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Monday, September 20, 2021

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गलवान घाटी में झड़प: बरकरार है चीन का तीन सेक्टरों के कई हिस्सों पर कब्जा!

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पूर्वी लद्दाख के पास भारत-चीन सीमा पर जारी झड़प में चीनी सैनिकों ने हमला कर भारत के 20 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया है। सोमवार की रात हुई इस घटना में मरने वाले सैनिकों में एक कर्नल भी शामिल है।

3488 किमी विवादित सीमा पर 1975 में हुई झड़प के बाद यह पहली घटना है जब दोनों देशों के बीच विवाद खूनी संघर्ष में बदला है। इसके पहले अक्तूबर, 1975 में चीनी सैनिकों ने घात लगाकर असम राइफल्स के चार सैनिकों की हत्या कर दी थी।

मंगलवार की सुबह सेना ने एक बयान जारी कर कहा कि “ गलवान घाटी में पीछे हटने की प्रक्रिया में कल (सोमवार) रात में एक हिंसक झड़प हो गयी जिसमें दोनों पक्षों के लोग हताहत हुए हैं। भारतीय पक्ष से एक अफसर और दो सैनिकों की हानि हुई है। परिस्थिति को सामान्य बनाने के लिए दोनों पक्षों के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी अभी भी मौके पर बैठक कर रहे हैं।”

देर शाम मंगलवार को भारतीय सेना की तरफ से एक और बयान जारी किया जाता है। जिसमें कहा गया कि “ 17 भारतीय सैनिक जो स्टैंड ऑफ लोकेशन पर ड्यूटी करते गंभीर रूप से घायल हो गए थे, पहाड़ की ऊंचाई पर जीरो से नीचे तापमान की चपेट में आने के बाद उनकी मौत हो गयी है। इसके साथ ही एक्शन में मारे गए सैनिकों की संख्या 20 हो गयी है।”

बयान यह भी कहता है कि “भारतीय और चीनी सैनिक गलवान घाटी से पीछे हट गए हैं जहां उनके बीच 15/16 जून, 2020 को झड़प हुई थी।”

इस बात की भी अपुष्ट खबर है कि इस झगड़े में पांच चीनी सैनिकों की भी मौत हुई है।

वरिष्ठ सेना के अधिकारियों ने इस मौके पर बंधक बनाए गए भारतीय सैनिकों के साथ की गयी चीनी बर्बरता को भी चिन्हित किया है। इनमें से कुछ को खड़ी चट्टानों पर फेंक दिया गया। बाद में सैनिकों के शव गलवान नदी से बरामद किए गए।

सूत्रों कहना है कि झड़प पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 (पीपी 14) के नजदीक भारतीय पक्ष वाले एलएसी की सीमा में उस समय हुई जब 300 के करीब पीएलए सैनिकों ने 50 भारतीय सैनिकों के समूह पर हमला बोल दिया। सेना के सूत्रों ने किसी भी तरह के आग्नेय अस्त्र के इस्तेमाल से इंकार किया है। मौतें बर्बर तरीके से की गयी हाथापाई और क्लब्स और स्टेव्स के साथ लड़ाई में हुई हैं।

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने झड़प के लिए भारतीय सैनिकों को जिम्मेदार ठहराया है। उसने इस बात का दावा किया है कि सोमवार को भारतीय सैनिकों ने दो बार अवैध रूप से सीमा पार कर चीनी सैनिकों पर हमला किया। उसने कहा कि ‘बीजिंग ने तीखा विरोध दर्ज किया’ लेकिन साथ ही तनाव को हल करने की दिशा में भी वह काम कर रहा है।

इस बीच, वरिष्ठ अधिकारियों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले महीने चीनी सैनिकों ने भारत के दावे वाले और पेट्रोलिंग क्षेत्रों में घुसपैठ की थी। पीछे हटने और अलग होने के लिए जारी बातचीत के बावजूद उन्होंने उस पर अपनी रक्षा से जुड़ा निर्माण कार्य शुरू कर दिया है।

