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तथाकथित सभ्यता की दरारों में संवेदनहीन समाज की पालकी ढोती बेनाम, बेआवाज़ और अदृश्य ज़िंदगियों की ‘स्वर्ग से विदाई’

मेहनतकश लोगों के बारे में हमारी व्यवस्था किस हद तक असंवेदनशील है, इसे अचानक लागू किए गए लॉकडाउन के निर्णय से समझा जा सकता है। एक झटके के साथ सारी सामाजिक और आर्थिक गतिविधियां ठप कर दी गईं। जो जहां पर था वहीं पर रोक दिया गया। शायद अदूरदर्शी नीति- निर्माताओं की कल्पना में भी वे करोड़ों लोग नहीं आए जो अपने घरों से हजारों-हजार किलोमीटर दूर रह कर रोज कुंआ खोद कर रोज पानी पीते हैं।

पिछले कुछ दशकों में बेलगाम होती जा रही कॉरपोरेट पूंजी और उसके दबाव में सिकुड़ते जा रहे श्रम-क़ानूनों ने उन्हें एक ग़ैर-जरूरी और अकिंचन भीड़ बना कर ठेका-प्रथा के रहमो-करम पर छोड़ दिया है। वे हमारी तथाकथित सभ्यता की दरारों में बेनाम, बेआवाज और अदृश्य जिंदगी जीते हुए चुपचाप एक संवेदनहीन समाज की पालकी ढोते रहते हैं। एक मनमाने निर्णय के साथ एक झटके में उन्हें उन दरारों से भी बेदखल कर दिया जाता है और जब वे बाहर आते हैं तो उन पर कर्फ्यू तोड़ने और कोरोना फैलाने का इल्जाम लगने लगता है।

इस पूरी निर्णय-प्रक्रिया में कहीं कोई तालमेल नहीं है। केंद्र तथा विभिन्न राज्य सरकारों ने उनके रहने, खाने-पीने या उनकी जांच का कोई प्रबंध नहीं किया, न आपस में कोई सहमति बनाई। पुलिस ने उनके साथ ‘कर्फ्यू जैसा ही’ व्यवहार किया। जो सरकार कोरोना के मरीजों को अभी हाल तक हवाई जहाजों से भर-भर कर ला रही थी और समुचित जांच भी नहीं करा रही थी उसी ने इन ग़रीब मेहनतकशों से उनकी बसें और ट्रेनें भी छीन लीं। नतीजतन ये लोग सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर अपने गांवों तक अपनी गृहस्थी अपने कंधों और सर पे लादे अपनी पत्नी और मासूम बच्चों के साथ पैदल ही निकल पड़े।

इस बीच सरकार ने अपने घरों में मध्यवर्ग के मनोरंजन के लिए दूरदर्शन पर 1990 के दशक के लोकप्रिय सीरियल ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ चलवा दिए। (ध्यान रहे कि यह दशक ही भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता और पुनरुत्थान के उभार, मंदिर आंदोलन के जोर पकड़ने और नई आर्थिक नीति के रूप में उदारीकरण, निजीकरण वैश्वीकरण की त्रयी द्वारा लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को विस्थापित करने का दशक रहा है। इन सारे रुझानों को वैचारिक संबल देने में इन पौराणिक आख्यानों ने भी अपनी भूमिका निभायी ही थी।)

एक तरफ एक केंद्रीय मंत्री अपने विशालकाय ड्राइंग रूम में एक विशाल डिजिटल टीवी स्क्रीन पर ‘रामायण’ देखते हुए अपनी तस्वीर ट्विटर पर साझा करते हुए पूछ रहे थे कि “मैं तो ‘रामायण’ का आनंद ले रहा हूं, क्या आप भी?” तो वहीं लाखों मेहनतकश लोग सड़कों पर और बहुत सारे पुलिस की मार से बचने के लिए रेल की पटरियों के किनारे-किनारे लहू-लुहान पैरों के साथ अपने मासूम बच्चों को घसीटते हुए सैकड़ों किलोमीटर के विस्थापन पर निकल पड़े थे।

अभी हाल ही में इंसाफ अली की मौत की खबर आई है। मुंबई से 14 दिनों तक दिन-रात पैदल चलते-चलते उसने 1500 किलोमीटर का सफर तो तय कर लिया था, लेकिन अंततः उत्तर प्रदेश में श्रावस्ती जिले के मठकनवां गांव में अपने घर पहुंचते-पहुंचते वह जिंदगी की बाजी हार गया।

