Subscribe for notification

बैटल ऑफ बंगाल: ममता के चलते बीजेपी के लिए वाटरलू साबित होगा बंगाल का चुनाव

इतने सालों में बंगाल और देश समझ गए हैं कि ममता बनर्जी को कम कर के नहीं आंका जा सकता। साधारण साड़ी और चप्पल पहनने वाली इस प्रखर नेत्री नामुमकिन को मुमकिन करने और राज्य से वाम मोर्चे के हटाने के लिए लठबाजी के अलावा और भी बहुत कुछ किया। एक दशक के बाद ममता का वास्ता फिर एक वैसी ही स्थिति से पड़ा है और देश की निगाहें फिर उसी तरफ लगी हैं। क्या दोबारा मुख्यमंत्री बनी इस महिला में अभी भी इतनी हिम्मत है कि पहले विरोधी से ज्यादा सशक्त और विरोधी से भिड़ जाए, ऐसा विरोधी जिसके लिए लगभग एक महीने से कुछ अधिक समय बाद संपन्न होने वाले चुनाव में अपना लक्ष्य पा लेना असंभव नहीं लगता।

अगर तृणमूल अपनी सत्ता कायम रखती है तो वह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को हराने वाले मुट्ठी भर राजनैतिक नेताओं में गिनी जाएंगी। ऐसे समय में जब कांग्रेस लड़खड़ा रही है, उनका नाम विपक्ष के महानतम नेताओं में पुख्ता मुकाम हासिल कर लेगा।

यदि बीजेपी जीतती है तो पश्चिमी बंगाल उन राज्यों में शुमार हो जाएगा जिनमें बीजेपी अपनी विचारधारा का ताना बाना खड़ा करना जरूरी समझती है। दांव पर इससे अधिक, और स्पष्ट, कुछ नहीं हो सकता। 2019 में बीजेपी का गुप्त मंत्र , खामोशी से कमल को वोट दो, था। पर अब तो विकल्प के बारे में कोई संशय ही नहीं है।

बंगाल की बेटी बनाम सोनार बांग्ला

तृणमूल कांग्रेस ने इस चुनाव को, बंगाल की अपनी बेटी, बनाम बेगानी बीजेपी की प्रदेश के लिए अस्पृश्य सांप्रदायिक राजनीति, के बीच मुकाबले का रूप से दिया है। बीजेपी विकास और रोजगार के वायदे कर रही है, यानी सोनार बांग्ला की वापसी।

इन बिंदुओं पर बीजेपी ममता को कमजोर मानती है क्योंकि वे वाम मोर्चे के विरुद्ध मां, माटी और मानुष के अभियान की बदौलत ही सत्ता में आई थीं, ऐसा अभियान जिसने नंदीग्राम में सेज और सिंगूर में टाटा नैनो प्रोजेक्ट बंद करवा दिए थे। बीजेपी का ममता सरकार पर आरोप है कि वह राज्य में निवेश जुटाने या रोजगार मुहैया करवाने में असफल रही हैं, जिसके कारण वहां के लोगों को विस्थापन भुगतना पड़ा।

कोविड के कारण हुई तालाबंदी में तो हद हो गई हजारों प्रवासी राज्य में लौट आए जहां क्वारेंटाइन की सुविधाएं भी खराब थीं। ममता सरकार ने हर प्रवासी मजदूर को एक हजार रुपए का अनुदान देने की घोषणा की, उसका भी बहुत कम हिस्सा ही दिया गया।

उद्योग विरोधी होने के आरोप को खारिज करते हुए बंगाल के वित मंत्री अमित मित्रा ने सरकार के बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट से संबद्ध आंकड़े देते हुए कहा कि 2015 से 2019 तक बंगाल को 1232603 करोड़ रुपए के कारोबार के प्रस्ताव मिले थे। 28 लाख रोजगारों का सृजन पहले ही हो चुका है।

ममता ने दलील दी है कि जहां सारे देश में बेरोजगारी बढ़ी है, बंगाल में एमएसएमई सेक्टर को बढ़ावा देते हुए 40 प्रतिशत रोजगारों की वृद्धि की गई है।

