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कल्पना चावला के शोक को भी मीडिया ने बनाया था इवेंट

चंद्रयान मिशन 2 के साथ रचे गए मेलोड्रामा ने मुझे नासा के कॉलंबिया शटल हादसे की याद दिला दी है। भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला और उनके छह साथियों की मौत को भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इवेन्ट मे तब्दील कर दिया था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस वीभत्स आचरण को बिल्कुल नज़दीक से देखने का यह मेरे लिए पहला मौक़ा था। क़रीब 16 साल में मीडिया अपने पतन की सारी हदें तोड़ चुका है। टीआरपी के लिए निर्लज्जता रचने वाला यह मीडिया अगर यही काम अपनी नियंत्रक राज्य सत्ता के इशारे पर करे या उसे ख़ुश करने के लिए करे तो और ज्यादा खराब दृश्य ही पैदा होंगे।

नासा का STS 107 मिशन सफलता के साथ संपन्न होने ही वाला था कि इस मिशन से जुड़ा अंतरिक्षयान कॉलंबिया 1 फरवरी 2003 को धरती के वायुंमंडल में प्रवेश करते हुए टूटकर बिखर गया था। इस मिशन के सात सदस्यीय दल में शामिल कल्पना चावला मूलत: भारत के हरियाणा राज्य के करनाल शहर की रहने वाली थीं। `टीआरपी के लिए कुछ भी करेगा` चरित्र वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक हिंदी चैनल ने उस शाम करनाल के सेक्टर-6 स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल में अपनी ओबी वैन भेजकर फेक जश्न रच रखा था।

कल्पना की शुरुआती शिक्षा इस स्कूल की मॉडल टाउन स्थित विंग में हुई थी। नासा से जुड़ने और एक सफल अंतरिक्ष यात्रा करने के बाद भी वे अपने इस स्कूल को भूली नहीं थीं। उनके प्रयास से इस स्कूल की दो छात्राओं को हर साल नासा में भ्रमण के लिए बुलाया जाता था। नासा जा चुकी ऐसी एक छात्रा और स्कूल की कुछ अन्य छात्राओं व कुछ अध्यापकों को मैनेज करके यह चैनल `कल्पना चावला के शहर करनाल में जश्न का माहौल` लाइव कर रहा था। इसके लिए चैनल ने आतिशबाजी या फूलझड़ी वगैराह भी मैनेज कर रखी थी। हकीकत यह थी कि शहर को इस अंतरिक्ष यात्रा से कोई लेना-देना नहीं था और वह अपने राज़मर्रा में व्यस्त था।

`दैनिक जागरण` के हमारे मित्र भी इस चैनल प्रोजेक्टेड उत्सव के फोटो वगैराह कर चुके थे। मैं अमर उजाला के करनाल दफ्तर में बैठा कीबोर्ड पीट रहा था कि नोएडा से समाचार संपादक ने फोन करके कल्पना चावला के अंतरिक्ष यान हादसे की ख़बर दी। उन्होंने कहा कि करनाल शहर में सन्नाटा छा गया है। शहर के लोग कल्पना चावला के स्कूल में इकट्ठा हो रहे हैं। उन्हें यह सब टीवी चैनल बता रहा था। टैगोर स्कूल से लाइव कर रहे चैनल ने तुरंत `शहर में जश्न` को `शहर में शोक` में तब्दील कर दिया था। दूसरे चैनल भी चंडीगढ़ और दिल्ली से अपनी ओबी वैन्स करनाल की तरफ़ रवाना कर चुके थे। हमारे पास संसाधन नहीं के बराबर थे, हमारी डेडलाइन की समय सीमा भी बहुत कम थी और सेक्टर 6 का टैगोर स्कूल दूर था। सबसे बुरा यह कि स्कूटर ने स्टार्ट होने से इंकार कर दिया। ऐसे में प्रतिद्वंद्वी अखबार दैनिक जागरण के तत्कालीन रिपोर्टर राजकुमार प्रिंस को रिक्वेस्ट कर उन्हें टैगोर स्कूल से अपने पास आने के लिए मजबूर किया। रात में उनके साथ टैगोर स्कूल पहुंचा तो वहां के `शोक` के कुछ दृश्य विचलित कर देने वाले थे।