कुछ ही दिनों पहले लॉकडाउन में फंसी तेलंगाना में मिर्च के खेतों में काम कर रही 12 साल की बच्ची जमलो मडकम की अपने घर पहुंचने से पहले ही भूख और निर्जलीकरण(डिहाइड्रेशन) से मौत हो गई थी। वह 100 किमी पैदल चलकर छत्तीसगढ़ के अपने गांव पहुंचने वाली थी।

ऐसी असंख्य कहानियां हैं जिन पर किसी संवाददाता की नज़र नहीं पड़ी और जो किसी टीवी चैनल या अखबार की सुर्खी बनने से पहले ही गुमनामी के अंधेरों में खो गईं।

ऐसा नहीं था कि अपने घरों को पहुंचने के लिए बेचैन ये मेहनतकश और गरीब लोग अपने गांवों में बहुत समृद्धि छोड़ कर आए थे, बल्कि यहां, शहर की लंबी अनिश्चितता और नजरों में परायेपन के बीच गुमनाम मौत के खतरे से वे भागना चाहते थे। आजादी के इतने वर्षों में भी सत्ता और समाज उनके प्रति अनचाहेपन और बेगानेपन की भावना से मुक्त नहीं हो पाया है।

उनकी अहमियत अभी भी उच्च वर्ग और उसके वैचारिक अनुचर बन चुके मध्य वर्ग की सत्ता की सीढ़ी और उसकी विलासिता के विशालकाय तंत्र के गुमनाम पुर्जे से ज्यादा कुछ नहीं है। कोरोना लाने में इन लोगों की कोई भूमिका नहीं थी लेकिन पांच सितारा मीडिया हाउसों में बैठे पत्रकार, सुविधाभोगी मध्यवर्ग का बड़ा हिस्सा और प्रशासनिक अमला इन्हें ऐसी ही हिकारत भरी नजरों से देख रहा था जैसे यही कोरोना का कारण हों।

गोरख पांडेय ने 1982 के एशियाड खेलों के बाद एक कविता लिखी थी— ‘स्वर्ग से विदाई’। इस कविता में अपने को गला और खपा कर भी मालिकों के लिए दुनिया को स्वर्ग बनाने वाले मजदूरों के प्रति ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ वाले इस नजरिये को उन्होंने बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त किया है। प्रस्तुत है यह कविताः

स्वर्ग से विदाई

भाइयों और बहनों!

अब यह आलीशान इमारत

बनकर तैयार हो गई है,

अब आप यहां से जा सकते हैं।

अपनी भरपूर ताकत लगाकर,

आपने मिट्टी काटी,

गहरी नींव डाली,

मिट्टी के नीचे दब भी गए

आपके कई साथी।

मगर आपने हिम्मत से काम लिया,

पत्थर और इरादे से,

संकल्प और लोहे से,

बालू, कल्पना और सीमेंट से

ईंट-दर-ईंट आपने,

अटूट बुलंदी की दीवारें खड़ी की।

छत ऐसी कि वहां से हाथ बढ़ाकर,

आसमान छुआ जा सके।

और खिड़कियां –

क्षितिज की थाह लेने वाली,

आंखों जैसी,

दरवाजे – शानदार स्वागत!