पैंगांग त्सो सेक्टर में चीनी सैनिक फिंगर 4 पर अपना कब्जा बनाए हुए हैं जिसमें फिंगर 8 और फिंगर 4 के बीच भारत के दावे वाला 8 किमी लंबा क्षेत्र भी शामिल है और जिसको भारतीय वर्जन का एलएसी माना जाता है। गलवान नदी सेक्टर में पीएलए अभी भी पीपी 15 और पीपी 17 और गलवान घाटी की ऊंचाइयों के क्षेत्रों पर कब्जा बनाए हुए है।

यह भी रिपोर्ट आ रही है कि चीनी सैनिक दौलतबेग ओल्डी सेक्टर में स्थित उत्तरी गलवान के देप्सांग क्षेत्र में भी प्रवेश कर गए हैं। यहां उन्होंने पीपी 12 और पीपी 13 तक के पूरे इलाके को अपने कब्जे में ले लिया है। इसका मतलब यह है कि भारतीय सेना को पैंगांग और गलवान सेक्टर जहां चीनी सेना पहले ही घुसपैठ कर ली है, के अलावा और सेक्टरों को भी सुरक्षित करना होगा। इसमें उत्तराखंड से जुड़ा हर्सिल सेक्टर भी शामिल है जहां पीएलए ने पहले ही अपनी सैन्य संख्या बढ़ा दी है। देप्सांग वही सेक्टर है जहां भारत और चीन के बीच 2013 में तनाव हुआ था।

मौजूदा संकट अप्रैल के अंत में शुरू हुआ जब भारतीय खुफिया एजेंसियों ने एलएसी पर चीनी सैनिकों के जमावड़े की सूचना दी। हालांकि भारतीय सेना ने कोविड 19 की महामारी के चलते उसको काउंटर करने के लिए फोर्स नहीं तैनात करने का फैसला लिया।

इसका नतीजा यह हुआ कि जब अप्रैल के अंत में एलएसी को पार कर बड़ी संख्या में चीनी सैनिक गलवान और पैंगांग में घुस आए तो भारतीय सेना की आंखें खुली की खुली रह गयीं।

हालांकि भारतीय सेना और पीएलए पेट्रोलों के बीच साल के इस मौसम में झगड़े कोई अप्रत्याशित नहीं हैं। लेकिन सोमवार के पहले भी इस बात के संकेत मिल गए थे कि मौजूदा झड़प सामान्य दिनों जैसी नहीं है। पहले पीएलए ने गलवान जैसे इलाके को अपने कब्जे में लिया जो परंपरागत रूप से शांतिपूर्ण माना जाता है। दूसरा वे अप्रत्याशित रूप से भारी तादाद में हजारों की संख्या में घुसे।

आखिर में यह बिल्कुल साफ तौर पर विवादित क्षेत्र के अस्थाई रूप से कब्जे का मामला नहीं था जैसा कि 2013 में देप्सांग या फिर 2014 में चुमार में हुआ था। इस बार पीएलए के सैनिक रक्षा चौकियां स्थापित कर रहे थे। बंकर बनाने की तैयारी कर रहे थे और उसके साथ ही और अपने घुसपैठियों को पीछे (हालांकि यह उनके ही क्षेत्र में था) से मदद देने के लिए तोपों को भी तैनात कर दिए थे। 

लद्दाख में पीएलए की घुसपैठ कोई स्थानीय घटना नहीं लगती है। यह 2000 किमी के पूरे उस मोर्चे का ही हिस्सा है जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी पीएलए के अलग-अलग ब्रिगेड और डिवीजनों की है। यह बताता है कि पूरे मामले का सैन्य और राजनीति के उच्च स्तर पर केंद्रीयकृत समन्वय किया जा रहा है।

(रक्षा विशेषज्ञ कर्नल (रिटायर्ड) अजय शुक्ला का यह लेख बिजनस स्टैंडर्ड में मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था जिसका यहां साभार हिंदी अनुवाद दिया जा रहा है।)    

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