Tuesday, January 18, 2022

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अपने ही बिछाए जाल में फंस गयी बीजेपी! विदेश मंत्री और एनएसए के चीनी संस्थाओं से निकले सीधे रिश्ते

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नई दिल्ली। मौजूदा समय और परिस्थितियों के हिसाब से जो जानकारी सामने आ रही है वह अपने आप में बेहद सनसनीखेज है। इसके सामने आने के बाद यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस से जुड़े राजीव गांधी पीस फाउंडेशन को मिलने वाली डोनेशन की राशि पर सवाल उठाने वाली बीजेपी अब खुद अपने ही बुने जाल में फंस गयी है। यह मामला इसलिए गंभीर हो जाता है कि इसमें सीधे देश के विदेश मंत्री शामिल हैं जिनके कंधे पर मौजूदा संकट के समय राजनयिक और कूटनीतिक समेत हर तरह से चीन से निपटने की जिम्मेदारी है। 

बताया जा रहा है कि विदेश मंत्री एस जयशंकर के बेटे से जुड़े और विदेश नीति पर बने थिंक टैंक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) ने चीनी कंसुलेट से 2016 में अच्छी खासी रकम हासिल की है। आप को बता दें कि ओआरएफ को रिलायंस इंडस्ट्रीज का भी समर्थन हासिल है।

इसके अलावा आरएसएस और बीजेपी से नाभिनाल का संबंध रखने वाले विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (वीआईएफ) जिसके संस्थापक सदस्यों में सरकार के मौजूदा सुरक्षा सलाहकार हैं, के विदेश और सामरिक क्षेत्र में काम करने वाली नौ चीनी संस्थाओं के साथ रिश्ते हैं। अब एक तरफ विदेश मंत्री और दूसरी तरफ पीएमओ से सीधे जुड़े अजीत डोभाल के चीन के साथ इन रिश्तों के सामने आने के बाद कांग्रेस पर लगाया जा रहा बीजेपी का आरोप कितना कमतर हो गया है यह किसी के लिए समझना मुश्किल नहीं है। विवेकानंद फाउंडेशन वह प्लेटफार्म है जिसके लोग मौजूदा सरकार के कई महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं।

टेलीग्राफ में प्रकाशित खबर के मुताबिक विदेश मंत्री के बेटे ध्रुव जयशंकर पिछले साल ही ओआरएफ के निदेशक बने हैं। विदेश मंत्री जो पहले चीन में भारत के राजदूत भी रह चुके हैं, अक्सर लेक्चर के सिलसिले में ओआरएफ का दौरा करते रहे हैं। उनका ये दौरा या फिर बातचीत विदेश नीति से जुड़े मसलों पर हुआ करती थी।

दिलचस्प बात यह है कि ओआरएफ ने खुद अपने पोर्टल पर दानदाताओं के नाम लिख रखे हैं जिनसे उसको धन मिलता रहा है। इस सूची के मुताबिक संस्था को 2016 में इकट्ठे ग्रांट हासिल हुई थी जिसमें कुल 1.25 करोड़ रुपये की रकम शामिल थी। उसके अगले वर्ष उसे 50 लाख रुपये मिले थे।

फाउंडेशन ने 29 अप्रैल, 2016 को 7.7 लाख रुपये हासिल किए। दूसरी किश्त उसे उसी साल 4 नवंबर को मिली। यह राशि 11.55 लाख रुपये थी। ये दोनों राशियां कोलकोता स्थित चीनी कंसुलेट से मिलीं। उसके बाद उसी साल की 31 दिसंबर को उसे पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के कंसुलेट जनरल से उसने 1.068 करोड़ रुपये हासिल किए।

उसके बाद फिर 1 दिसंबर, 2017 को उसे 50 लाख रुपये और मिले।

इसी तरह से विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन ने अपनी वेबसाइट पर उन चीनी संस्थाओं के नाम लिख रखा है जिससे उसके रिश्ते हैं। इनमें इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्ट्रैट्जिक स्टडीज (बीजिंग); सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज, पेकिंग यूनिवर्सिटी, (बीजिंग); रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर इंडियन ओसियन इकोनामीज, यूनान यूनिवर्सिटी ऑफ फाइनेंस एंड इकोनामिक्स, कुमिंग; नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्ट्रैट्जी ऑफ चाइनीज एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेंज, बीजिंग; सेंटर फार साउथ एशिया एंड वेस्ट चाइना कोआपरेशन एंड डेवलपमेंट यूनिवर्सिटी, चेंगुडू; इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज, सिचुआन यूनिवर्सिटी; सिल्क रोड थिंक टैंक नेटवर्क डेवलपमेंट रिसर्च कौंसिल, बीजिंग; और द सेंटर फॉर इंडियन स्टडीज, सेंझेन।

टेलीग्राफ के मुताबिक सुरक्षा से जुड़े इस्टैब्लिशमेंट का कहना है कि दोनों थिंक टैंकों के सदस्यों की पहुंच नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में बेरोकटोक होती रही है। और यह बात किसी से छुपी नहीं है कि सरकार के लिए इन दोनों इमारतों का क्या महत्व है।

टेलीग्राफ ने इस सिलसिले में ओआरएफ को एक मेल किया था। जिसमें ओआरएफ का जवाब आया था कि ‘आपका संदेश मिल गया है और जल्द ही आप से संपर्क किया जाएगा’।

इसके साथ ही टेलीग्राफ ने ओआरएफ के अध्यक्ष समीर सरन को भी ट्विटर पर एक संदेश भेजा था लेकिन अभी तक उसका कोई जवाब नहीं आया।

हालांकि इसके साथ ही टेलीग्राफ ने इस बात को भी स्पष्ट किया है कि वह इस बात का दावा नहीं करता है कि किसी भी तरह का डोनेशन वैध नहीं है।   

(द टेलीग्राफ में अंग्रेजी में प्रकाशित यह रिपोर्ट साभार ली गयी है।)    

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