित पकड़ यह है कि जैसे-जैसे वे हस्ताक्षरकर्ता देशों की अमेरिकी प्रौद्योगिकी तक पहुंच बढ़ाते हैं, वे दंडात्मक निहितार्थ के साथ उन्हें अमेरिकी कानूनी प्रणाली में असंगत रूप से जकड़ते हैं।

सबसे अच्छे रीजनल क्षेत्र में भारतीय नौसेना और वायुसेना के एओआर (जिम्मेदारी का क्षेत्र) के साथ और इसके ठीक उलट यूएसए का वैश्विक विस्तार होगा, कह सकते हैं कि LEMOA तार्किक रूप से अमेरिकी सेना के लिए लाभकारी होगा। भारतीय बेसिंग अमेरिकी बलों को आपूर्ति, स्पेयर पार्ट्स, कर्विस और ईंधन भरने का उपयोग करने की अनुमति देगा।

लड़ाकू हथियारों की बिक्री फांउडेशनल एग्रीमेंट का अहम हिस्सा है

अमेरिका द्वारा लड़ाकू हथियारों की बिक्री इन ‘फाउंडेशनल एग्रीमेंट’ का एक अहम हिस्सा है। और पारस्परिकता को आसान बनाने के लिए पार्टनर देश की रक्षा प्रणालियों को “मानकीकृत” करके पार्टनर देशों को सैन्य हस्तांतरण को बढ़ावा देना चाहते हैं।

टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह बात कई अमेरिकी अधिकारियों द्वारा व्यक्त की गयी है। आर. क्लार्क कूपर, सहायक सचिव, राजनीतिक-सैन्य (पीएम) मामलों के ब्यूरो ने 5 अक्तूबर को ‘ग्रेट पावर कम्पटीशन ऑब्जेक्टिव्स के साथ इंडो-पैसिफिक में अलाइनिंग आर्म्स सेल्स’ पर बोलते हुए कहा कि “चूंकि यूएसए के पार्टनर और सहयोगी अपने दम पर चीन के साथ खड़े होने की उम्मीद नहीं कर सकते, इसलिए उनके साथ एक पारस्परिकता नेटवर्क बनाना ज़रूरी था, ताकि हथियारों की बिक्री और सुरक्षा सहायता प्रक्रियाओं के माध्यम से उनकी सुरक्षा क्षमताओं को बढ़ाया जा सके।”

रक्षा निर्यात में अमेरिकी एकाधिकार की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि “चीन और रूस जैसे अमेरिका विरोधी हथियारों की बिक्री के जरिए विदेश में अपना प्रभाव बढ़ाने और अमेरिकी सुरक्षा साझेदारी को खत्म करने की रणनीति अपना रहे हैं। रूस और पीआरसी भी साझेदारों की संप्रभुता और अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीतियों के लिए अपने कथित सम्मान को टालना पसंद करते हैं,  साथ ही अमेरिका की पार्टनर देशों के मानवाधिकार की सतत चिंता और अमेरिकी सैन्य उपकरणों के जिम्मेदारी पूर्वक अंत्य-उपयोग के विपरीत है।”

कूपर के अनुसार,  निःसंदेह यूएसए सुरक्षा के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा प्रदाता था, अनुदान सुरक्षा सहायता का सबसे बड़ा प्रदाता, प्रति वर्ष $ 15 बिलियन से अधिक का रक्षा निर्यात करने वाला रक्षा उपकरणों का अब तक का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत। जो कि रूस के लगभग दो गुना और चीन की तुलना में कई गुना अधिक था।

साल 2008 में अमेरिका से लगभग शून्य खरीदारी करने वाला भारत साल 2020 तक $20 बिलियन का अमेरिकी हथियारों व रक्षा आयात करने वाला सबसे बड़ा आयातक बन चुका है। यहां ये याद रखना होगा कि इस समय भारत और यूएसए दोनों ही देशों में धुर दक्षिणपंथी विचारधारा सत्ता में है। वहीं साल 2015 से 2019 यानि महज पांच साल में भारत के सबसे बड़े हथियार प्रदाता रूस द्वारा भारत को किया जाने वाला रक्षा निर्यात 72 से घटकर 56 प्रतिशत पर आ गया है।