अभी ही ममता ने, सरकार आपके द्वार, और आपके पड़ोस में ही समाधान, ये दो कार्यक्रम शुरू किए हैं। कर्मचारी कल्याणकारी योजनाओं से लाभ देने के लिए कैंप लगा रहे हैं। जिनमें स्वस्थ साथी नाम की 5 लाख रुपए वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजना भी शामिल है। कर्मचारी, सड़कों की मरम्मत,, निकासी व्यवस्था और पीने के पानी से संबद्ध समस्याओं को भी नोट कर रहे हैं। ये योजनाएं, ममता की पहली और लोकप्रिय योजनाओं, जैसे वृद्धावस्था पेंशन और लड़कियों के लिए कन्याश्री की अगली कड़ी हैं।

फरवरी में लेखानुदान प्रस्तुत करते हुए ममता सरकार ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए 20 लाख पक्के घर बनाने और इंग्लिश माध्यम के स्कूल खोलने, सरकार से मान्यता प्राप्त मदरसों के लिए अनुदान बढ़ाने, चाय बागान में स्कूल खोलने, किसानों की सहायता में वृद्धि करने और कामगारों को पांच अंडों का भोजन देने जैसी योजनाओं की घोषणा की थी।

तृणमूल के सांसद सौगत राय ने बताया है कि स्वस्थ साथी को अपार सफलता मिली है। कोविड के कारण हुए लॉकडाउन में लोगों को मुफ्त राशन दिए जाने की भी प्रशंसा हुई है। 5 रुपए में भोजन देने वाली योजना भी सफल रही है। संक्षेप में, हमारी स्थिति मजबूत है।

ममता को बतौर बंगाल की अपनी बेटी प्रस्तुत करने का उद्देश्य है महिला मतदाताओं को लुभाना, जिनका दीदी को समर्थन मिलने की पूरी उम्मीद है।ममता की सभाओं में महिलाओं की भारी संख्या में उपस्थिति होती है और तृणमूल की प्रमुख अपने अभियान की शुरुआत उत्तरी बंगाल में महिलाओं की पदयात्रा के साथ करना चाहती हैं।

तृणमूल सांसद काकोली घोष दस्तीदार का कहना है कि बाल कन्याओं और महिलाओं के लिए ममता बनर्जी द्वारा चलाई गई योजनाओं की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा हुई है। बीजेपी शासित राज्यों में महिलाओं के प्रति हिंसा और सामूहिक बलात्कार के समाचार मिलते रहे हैं। पर बंगाल में महिलाएं सुरक्षित हैं। लेकिन जाति और सांप्रदायिकता की बिसात बिछ चुकी है।

लेकिन बहुत ही ध्रुवीकृत इस अभियान में वोट दिलाने वाले हर समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिए जंग छिड़ चुकी है।

23 जनवरी को सुभाष चंद्र बोस से जुड़े एक कार्यक्रम, जिसमें प्रधानमंत्री मौजूद थे, में भीड़ के एक हिस्से द्वारा जय श्री राम का नारा लगाए जाने के बाद मुख्यमंत्री ने संबोधन करने से इंकार कर दिया। ममता ने गुस्से में कहा, यह सरकारी कार्यक्रम है, किसी राजनैतिक दल का नहीं।

बीजेपी ने तीखी प्रतिक्रिया करते हुए कहा कि ममता जय श्री राम का विरोध कर रही हैं और मुसलमानों का तुष्टीकरण। बंगाल की जनसंख्या का 30 प्रतिशत होने के कारण मुस्लिम आबादी सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। बीजेपी इसके उलट हिंदुओं के ध्रुवीकरण पर आस लगाए बैठी है।

तृणमूल ने अपने पहले दावे, कि राम बंगाल की संस्कृति का अभिन्न अंग नहीं हैं, से कदम पीछे हटा लिए हैं। और उसके विपरीत, जय बांग्ला, का सर्व समावेशी नारा दिया है। ममता ने लोगों को अनुरोध किया है कि फोन कॉल रिसीव करते समय वे, जय बांग्ला, कहें।

तृणमूल को आशा है कि मुस्लिम ममता सरकार का साथ देंगे जिसने इमामों के लिए भत्ते, मुस्लिम छात्रों के लिए छात्रवृत्तियां और मान्यता प्राप्त मदरसों के लिए अनुदान की घोषणा की है।

मुकाबले में मुस्लिम वोटों का हकदार होने का दावा करने वाले, नए प्रतिस्पर्धी एआईएमआईएम और फुरफुरा शरीफ के मुल्ला अब्बास सिद्दीकी के उतरने के कारण ममता ने आरजेडी, समाजवादी दल जैसे क्षेत्रीय दलों को अपने पक्ष में आने का निमंत्रण दिया है। तृणमूल को उम्मीद है कि इससे हिंदी भाषी वोटरों में बीजेपी की पहुंच रोकी जा सकेगी।