अपने घुटनों, बाजुओं और

बरौनियों के बल पर आपने

सैकड़ों साल टिकी रहने वाली

यह जीती जागती इमारत तैयार की।

अब आपने हरा-भरा लॉन,

फूलों का बगीचा,

झरना और ताल भी बना दिया है।

कमरे-कमरे में गलीचा

और कदम-कदम पर

रंग-बिरंगी रोशनी फैला दी है।

गर्मी में ठंडक और ठंड में

गुनगुनी गर्मी का इंतजाम कर दिया है।

संगीत और नृत्य के साज सामान

सही जगह पर रख दिए हैं।

अलगनियां, प्यालियां,

गिलास और बोतलें

सजा दी हैं।

कम शब्दों में कहें तो

सुख-सुविधा और आजादी का

एक सुरक्षित इलाका,

एक झिलमिलाता स्वर्ग

रच दिया है।

इस मेहनत

और इस लगन के लिए

आपको बहुत-बहुत धन्यवाद,

अब आप यहां से जा सकते हैं।

यह मत पूछिए कि कहां जाएं,

जहां चाहें वहां जाएं

फिलहाल, उस अंधेरे में

कटी जमीन पर

जो झोंपड़े डाल रखे हैं

उन्हें भी खाली कर दें।

फिर जहां चाहें वहां जाएं।

आप आजाद हैं

हमारी जिम्मेवारी खत्म हुई

अब एक मिनट के लिए भी

आपका यहां ठहरना ठीक नहीं,

महामहिम आने वाले हैं

विदेशी मेहमानों के साथ।

आने वाली हैं अप्सराएं,

और अफसरान।

पश्चिमी धुनों पर शुरू होने वाला है

उन्मादक नृत्य।

जाम छलकने वाला है

भला आपकी

यहां क्या जरूरत हो सकती है?

और वे आपको यहां देखकर क्या सोचेंगे?

गंदे कपड़े

और धूल में सने शरीर

ठीक से बोलने, हाथ हिलाने

और सर झुकाने का भी शऊर नहीं।

उनकी रुचि और उम्मीद को

कितना धक्का लगेगा

और हमारी कितनी तौहीन होगी।

मान लिया कि इमारत को

यह शानदार बुलंदी हासिल कराने में

आपने अपनी हड्डियां तक गला दीं,

खून पसीना एक कर दिया,

परंतु इसके एवज में

मजूरी दी जा चुकी है

मुंह मीठा करा दिया है

धन्यवाद भी दे चुके हैं

अब आपको क्या चाहिए?

आप यहां से टल नहीं रहे हैं

आपके चेहरे के भाव भी बदल रहे हैं।

शायद अपनी इस विशाल

और खूबसूरत रचना से,

आपको मोह हो गया है

इसे छोड़कर जाने में दुख हो रहा है।

ऐसा हो सकता है!

मगर इसका मतलब यह तो नहीं

कि आप जो कुछ भी

अपने हाथों से बनाएंगे,

वह सब आपका हो जाएगा।

इस तरह तो यह सारी दुनिया

आपकी होती,

फिर हम मालिक लोग कहां जाते।

याद रखिए

मालिक, मालिक होता है

मजदूर, मजदूर।

आपको काम करना है

हमें उसका फल भोगना है

आपको स्वर्ग बनाना है

हमें उसमें विहार करना है।

अगर ऐसा सोचते हैं

कि आपको अपने काम का

पूरा फल मिलना चाहिए,

तो हो सकता है

कि पिछले जन्मों के आपके काम,

आपको अभावों के नरक में

ले जा रहे हों।

विश्वास कीजिए

धर्म के सिवा कोई रास्ता नहीं,

अब आप यहां से जा सकते हैं।

क्या आप यहां से जाना ही नहीं चाहते?

यहीं रहना चाहते हैं

इस आलीशान इमारत में,

इन गलीचों पर पांव रखना चाहते हैं,

ओह! यह तो लालच की हद है,

सरासर अन्याय है।

कानून और व्यवस्था पर

सीधा हमला है।

दूसरों की मिल्कियत पर

कब्जा करने

और दुनिया को उलट-पुलट देने का

सबसे बुनियादी अपराध है।

हम ऐसा हरगिज नहीं होने देंगे

देखिए, यह भाईचारे का मसला नहीं है।

इंसानियत का भी नहीं,

यह तो लड़ाई का

जीने या मरने का मसला है।

हालांकि हम खून-खराबा नहीं चाहते

हम अमन-चैन,

सुख-सुविधा पसंद करते हैं।

लेकिन अगर आप मजबूर करेंगे,

तो हमें कानून का सहारा लेना पड़ेगा

पुलिस, और जरूरत पड़ी तो

फौज को भी बुलाना पड़ेगा।

हम कुचल देंगे,

अपने हाथों गढ़े,

इस स्वर्ग में रहने की

आपकी इच्छा भी कुचल देंगे,

वर्ना जाइए,

टूटते जोड़ों, उजाड़ आंखों की,

आंधियों, अंधेरों और सिसकियों की,

मृत्यु, गुलामी

और अभावों की अपनी

बे-दरो-दीवार दुनिया में

चुपचाप,

वापस चले जाइए।

—गोरख पांडेय

(शैलेश की प्रस्तुति।)

This post was last modified on May 1, 2020 8:35 am

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Published by
Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi