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चीनी राजदूत ने पैंगांग त्सो में चीनी कब्जे वाले क्षेत्र को बताया एलएसी, भारत का कड़ा एतराज

नई दिल्ली। भारत में चीन के राजदूत सुन वेइडांग ने कहा है कि पैंगांग त्सो झील के उत्तरी किनारे पर चीन की परंपरागत सीमा रेखा एलएसी के मुताबिक ही है। इस तरीके से वह पैंगांग त्सो में कब्जे वाले उस नये बिंदु को वास्तविक नियंत्रण रेखा बता रहे हैं जो भारत के दावे वाले वास्तविक नियंत्रण रेखा से पश्चिम की ओर 8 किमी अंदर है। यानी भारतीय सीमा के भीतर है।

उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया जिसमें कहा जा रहा है कि चीन ने पैंगांग त्सो में अपना भौगोलिक विस्तार कर लिया है।

राजदूत की यह टिप्पणी दोनों देशों के बीच होने वाले पांचवें चक्र के कमांडर स्तर की वार्ता से पहले आयी है। जिसकी अगले कुछ दिनों में होने की संभावना है। इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज स्टडीज की ओर से आयोजित एक वेबिनार में उन्होंने कहा कि पैंगांग झील के उत्तरी किनारे पर “चीन की परंपरागत सीमा रेखा एलएसी के मुताबिक है। और यहां इस तरह का कोई मामला नहीं है कि चीन ने अपने जमीनी दावे को विस्तारित कर दिया है। चीन इस बात की उम्मीद करता है कि भारतीय सेना दोनों देशों के बीच के प्रासंगिक द्विपक्षीय समझौतों और प्रोटोकाल का कठोरता से पालन करेगी और चीनी पक्ष वाले एलएसी को अवैध रूप से पार करने से बचेगी।”

उन्होंने कहा कि “दोनों पक्षों के संयु्क्त प्रयास से ज्यादातर इलाकों में सीमा पर तैनात सेना के जवान पीछे हट गए हैं। जमीन पर डिसएनगेजमेंट की स्थिति है और तापमान लगातार कम हो रहा है”।

चीनी राजदूत की टिप्पणियों का जवाब देते हुए नई दिल्ली ने कहा कि कुछ प्रगति जरूर हुई है लेकिन पीछे हटने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो पायी है।

विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि “इस लक्ष्य की दिशा में कुछ प्रगति जरूर हुई है लेकिन अलग होने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो पायी है।” उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों के वरिष्ठ कमांडर इसको हल करने की दिशा में कदम उठाने के लिहाज से जल्द ही मिलेंगे।

उन्होंने कहा कि शांति और स्थायित्व को बरकरार रखना द्विपक्षीय रिश्तों की बुनियाद है। श्रीवास्तव ने कहा कि “इसलिए हम इस बात की उम्मीद करते हैं कि पूरी तरह से अलग होने और पीछे जाने के लिए चीनी पक्ष गंभीरता से हम लोगों के साथ काम करेगा। और जैसा कि विशिष्ट प्रतिनिधियों के बीच तय हुआ था सीमाई इलाके में शांति की बहाली होगी।”

पैंगांग त्सो जहां चीनी सेना ने फिंगर 4 से जुड़ी रिज लाइन को अपने कब्जे में ले रखा है वह उससे पीछे जाने से इंकार कर रही है। लिहाजा माना जा रहा है कि कॉर्प्स कमांडर के बीच अगली बातचीत में दोनों पक्षों का फोकस इसी पर होगा।

चीनी राजदूत ने अपने भाषण में कहा कि चीन भारत के लिए कोई सामरिक खतरा नहीं है। और इसके साथ ही उन्होंने रिश्तों को जबरन खत्म करने की कोशिश को भी खतरनाक बताया।

सुन ने कहा कि “चीन दोनों पक्षों के बीच सहयोग के पक्ष में है और इस तरह के किसी खेल के खिलाफ है जिसमें दोनों को कुछ न हासिल हो। हमारी अर्थव्यवस्था ऊंचे स्तर पर एक दूसरे की पूरक हैं। एक दूसरे से गुथी हुई हैं और परस्पर निर्भर भी हैं। जबरन अलगाव इस प्रवृत्ति के खिलाफ है और यह केवल और केवल उस दिशा में ले जाएगा जिसमें किसी को कुछ हासिल नहीं होगा।”