साथ ही तृणमूल अपनी मुस्लिम समर्थक होने की छवि को भी दुरुस्त करने की कोशिश कर रही है। सर ढके नमाज अदा करती ममता के पोस्टर अब नजर नहीं आते। और तृणमूल सरकार ने हिंदू पुजारियों के लिए भी अब स्टाइपेंड की घोषणा कर दी है। राम नवमी और हनुमान जयंती में अब रुकावट नहीं डाली जाएगी, हालांकि इनके मुख्य आयोजक बीजेपी वाले ही होंगे।

चुनावों के नजदीक होने के कारण बीजेपी ने अब अपनी परिवर्तन यात्रा शुरू कर दी है, जिनमें से कई यात्राएं अल्पसंख्यकों के इलाकों से गुजरेगी। हालांकि यात्राओं से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने वाले। इसके अलावा बीजेपी कबीलों और मटुआ, अनुसूचित जाति, के वोट हासिल करने के भी प्रयास कर रही है जिन्होंने 2019 के लोक सभा चुनावों में भी बीजेपी का साथ दिया था। मटुआ, बांग्ला देश से आए हिंदू शरणार्थी हैं जिनका 42 विधान सभा क्षेत्रों में असर है। लेकिन नागरिकता संशोधन अधिनियम, जिससे इनको जल्दी ही नागरिकता मिल जाती, में देर होने के कारण उनमें भी मोहभंग की स्थिति बनी हुई है।

विद्यासागर विश्व विद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर प्रतिम बसु का मानना है बीजेपी के सारे शोर शराबे के बावजूद ममता की स्थिति सुदृढ़ है। वाम मोर्चे को हटाने के बाद तृण मूल ने अपना संगठन मजबूत किया है। पार्टी बंगाल और वहां की जनता को समझती है। और जहां ममता बनर्जी की छवि बरकरार रही है, वहीं बीजेपी के पास बंगाली बोलने वाला मुख्यमंत्री के पद के लिए कोई उम्मीदवार नहीं है।

इस बारे में बीजेपी ने स्थिति स्पष्ट नहीं की है, क्योंकि अमित शाह ने इतना ही कहा है कि मुख्यमंत्री कोई भूमि पुत्र ही होगा। जिन नामों पर चर्चा होती है, उनमें बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष, जिनके तुरत फुरत में दिए गए बयान मध्यम वर्ग को नहीं सुहाते, तृणमूल से आए सुवेंदु अधिकारी और क्रिकेटर सौरव गांगुली के नाम शामिल हैं, हालांकि गांगुली इस बारे में अनिच्छुक दिखते हैं।

तृणमूल के उम्मीदवारों में 50 महिलाएं, पूरी संख्या का 17 प्रतिशत, 42 मुस्लिम यानी 14.43 प्रतिशत, शामिल हैं, जिनमें अधिकांश अनुसूचित जातियों से हैं। पार्टी ने मौजूदा 27 उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया है।

कमल पर मोहर

बंगाल की कैडर पर आधारित राजनीति में एक नई पार्टी का पैर जमाना, शब्दश: अपने शरीर को जोखिम में डालने जैसा है। लेकिन बीजेपी ने अपना संगठनात्मक ढांचा खड़ा कर लिया है। स्थानीय ऑफिसेज में कोई रुकावट नहीं है, दल के नेताओं को सुरक्षा का आश्वासन और किसी प्रकार के जोखिम के लिए बीमा तक की गारंटी उपलब्ध है, वरिष्ठ नेता वहां भेजे जा रहे हैं, और बंगाल को एजेंडे में सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसी कारण 2019 के लोक सभा चुनावों में बीजेपी ने 42 में से 19 सीटों पर स्तब्धकारी विजय हासिल की। 2014 में यह संख्या 2 थी। और तब से रास्ता सहज होता जा रहा है।

2015 से प्रदेश में बीजेपी की पीठ पर मौजूद नेताओं में राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय शामिल हैं। तृणमूल के पूर्व नंबर 2 के साथ मिलकर उन्होंने कई नेताओं को फुसलाया और पार्टी बदल कर बीजेपी में शामिल करवाने में सफलता पाई।

विकास का वायदा करने के साथ साथ पार्टी ने अपने अभियान में ममता सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था की असफलताएं, अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण और बुआ भतीजे का राज जैसे मुद्दों को भी शामिल किया है। इन आरोपों का बहुतों पर ठीक निशाना लगा, जैसे तृणमूल के कार्यकर्ताओं द्वारा अवैध कमीशन लेना, पैसे ऐंठना, गाय की तस्करी, कोयले की तस्करी जैसे कारनामों में लिप्त होना और सिंडिकेट राज की मौजूदगी। यह सब वाम मोर्चा के समय से व्यवस्थित ढंग से चला आ रहा था। पर तृणमूल के नेताओं पर आरोप है कि उन्होंने अपनी ही जेबें भरी और निचले स्तर तक बांट नहीं हुई। लोगों को एम्फन चक्रवात के बाद तृणमूल नेताओं द्वारा राहत कोष के इधर उधर करने की बातें अभी तक याद हैं।

राजनैतिक हिंसा का उल्लेख करते हुए बीजेपी वोटरों के पास, और अन्याय नहीं, जैसे नारे भी लेकर जा रही है। बीजेपी का दावा है कि पिछले 3 सालों में बंगाल में उसके 130 से भी ज्यादा कार्यकर्ता मारे गए हैं।

दिलीप घोष कहते हैं कि उनका लक्ष्य सत्ता पाने से भी आगे का है। हम ऐसा सोनार बांग्ला बनाना चाहते हैं जिसमें लोगों को कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए दलाली नहीं देनी पड़े। हम महिलाओं और बेटियों को सुरक्षा देना चाहते हैं। यह तभी होगा जब हमारे पास दो इंजन वाली सरकार हो। मतलब केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार हो। हमें 294 में से 200 सीट जीतने की आशा है।

चुनावों के नजदीक आने के साथ साथ, ममता का दल छोड़ने वाले सदस्यों के कारण भी बीजेपी का हौसला बढ़ा है। ममता के बहुत से विश्वासपात्र सहयोगियों में कई अब उनके साथ नही हैं, मुकुल रॉय, जिन्होंने ने 2017 में साथ छोड़ दिया , से लेकर शुवेंद्र अधिकारी, जिन्होंने (पिछली सितंबर), राजीव बनर्जी(31 जनवरी) और दिनेश त्रिवेदी (फरवरी), इसके अलावा लगभग एक दर्जन विधायक इनमें शामिल हैं।

सिविल सोसाइटी के कई सदस्य और बंगाली फिल्मों और टेलीविजन के कई सितारे भी अपनी निष्ठा बदल कर बीजेपी में शामिल हो गए हैं।

उसके साथ बीजेपी के राजनैतिक नेता अमित शाह, बीजेपी प्रमुख जे पी नड्डा से लेकर यूपी के मुख्य मंत्री आदित्यनाथ योगी और कई केंद्रीय मंत्री तक दे रहे हैं जो नियमित रूप से बंगाल का दौरा करते रहे हैं। तृणमूल में ममता के अलावा कोई उल्लेखनीय नेता नहीं। अभियान की समाप्ति तक मोदी लगभग 20 सभाएं कर सकते हैं। तृणमूल ने आरोप लगाया है कि चुनाव आठ दौरों में इसलिए करवाए जा रहे हैं ताकि दूसरे प्रदेशों में चुनावों से फारिग हो कर प्रधानमंत्री अपना सारा समय बंगाल को से सकें। बीजेपी के प्रमुख नेता लगभग 100 रैलियां कर सकते हैं।

कई और लोग भी तृणमूल छोड़ कर जा सकते हैं जैसे जैसे केंद्रीय एजेंसियां इसके नेताओं के मामलों में पड़ताल करेंगी। दल बदल कर बीजेपी में आने वाले कई नेताओं ने भी ऐसी जांच का सामना किया है। ममता के घर तक भी यह एजेंसियां पहुंच गई हैं, जब परवर्तन निदेशालय ने उसके भतीजे अभिषेक पर निशाना साधा जिसका बीजेपी वाले “भाईपो” कहकर मजाक उड़ाते हैं।

पार्टी के भीतर के जानकारों का मानना है की अभिषेक ममता और तृणमूल की दुखती नस हैं और पार्टी के कई लोग, अधिकारी समेत, इस 33 साल के इंसान के इतनी जल्दी तरक्की करने के कारण ही पार्टी छोड़ गए। सूत्रों के अनुसार तृणमूल के बीजेपी में जाने वाले कई नेताओं ने पार्टी को बताया है की इस दुखती रग के जरिए अन्य लोगों तक भी पहुंचने की कोशिश की जा सकती है।

