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पहले ही तैयार हो गयी थी चीनी हमले की पृष्ठभूमि

भारत-चीन सीमा झड़प के मामले में कुछ बातें अनुत्तरित हैं। या तो सरकार ने उस पर चुप्पी साध ली है या फिर उसके दावे सच के करीब नहीं दिखते हैं। मसलन चीन ने भारत की कितनी जमीन अपने कब्जे में ली है। यह एक रहस्य बना हुआ है। गैर आधिकारिक सूत्रों की मानें तो यह 50 से 60 वर्ग किमी बतायी जा रही है। लेकिन आधिकारिक तौर पर इस पर कुछ नहीं बोला गया है। उल्टे सरकार और बीजेपी से जुड़े लोग किसी तरह के जमीन कब्जे की बात सिरे से खारिज कर दे रहे हैं। लेकिन यह बात अब किसी से छुपी नहीं है कि चीन ने उस गलवान घाटी को अपने कब्जे में ले लिया है जो अभी तक भारत का हिस्सा हुआ करती थी।

यह पूरा पहाड़ियों का इलाका है और इस समय यहां का तापमान शून्य से भी नीचे है। चीन के विदेश मंत्री ने परसों बयान जारी कर कहा है कि गलवान घाटी उसका हिस्सा है और उसमें भारत का किसी भी तरह का हस्तक्षेप उसकी संप्रभुता का उल्लंघन माना जाएगा। लेकिन इसका न तो भारत की तरफ से कोई आधिकारिक जवाब दिया गया और न ही इसको संज्ञान में लिया गया।

मामले पर चुप रहने पर सच नहीं बदल जाएगा। सच्चाई यह है कि गलवान घाटी में इस समय चीन के 6 से 7 हजार के करीब सैनिकों का जमावड़ा है। और वह वहां बाकायदा आग्नेय हथियारों के साथ मौजूद हैं। साथ ही सुरक्षा कैंप बना रहे हैं। और उनको पीछे से तोपों का बैक अप है। यहां भारत के पहले से मौजूद एक कैंप को चीनी सैनिकों द्वारा जबरन हटाया जा चुका है। यह उसी 5 मई को हो गया था जब दोनों पक्षों के सैनिकों के बीच झड़प हुई थी। जिसमें कुछ सैनिकों के घायल होने की खबर थी।

दोनों देशों के बीच वार्ता इसी कब्जे को लेकर हो रही है। भारत का कहना है कि दोनों पक्ष 30 अप्रैल के पीछे की अपनी यथास्थिति पर चले जाएं। लेकिन चीन उसके लिए तैयार नहीं दिख रहा है। अब आइये उस दिन यानी 15/16 जून की रात की घटना पर बात करते हैं। उस रात के पहले दिन में दोनों देशों के बीच मेजर जनरल स्तर की वार्ता जारी थी। और वैसे भी कहीं जब वार्ता चल रही होती है तो फिर तमाम दूसरी गतिविधियां ठप कर दी जाती हैं। और उसके बाद भी अगर कोई हरकत करता है तो कहने का मतलब है कि वह वार्ता के पीछे छुपी भावनाओं का उल्लंघन कर रहा है। बताया जा रहा है कि 15 की शाम को भारत की तरफ से दो पेट्रोलिंग पार्टियों को गलवान की घाटी में जायजा लेने के लिए भेज दिया गया।

अपुष्ट खबरों की मानें तो कर्नल संतोष बाबू के नेतृत्व में बिहार रेजिमेंट को अपनी चौकी वापस लेने के निर्देश के साथ वहां भेजा गया था। अब कोई भी पूछ सकता है कि गलवान घाटी में जहां पहले से ही चीन के 7000 से ज्यादा सैनिक मौजूद हों वहां पेट्रोलिंग के नाम पर 100 के करीब सैनिकों को भेजने का क्या तुक बनता है? और वह भी बगैर किसी हथियार के। इसके जरिये आखिर हम क्या हासिल करना चाहते थे? और वैसे भी पेट्रोलिंग का मतलब है कि आप जहां तक जा पा रहे हैं वह इलाका आपके कब्जे में है। लिहाजा गलवान तक बे रोक-टोक पेट्रोलिंग का मतलब था उस पर कब्जे का दावा। ऐसे में वहां पहले से ही जमा बैठे चीनी सैनिक क्या इसकी इजाजत देते? और फिर हुआ वही जिसका खतरा था। भारतीय सेना के 100 जवानों के वहां पहुंचने पर चीन के 300 सैनिकों ने एक साथ हमला बोल दिया।

