Sunday, May 29, 2022

आजम खां को सुप्रीम राहत, मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की भूमि के अधिग्रहण पर रोक 

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उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को रामपुर में मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को आवंटित भूमि के अधिग्रहण पर रोक लगा दी। जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रवि कुमार की पीठ ने मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका पर उत्तर प्रदेश राज्य को नोटिस जारी करते हुए अंतरिम आदेश पारित किया, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के अतिरिक्त जिला, मजिस्ट्रेट, रामपुर, यूनिवर्सिटी को आवंटित लगभग 400 एकड़ भूमि वापस लेने के लिए जारी निर्देश में हस्तक्षेप करने से इनकार करने को चुनौती दी गई थी। ट्रस्ट के अध्यक्ष समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान हैं। 

वर्ष  2005 में जब यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई थी, तब राज्य सरकार ने मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट को उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 154 (2) के तहत यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए 12.5 एकड़ (5.0586 हेक्टेयर) की सीमा के विरुद्ध 400 एकड़ भूमि का अधिग्रहण करने के लिए अनुमति दी थी। अनुमति कई शर्तों के साथ दी गई थी। उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की द 104/105 मार्च, 2020 में सब डिविजनल मजिस्ट्रेट, रामपुर ने बताया कि ट्रस्ट ने कई उल्लंघन किए हैं, जैसे कि अनधिकृत निर्माण (एक मस्जिद सहित) और शैक्षिक उद्देश्यों के अलावा अन्य गतिविधियों के लिए भूमि का डायवर्जन। 

एसडीएम की रिपोर्ट के आधार पर एडीएम ने जनवरी, 2021 में उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 104/105 के तहत शक्तियों का आह्वान करते हुए एक आदेश पारित किया। यूनिवर्सिटी को 12.5 एकड़ से अधिक की भूमि अधिग्रहण के लिए राज्य सरकार की अनुमति लेनी होगी। 

ट्रस्ट ने एडीएम के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसमें कार्यवाही के नोटिस की तामील की कमी, खंडन करने के अवसर से वंचित करना शामिल हैं। जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने 6 सितंबर, 2021 को रिट याचिका खारिज कर दी। एकलपीठ ने कहा कि पक्षकारों के वकील को सुनने और रिकॉर्ड के अवलोकन के बाद मैंने पाया कि याचिकाकर्ता-ट्रस्ट द्वारा हस्तक्षेप का कोई मामला नहीं बनाया गया है, क्योंकि ट्रस्ट द्वारा भूमि का हस्तांतरण अधिनियम, 1950 की धारा 157-ए से प्रभावित है। इसके अलावा राज्य द्वारा 7 नवम्बर 2005 को दी गई अनुमति की शर्तों का उल्लंघन किया गया है, जिसके लिए संस्थान को इसका सख्ती से पालन करना आवश्यक है। किसी भी उल्लंघन से राज्य सरकार में 12.5 एकड़ को छोड़कर भूमि निहित हो जाएगी।

कोर्ट ने कहा कि एसडीएम की रिपोर्ट में यह स्पष्ट है कि ‘मस्जिद’ का निर्माण मंजूरी/अनुमति की शर्त का उल्लंघन है, क्योंकि ट्रस्ट को केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए भूमि का उपयोग करने की आवश्यकता है। अदालत ने कहा कि यह तर्क कि परिसर में शिक्षण के साथ-साथ गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए आवासीय परिसर है, उनके लिए एक ‘मस्जिद’ का निर्माण किया गया है, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह राज्य द्वारा दी गई अनुमति के खिलाफ है।

कोर्ट ने आगे कहा कि मौजूदा मामले में 12.50 एकड़ से अधिक भूमि के हस्तांतरण की अनुमति केवल एक शैक्षणिक संस्थान की स्थापना के लिए दी गई है। ‘मस्जिद’ की स्थापना 07 नवम्बर, 2005 को दी गई अनुमति के खिलाफ है। इस प्रकार ट्रस्ट ने शर्तों का उल्लंघन किया है। नंबर पांच में स्पष्ट रूप से प्रावधान किया गया है कि किसी भी शर्त के उल्लंघन की स्थिति में 12.50 एकड़ से अधिक भूमि सुनवाई का अवसर प्रदान करने के बाद राज्य सरकार में निहित होगी न तो प्रतिवादी नंबर तीन के समक्ष उत्तर में और न ही इस अदालत के समक्ष याचिकाकर्ता-ट्रस्ट एक ‘मस्जिद’ स्थापित करने की कार्यवाही को उचित ठहरा सकता है जो अनुमति आदेश दिनांक 07 नवम्बर 2005 में निर्धारित शर्तों का स्पष्ट उल्लंघन है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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