Sunday, May 29, 2022

खास रिपोर्ट: कभी ढाका की जुबान पर हुआ करती थी बरहजिया मिठास

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बरहज (देवरिया)। उत्तर प्रदेश में एक बार फिर भाजपा की सरकार बन चुकी है। डबल इंजन की सरकार गठन का विकास के खूब किए गए दावे को जमीनी शक्ल कितना मिल पायेगा,यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन हकीकत यह है कि यूपी के पूर्वांचल का नाम आते ही मजदूरों के हब के रूप में इलाके की तस्वीर हर किसी के जेहन में आ जाती है। इस पहचान से इतर भी इसका कुछ अतीत रहा है। तत्कालीन गोरखपुर जिले के बरहज की हम बात कर रहे हैं। अंग्रेजी हुकूमत में जहां देश के बाहर के हिस्से को संवारने के लिए पूर्वांचल के मजदूर पसीने बहाते थे। उस दौर में बरहज का इलाका खांडसारी के उद्योग के रूप में यूपी से लेकर बांग्लादेश की राजधानी ढाका तक में अपनी पहचान बना रहा था। गिरमिटिया मजदूर के कलंक से मुक्त रह कर यहां के मजदूर अपनी ही माटी को संवारने में लगे थे। यह पहचान तो अब मिट चुकी है,पर बरहजिया (लोकल ट्रेन)आज भी इसकी गवाह है।

रेलवे स्टेशन जो बरहज बाजार के नाम से जाना जाता है

सात स्टेशनों से होकर गुजरती है लाइफ लाइन ट्रेन

भारतीय रेल में बरहजिया के नाम से कोई ट्रेन का उल्लेख नहीं है, पर बरहज बाजार से भटनी जंक्शन तक चलने वाली दो जोड़ी पैसेंजर ट्रेन को ही लोग बरहजिया के नाम से पुकारते हैं। 30 किलोमीटर लंबे रूट पर कुल सात स्टेशनों से होकर यह ट्रेन गुजरती है। जिसमें बरहज बाजार के बाद रेलवे स्टेशन सिसई गुलाब राय, सतरांव, देवरहा बाबा रोड,सलेमपुर जंक्शन,पिवकोल व अंतिम स्टेशन भटनी जंक्शन है। जिसे यहां के लोगों का लाइफ लाइन कह सकते हैं। अतीत में यह रेलवे लाइन यहां की मजबूत अर्थव्यवस्था का मूल आधार हुआ  करती थी।

 बरहज व बरहजिया का रहा है विकास से सीधा रिश्ता

पूर्वांचल के बरहज समेत एक बड़े परिक्षेत्र की चर्चा हम इस लिए कर रहे हैं क्योंकि जब हमारे हुक्मरान पूर्वांचल को गरीबी व लाचारी के रूप में देखते हैं। आज सचमुच देश के विभिन्न हिस्सों से लेकर खाड़ी देशों में पूर्वांचल के लाखों मजदूर अपने परिवार का भविष्य संवारने की उम्मीद में पूरी उम्र गुजार देते हैं। जबकि इतिहास गवाह है कि पूरब का यह हिस्सा कभी औद्योगिक रूप से काफी समृद्ध रहा है। ऐसे में इलाके के सुनहरे अतीत को भी जानना जरूरी हो जाता है। जब हम इस इलाके की मजबूत अर्थव्यवस्था की चर्चा करते हैं तो देखने को मिलता है कि बरहजिया ट्रेन व बरहज बाजार को अलग करके नहीं देखा जा सकता है।

उजड़ गयी पूरी बाजार

खांडसारी की हुआ करती थी 400 मिलें

बरहज स्थित बाबा राघवदास भगवान दास स्नातकोतर महाविद्यालय के प्राचीन इतिहास के विभागध्यक्ष डा.अजय मिश्र कहते हैं कि मुगलकाल से ही यहां बड़े पैमाने पर जलमार्ग से व्यापार होने का उल्लेख है। जिसे अग्रेजों ने और समृद्ध किया। सन 1897 में बरहज बाजार को आर्थिक रूप से विस्तार देने की बड़ी कोशिश की गई।  ऐसे में भटनी तक रेल लाइन बिछाया गया। सरकारी गजेटियर में इसका विस्तार से उल्लेख है। एक मात्र परिवहन साधन के रूप में जलमार्ग से जहाज हुआ करते थे, वैसे वक्त पर रेल लाइन बिछाकर यह कहा जाता है कि अंग्रेजों ने बड़ी पहल की।

बाबा राघवदास भगवान दास स्नातकोतर महाविद्यालय में इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष अजय मिश्र

उस समय बरहज बाजार गोरखपुर जिले के अंतर्गत आता था। पूर्वांचल के देवरिया को जहां बाद में सर्वाधिक चीनी मिलों के चलते इसे चीनी का कटोरा कहा गया, इसके पूर्व इस इलाके में खंडसारी की 300 से 400 मिलें हुआ करती थीं। पूर्वांचल की अर्थव्यवस्था का यह मजबूत आधार था। इसकी व्यापकता का इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि यहां से तैयार सीरा देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा जलमार्ग से ढाका तक जाता था।

गिरमिटिया मजदूर की परंपरा से दूर रहा यह इलाका

बरहज महाविद्यालय के राजनीति शास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. अरविंद पाण्डे उस दौर की चर्चा करते हुए कहते हैं कि रोजगार व आर्थिक समृद्धि के लिहाज से मजबूत स्थिति का आकलन करने के लिए गिरमिटिया मजदूरों के इतिहास को समझना होगा। अंग्रेज भारतीय मजदूरों को एक एग्रीमेंट के तहत देश के बाहर विभिन्न क्षेत्रों में मजदूरी कराने के लिए ले जाते थे। इसी एग्रीमेंट को कालांतर में अपभ्रंश के रूप में गिरमिटिया कहा जाने लगा है। उत्तर भारत के अलावा महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के भी मजदूर वहां जाते थे। जिस समय भारतीय मजदूरों का मॉरीशस जाना शुरू हुआ, उस समय मॉरीशस की सुगर इंडस्ट्री खत्म होने के कगार पर थी। गन्ने का उत्पादन कम होने से फैक्टरियां बंद हो रही थीं। भारतीय मजदूरों ने उनमें एक नई जान फूंकी। पहले के समय दुनिया भर में चीनी की मांग बढ़ने से मॉरीशस की अर्थव्यवस्था को खासा मुनाफा हुआ था। पर बाद में एकल फसल पर आधारित उद्योग वाली अर्थव्यवस्था के नाते इसका पतन हुआ और फिर धीरे-धीरे यहां दूसरे उद्योग-धंधों का लगना शुरू हुआ। पर आज भी मॉरीशस की एक्सपोर्ट आमदनी में एक-तिहाई हिस्सा चीनी का है।

प्रोफेसर अरविंद पांडेय

खास बात यह है कि गिरमिटिया मजदूर के रूप में यहां के लोगों के पलायन के बावजूद पूर्वांचल के बरहज का यह हिस्सा खुद मजबूत अर्थव्यवस्था का उस दौर में इतिहास रच रहा था। पूर्वांचल में चीनी मिलों की स्थापना के पूर्व तक खांडसारी प्रमुख उद्योग हुआ करता था।

वर्ष 1952 में बना नगरपालिका क्षेत्र

बरहज के स्वंतत्रता सेनानी रहे विश्वनाथ तिवारी के पुत्र व अधिवक्ता वीरेंद्र तिवारी कहते हैं कि अंग्रेज साहित्यकार कार्ल लाइ ने देवरिया क्षेत्र का दौरा करते हुए यहां के इतिहास का उल्लेख किया है। जिसमें कहा कि बरहज अठारह सौ के दशक में नोटिफाइड एरिया हुआ करता था। जिसे बाद में 1952 में नगरपालिका घोषित कर दिया गया। गौरा व बरहज को मिलाकर इस नगरपालिका का गठन किया गया। यहां सरयू नदी के किनारे गौरा है।

जहां बंजारों की एक बड़ी बस्ती हुआ करती थी। मझौली के राजा ने इस बस्ती को खाली करा दिया। जहां इनके वंशज अभी रहते हैं। 200 वर्ष पूर्व यहां खांडसारी की मिल हुआ करती थी। यहां के सीरे की सप्लाई ढाका तक किए जाने की बात वे भी करते हैं। उस दौरान महावीर प्रसाद केडिया से भी अधिक बड़ा उद्यमी बेचू साहू हुआ करते थे। एक अनुमान के मुताबिक 1914 में यहां खांडसारी का 1 करोड़ रूपये का व्यवसाय हुआ था। इसके बाद ही पूर्वांचल में चीनी मिलों की स्थापना शुरू हुई।

वीरेंद्र तिवारी

प्रतापपुर में स्थापित हुई देश की पहली चीनी मिल

इसके पूर्व ही वर्ष 1903 में प्रतापपुर में देश की पहली चीनी मिल की स्थापना के बाद खांडसारी के विकल्प के रूप में चीनी का उत्पादन शुरू हो गया था। खास बात यह है कि प्रतापपुर देवरिया जिले व बिहार के सीवान जिले के सरहद पर मौजूद है। गन्ने के लिए न्यूनतम मूल्य तय करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित चीनी बेंत अधिनियम, 1934 को राज्य सरकार ने लागू कर दिया। गन्ना विकास के क्षेत्र में किसानों के हित में यह बड़ा कदम था। गन्ना विकास विभाग की स्थापना उत्तर प्रदेश में वर्ष 1935 में ही कर दी गई। ऐसे में जल्द ही उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य बन गया। जिसका प्रमुख केंद्र देवरिया हुआ करता था। बाद के दिनों में ऐसा भी समय आया कि उत्तर प्रदेश में कुल 157 चीनी मिलें हो गईं। ब्राजील के बाद भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश बन गया। ऐसे वक्त में देवरिया के बाद पूर्वांचल का गोरखपुर, बस्ती,गोंडा के अलावा पश्चिम में मेरठ,सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मुरादाबाद चीनी उत्पादन के प्रमुख केंद्र बन गए।

उधर इसका नतीजा रहा कि बरहज समेत आस-पास के खांडसारी के उद्योग बंद होते चले गए। वर्ष 1916 आते-आते ये सभी उद्योग बंद हो गए। इसके बाद भी यहां के उद्यमियों ने हार नहीं मानी। अब लकड़ी के निर्मित सामानों के क्षेत्र में यह अपनी पहचान बनाने लगे। यहां के लकड़ी के बने फर्नीचर की मांग बढ़ती चली गई।

इसके अलावा लोहे के सामान जैसे ताला,आलमारी,कड़ाह आदि का निर्माण होने लगा। लेकिन सरकारी संरक्षण के अभाव में आजादी के बीस साल बाद ही ये सभी उद्योग प्रतिस्पर्द्धा में नहीं टिक पाए। प्रमुख उद्यमी सूर्यकांत के यहां बने कड़ाही व आलमारी की बाहर बहुत ही मांग रही। अब ये सब उद्यम बंद हो जाने से यहां विरानगी छाई हुई है। लिहाजा इन उद्योगों के ठप पड़ने से वर्ष 1962 के बाद से यहां के कारीगरों व मजदूरों का पलायन शुरू हो गया। इसके बाद से लगातार यह इलाका मजदूरों के बड़े हब के रूप में अपना पहचान बनाकर रह गया है। ऐसे में देखना है कि योगी सरकार के शुरू हुए दूसरे कार्यकाल में पूर्वांचल के विकास के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।

(बरहज, देवरिया से जितेंद्र कुमार उपाध्याय की रिपोर्ट।)

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