तृणमूल के विधायकों में से बीजेपी में शामिल होने वाले एक सदस्य मिहिर गोस्वामी का कहना है की पार्टी अब बदल चुकी है। अभिषेक और प्रशांत किशोर ने पार्टी को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बना दिया है। पार्टी में अब किसी को सम्मान नहीं मिलता।

2019 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल की लोकसभा में सीटें 34 से गिरकर 22 पर आ जाने के बाद इस प्रभावशाली राजनैतिक रणनीतिकार को पार्टी में लाया गया। लोगों के लिए एक सीधा शिकायत कक्ष “दीदी के बोलो” जैसी पहल करने के पीछे किशोर का ही दिमाग है। उसके बारे में यह भी कहा जाता है की विधायकों और सांसदों का मूल्यांकन करने जैसी उसकी कारगुजारी ने पार्टी में बहुत लोगों को नाराज भी कर दिया।

सूत्रों के अनुसार ममता ने हाल ही में इस कारण होने वाले नुकसान को रोकने की कोशिश की है। उसके निकट के एक सूत्र ने बताया है कि किशोर काम तो कर रहा है पर अब दीदी ही इंचार्ज हैं।

संयुक्त फ्रंट

कभी विरोधी रहे साम्यवादी और धार्मिक शक्तियों का यह एक असंभव सा संगठन है। लेकिन लगभग हाशिए तक पहुंचा दिए गए। सीपीएम और कांग्रेस के पास अब न के बराबर विकल्प है। पहले इन दोनों दलों में एकजुट होने पर बवाल उठता था, हारकर अब दोनों ने इस विकल्प को चुन लिया है। दोनों को 2019 के चुनाव में बंगाल में केवल 13 प्रतिशत वोट मिले थे। फुरफुरा शरीफ के मजार के इमाम अब्बास सिद्दकी की तरफ हाथ बढ़ाना शायद इस सब की सहज नियति थी।

इस संयुक्त फ्रंट में अभी भी कुछ के तेवर चढ़े हैं क्योंकि कांग्रेस सिद्दीकी के इंडियन सेक्युलर फ्रंट को। अपने बचे कूचे मालदा, मुर्शिदाबाद जैसे गढ़ों में सीटें देने में कोताही कर रही है। लेकिन 28 फरवरी को हुगली के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में फ्रंट द्वारा आयोजित रैली में विशाल जन समूह की उपस्थिति के कारण शायद मामला सुलझ जाए।

सीपीएम के विधायक सूजन चक्रवर्ती कहते हैं कि वामदलों ने बंगाल में सांप्रदायिक शक्तियों को सिर उठाने नहीं दिया। तृणमूल ने अस्मितावाद और सांप्रदायिकता की राजनीति को बढ़ावा दिया जिससे बीजेपी को पैर जमाने में मदद मिली।

सीपीएम के सिद्दीकी की पार्टी से गठजोड़ के कारण बीजेपी को उसकी धर्मनिरपेक्षता की कलई खुलने का आरोप लगाने पर चक्रवर्ती का कहना है कि सिद्दीकी धर्म और जाति से परे होकर आम आदमी की मांगें ही उठा रहे हैं और सीपीएम की तरह वह भी निचले तबकों के लिए ही मुखर हैं।

परदेस में कांग्रेस प्रमुख अधीर चौधरी आईएसएफ के साथ किसी भी तनाव को महत्व न देते हुए कहते हैं की हमारा गठबंधन वाम मोर्चे के संग है। पहले हम वाम मोर्चे के साथ सीटों के बंटवारे के मामले का निपटान करेंगे।

इस बड़ी तस्वीर का अक्स एक और बात से स्पष्ट हो गया है। 7 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी उसी ब्रिगेड परेड ग्राउंड में एक रैली को संबोधित किया। राजभवन, ईस्टर्न आर्मी कमांड के मुख्यालय, विक्टोरिया टर्मिनल और ईडन गार्डन से घिरा यह मैदान बंगाल के कई मील के पत्थरों का साक्षी रहा है। चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद मोदी की यह पहली जनसभा थी।

(इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित राविक भट्टाचार्य और शांतनु चौधरी की रिपोर्ट। अनुवाद महावीर सरबर ने किया है। साभार।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on March 9, 2021 2:35 pm

Share