उन्होंने भारतीय जनमत की उस सोच पर भी अचरज जताया जिसमें वह भारत सरकार से ताईवान, जिंगजियांग, हांगकांग और दक्षिण-चीन सागर पर अपनी स्थिति पर फिर से विचार करने की गुहार लगा रही है।

सुन ने इस बात को चिन्हित करते हुए कहा कि “यह मुझे चिंतत करती है।”

“ताईवान, हांगकांग, जिंगजियांग और जियांग पूरी तरह से चीन के आंतरिक मामले हैं। और चीन की संप्रभुता और उसकी सुरक्षा से जुड़े हुए हैं। जब चीन दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता तो यह बाहरी हस्तक्षेप को भी इजाजत नहीं देगा और न ही अपने बुनियादी हितों से कोई समझौता करेगा”।

गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के एलएसी पार करने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कुछ इस तरीके से पेश किया कि गलवान घाटी की घटना सही हो या कि गलत ‘बहुत साफ’ है। उन्होंने कहा कि “और मैं यहां इस बात को बहुत साफ तरीके से स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि इसके लिए चीनी पक्ष जिम्मेदार नहीं है।”

उन्होंने कहा कि इस अप्रैल के शुरू से “गलवान घाटी से सटे इलाके में सीमा पर तैनात भारत की सेना सड़कें, पुल और इंफ्रास्ट्रक्चर बना रही है। और इसी ने चीनी पक्ष को आगे आकर सेना और कूटनीतिक चैनल के जरिये अपनी मौजूदगी दर्ज करने के लिए बाध्य किया।”

उन्होंने आगे कहा कि “और इसी प्रतिनिधित्व के बाद भारतीय पक्ष अपने लोगों को पीछे ले जाने और इंफ्रास्ट्रक्चर को ध्वस्त करने के लिए राजी हुआ जिसे उसने एलएसी के पार बनाया था। और 6 जून को इसके लिए दोनों पक्षों के कार्प्स कमांडरों की बैठक हुई थी।”

उन्होंने कहा कि “भारतीय पक्ष ने इस बात पर प्रतिबद्धता जाहिर की थी कि वे………गलवान घाटी के मुंहाने तक पेट्रोल या फिर किसी भी इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाने के लिहाज से नहीं जाएंगे। लेकिन दुर्भाग्य से 15 जून की शाम को अग्रिम मोर्चे पर तैनात भारतीय सैनिकों ने इस सहमति को तोड़ दिया जो कमांडरों के बीच बैठक में बनी थी। और वो एक बार फिर एलएसी के पार चले गए। यहां तक कि बातचीत करने के लिए आए चीनी सैनिकों के खिलाफ वो हिंसक हो गए और उन पर हमला बोल दिए। फिर इस विवाद ने एक भीषण संघर्ष को जन्म दे दिया। यह दोनों पक्षों के बीच शारीरिक लड़ाई थी और फिर जिसका नतीजा मौतों के तौर पर सामने आया।”

चीनी पक्ष में मौतों के बारे में पूछ जाने पर उन्होंने कहा कि घटना दुर्भाग्यपूर्ण थी और संख्या संबंधी कोई भी व्याख्या किसी रूप में मददगार साबित होने नहीं जा रही है।

एलएसी पर स्पष्टीकरण में देरी के सवाल पर सुन ने कहा कि एलएसी पर स्पष्टीकरण देने का मुख्य उद्देश्य सीमाई इलाके में शांति की बहाली है। फिर भी अगर एक पक्ष एकतरफा तरीके से अपनी समझ के मुताबिक एलएसी को तय कर लेता है तो बातचीत के दौरान इससे कुछ विवाद पैदा हो सकता है।

इस बीच, चीनी रक्षा मंत्रालय के इस दावे कि दोनों पक्षों की सेनाएं धीरे-धीरे पीछे जा रही हैं और लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर परिस्थिति डिस्कैलेशन की तरफ बढ़ रही है, भारतीय सेना के सूत्रों का कहना है कि पिछले दो हफ्तों से जमीन पर किसी भी तरह का सकारात्मक बदलाव नहीं आया है।

सेना के सूत्रों का कहना है कि पैंगांग त्सो और 17A के पैट्रोलिंग प्वाइंट पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। और माना जा रहा है कि पांचवें चक्र की कमांडरों की वार्ता में यही मुद्दा होगा। हालांकि शुक्रवार को इस बैठक के होने के आसार जताए जा रहे हैं लेकिन अभी तक इस पर किसी भी तरह का आधिकारिक बयान नहीं आया है।

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This post was last modified on July 31, 2020 2:56 pm

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