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नौकरशाहों के डैमेज कंट्रोल से नहीं बनी बात

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बयान पूरे भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान पर भारी पड़ गया है। नौकरशाही डैमेज कंट्रोल में जुट गयी है और उसने दिल्ली से लेकर वाशिंगटन तक एक कर दिया है। मसला भी बड़ा है। और बयान भी एक ऐसे शख्स के जरिये आया है जिसके कहने का अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई मतलब होता है। यह किसी नेपाल या फिर बांग्लादेश के राष्ट्राध्यक्ष का बयान नहीं है। यह दुनिया की राजनीति को अपनी मुट्ठी में रखने की कोशिश करने वाले अमेरिका का है। वैसे भी अमेरिका का दूसरे के फटे में टांग अड़ाने की पुरानी आदत है। और जब यह मौका खुद किसी राष्ट्राध्यक्ष द्वारा मुहैया कराया जाए तो भला वह कहां चूकने वाला है। और विदेश नीति का सामान्य सिद्धांत है कि वह अपने प्राथमिक हितों को ध्यान में रखकर संचालित होती है।

यह नीति केवल और केवल भारत और उसकी मौजूदा सत्ता पर लागू नहीं होती है। वह भारत, इस्राइल और अमेरिका की धुरी बनाने के अपने सपनों को पूरा करने के एवज में हर कुर्बानी देने के लिए तैयार है। खाड़ी देशों से अपने संबंधों की कीमत पर हमारा देश इस्राइल से पींगे बढ़ा रहा है। और खेती से लेकर रक्षा तक हर जगह इस्राइली सामानों और उसकी तकनीकी घुसेड़ी जा रही है। भले ही इसके लिए खाड़ी देशों में रह रहे लाखों भारतीयों के हितों को चोट पहुंचे या फिर वहां से आने वाले पेट्रो डालर की रकम में गिरावट आए। भारत ने तय कर लिया है कि उसे हर कीमत पर इस्राइल से रिश्ते मजबूत करने हैं।

ईरान जिससे भारत के सालों से गहरे रिश्ते रहे हैं। और हर मौके पर वह एक विश्वसनीय मित्र के तौर पर खड़ा रहा है। कश्मीर से लेकर तेल के मामले में वह हमेशा मददगार साबित हुआ है। यह अकेला ऐसा मुल्क है जिसने हमारे साथ डॉलर (विदेशी मुद्रा) की बजाय रुपये में तेल का विनिमय किया है। और एकबारगी तो उसने अनाज के बदले तेल दिए हैं। जिसमें हमारे देश के कई नौकरशाह और राजनेता माला-माल हो गए। लेकिन अब चूंकि अमेरिका चाह रहा है कि आप उससे अपने रिश्ते खत्म कर लें। बगैर गुणा-गणित लगाए आपने उस पर अमल करना शुरू कर दिया। नतीजतन ईरान से आयात होने वाले तेल में लगातार कटौती की जा रही है।

कमोवेश यही हाल रूस के साथ हमारे रिश्तों का है। सालों-साल की दोस्ती जो हर नाजुक मौके पर खरी उतरी है, अमेरिका चाह रहा है कि उसे भारत खत्म कर दे। एस-400 लड़ाकू विमान की खरीदारी हो या फिर दूसरे मामले वह लगातार उसको खत्म करने का सरकार पर दबाव बना रहा है। यह बात अलग है कि अभी तक भारत ने उस पर उस तरह से अमल नहीं किया है। लेकिन मोदी शासन में रूस के साथ रिश्तों के बर्फ के जमने का ही नतीजा था कि उसने पाकिस्तान का रुख कर लिया और उसे भारत के नये विकल्प के तौर पर देखना शुरू कर दिया। अनायास नहीं हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच संयुक्त युद्धाभ्यास से लेकर हथियारों की खरीदारी के क्षेत्र में कुछ नई पहलें हुई हैं।

जिस अमेरिका पर आप भरोसा कर रहे हैं क्या वह उतने भरोसे लायक है? अगर इस्राइल को छोड़ दिया जाए जिससे उसकी दोस्ती एक स्थाई रणनीतिक और सामरिक मामला है, उसने किसी भी देश के साथ स्थाई संबंध नहीं बनाए हैं। और उन देशों को तो उसने खासकर तबाह किया है जिससे उसने दोस्ती की। इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान इसके उदाहरण हैं। पूरे लैटिन अमेरिका को तबाह करके उसके नागरिकों को कंगाल बना दिया और अब जब उसके लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए अमेरिका में घुसने की कोशिश कर रहे हैं तो उनके साथ जानवरों सरीखा व्यवहार कर रहा है।

जहां तक रही कश्मीर की बात तो इस बात में कोई शक नहीं कि कूटनीतिक स्तर पर पाकिस्तान की जीत हुई है। और पाक प्रधानमंत्री इमरान खान ने इसको अंतरराष्ट्रीय मसला बनाने में सफलता हासिल कर ली है। एकबारगी मान लेते हैं कि पीएम मोदी ने कश्मीर मसले पर मध्यस्थता की बात नहीं कही होगी। लेकिन इससे ट्रंप और अमेरिका को ऐसा कहने और करने से तो रोका नहीं जा सकता है। और वह आज नहीं तो कल ऐसा करेंगे। क्योंकि उनका इसी में हित है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि हर देश अपनी विदेश नीति अपने हितों के मुताबिक तय करता है। लिहाजा कश्मीर अमेरिका के लिए हमेशा एक ऐसी फटी चादर है जिसमें वह अपनी टांग अड़ा सकता है। और उसको पता है कि यह भारत की दुखती रग है और एकबारगी अगर उसको अपने नियंत्रण में ले लिया तो स्थाई रूप से भारत की गर्दन उसके हाथ में आ जाएगी।

इसलिए आज नहीं तो कल अमेरिका इस दिशा में बढ़ेगा। यह बात अलग है कि वह इसको कहता नहीं रहा है और पहली बार किसी राष्ट्रपति के मुंह से ऐसा निकल गया। और अगर मोदी ने अपनी बातचीत में उसके कुछ संकेत दिए थे तो वह अपनी गर्दन सौंपने जैसा है। वैसे भी आप जब बिल्ली को अपने घर में आने देंगे तो फिर वह दूध भी पीएगी और खीर भी खाएगी। और क्योंकि वह आपका खासम खास हो चुकी होगी और आप उसे अपने कंधे पर सवार कर चुके होंगे इसलिए उसको चीर भी नहीं सकते हैं।

आखिर में एक चीज हमें समझनी होगी कि यह मामला नौकरशाही के स्तर पर हल होने वाला नहीं है। अगर प्रधानमंत्री ने सचमुच में ऐसा कुछ नहीं कहा है तो उन्हें खुलकर इस बात को कहने में भला क्या एतराज हो सकता है। क्योंकि ऐसा न करने पर वह लोगों के मन में संदेह को और गहरा कर रहे होंगे।

This post was last modified on July 24, 2019 12:55 pm

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