इस बात में कोई शक नहीं है कि हमारे सैनिकों ने पूरी बहादुरी के साथ मुकाबला किया और लेकिन चूंकि संख्या बल में वह कम थे और उनके पास कोई हथियार भी नहीं था। पूरी लड़ाई हाथ और ईंट पत्थरों से हुई। इस मामले में कहा जा रहा है कि चीनी सैनिकों ने कटीले तार लगी बेंतें और पत्थर समेत हाथों में पहने लोहे के नाखूनी दस्तानों का इस्तेमाल किया। और कुछ सैनिकों को तो नुकीली चट्टानों पर पटक दिया। जिससे उनकी मौत हो गयी। और कुछ को गलवान नदी में कूदना पड़ा जहां डूबने से उनकी मौत हो गयी। अब तो इस खबर की भी पुष्टि हो गयी है कि भारत के 10 सैनिक चीनी सेना के कब्जे में थे। इसमें दो अफसर भी शामिल हैं। चीनी सेना ने दोनों पक्षों के बीच कई चक्रों की वार्ता के बाद उन्हें कल शाम छोड़ दिया।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह फैसला किसका था? हालात को देखते हुए कोई अंधा भी कह सकता है कि सैनिकों को वहां खुदकुशी के लिए भेजा गया था। अगर आपने सामने वाले दुश्मन से मुकाबला करने के लिए उसके बराबर सैनिक और उसी मात्रा में हथियार नहीं भेजा तो यह बात साफ है कि आप उन्हें शहीद होने के लिए वहां भेज रहे हैं। इसका नतीजा यह रहा है कि हमें अपने 17 बेशकीमती सैनिकों की जान से हाथ धोना पड़ा।

दरअसल इसके पीछे एक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और उद्देश्य भी छुपा हुआ दिखता है। और यह पीएम मोदी के उस पहले बयान से साफ हो जाता है जिसके जरिये उन्होंने पहली बार पूरी घटना पर अपना मुह खोला था। उनका पहला वाक्य ही यही था कि हमारे सैनिक मारते हुए मरे हैं और मुझे उन पर गर्व है। यानि वे मुकाबला करते हुए शहीद हुए हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि यह मुकाबला 50 बनाम 7000 का था। दरअसल गलवान घाटी पर चीन ने 30 अप्रैल के बाद ही कब्जा कर लिया था। और इस पूरी प्रक्रिया में न तो एक सैनिक चीन का मारा गया और न ही भारत का कोई सैनिक शहीद हुआ। लिहाजा भारत में यह बात उठने लगी थी कि हम बगैर लड़े अपनी 60 वर्ग किमी की जमीन चीन के हवाले कर दिए।

हवाओं में तैर रही यह बात अगर आखिरी तौर पर पुष्ट हो जाती तो फिर सत्ता प्रतिष्ठान के लिए इससे बड़ा दाग कोई दूसरा नहीं होता। लिहाजा उस दाग को ही मिटाने के लिए जान बूझ कर उन सैनिकों को उस गलवान मिशन पर भेज दिया गया। क्योंकि सीमा पर मौजूद हमारे उच्च पदस्थ सैन्य अफसरों को लड़ाई की सारी बारीकियां पता हैं। लिहाजा पेट्रोलिंग पर भेजे जाने के बाद उन सैनिकों के साथ क्या होगा उसका आभास उन्हें रहा होगा। बावजूद इसके उन्होंने ऐसा क्यों किया यह एक बड़ा सवाल है जिसका उत्तर मौके पर तैनात सैन्य अफसरों और भारतीय राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान को देना है।

रक्षा विशेषज्ञ अजय शुक्ला की मानें तो चीन भारत के तीन सेक्टरों में हस्तक्षेप किया है। जिसमें गलवान पर उसका पूरा कब्जा है। साथ ही दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में बनी रोड से 1.50 किमी दूर वह पहुंच गया है। इसके अलावा देप्सांग सेक्टर में भी उसने हरकत की है। यह वही स्पॉट है जहां 2013 में यूपीए के दौरान उसने बवाल काटा था।

दरअसल हर साल गर्मी के महीने में जम्मू में मौजूद भारतीय सेना की रिजर्व फोर्स की एक टुकड़ी को गलवान सेक्टर में भेज दिया जाता था। लेकिन इस बात कोरोना के चलते सेना ने उसे नहीं भेजने का फैसला किया। इसका नतीजा यह रहा कि जब चीनी सैनिक हजारों की तादाद में एक साथ घुसे तो उनका मुकाबला करने के लिए भारतीय सैनिकों की पर्याप्त संख्या मौजूद ही नहीं थी। और न ही उनके पा कोई बैकअप था। लिहाजा भारतीय सैनिकों के पास पीछे हटने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था।