पिछले 15 सालों के दौरान भारत ने सी-17 ग्लोबमास्टरर्स और सी-130जे सुपर हरक्यूलिस स्पेशल ऑपरेशन ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट समेत करीब 20 बिलियन डॉलर की रक्षा खरीद की है। इसके अलावा हेलिकॉप्टर के मामले में भी अमेरिकी चिनूक और अपाचे की खरीद सशस्त्र बलों के लिए की गई है। सेना अमेरिकी अल्ट्रा लाइट हॉवित्जर का भी इस्तेमाल कर रही है। नौसेना ने हाल ही में अमेरिकी एमएच-60 रोमियो एंटी-सबमरीन युद्धक बहुराष्ट्रीय हेलिकॉप्टरों को अपनी जरूरतों के लिए चुना है। सूत्रों के मुताबिक भारत अमेरिका से MQ-9 B ड्रोन खरीद रहा है। परस्पर समझौते के बाद भारत अंतरिक्ष के डाटा का प्रयोग दुश्मन के अड्डों पर हमला करने के लिए कर सकेगा। भारत और अमेरिका के बीच पहले ही तीन फाउंडेशनल एग्रीमेंट हो चुके हैं। इन एग्रीमेंट के तहत दोनों देश पहले से ही एक-दूसरे के मिलिट्री संस्थानों का प्रयोग रि-फ्यूलिंग और आपूर्ति के लिए करने में सक्षम हैं। इसके अलावा कम्युानिकेशन के समझौतों के बाद दोनों देश आपस में जमीन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य जानकारियों को साझा कर रहे हैं।

क्या ‘Quad’ का सदस्य बनेगा भारत

अमेरिकी रक्षा मंत्री मॉर्क एस्पर ने ‘टू प्लस टू’ वार्ता में BECA पर हस्ताक्षर के बाद कहा, “आने वाले दिनों में ऑस्ट्रेलिया, जापान के साथ मालाबार पर हम एक्सरसाइज में शामिल होंगे। डिफेंस एग्रीमेंट के तहत जिओ स्पेस इन्फॉर्मेशन शेयरिंग करेंगे। डिफेंस टैक्नोलॉजी कोऑपरेशन के तहत हेलिकॉप्टर, फाइटर जेट पर चर्चा हुई।”

वहीं अमेरिकी विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और भारत के बीच सीमा विवाद ज़्यादा खराब होने से भारत यूएसए-जापान-आस्ट्रेलिया के क्षेत्रीय पार्टनरशिप जिसे ‘चतुर्भुजीय सुरक्षा संवाद’ या ‘Quad’ कहते हैं के नजदीक आएगा।

बता दें कि ‘Quad’ फोरम को साल 2007 में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे द्वारा प्रस्तावित किया गया था। तब शिंजो आबे ने इसे एशिया का ‘आर्क ऑफ डेमोक्रेसी’ कहा था।     

‘Quad’ को लेकर चीन ने इस क्षेत्र में अपने प्रभुत्व के लिए एक ख़तरे के तौर पर रेखांकित करते हुए कहा था, “क्वाड और कुछ नहीं चीन के हितों के खिलाफ़ संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा ‘नाटो’ का एशियाई वर्जन बनाने का प्रयास है।”

यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ पीस में एशिया कार्यक्रम के वरिष्ठ सलाहकार विक्रम जे सिंह भारत-चीन सीमा के हालात पर टिप्पणी करते हुए न्यूयार्क टाइम्स से कहते हैं – कोई भी पीछे नहीं हट रहा है, और यही स्थिति सर्दियों में भी बनी रहने वाली है। अब आपको एक स्थिति मिल गई है जहां सामरिक स्तर पर आपको और खराब स्थिति मिलने वाली है।

संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच संबंध कभी भी अच्छे नहीं रहे। लेकिन लद्दाख क्राइसिस के चलते संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के आपसी संबंध तेजी से बदले हैं। चीन पर बढ़ते भारत के फोकस को अमेरिकी राजनयिक संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए अच्छा मानते हैं। चीन के खिलाफ यूएसए और भारत की रणनीतिक साझेदारी चीन के बढ़ते प्रभाव को न्यूट्रल करके एशिया में शक्ति संतुलन स्थापित करेगा।

भारत और चीन के बीच बिगड़े संबंध का फ़ायदा उठाते हुए यूएसए ने भारत के साथ रणनीतिक समझौता करके भारत के रास्ते चीन को उसके घर में घेरना चाहता है। यदि भारत और चीन के संबंध न बिगड़े होते तो शायद भारत-अमेरिका का ये समझौता न होता। जैसी की ख़बर है चीन ने भारत के एक हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर अपनी सेना तैनात कर रखा है। और भारत के प्रधानमंत्री का बयान है कि न कोई घुसा है, न घुस आया है न ही हमारी एक भी इंच ज़मीन पर चीन का कब्ज़ा है।   