पीएम मोदी और इसरो चीफ सिवा चंद्रयान लांचिंग के मौके पर।

करनाल शहर के लोगों को टीवी से ही पता चल रहा था कि उनके शहर में उत्सव का भव्य आयोजन शोक के आयोजन में तब्दील हो चुका है। बहुत से लोग टैगोर स्कूल में पहुंच गए थे। इनमें कुछ छोटे-मोटे नेता टाइप भी थे जो किसी तरह कैमरे के सामने आने की कोशिश कर रहे थे। कुछ हम लोगों से अखबार में श्रद्धांजलि छापने की अपील भी कर रहे थे। देश की एक बड़ी जूता कंपनी के मालिक परिवार का एक सदस्य जिसे मैं नहीं जानता था, बार-बार अपने बाल सही कर रहा था और रुक-रुक कर अपने ऊपर कुछ स्प्रे भी कर रहा था। प्रिंस ने भी मुझे उसके बारे में बताया। वह कभी कल्पना चावला का सहपाठी रहा होगा और टीवी चैनलों के लिए उसे लाइव करना ज़रूरी लग रहा होगा। शोक के मेलोड्रामा से मुझे इतनी कोफ़्त हुई कि मैंने कहा, टीवी में चेहरा, आवाज़ और कपड़े तो आएंगे पर स्प्रे की गंध नहीं आ पाएगी। सारी दुनिया जानती थी कि जो अंतरिक्ष यान टैक्सास के ऊपर टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर चुका था, उसके सातों यात्रियों के अवशेष भी बिखर चुके थे। फिर भी चैनल ने ड्रामा रचा।

स्कूल परिसर में किसी देव प्रतिमा के सामने स्कूल के अध्यापक और स्टूडेंट्स को कल्पना चावला के जीवित होने की प्रार्थना करने के लिए खड़ा होने के लिए कहा। ऐसे लोग कितने ज़लील होते होंगे जो चैनल की स्टोरी के लिए या ख़ुद टीवी में आने के लिए शोक के फिल्मांकन में अभिनय करने के लिए तैयार हो जाएं। मैं तो वहां का माहौल देखकर तुरंत वापस दफ़्तर आ गया था लेकिन भास्कर जो पानीपत से छपता था और दैनिक जागरण जिसकी खबरें भेजने की डेडलाइन भी देर तक थी, के रिपोर्टर और फोटोग्राफर वहीं थे। मुझे कोई एक ही कैची सी स्टोरी तुरंत फाइल करने के लिए कहा गया था। तभी हमारे समाचार संपादक बलदेव भाई शर्मा का फोन आया।

वे शोकाकुल अध्यापकों और स्टूडेंट्स की प्रार्थना का फोटो चाहते थे। हमारा फोटोग्राफर अपने गाँव जा चुका था। उस प्रायोजित सीन का फोटो न होना उसके लिए खतरा बनने जा रहा था। तब एक दूसरे अख़बार के फोटोग्राफर धर्म सिंह की मेहरबानी से हमें एक फोटो हासिल हो सका। और तारा टूट गया जैसी किसी पंक्ति से शुरू हुई और इसी शीर्षक से फर्स्ट पेज पर छपी स्टोरी में इस प्रार्थना का ज़िक्र मुझे भी इस तरह करना पड़ा कि आखिर में किसी चमत्कार की आस में वे प्रार्थना में खड़े हो गए। `अंत में प्रार्थना` टाइप। अगले दिन यह स्टोरी काफ़ी ज़्यादा पसंद की गई औऱ इस तरह शोक की घटना से मुझे भी टुच्ची ख़ुशी हासिल हुई।