कुछ बातें अब इस पूरी प्रगति की पृष्ठभूमि पर। देश में मोदी सरकार के आने के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों में जो बदलाव आया है यह उसका भी एक नतीजा हो सकता है। मसलन अभी तक विदेश नीति के मामले में भारत बिल्कुल स्वतंत्र था। और सामरिक या फिर रणनीतिक तौर पर वह किसी के साथ नाभि नालबद्ध नहीं था। लेकिन मोदी के सत्ता में आने के साथ ही स्थितियों में तेजी से बदलाव आया। यूपीए के दौर में जो भारत ब्रिक्स और तमाम मंचों के जरिये चीन के साथ मिलकर अमेरिका संरक्षित आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के समानांतर ताकत बनने का हिस्सेदार था। सत्ता में आते ही मोदी ने न केवल उससे अपना हाथ खींच लिया बल्कि चीन विरोध के किसी भी मौके पर वह विरोधियों के साथ खड़ा दिखा।

इसके आगे एक दूसरी और घटना हुई। क्षेत्रीय स्तर पर भारत की अगुआई में चलने वाले सार्क से भी उसने खुद को अलग कर लिया। सार्क की शायद ही किसी बैठक में मोदी गए हों। और अब तो उसकी बैठकें होती भी हैं या नहीं इसकी किसी को जानकारी तक नहीं है। इस तरह से पड़ोसी देशों के साथ बातचीत और रिश्तों का जो औपचारिक साझा मंच था वह भी जाता रहा। और मोदी ने एक सूत्रीय कार्यक्रम के तौर पर अमेरिका के साथ राजनीतिक और आर्थिक के अलावा स्ट्रेट्जिक रिश्तों में जाने पर जोर दिया। जिसके तहत दोनों देशों के बीच एक से बढ़कर एक समझौते हुए। जिसमें नाटो तक में शामिल होने की बात पहुंच गयी।

और इस तरह से मोदी भारत-अमेरिका-इजराइल की धुरी के अपने संघ घोषित लक्ष्य के करीब दिखने लगे। इस प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की भूमिका चीन के खिलाफ अमेरिका के एक प्यादे से ज्यादा नहीं रही। और अब जबकि अमेरिका हर मोर्चे पर चीन की घेरेबंदी कर रहा है तो भारत कहीं खुलकर और कहीं मौन रहकर उसके साथ खड़ा है। ताजा मामला यूएन में कोरोना प्रकरण की जांच का था अमेरिका यूरोप की इस पहल में भारत भी उसका बराबर का साझीदार था। जबकि उसको पता था कि यह सब कुछ चीन की घेरेबंदी के लिए किया जा रहा है।

इस अंतरराष्ट्रीय पृष्ठभूमि में घरेलू मोर्चों पर भी सरकार ने कुछ ऐसा किया जो सीधे न सही लेकिन दूरगामी तौर पर यथास्थिति को बदलने का माद्दा रखती है। और उसमें चीन के साथ रणनीतिक और सामरिक रिश्ते सीधे प्रभावित होते हैं। मसलन जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के साथ ही लद्दाख समेत सभी इलाकों को सीधे केंद्रीय शासन में लेने का फैसला इस दिशा में सबसे बड़ा कदम था। इससे न केवल पाक और चीन के बीच पीओके से गुजरने वाली चीन की सामरिक रोड प्रभावित होती है बल्कि अक्साई चिन का इलाका भी सीधे प्रभाव में आ गया।

और इस मसले पर गृहमंत्री अमित शाह का संसद में दिया गया वह बयान उस खतरे को बताने के लिए काफी था जिसमें उन्होंने न केवल पाक अधिकृत कश्मीर बल्कि अक्साई चिन को भी समय पड़ने पर अपने कब्जे में लेने की बात कही थी। इस बीच, दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में स्थाई रोड बनाने की घटना ने उसमें कैटेलिक का काम किया। क्योंकि चीन नहीं चाहता है कि भारत एलएसी पर किसी भी तरह के स्थाई निर्माण में जाए। इन सारी चीजों पर भारत को बढ़ने से रोकने और अपने तरीके से चेतावनी देने के तौर पर इस हमले को अंजाम दिया गया। और यही परिस्थितियां और पृष्ठभूमि थी जिन्होंने दोनों देशों को यहां लाकर खड़ा किया है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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This post was last modified on June 19, 2020 9:53 am

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