‘अमेरिकी राष्ट्रवाद’ के बूते चुनाव जीतने के लिए चीन के रूप में एक दुश्मन चाहिए ट्रंप को

“टू प्लस टू” वार्ता के बाद प्रेस कांन्फ्रेंस में अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा- “ दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। आज हम वार मेमोरियल गए थे। यहां देश के लिए जान गंवाने वाले जवानों के साथ उन 20 जवानों को भी श्रद्धांजलि दी, जिन्हें PLA ने मारा था। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी लोकतंत्र की समर्थक नहीं है। चीन लोकतंत्र, कानून, पारदर्शिता का दोस्त नहीं है और ये दुनिया देख रही है। हमें खुशी है कि भारत और अमेरिका केवल चीन ही नहीं, हर खतरे के खिलाफ आपसी सहयोग को मजबूत करने के लिए कदम उठा रहे हैं।”

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में हो रहे राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनज़र राष्ट्रपति और रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप चीन को यूएसए के दुश्मन के रूप में अमेरिकी मतदाताओं के दिमागों में स्थापित करने की राजनीति के चलते अमेरिकी चुनाव का पूरा फोकस चीन पर शिफ्ट हो गया है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने पिछले कुछ महीनों से चीन के खिलाफ़ आर्थिक, राजनीतिक, और कूटनीतिक कार्रवाइयों का एक पूरा सिलसिला ही बना डाला है। कोविड-19 के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराने से लेकर हांगकांग में चीन की सरकार के खिलाफ हो रहे विरोध को खत्म करने, उइघुर मुस्लिम समुदाय का मानवाधिकार हनन, अनुचित व्यापार प्रक्रियाओं और दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रामक रवैये के खिलाफ़ डोनाल्ड ट्रंप का हस्तक्षेप करना शामिल है।

जाहिर है डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी (पूंजीवाद+फासीवाद) ‘चीन’ और ‘वामपंथ’ के रूप में अपने लिए एक म्युचुअल दुश्मन तैयार कर रहे हैं। जिसका राजनीतिक इस्तेमाल ट्रंप अभी चुनाव में कर रहे हैं और नरेंद्र मोदी आने वाले समय में करेंगे। लेकिन चीन को सबक सिखाने के लिए भारत ने जिस शर्त पर यूएसए से समझौता किया और उसे एशिया में पैर जमाने के लिए अपनी ज़मीन मुहैया करवाने का काम किया है वो बेहद ख़तरनाक है। इतिहास गवाह है दो पड़ोसियों के बीच झगड़े का फायदा उठाते हुए अमेरिका ने जिन जिन क्षेत्रों में कदम रखा है वहां आज तक हालात सामान्य नहीं हुए हैं। जाहिर अमेरिका को भली भांति मालूम है कि चीन-भारत के संबंध सुधरने की स्थिति में यूएसए भारत से दूर होता जाएगा।

भारतीय मीडिया में भारत के हासिल का ढिंढोरा पीटा, अमेरिका के हासिल का नहीं 

भारत की कथित मेनस्ट्रीम मीडिया जिसे गोदी मीडिया भी कहा जाता है ने एकतरफा रिपोर्टिंग करते हुए भारत के ‘टू प्लस टू’ से हासिल को लिखा है। इससे यूएसए को क्या हासिल हुआ ये कहीं नहीं है।

बावजूद इसके अमेरिकी समाज में खुलेपन के, जहां सभी आधिकारिक फैसले और नीतियां सार्वजनिक की जाती हैं, ‘टू प्लस टू’ के तहत हुए इन ‘फाउंडेशनल एग्रीमेंट’ को भारत के मोदी सरकार के इशारे पर “गैर-सार्वजनिक दस्तावेज” का ठप्पा मारकर गोपनीयता की पर्देदारी कर दी गई, जो कि सरकारी जानकारी को संसद और जनता को साझा करने से रोकता है। इससे यह सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या समझौता किया गया दो देशों के बीच जो कि सार्वजनिक जांच से परे है। इससे इस बात को बल मिलता है कि ये जो मूलभूत समझौता हुआ है वो भारत के हित में नहीं है, और देश किसी अपरिवर्तनशील स्वीकृति में फँस सकता है।

दोनों ही देशों के लोगों को यह जानने का अधिकार है कि उनकी सरकारें किसी समझौते में किस बात पर सहमत हुई हैं।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on November 1, 2020 7:52 pm

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