विडंबना यह थी कि कल्पना चावला की मृत्यु के बाद चैनलों का मेलोड्रामा कई दिनों तक ज़ारी रहा जिससे अखबारों को कंपटिशन करना पड़ रहा था। अगले दिन 2 फरवरी की सुबह मिनी सेक्रिट्रेएट कैम्पस में हुई शोकसभा में हरियाणा सरकार की तरफ़ से तत्कालीन मुख्यमंत्री के पुत्र अजय चौटाला शामिल हुए। दोपहर में चैनल वालों ने सर्राफा बाज़ार में पहुंचकर वहां की एसोसिएशन के एक पदाधिकारी और कांग्रेस नेता सेवाजी सर्राफ से रिक्वेस्ट करके विजुअल लेने भर तक के वक़्त के लिए कुछ दुकानों के शटर गिरवा लिए। बाज़ार पूरी तरह खुले हुए थे और चैनलों पर कल्पना चावला के शोक में करनाल के बाज़ार बंद होने की ख़बर चल रही थी। लोगों को तब यही लगता था कि चैनल पर बाकायदा वीडियो के साथ ख़बरें चलती हैं और उससे ज्यादा प्रामाणिक क्या हो सकता है।

मैं देख रहा था कि चैनल तो दिन दहाड़े झूठ रच रहे हैं। अखबारों ने भी चैनलों के दबाव में करनाल बंद की खबर छापी। यह एक शर्मनाक दबाव था। मैंने ख़ुले बाज़ारों के फोटो और बाज़ार बंद के दावे के पीछे के ड्रामे की खबर भेजी जिसे संपादक ने छाप दिया। शर्मनाक यह था कि `करनाल की बेटी` के शोक के नाम पर हवन और दूसरे कर्मकांड शुरू हो गए। एक वैज्ञानिक के लिए शोक के नाम पर। (जहां तक `करनाल की बेटी` के लिए शोक की बात है तो कल्पना चावला के नाम से प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज का नाम दीनदयाल उपाध्याय किया जा चुका है।) प्रायोजित खबरों की बौछारों के बीच लगभग गुस्साते हुए मैं मॉडल टाउन की उस बिल्डिंग में गया जहां कल्पना चावला पढ़ी थी।

इसरो चीफ को ढांढस बंधाते पीएम मोदी।

`स्कूल के बाहर खड़ा नीम का पेड़ भी उदास है`, से शुरू कर कुछ लोगों के बयानों के सहारे और कल्पना और उनकी फ्रेंड के स्कूली दौर के एक पुराने फोटोग्राफ के सहारे लफ्फाजी का एक ढेर उस दिन मैंने खीझते हुए भेजा था। अगले दिन वह स्टोरी ऑल एडिशन फर्स्ट पेज पर `उदास है वह नीम का पेड़ भी` शीर्षक से छपी हुई थी। शोक के बहुत से कार्यक्रमों में सबसे गरिमा भरा कोई अनुभव था तो अमेरिका से करनाल आए कल्पना के पति जीन पियरे हैरिसन को सुनना था। दयाल सिंह कॉलेज सभागार में उन्होंने जो कहा वह एक युवा वैज्ञानिक की संज़ीदगी और प्रतिबद्धता को बताता था और पति-पत्नी के रिश्ते की ऐसी गरिमा को भी जो लिजलिजी भावुकता में प्रकट नहीं हो रही थी। हमारे यहां स्पेस की प्रॉब्लम थी तो जो मैं लिखना चाहता था, वह दैनिक जागरण के एक साथी से शेयर किया जहां `भावुकता नहीं भाव प्रवणता` जैसे शीर्षक से उस साथी के नाम से छपा।

