शरीर से 90 फीसद विकलांग और कई गंभीर बीमारियों के शिकार प्रो.साई बाबा की जमानत याचिका ख़ारिज

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बम्बई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने माओवादियों के साथ संबंधों के लिए एक कारागार में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जी एन साईबाबा की जमानत याचिका मंगलवार को खारिज कर दी।साईबाबा ने चिकित्सा आधार पर एक याचिका दायर करते हुए कहा था कि अन्य बीमारियों से ग्रस्त होने और खराब सेहत के कारण जेल में उनके कोरोना वायरस से संक्रमित होने का अधिक जोखिम है।

विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर को माओवादियों के साथ संबंधों के लिए मार्च 2017 में दोषी ठहराया गया था और इस समय वह नागपुर केन्द्रीय कारागार में बंद है। न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर और न्यायमूर्ति अमित बोरकर की एक खंडपीठ ने मंगलवार को कहा कि उनकी जमानत याचिका खारिज की जाती है।

साईबाबा ने, वकील निहाल सिंह राठौड़ के माध्यम से दायर अपनी याचिका में, चिकित्सा आधार पर 45 दिनों के लिए जमानत मांगी थी, ताकि वे बाहर ईलाज करा सकें और हैदराबाद में अपनी कैंसर से पीड़ित मां से भी मिल सकें। साईबाबा ने कहा था कि वह गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं और जेल में कोविड-19 से उनके संक्रमित होने का अधिक खतरा है। उन्होंने कहा था कि जेल में उन्हें समुचित ईलाज नहीं मिल रहा है।

विशेष सरकारी वकील पी के सथ्यनाथन ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को जेल की एक अलग विंग में रखा गया था, जहां उनका जेल की अन्य विंग में बंद कैदियों से संपर्क नहीं होता है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के भाई उनकी मां की देखभाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘इस तरह सभी आधारों पर चाहे चिकित्सा हो , महामारी या उनकी मां का स्वास्थ्य हो, वह जमानत पर रिहा होने के हकदार नहीं हैं।

जीएन साई बाबा ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के समक्ष जमानत याचिका दायर किया था। याचिका में साई बाबा के खराब स्वास्थ्य एवं जेल में कोरोना वायरस संक्रमण फैलने का हवाला दिया गया था ।साई बाबा ने अदालत से याचिका पर तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया, जिसके बाद न्यायमूर्ति अतुल चंदुरकर और न्यायमूर्ति अमित बोरकर ने महाराष्ट्र सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर 24 जुलाई से पहले अपना जवाब देने को कहा। जमानत याचिका में कहा गया है कि पहले से कई बीमारियों से ग्रस्त होने के कारण साई बाबा पर वायरस से संक्रमित होने का अधिक खतरा है। साई बाबा को नागपुर केंद्रीय कारागार में रखा गया है, जहां अब तक 150 से अधिक कैदी और 40 जेलकर्मी संक्रमित पाए जा चुके हैं। इस कारागार में 1,800 कैदी हैं और यहां 265 पुलिसकर्मी तैनात हैं।

उल्‍लेखनीय है कि नौ मई, 2014 को दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साई बाबा को माओवादियों के साथ संबंध रखने के आरोप में महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। उनकी गिरफ्तारी के वक्‍त पुलिस ने दावा किया था कि साई बाबा प्रतिबंधित संगठन भाकपा-माओवादी के कथित तौर पर सदस्य हैं, उन लोगों को साजो सामान से समर्थन देने के साथ ही भर्ती में मदद करते हैं। अदालत ने कहा था कि नक्सलवादियों और उनकी विध्वंसक गतिविधियों की वजह से नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास और औद्योगीकरण नहीं हो पा रहा है। इसलिए दोषी पाए गए कैदियों के लिए सिर्फ उम्र कैद की सजा काफी नहीं है लेकिन वो यूएपीए की जिस धारा 18 और 20 के तहत दोषी पाए गए हैं, उनमें अदालत उम्र कैद की सजा ही देने के लिए मजबूर है।

शरीर से तकरीबन 90 फीसद विकलांग डीयू के प्रोफेसर जीएन साई बाबा शुरू से ही आदिवासियों-जनजातियों के लिए आवाज उठाते रहे हैं। आंध्र प्रदेश के एक गरीब परिवार में पैदा हुए जीएन साईबाबा 90 प्रतिशत शारीरिक रूप से अक्षम हैं।2003 में दिल्ली आने से पहले उनके पास ह्लीलचेयर खरीदने के भी पैसे नहीं थे।लेकिन पढ़ाई में हमेशा से वह काफी तेज थे। साईबाबा 9 मई, 2014 में गिरफ्तार होने से पहले राम लाल कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। अखिल भारतीय पीपुल्स रेजिस्टेंस फोरम (एआईपीआरएफ) के एक कार्यकर्ता के रूप में, उन्होंने कश्मीर और उत्तर पूर्व में मुक्ति आंदोलनों के समर्थन में दलित और आदिवासी अधिकारों का प्रचार करने के लिए 2 लाख किमी से अधिक की यात्रा की थी।

साईबाबा पर शहर में रहकर माओवादियों के लिए काम करने का आरोप है।क्रांतिकारी डेमोक्रेटिक फ्रंट माओवादियों का गुट है। इन पर इस गुट के सदस्य होने का आरोप था। हालांकि खुद उन्होंने हमेशा ही माओवादियों का साथ देने के आरोप को झूठा बताया था। साईबाबा हमेशा से आदिवासियों के हितों के पैरोकार रहे हैं। 1990 से वे आरक्षण के समर्थन में मुहिम चला रहे हैं। सितंबर 2009 में . माओवादियों पर काबू पाने के लिए शुरू किए गए ऑपरेशन ग्रीन हंट में पकड़े गए थे।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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