यह सब कल शाम ही याद आना शुरू हो गया था जब अपने यहां के चैनलों पर चंद्रयान मिशन 2 के संपन्न होने से पहले मीडिया के पतन के दृश्य चल रहे थे। आप टीवी न भी देखते हों पर आसपास बाज़ारों में, यहां तक कि अस्पतालों में भी चलते रहने वाले टेलिविजनों की बदौतल इन दृश्यों से बच नहीं सकते हैं। वैज्ञानिकों की रीसर्च और प्रतिबद्धता पर टिके मिशन की कवरेज के नाम पर हाथों में सफेद जुराब और स्कूली बच्चों के फैंसी ड्रेसेज शो जैसे पहरावे में अंतरिक्ष यात्री होने का हबूब रचते बेशर्म रिपोर्टर-एडिटर वगैराह क्या-क्या नहीं बक रहे थे? वे ऐसे गंभीर मौके पर संज़ीदगी के बजाय वे चंद्रयान-पाकिस्तान के तुक से उन्मादी मिशन में मुब्तिला थे। बाबा बाज़ार भी सजा था। चांद पर प्लॉट काटे जा रहे थे और चाँद को मोदी की मुट्ठी में बताया जा रहा था। क्या यह किसी देश के वैज्ञानिकों और इसरो जैसे उसके पुराने अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान की गरिमा के प्रति और किसी प्रधानमंत्री की भी गरिमा के प्रति उपयुक्त व्यवहार था? पत्रकारिता की गरिमा की तो बात ही क्या की जाए? क्या सत्ता यही चाहती थी?

ऐन वक़्त पर चंद्रयान-2 के लैंडर ‘विक्रम’ का पृथ्वी स्थित नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूटा तो स्तब्ध रह जाने वाली बात थी ही। लेकिन, वैज्ञानिक जानते हैं कि ऐसा भी होता है और अपने और अपने से पहले दूसरे देशों के वैज्ञानिकों के बहुत सारे सफल व असफल प्रयास हर अगली यात्रा के गौरवपूर्ण पड़ाव ही होते हैं। अफ़सोस कि मीडिया इस घटना के बाद की गरिमा का निर्वाह करने में भी नाकाम रहा। सोशल मीडिया पर इसरो के लिए ढांढस बंधाने वाली पोस्ट्स जिनमें `गिरते हैं शहसवार ही…` टाइप शेरों की भरमार भी कम हास्यास्पद नहीं थीं। काश, देश में ऐसा माहौल होता कि लोग वैज्ञानिकों और उनके काम पर ज्यादा संज़ीदगी से रिस्पॉन्ड कर पाते।

और एक बात यह कि टीवी चैनलों पर बेतुके और उन्मादी कार्यक्रम न रचे जाएं तो भी वैज्ञानिक अभिय़ानों की सफलता के श्रेय स्वत: ही सरकार को मिलते ही हैं। सरकार का काम होना चाहिए कि वह रिसर्च में कोई बाधा न आने दे और वैज्ञानिकों का मनोबल मज़बूत रखे। प्रधानमंत्री को वैज्ञानिक उपलब्धियों पर गरिमापूर्ण ढंग से वैज्ञानिकों को श्रेय देते हुए बधाई देनी ही चाहिए और जाहिर है कि किसी `विफलता` पर भी उतने ही गरिमापूर्ण ढंग से वैज्ञानिकों को आगे बढ़ने के लिए हौसला देना चाहिए।

आज बहुत से लोगों ने मीडिया और सत्ता के व्यवहार की आलोचना की तो बहुत से लोगों ने रोते हुए वैज्ञानिक की पीठ थपथपाते जा रहे प्रधानमंत्री की पिता की छवि के रूप में प्रशंसा की। मेरी राय में यह दृश्य इतने भावातिरेक के प्रदर्शन के बजाय एक प्रधानमंत्री का एक वैज्ञानिक के साथ हाथ मिलाते हुए ज़्यादा मजबूती दिखाता हुआ होता तो बेहतर होता। वैज्ञानिक अभियानों में सहयोग और हौसले के लिए परदे पर प्रदर्शन भी ज़रूरी नहीं होते। देश में विज्ञान के उत्थान के लिए तो सबसे बढ़कर यह बात हो कि वैज्ञानिक भी बाबाओं के दरवाजों पर विज्ञान को लज्जित-पराजित दिखाने वाले प्रदर्शन न करें और प्रधानमंत्री वैज्ञानिक सोच को नुकसान पहुंचाने वाले पुराने भाषण न दोहराएं।

(धीरेश सैनी जनचौक के रोविंग एडिटर हैं।)

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